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लघुकथा // आटोवाली // अतुल शुक्ला

आटोवाली

शहर के प्रतिष्ठित मेडिकल अस्पताल परिसर के कांफ्रेंस हाल में आज नये डॉक्टरों का दीक्षांत समारोह का आयोजन है समारोह में भाग लेने के लिये नये डॉक्टर अपने परिवार जनों के साथ आये हुये हैं। बडी बडी गाडियों के बीच एक आटो भी परिसर में अन्दर आया। आटो चालाक की सीट पर खाकी ड्रायवर की वर्दी पहने हुये रमा ने आटो स्टेण्ड पर आटो खड़ा कर कांफ्रेस हाल की ओर अपने कदम बढाये उसका आत्मविश्वास उसके चेहरे पर साफ झलक रहा था वो बहुत खुश थी। कांफ्रेंस हाल में कार्यक्रम के प्रारम्भ होते ही पहले नम्बर पर ही नाम पुकारा गया डॉक्टर आशा। हाल में चारों और तालियां बज उठी अपनी बेटी आशा का नाम सुनते ही रमा भी अपनी सीट पर से खडी होकर पूरे जोश में ताली बजाने लगी। आशा आगे बढी और मुख्यअतिथि के हाथों डिग्री लेकर पीछे मुड़कर देखा तो माँ लगातार ताली बजाये जा रही है।

रमा की खुशी का ठिकाना नहीं था आज उसे जीवन का हर पल याद आ रहा था जब उसके पति कहते थे मैं अपनी बिटिया को डॉक्टर बनाऊॅगा वो रोज अपनी गाडी से बिटिया को स्कूल ले जाते उसकी सुख सुविधा का पूरा ध्यान रखते। अचानक एक दिन जिन्दगी तूफान आया। शाम को आफिस से लौटते समय एक्सीडेंट में आशा के पिता का देहांत हो गया। उसका हंसता खेलता परिवार बिखर गया। धीरे धीरे घर का गुजारा चलाना भी मुश्किल हो गया पति के वेतन के अलावा घर में आमदनी का कोई सहारा नहीं था वह स्वयं भी इतनी पढी लिखी नहीं थी कि किसी आफिस में कोई काम कर लेती। नाते रिश्तेदार सब धीरे धीरे किनारा करने लगे। इन परिस्थितियों में उसने घर से बाहर निकलकर कुछ करने की कोशिश की नाते रिश्तेदारों ने उसे हर काम करने से रोका वो जो भी काम करने के लिये आगे बढ़ती उसको टोक दिया जाता रोक दिया जाता कहते परिवार की इज्जत का ख्याल रखो तुम महिला हो नहीं कर पाओगी सब टोकते पर कोई मदद न करता ना ही कोई रास्ता बताता। वो भी यही सोचती कि काम करे भी तो क्या करे कैसे घर का गुजारा चलाये उसे अपने पति का सपना पूरा भी करना है आशा को डॉक्टर बनाना है वो हर दिन यही सब सोचती रहती। उसने पति के साथ कार की पहली सीट पर बैठकर कार चलाना तो सीख लिया था। कार चलाने के अलावा और कोई काम उसे आता नहीं। घर के खर्च चलाने में उसे असुविधाओं का सामना करना पड़ता रमा ने इन सब परिस्थितियों के बावजूद आशा का स्कूल बंद नहीं कराया। एक दिन पडोस में रह रहे शर्माजी के बच्चों को स्कूल ले जाने वाला आटो नहीं आया समय पर स्कूल पहुँचाने के लिये शर्माजी ने कहा भाभीजी आपकी कार से आप बच्चों को स्कूल छोड़ दो हम आटो का किराया दे देंगे। रमा को तो पैसों की सख्त जरूरत थी आज आशा की फीस भी भरना थी वह तुरन्त तैयार हो गई पति की कार को साफ किया और स्कूल छोड़ आई शर्माजी ने जब हाथ में पैसे दिये तो उसकी अन्दर से आत्मविश्वास जागा कि वह गाडी चलाकर भी पैसे कमा कर अपना जीवन यापन कर सपने साकार कर सकती हैं।

रमा ने अपने पति की पुरानी कार को बेचकर आटो खरीदा उसने मन ही मन ठान लिया कि वह लोगों की परवाह क्यों करे जब पति का स्वर्गवास हुआ तो कोई मदद के लिये आगे नहीं बढा सब हंस रहे थे। आज उसने ठान लिया है और ड्रायवरी के अपने हुनर को अपना व्यवसाय बना लिया। आशा की सहेलियों और आस पड़ोस के बच्चों को आटो से स्कूल लाने और छोड़ने का काम शुरू कर दिया। खाली समय में वह आटो लेकर आटो स्टेंड पर भी जाने लगी। सब उसके ऊपर हंसते ताने भी मारते कोई बुरी निगाह से भी देखता परन्तु उसने शर्मोहया को छोड़कर उसे तो बस एक ही जुनून था कि बेटी आशा को पढा लिखाकर पति का अधूरा सपना पूरा करना है उसे डाक्टर बनाना है। वह अपनी ही धुन में आगे बढ़ती रही।

कांफ्रेंस हाल में चारों ओर तालियां बज रही थी रमा की आंखों में आत्मविश्वास के आंसू आ रहे थे उसे अपने आप पर गर्व हो रहा था कि आज उसने कुरीतियों की परवाह किये बिना अपने पति का सपना पूरा कर दिया वह प्रफुल्लित होकर अपने आंसुओं को दबाते हुये पूरे जोश में सिर उठाकर तालियां बजाये जा रही थी। आशा के नम्बर देखकर मुख्यअतिथि ने आशा से कहा अपने अभिभावकों को बुलाओ हम उनसे मिलना चाहते हैं। आशा ने उत्साह से हाथ हिलाते हुये इशारा कर मां को बुलाया आत्मविश्वास भरपूर विजयी मुद्रा में जब रमा स्टेज की ओर आगे बढी कांफ्रेंस हाल में सभी देखकर हैरान हो गये प्रदेश में नम्बर एक पर आने वाली डॉक्टर आशा की मां आटो चालक की ड्रेस में रमा है।

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