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लघुकथा - सबका अधिकार - ज्ञानदेव मुकेश


    बाट जोहते-जोहते सुबह से दोपहर हो गई। मगर कामवाली बाई नहीं आयी। घर की गृहिणी दांत पीसने लगी और पांव पटकती रही। उन्होंने निश्चय कर लिया कि आज इस कमबख्त की छुट्टी करके ही दम लेना है।
    शाम को कामवाली आयी। उसे देखते ही गृहिणी के गुस्से का बम उसपर फट पड़ा, ‘‘सुबह क्यों नहीं आई ? तमाशा बना रखा है ? खुद को समझती क्या हो ? किसी रियासत की नवाबजादी ?’’
    कामवाली बिल्कुल शांतचित रही। उसने धीरे से कहा, ‘‘मां जी, मैं अब काम नहीं करूंगी।’’
    गृहिणी भौंचक रह गई। उसने पूछा, ‘‘क्या कहा ? काम नहीं करेगी ? तू क्या बहुत पैसे वाली हो गई है ?’’
   कामवाली ने शांति बनाए रखते हुए कहा, ‘‘मैं बहुत पैसेवाली तो नहीं हुई। मगर हां, मेरा मरद इतना जरूर कमाने लगा है कि मुझे अब काम करने की जरूरत नहीं है।’’
    गृहिणी ने व्यंग्य से पूछा, ’’क्या तेरा मरद हवाई जहाज उड़ाने लगा है ?’’
    कामवाली ने सहज भाव से कहा, ‘‘हवाई जहाज तो नहीं, मगर बैटरी से चलने वाला हवा-हवाई ऑटो चलाने लगा है।’’
   गृहिणी का वाणी-प्रहार जारी रहा, ‘‘तुमलोगों में यही खराब आदत है। घर में थोड़े से पैसे आए नहीं कि ऐंठने लगती हो और काम छोड़कर बैठ जाती हो। एक दिन ऑटो बंद हो जाएगा, फिर तुम पुराने रास्ते पर आ जाओगी।’’
    कामवाली ने कहा, ‘‘मां जी, ऐसे न बोलिए। मेरा मरद आगे चलकर टैक्सी भी लेने वाला है। उसकी आमदनी और बढ़ जाएगी तब मैं घरों में बर्तन-वासन करना तो क्या मैं खुद अपने घर में कामवाली रख लूंगी। तरक्की करना सिर्फ आप ही लोगों का अधिकार है क्या ? हम क्या ज़िन्दगी भर एक ही जगह रह जाएं ?’’
              
                                                         -ज्ञानदेव मुकेश                                               
                                     पता-
                                                 फ्लैट संख्या-301, साई हॉरमनी अपार्टमेन्ट,
                                                 अल्पना मार्केट के पास,
                                                 न्यू पाटलिपुत्र कॉलोनी, 
                                                  पटना-800013 (बिहार)

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