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भाषा अनुसंधान : सांस्कृतिक संदर्भ - डॉ. गोरख काकडे

भाषा अनुसंधान : सांस्कृतिक संदर्भ

डॉ. गोरख काकडे

सरस्वती भुवन कला, वाणिज्य महाविद्यालय,

औरंगाबाद (महाराष्ट्र)


खोज एवं आविष्कार मनुष्य की मूल प्रवृत्तियाँ हैं। मनुष्य ने अपने भौतिक एवं बौद्धिक जीवन को इन्हीं मूल प्रवृत्ति के विकास से समृद्ध बनाया है, और अपनी क्षमताओं को भी परखा है। आज के समय में हो रहे नवीन शोध सत्य को अस्थायी बना रहे हैं, और अपने युग के एक अलग सत्य को दुनिया के सामने रख रहे हैं। यह सारा संभव हो रहा है मनुष्य की खोज वृत्ति के कारण। और यही खोजी वृत्ति हमें उकसाती है कि, खोज या शोध क्या है?

इसी शोध को अनुसंधान का नाम प्राप्त हुआ है। अनुसंधान इस संकल्पना को स्पष्ट करते हुए एस. एन. गणेशन अपनी बात रखते हैं कि, ’’अनुसंधान अथवा शोध उस प्रक्रिया या कार्य का नाम है जिनमें बोधपूर्वक प्रयत्न से तथ्यों का संकलन कर सूक्ष्मग्राही एवं विवेचक बुध्दि से उनका अवलोकन-विश्लेषण करके नये तथ्यों या सिध्दान्तों का उद्घाटन किया जाता है। दूसरे शब्दों में, पहले अज्ञान वस्तुओं, तथ्यों या सिद्धांतों के आविष्कार की बोधपूर्वक क्रिया ही अनुसंधान है।’’1 सिद्धांतों के आविष्कार की यह बोधपूर्वक क्रिया ही आज हमें अनुसंधान के विभिन्न क्षेत्रों में अपनी भूमिका निभाती दिखाई देती है। फिर वह वैज्ञानिक अनुसंधान हो, तकनीकी अनुसंधान हो, मानवीकीय अनुसंधान हो, सामाजिक, सांस्कृतिक, साहित्यिक या भाषिक अनुसंधान हो। इसमें से यहाँ हम भाषिक अनुसंधान पर बात करेंगे। भाषिक अनुसंधान के भी अनेक पहलू हैं। इन पहलुओं में से हम केवल भाषा अनुसंधान के सांस्कृतिक पहलुओं पर बात करेंगे। जिसे शोध प्रपत्र में आगे सांस्कृतिक संदर्भ कहा गया है। इस शोधालेख में हम देखेंगे कि, क्या भाषा अनुसंधान में सांस्कृतिक संदर्भ अपना महत्व रखते हैं? वे कौन से सांस्कृतिक संदर्भ हैं जिनकी सहायता से भाषा अनुसंधान में मदद मिल सकती है? क्या उनकी वजह से प्रचलित सत्य बदल सकते हैं? ऐसे अनेक प्रश्नों के उत्तर पाने का छोटा सा प्रयास है यह शोध-प्रपत्र।

भाषा अनुसंधान केवल भाषा का ही नहीं ंतो वह संस्कृति का भी अनुसंधान होता है। संस्कृति का अभिन्न अंग भाषा है और भाषा का अभिन्न अंग संस्कृति है। दोनों में से एक का नष्ट होना दूसरे की मृत्यु है। इसलिए इस शोधालेख में भाषा और संस्कृति दोनों को एक-दूसरे के पूरक रुप में देखकर विचार किया जाने वाला है।

भाषा पर अनुसंधान करते समय भाषा के अंगों को समझना जरुरी होता है। जिसमें स्वर, व्यंजन, शब्द, शब्दों की रचना, वाक्य निर्माण, वाक्य के अंग, पद या रुप रचना, अर्थ प्राप्ति, अर्थ परिवर्तन, व्याकरण, लिपि आदि का समावेश है। इन सभी को सामने रखकर भाषा अनुसंधान किया जाता है। भाषा अनुसंधान के अंगों को समझने के बाद जरुरी हो जाता है कि संस्कृति और सांस्कृतिक संदर्भों को समझना। संस्कृति का स्वरुप स्पष्ट करते हुए जवाहरलाल नेहरु रामधारी सिंह दिनकर के ’संस्कृति के चार अध्याय’ इस किताब की प्रस्तावना में लिखते है, ’’संस्कृति है क्या? शब्दकोश उलटने पर इसकी अनेक परिभाषाएँ मिलती हैं। एक बड़े लेखक का कहना है कि, ’’संसार भर में जो भी सर्वोत्तम बातें जानी या कही गई है, उनसे अपने आपको परिचित करना संस्कृति है।’’ एक दूसरी परिभाषा में यह कहा गया है कि, ’’संस्कृति शारीरिक या मानसिक शक्तियों का प्रशिक्षण, दृढीकरण या विकास अथवा उससे उत्पन्न अवस्था है।’’ यह ’’मन, आचार अथवा रुचियों की परिष्कृति या शुध्दि है।’’ यह ’’सभ्यता का भीतर से प्रकाशित हो उठना है।’’ इस अर्थ में, संस्कृति कुछ ऐसी चीज का नाम हो जाता है, जो बुनियादी और अन्तर्राष्ट्रीय है।’’2 इससे स्पष्ट होता है कि संस्कृति में मूर्त और अमूर्त दोनों का समावेश होता है। मूर्त भौतिक जगत से संबंधित होती है, तो अमूर्त मानसिक जगत से संबंधित होती है। जिसे हम मूल्य कहते हैं।

संस्कृति के अंगों, संदर्भों को स्पष्ट करे तो कह सकते हैं कि जीवन आचरण से संबंधित सकारात्मक बातें ही संस्कृति है। यह सकारात्मक बातें स्थूल रुप में इस प्रकार हो सकती हैं - संबंधित समूहों के आचार-विचार, रहन-सहन, खान-पान, रीति-रिवाज, परंपराएँ, पर्व, उत्सव, त्यौहार, संस्कार, लोककथाएँ, लोकगीत, लोकोक्तियाँ, लोकधारणाएँ, ललित कलाएँ, आध्यात्मिक धारणाएँ, देव-देवताएँ, धर्मग्रंथ मानवीय मूल्य आदि।

भाषा अनुसंधान के अंगों और संस्कृति के अंगों को, संदर्भों को समझने के बाद देखते हैं कि भाषा अनुसंधान में सांस्कृतिक संदर्भ अपनी भूमिका कहाँ तक निभाते हैं।

भाषा अनुसंधान के सांस्कृतिक संदर्भों को देखते समय सबसे पहला संदर्भ हमारा सामने आता है, भाषा उत्पत्ति से संबंधित सिद्धांतों में। भाषा उत्पत्ति के बारे में सही-सही वैज्ञानिक सिद्धांत अब तक स्थापित नहीं हुआ। किसी भी विद्वान ने भाषा की उत्पत्ति निश्चित रुप से ऐसी ही हुई है, यह नहीं बताया। जो सिद्धांत स्थापित हुए हैं उनमें, ’दैवी उत्पत्ति का सिद्धांत’, ’विकासवादी सिद्धांत’, ’निर्णय सिद्धांत’, ’धातु सिद्धांत’, ’अनुकरण सिद्धांत’, ’मनोभावाभिव्यक्ति सिद्धांत’, ’यो-हे-हो सिद्धांत’, ’टा-टा सिद्धांत’, ’संगीत सिद्धांत’ आदि का समावेश है।

उपर दिये गये सिद्धांतों में से पहला ’दैवी उत्पत्ति का सिद्धांत’ और अंतिम ’संगीत सिद्धांत’ तो संस्कृति से जुडे मुखर संदर्भ हैं। जो भाषा अनुसंधान में अपना महत्त्वपूर्ण स्थान रखते हैं। यह सिद्धांत केवल किसी एक ही भाषा की उत्पत्ति से संबंधित नहीं हैं। इसके बारे में भोलानाथ तिवारी लिखते हैं, ’’संस्कृत भाषा तथा उसके व्याकरण के मूलाधार पाणिनि के १४ सूत्र शिव के डमरु से निकले माने जाते हैं।... बौध्द ’पालि’ को भी इसी प्रकार मूल भाषा मानते रहे हैं और उनका विश्वास रहा है कि भाषा अनादि काल से चली आ रही है। जैन लोग तो संस्कृत पंडितों और बौध्दों से भी चार कदम आगे हैं। उनके अनुसार तो ’अर्धमागधी’ केवल मनुष्यों की ही मूल भाषा नहीं है, बल्कि सभी जीवों की मूल भाषा है।... ईसाई और उनमें भी प्रमुखतः कैथोलिक लोग ’हिब्रु’ (जिसमें उनका धर्मग्रंथ Old Testament लिखा गया है) को संसार की सभी भाषाओं की जननी मानते हैं।... मुसलमान लोग ’कुरान’ को खुदा का कलाम मानते हैं। मिस्त्र में भी वहाँ के प्राचीन लोगों का अपनी भाषा के संबंध में कुछ ऐसा ही विश्वास था।’’3 इन सारी बातों से स्पष्ट होता है कि भाषा अनुसंधान में संस्कृति से जुड़े यह संदर्भ अपना महत्व रखते हैं।

भाषा उत्पत्ति के सिद्धांतों के समान ही भाषिक परिवारों के नाम भी हमें संस्कृति के सांस्कृतिक संदर्भों से जोड़ देते हैं। विद्वानों ने संस्कृति को केंद्र में रखकर ही भाषिक परिवारों का नामकरण किया है। जैसे, बुशमैन, बांटु, हैमेटिक-सेमेटिक, काकेशियन, चीनी, द्रविड़, आस्ट्रो-एशियाटिक, जापानी-कोरियाई, भारोपीय आदि। इन भाषा परिवारों का अनुसंधान हम उनकी संस्कृति को समझे बगैर नहीं कर सकते। इन परिवारों का अध्ययन, अनुसंधान करते समय हमें तुलनात्मक भाषा अनुसंधान का सहारा लेना पड़ता है। भाषिक परिवारों की जड़ तक पहुंचने की दृष्टि से भी सांस्कृतिक संदर्भ अपना महत्व रखते हैं।

जब भाषा का तुलनात्मक अनुसंधान किया जाता है और एक जैसे शब्द दूसरी भाषा में मिलने लगते हैं, तो उनके कारणों की खोज में सांस्कृतिक संदर्भ हमारी मदद करते हैं। इस अनुसंधान में देखा जाता है कि, क्या उनकी संस्कृति में भी साम्य है? अगर साम्य है तो वहाँ उन शब्दों का क्या अर्थ है? क्या यहाँ भी वही अर्थ है? ऐसे अनेक सवालों के उत्तर हमें सांस्कृतिक संदर्भों के आधार पर मिल सकते हैं, ‘‘हिंदी, उर्दू, बंगला, मराठी, गुजराती, उडिया, पंजाबी, असमी, गुरखाली और कश्मीरी आदि भाषाएँ आर्य भाषाएँ हैं जो संस्कृत की परम्परा से उत्पन्न हुई हैं। भारत से बाहर आर्यभाषाओं का संबंध हिन्द-जर्मन भाषा समूह से है। कहते हैं, हिंद-जर्मन भाषाएँ बोलनेवाले लोग किसी समय एक ही जगह रहते थे और उसी कबीले की भाषा से संसार की समस्त आर्य भाषाएँ निकली हैं।... हिंद-जर्मन-परिवार की भाषाओं में जो समानता है, उसी से यह अनुमान किया गया है कि प्रायः समस्त यूरोप के लोग उसी परिवार से निकले हैं, जिस परिवार के भारतीय आर्य थे।‘‘4 और यह अनुमान लगाने में सांस्कृतिक संदर्भ मदद करते हैं, ‘‘ईसा से 3 हजार वर्ष पूर्व भूमध्यसागर से लेकर सिंधु की घाटी तक, जो सभ्यता फैली हुई थी, वह बहुत कुछ समान थी। द्रविडों में जो मातृमूलक परम्परा है, वह इमेलाइट लोगों में भी थी। इसी प्रकार, सर्प पूजा और देवीमाता की पूजा भी उन लोगों में प्रचलित थी। सुमेरिया में देवदासी जैसी भी कोई प्रथा थी। सुमेरिया में एक ऐसे देवता की भी पूजा चलती थी, जिनका वाहन बैल था।‘‘5 रामधारी सिंह दिनकर की इन धारणाओं से श्री जयचन्द्र विद्यालंकार और डॉ. सुनिति कुमार चटर्जी की धारणाएँ भी मेल खाती है, सन् 1786 में सर विलियम जोंस ने यह स्थापना रखी है कि, युनानी, लातानी, गोथिक, कैल्टिक, फारसी और संस्कृत ये सभी भाषाएँ किसी एक ही भाषा से विकसित हुई हैं।‘‘6

सूक्ष्म दृष्टि से अगर हम भाषा अनुसंधान के सांस्कृतिक संदर्भों की ओर देखे तो भाषा की संरचना हमारा ध्यान खिंचती है। भाषा की सबसे लघुत्तम इकाई स्वन या ध्वनि को माना जाता है। जिसमें स्वर और व्यंजन सम्मिलित होते हैं। जब हमें स्वनों के निर्माण और उसके विकास की खोज लेनी हो तो अन्य शोध-संदर्भों के साथ-साथ सांस्कृतिक संदर्भों की भी मदद लेनी पडती है। आज तक स्वनों के उच्चारण का एकदम प्रारंभिक रुप क्या था यह कहना तो असंभव है। लेकिन स्वनों के लिखित रुप में बारे में कुछ कहा जा सकता है कि, उनका आरंभिक रुप कैसा था। देवनागरी का विचार करे तो ’अ’ इस स्वन का स्वरुप हमें भारतीय संस्कृति से जुडा हुआ लगता है। हातनूर के शिलालेख का परिचय देते हुए प्रा. रघुनाथ महारुद्र भुसारी अपनी किताब ’साहित्य आणि संशोधन’ में स्पष्ट करते हैं कि, ’’इस शिलालेख की लिपि देवनागरी है। अक्षरों की लिखावट बारहवीं सदी के अन्य शिलालेखों जैसी ही है। इस शिलालेख के ड्ढ और चा इन अक्षरों को छोड दे तो बाकि के अक्षरों की लिखावट आधुनिक लिखावट जैसी लगती है...

१) सुकु १२२३ प्ल २) व स्वच्छरे पुरुषु

3) दे ऊ पंडिति नां ४) गनाथांचा प्रस (सा)

5) दु केला व्रिध्हि के ६) लि. सुतारु हा

7) रिदे ऊ नागना ८) था नमस्तु ।। ’’7

उपरोक्त उदाहरण को सामने रखकर हम कह सकते हैं कि ड्ढ जैसी अनेक ध्वनियाँ संस्कृति से जुडी हुई हैं होगी जो भाषिक स्वन बनी होंगी।

भाषा में सबसे अर्थपूर्ण लघुत्तम इकाई कहे जानेवाले शब्दों के अनुसंधान के बारे जब विचार करते हैं तो अनेकानेक शब्दों की निर्मिति और विकास संस्कृति से संबंधित होने का सत्य प्राप्त होता है। फिर वह हिंदी का ‘अवेषणा‘ हो, फ्रेंच का ‘बैंक‘ हो या अंग्रेजी का ‘बजेट‘ हो। ऐसे शब्दों की उत्पत्ति ढूँढने के लिए वहाँ की संस्कृति को समझना आवश्यक होता है। जैसे, ‘गवेषणा‘ शब्द की निर्मिति गाय को खोजने से हुई है, ‘बैंक‘ शब्द की निर्मिति इटली के यहूदी साहूकारों के व्यापारिक संस्कृति से जुडी है। वे ’बेंच’ पर बैठकर व्यापार करते थे तो ’बेंच’ से ’बैंक’ बना है। ब्रिटीश संसद में जब बजेट पेश किया जाता था तो चमडे की बैग लेकर जाने की संस्कृति थी। उस बैग को ’बजेट’ कहते थे। ऐसे अनेकानेक संदर्भ हैं जो संस्कृति से जुड़े हुए हैं। समय-समय की प्रचलित संस्कृतियों का आधार लेकर भी शब्दों के प्रयोग को समझा जा सकता है। वैदिक संस्कृति के समय में जीव, आत्मा, जगत जैसे शब्दों का प्राबल्य था तो बुध्द के समय में शील, अहिंसा, शांति जैसे शब्दों का प्रयोग ज्यादा था। ऐसी स्थितियों को समझने के लिए भी सांस्कृतिक संदर्भों की मद्द लेनी पडती है।

शब्दों के अर्थ परिवर्तन पर जब हम विचार करते हैं तब भी सांस्कृतिक संदर्भ हमारी मद्द करते हैं। जैसे, ‘गोबी‘ का कोबी होना, ‘पाखाने‘ का दिशा मैदान होना, ‘असुर‘, ‘मुसलमान‘ और ‘हिंदू‘ का अर्थ बदलना, ’’असुर का पहले हमारे यहाँ ’देवता’ अर्थ था। उस समय तक संभवतः ईरान वालों के प्रति हम लोगों के विचार बुरे नहीं थे। किन्तु ज्यों ही विचार बदले, हमने उस शब्द का अर्थ ’राक्षस’ इसलिए कर लिया कि वह नाम ईरानियों के प्रधान देवता (अहुरमज़्दा) का था। यही बात वहाँ भी हुई। हमारे ’देव’ शब्द का अर्थ उन लोगों ने अपने यहाँ अदेव या राक्षस कर लिया। सांप्रदायिक दंगों तथा पाकिस्तान के बटवारे के समय ‘मुसलमान‘ शब्द का अर्थ यहाँ कुछ गिर गया था। ’हिंदू’ शब्द की यह दशा पाकिस्तान में अब भी है। सनातनी हिंदुओं में ’ईसाई’ के अर्थ की भी यही दशा है। फारसी में ’हिंदू’ का अर्थ बहुत पहले ’गुलाम’, ’काफिर’, और ’नापाक’ आदि है।’’8 ऐसे अनेक शब्द हैं जिनका अर्थ और अर्थ परिवर्तन के कारण, अर्थ परिवर्तन की दिशाएँ समझने के लिए सांस्कृतिक संदर्भों का आधार लेना होता है।

वाक्य रचना में कर्ता, कर्म, क्रिया, नाम, सर्वनाम, धातु, लिंग, वचन, कारक, उपसर्ग, प्रत्यय, समास, संधी आदि का महत्वपूर्ण स्थान होता है। इनके प्रयोग और की खोज में भी सांस्कृतिक संदर्भ हमारी मद्द करते हैं। हर एक समूह की संस्कृति होती है और वह समूह अपनी संस्कृति के अनुसार भाषा की वाक्य रचना करता है। हिंदी बोलने वाला समूह कर्ता$कर्म$क्रिया का प्रयोग करता है। अंग्रेजी बोलनेवाला समूह कर्ता$क्रिया$कर्म का प्रयोग करता है। हिंदी बोलनेवाला पिता को ‘आप‘ कहेगा, समवयस्क मित्र को ‘तुम‘ कहेगा और बेटे को ‘तू‘ कहेगा, किन्तु अंग्रेजी बोलनेवाला व्यक्ति सबके लिए केवल ल्वन का ही प्रयोग करेगा। इसका मतलब यह नहीं कि अंग्रेजी बोलनेवाला व्यक्ति अपने पिता की अवहेलना करता है। वह भी उतना ही सम्मान करता है, जितना हिंदी बोलनेवाला। फिर ऐसा क्यो? इस सवाल का उत्तर पाने के लिए हमें मदद लेनी होती है सांस्कृतिक संदर्भों की। शब्द संगठन को जोड़नेवाली सांस्कृतिक संदर्भों की बात करते हुए पियुष कुमार श्रीवास्तव प्रा. दिलीप सिंह के विचारों को व्यक्त करते है कि, ’’संसार की किसी भी भाषा में रिश्ते-नाते की शब्दावलियों का संगठन (Organisation) और विश्लेषण (Analysis) लिंग, रक्त संबंध और विवाह सम्बन्धों के आधार पर ही किया जाता है।’’9 इस आधार पर हम कह सकते हैं कि शब्द संरचना और भाषा व्यवहार के पीछे सांस्कृतिक संदर्भ जुड़े होते हैं।

बोली भाषा के अनुसंधान के लिए तो सांस्कृतिक संदर्भ प्राथमिक संदर्भ/स्त्रोत होते हैं। विश्व में अनेक बोलियाँ बोली जाती हैं। समूह, जाति, जनजाति, प्रदेश आदि के अनुसार बोलियों का वर्गीकरण किया जाता है। इन वर्गीकृत बोलियों पर अगर अनुसंधान करना हो तो सबसे पहले हमें उनकी संस्कृति/लोकसंस्कृति को समझना पडता है। उनके उत्सव, त्यौहारों, पर्वों में शामिल होना पड़ता है, उनके लोकगीतों, लोकविश्वासों, लोक-कलाओं, लोकोक्तियों, ललित कलाओं, उनके आचार-विचारों को समझना पड़ता है। तब जाकर हम उनकी बोली भाषा का अध्ययन/अनुसंधान कर सकते हैं। ‘बोडो‘ समाज समूह से निकली ’गारो भाषा’ का उदाहरण ले लेते हैं, ’’गारो भाषा और संस्कृति की विरासत समृध्द है और वह वाचिक परंपरा के रुप में ही हस्तांतरित होती आई है। गारो भाषा की विविध बोलियों का शब्द भंडार भी समृध्द है जिसे आज तक कोशबध्द नहीं किया जा सका है। इसके अतिरिक्त तोलकचिया (पहेलियाँ), कत्ता मेआपा (लोकोक्तियाँ), कत्ता रोंगचू (पारंपरिक कथाएँ), माअंबि (पारंपरिक इतिहास) आदि मौखिक परंपरा द्वारा हस्तांतरित साहित्य है।’’10 इस मौखिक साहित्य को समझने के लिए और बोलीभाषा पर अनुसंधान करने के लिए उनके सांस्कृतिक संदर्भों को समझना आवश्यक होता है।

भाषा में मिथकों, प्रतीकों, कहावतों, मुहावरों, घोषणाओं, सुक्तियों आदि का भी महत्वपूर्ण स्थान होता है। जब इस पर शोध की दृष्टि से विचार किया जाता है तो अनायास ही हमें परंपराओं, रुढियों, और पौराणिक संदर्भों का आधार लेना होता है। ‘एकलव्य‘, ‘कर्ण‘ के मिथक को समझने के लिए हमें महाभारत कालीन संस्कृति को समझना आवश्यक होता है। ’हर हर महादेव, बम बम भोले, जो बोले सो निहाल’ जैसे घोषवाक्यों को समझने के लिए ’हिंदू’ और ’सिख’ संस्कृति का आधार लेना पड़ता है। साथ ही पूरे ’युधिष्ठिर के अवतार’, ’भाग्य के सबसे बडे साथी’, ’लक्ष्मी के पति’, ’धर्मावतार’ जैसी कहावतों और मुहावरों को समझने के लिए सांस्कृतिक संदर्भों का आधार लेना पड़ता है।

भाषा के सामान्यतः दो प्रमुख अंग माने जाते हैं, एक है मौखिक और दूसरा है लिखित। इसमें से दूसरा लिपि कहलाता है। लिपि अनुसंधान में भी सांस्कृतिक संदर्भ अपनी ओर से मदद करते हैं। आज भी लिपि के उद्भव के बारे में शिलालेखों को संदर्भ माना जाता है। साथ ही देव-देवताओं के चित्र, देव-देवताओं संबंधी धारणाओं, त्यौहारों की झाँकियों के चित्र, मूर्तिकला, मंदिर, स्थापत्य कला आदि को लिपि उद्भव एवं विकास के अध्ययन के साधन माना जाता है, जो संस्कृति के अंग माने जाते हैं। साथ ही भाषा-शैलियों के अनुसंधान में भी सांस्कृतिक संदर्भ अपना विशिष्ट स्थान रखते हैं।

संक्षेप में हम कह सकते हैं कि भाषा अनुसंधान के अनेक संदर्भों में सांस्कृतिक संदर्भ अपना महत्वपूर्ण स्थान रखते हैं। भाषा का अनुसंधान करने वाला व्यक्ति प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रुप से सांस्कृतिक संदर्भों का आधार लेता ही है। कभी वह भाषा उत्पत्ति, भाषा विकास, स्वन, शब्द, पद की खोज में संस्कृति का आधार लेता है, तो कभी अर्थ प्राप्ति, वाक्य संरचना, प्रतीकों, बिंबों, मिथकों, कहावतों, मुहावरों के संबंध में, तो कभी बोली भाषा के अनुसंधान में सांस्कृतिक संदर्भों का आधार लेता है। सांस्कृतिक संदर्भों का आधार लिए बिना भाषा का अनुसंधान पूरा नहीं हो सकता और अगर हम उसे पूरा कहे तो वह ’युधिष्ठिर के अर्धसत्य’ जैसा होगा।

संदर्भ :

1. एस. एन. गणेशन, अनुसंधान प्रविधि सिद्धांत और प्रक्रिया, लोकभारती प्रकाशन, इलाहाबाद, स. 2007 पृ. 13

2. जवाहलाल नेहरू, संस्कृति के चार अध्याय (रामधारी सिंह दिनकर), लोकभारती प्रकाशन, इलाहाबाद, तीसरा सं. 2010 पृ. गप

3. भोलानाथ तिवारी, भाषा-विज्ञान, किताब महल, इलाहाबाद, सं. 2002 पृ. 41, 42

4. रामधारी सिंह दिनकर, संस्कृति के चार अध्याय, लोकभारती प्रकाशन, इलाहाबाद, तीसरा सं. 2010 पृ. 28

5. वही, पृ. 22

6. वही, पृ. 39

7. प्रा. रघुनाथ महारूद्र भुसारी, साहित्य आणि संशोधन, जोशी ब्रदर्स, हैद्राबाद, सं. 1951 पृ. 128, 129

8. भोलानाथ तिवारी, भाषा-विज्ञान, किताब महल, इलाहाबाद, सं. 2002 पृ. 275, 276

9. पियुष कुमार श्रीवास्तव, मानस की समाजभाषिकी : नाते रिश्ते की शब्दावली, (भाषा : संस्कृति और लोक, संपा. डॉ. दयानंद मिश्र, वाणी प्रकाशन, दिल्ली, सं. 2012 पृ. 101)

10. श्रृति - गारो का सांस्कृतिक परिदृश्य, समकालीन भारतीय साहित्य, नवम्बर, दिसम्बर, 2012, पृ. 119

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