नाका - विश्व की पहली, यूनिकोडित हिंदी की सर्वाधिक प्रसारित, लोकप्रिय ई-पत्रिका. 

विविध विधाओं में से चुनकर पढ़ें -

* कहानी  || * उपन्यास || * हास्य-व्यंग्य  || * कविता  || * आलेख  || * लोककथा  || * लघुकथा  || * ग़ज़ल  || * संस्मरण  || * साहित्य समाचार  || * कला जगत  || * पाक कला  || * हास-परिहास  || * नाटक  || * बाल कथा  || * विज्ञान कथा  ||  * समीक्षा  ||

---***---

यहाँ की विशाल ऑनलाइन लाइब्रेरी में मनपसंद रचनाकार अथवा रचनाएँ खोज कर पढ़ें -

 नाका में प्रकाशनार्थ  रचनाएं इस पते पर ईमेल करें : rachanakar@gmail.com  रचनाकार के वाट्सएप्प नंबर 8989162192 (कृपया कॉल नहीं करें, कॉल रिसीव नहीं होगी, तथा इसका उपयोग केवल प्रकाशनार्थ रचना भेजने के लिए ही करें) पर भी वाट्सएप्प से रचनाएँ अथवा रचना पाठ के वीडियो प्रकाशनार्थ भेजे जा सकते हैं. अधिक जानकारी के लिए यह पृष्ठ [लिंक] देखें.

--

जैसे कोई तिनका हवा में...... काव्य संकलन - जितेन्द्र आनन्द

1.

एक एकाकिन सा मौन खड़ा है मेरे मन के द्वारे

सिहर-सिहर अकुलाती कल्पना बसी पलकों के सहारे

निराकार शान्ति को लेकर कहता है मुझसे ये समीर

बह जाएगा आज तुम्हारा मन में बसा बसाया शहर।

​​

​​

उड़ जाएगी तृष्णा मन की, झंझा सी जो बसी हुई

क्षुब्द सागर के विस्तारों में तूफानों से घिरी हुई

ये प्रीति तुम्हारी कर देगी मुझे इस जीवन में पागल

देखता रह गया मैं विस्तृत गगन, होकर मन से घायल ।

​​

​​

मन में बसी हुई प्रतिमा को, करता रहता हर पल दर्शन

वरदान माँगता प्राण दहन कर, पल भर साथ तुम्हारा यह मन

भटक-भटक यह डगर-डगर मेरे मन की सुलगी ज्वाला

निष्ठुर कठिन जग दे रहा है प्रतिदान मुझे विषम हाला।

​​

​​

तम से हारी हुई अभिशप्त रजनी कर रही है आज पुकार

बहुत देर हुई सुबह न आई, मन को यह कैसा इन्तजार

धरती डोल रही है कदमों में, देह में जाग उठा है कंपन

कैसी प्रचंड वेदना और उन्माद, यह शापज्वलित पापी मन ।

​​


2.

मुझे भुला दिया है तुमने, हृदय तड़फ उठता प्रतिपल

कैसी माया, जलता तिल-तिल इस ज्वाला में हर पल

न देखी कभी जीवन में ऐसी दुष्कर कठिन रात तूफानी

शोर मचाती हवा को सुना रहा हूँ, बीती हुई कहानी ।

​​

सब भूल गए तो क्या हुआ, कौन न भूला किसी को जग में

बस जरा देर भर बात हुई, सच मान लिया कैसे उस पल में

ये मोह प्रबल सा लेकर आया, कसक लिए जल जाने की

ताकत आज लगा दी मैंने, एक मृग-मरीचिका पाने की ।

​​

वह सपना था या बस आँख लगी, उल्लास भरे दो नयन

दो कदम चले, रूक-रूक कर, हर कदम पैरों में कम्पन

उत्तर, दक्षिण, पूरब, पश्चिम हर दिशा चीख-चीख कर बोले

मुझे भुला दिया तुमने, विकल भाव होकर मन मयूर डोले ।

​​

तरस दिखा मेरे चेहरे पर, हर पथिक की मुस्कान बदलती है

एक यायावर लिए, धुआँ-धुआँ होकर मन में आग सुलगती है

सच जान गयी ये दुनिया कब से, मैंने जान कर मन से न माना

मुझे भुला दिया है तुमने, बहुत देर हुई, दिल ने भी न पहचाना ।

​​

3.

मुझे बाँधकर ज्वालामुखी से, कौन छोड़ गया है चिरकाल से

कर लाख प्रयत्न, न टूटता यह बन्धन, आघात नहीं हैं काम के

अब तो दूर शीतल नदी को छूती हवा भी दाह लेकर आती

गुजर जाती इठलाकर करीब आकर, मुझे देखकर मुस्कराती ।

​​

द्रोही मन की आवाज गूँजती, निशब्द होकर अतृप्त वीरानों में

भरे कंठ से सहमा मन, सुनाये ध्वनि-हीन कथा, आख्यानों में

कैसे व्यक्त करूँ लालसा, इस अग्नि-दाह से बहुत दूर जाने की

मिट जाये जलन, हो हृदय दुराशा दूर, ऐसा अमृत पाने की ।

​​

तन मन को अब सुध कहाँ, हर प्रतिध्वनि लेकर आई निराशा

एक-एक आवाज कर रही है पुकार, लेकर चिरकाल आशा

अब कोई अभिमान नहीं, बुझते दीपक का अन्तिम उजाला

बंधे हुए ज्वालामुखी से ज्यादा, जलती है अब अंतर में ज्वाला ।

​​

कैसा सुख-दुख, कैसी उलझन, कैसा ये कठोर संसार

क्यों चाह रहा है हृदय, स्वप्निल कल्पना में बसा प्यार

कल्पित आशा लेकर, हृदय मुक्ति की कथा कहे विशेष

अन्त ज्वालामुखी का चाहे हो जाये, मन रह जाएगा शेष ।

​​


4.

संध्या ने हाथ रख दिया रवि के कंधे पर, थक-हार कर बोली

अन्त हो गया है दिन का, तारावलियाँ खेलेंगी रात भर होली

तम का प्रभाव अब फैल रहा है, चारों दिशायों में घनघोर

अँधेरे ने मिटा दिया है, अन्तर धरा-आकाश का हर ओर ।

​​

गुजरा दिन बन गया इतिहास, नहीं चाहिए कोई परिभाषा

जो पृष्ठ रह गए शेष, रिक्तता भर जाने की नहीं कोई आशा

कोई करे प्रतीक्षा रात- भर, इन हारी श्वासों को बनाकर डोली

न वापिस मिल पाएगी कभी, दर्पण में अपनी सूरत वह भोली ।

​​

काँटों के पाशों जैसी यादें, खिंची हुई तलवारें हर कोने में

सोने का असफल प्रयत्न, चिर शत्रु बन दाह लगी सेज में

पल-पल गुजरती काली रात, कह रही है अपनी व्यर्थ व्यथा

इस खालीपन लिए सन्नाटे में, कौन सुने जीवन की कथा।

​​


5.

दिन भर नाप इस काली सड़क को, मैं लौट आया थक कर

भूख लगती है प्रतिक्षण, पेट में रिरयाती हुई दीन बन कर

कर रहा हूँ स्वयं का सम्मान, एक और दिन जीने के लिए

कैसी लज्जा कैसी कराह, दो कौर जीवन निर्वाह के लिए ।

​​

दीन हो गयी कातर वाणी, भय से काँप रहा डरपोक हृदय

कल क्या होगा, क्या बदल जाएगा कराहता हुआ समय

पेट भर ही लाते हैं कहीं से पंछी, कल का न कोई डर है

प्रतिशोध लिया जीवन ने, भूख विश्व का अमिट समर है ।

​​

न कोई विश्राम चाहिए, न कोई आराम, हो दिन-रात बस काम

विकट बोझ को लेकर शूलों के पथ पर, न मिले कोई विराम

बीत गया दिन, कब रात हुई, न जाने आ गयी फिर वही सुबह

लेख विषम भाग्य की रेखा, आज फिर शुरू हुआ नया विग्रह ।

​​

1 टिप्पणियाँ

  1. बीत गया वो कल था, आने वाला कल अंजान,
    आज सामने खड़ा हमारे, अपना सीना तान !
    ये सड़क नाप ली उन लोगों ने जो पूर्वज कहलाते हैं,
    आज भी नाप रहे इसी को, इसे विकास बताते हैं ! कविता के भाव गहरे पर शिक्षाप्रद हैं !

    जवाब देंहटाएं

रचनाओं पर आपकी बेबाक समीक्षा व अमूल्य टिप्पणियों के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद.

स्पैम टिप्पणियों (वायरस डाउनलोडर युक्त कड़ियों वाले) की रोकथाम हेतु टिप्पणियों का मॉडरेशन लागू है. अतः आपकी टिप्पणियों को यहाँ प्रकट होने में कुछ समय लग सकता है.