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सच की होली और उसकी सार्थकता - शशांक मिश्र भारती

शरद ऋतु समाप्त हुई। बसन्त ऋतु आ गई। यानी कि अब होली आ गई। चारों ओर का वातावरण त्यौहार का बन गया। गले मिलेंगे। पुराने वैर भाव भुलाएंगे। भाईचारा बनायेंगे। सभी के प्रति समान और सम्मान का व्यवहार करेंगे।

किन्तु जब होली गलत तरीके से खेली या मनायी जाती है। मानव समाज की जगह बन्दर छाप कपड़ा फाड़ना आरम्भ हो जाता है। अवसरवादी अवसर पाकर दूसरों के घरों में जूते चप्पल और रंगों से सराबोर कपड़े फाड़कर फेंकने लगते हैं तो लोगों को कष्ट होता है। परेशानियां बढ़ जाती हैं। लड़ाई झगड़े का माहौल बन जाता है। कहीं कहीं झगड़े भी हो जाते हैं। इससे दूसरे त्यौहार प्रभावित होते हैं। अन्य समुदायों में अपने अपने पर्वों को लेकर अनावश्यक प्रतिस्पर्धा और दिखावा बढ़ जाता है। समाज में वैमनस्य का आधार बन जाता है। प्रशासन का काम बढ़ जाता है।

इसलिए आवश्यकता इस बात की है कि होली खेलें पर ऐसे नहीं कि दूसरों को परेशानी हो। रंग डाले पर ऐसा भी नहीं जो सामने वाले की त्वचा पर बुरा प्रभाव डाले। गन्दे पानी कीचड़ काले गोबर वार्निश आदि को किसी के ऊपर न डालें। जिससे परेशानी हो विभिन्न प्रकार के रोग पैदा हों। नाचों गाओ मनोरंजन करो। हर्षोल्लास से होली मनाओ। किन्तु गन्दी हरकतें न करो और न ही किसी को अपशब्द कहो। मिट्टी के तेल में मिले रंग तो किसी के ऊपर बिल्कुल भी न डालें। इससे शरीर को बहुत नुकसान पहुंचता है। ऐसे लोगों को होली खेलने के लिए विवश न करें जो बीमार हों या अन्य किसी कारण से होली खेलने में असमर्थ हों रेल बसों या अन्य वाहनों से यात्रा करने वालों पर रंग न डालें। पता नहीं कौन किस परिस्थिति में और कहां जा रहा हो। उसकी क्या विवशता अथवा आवश्यकता हो।

कहीं कहीं पर गोबर काला तेल कैमिकल और गोबर गुब्बारों में भर भर कर आने जाने वालों रेल और बसों पर फेंकते हैं। जोकि बहुत गलत है। इससे कई बार लोगों की आंखें तक क्षतिग्रस्त हुई हैं। त्वचा को गम्भीर हानि पहुंची है। ऐसा कृत्य करते मैंने हिन्दू ही नहीं अन्य समुदाय के लोगों को भी होली के अवसर पर देखा है। स्वंय मेरी रेलयात्रा पर ऐसी घटनायें न्यूरिया स्टेशन पर घटी हैं। कई लोग बुरी तरह प्रभावित हुए हैं। कुल मिलाकर ऐसा व्यवहार दूसरों के साथ करें। जो पहले अपने साथ करके देख लिया हो। कहने का तात्पर्य यही है कि दूसरों के साथ भी कुछ ऐसा न करें जो आपके लिए हानिप्रद हो। होली को होली की तरह भेदभाव भुलाकर मेल जोल से मनायें। दूसरों को भी यही प्रेरणा दें।

इसके अलावा कुछ व्यक्तियों ने दीपावली पर जुआं खेलने की गन्दी आदत की भांति होली में गांजा अफीम भांग शराब आदि का नशा करने की आदत डाल ली है। साथ ही दूसरों को भी हठ करके करवाते हैं। कुछ लोगों के लिए तो होली में नशा करना एक रिवाज सा हो गया है और यह जबरदस्ती का रिवाज लड़ाई झगड़े बढ़ा रहा है। घर परिवार व समाज को खोखला कर रहा है। फूट डाल रहा है।

नशा चाहें किसी का हो मनुष्य की बुद्धि बिगाड़ देता है अस्थिरता नशे की खासियत है। जिससे वह होश में नहीं रहता। अनाप शनाप बकता है। गन्दी हरकतें करता है। झगड़े फसाद पैदा होते हैं। परिणामतः समाज के अन्य लोगों को कष्ट पहुंचता है तथा होली का मजा फीका पड़ जाता है। हंसी खुशी का वातावरण उदासी में बदल जाता है। अतः ऐसे लोगों से विशेषकर होली में दूर या पूर्ण सावधान रहे। जो नशे की वस्तुएं विभिन्न मिठाईयों में मिलाकर या जबरदस्ती हठकर के खिला पिला देते हैं तथा अपने आप भी चाहें जैसी स्थिति में क्यों न हों। कैसा भी किसी किस्म का नशा न करें। घर से बाहर निकलने से पूर्व अपनी त्वचा सिर व आंखों की सुरक्षा का उपाय कर लें। किसी भी अनहोनी से स्वंय बचें और दूसरों को भी बचायें। यही सच का होली मनाना और उसका सार्थकता भी होगी।

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