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‘गुज़रा हूँ जिधर से’ ग़ज़ल संग्रह से तेजपाल सिंह ‘तेज’ की दस ग़ज़लें

तेजपाल सिंह ‘तेज’ की दस ग़ज़लें

-एक-

मौत को तकिया बनाकर ज़िंदगानी सो चली,

छोड़कर वादे - बहारी पुर - बहाराँ हो चली।

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यहाँ मोड़ हैं पग - पग घने रफ्तार क्या बने,

छोड़कर कश्ती कि वो बे – किनारा हो चली।

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देखकर सूरत – शकल, जब फूल मुरझाने लगें,

क्या करे जीकर कोई, ये सोच भारी हो चली।

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कि इंसान के हाथों गया, इंसानियत का नूर,

बदख़याली यूँ बढ़ी कि खानदानी हो चली।

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आँख हों इसकी या उसकी ‘तेज’ अब झुकती नहीं,

कि आँख का पानी मरा, तहजीब पानी हो चली।

​​

-दो-

पत्थर उठाए हाथ जो तिनके से तने हैं,

घर उन्हीं के खासकर शीशे के बने हैं।

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भीड़ तो है हर कदम पर भीड़ में साहिब,

आदमी की जून में दो - चार जने हैं।

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कल तलक था आसमाँ मेघों से बाबस्ता,

आजकल धरती पर भी घन–श्याम घने हैं।

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इंसान ने इंसानियत को आप ही अगवा किया,

माँ ने तो वरना बारहा इंसान जने हैं।

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हाथ में जिनके खिलौने चाहिए थे ‘तेज’,

खून में अपने ही उनके हाथ सने हैं।

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-तीन-

दिन गुजरा और रात हुई,

फिर भी ना प्रभात हुई।

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सूखा-सूखा अपना आँगन,

ये कैसी बरसात हुई।

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रीत गई रिश्तों की गागर,

कि मानवता बदजात हुई।

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बाहर-बाहर जीत मुकम्मिल,

भीतर-भीतर मात हुई।

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‘तेज’ बुझा सा क्यूँ रहता है,

ऐसी भी क्या बात हुई।

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-चार-

लिखने लगी कहानी बिटिया रानी रे,

लगता है अब बिटिया हुई सयानी रे।

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कि सावन-मासे मेघों से बतियावे है,

पायल की छमछम संग बरसे पानी रे।

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अलकों में नित चाँद-सितारे गूँथे है,

पूछे है दर्पन से तन के मानी रे।

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साँसे उसकी अब मधु की मोहताज कहाँ,

कल की चिंता में बेकल है नानी रे।

​​

तो होता तो पल-दो-पल बतिया लेती,

दुख अपने अब कासे करूँ बयानी रे।

​​

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-पांच-

हर पल नया सवाल हुआ है,

इतना फ़कत कमाल हुआ है।

​​

नए दौर की चकाचौंध में,

जीना बहुत मुहाल हुआ है।

​​

लोकतंत्र की छाती पर चढ़,

हरसू खूब धमाल हुआ है।

​​

इंसा के हाथों से बेशक,

इंसा आज हलाल हुआ है।

​​

प्रशासन अब राजनीति का,

सबसे बड़ा दलाल हुआ है।

​​

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-छ:-

जब-जब मौसम तनिक सुहाना लगता है,

कि अपना कोई लाख सयाना लगता है।

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चौखट पर हर साँस मौत का पहरा है,

कि जीवन ने ले लिया बयाना लगता है।

​​

हमने तो ता - -उम्र फकीरी झेली है,

साथी को मिल गया खजाना लगता है।

​​

कि गई साँझ ही उसने नाता तोड़ा है,

गुजरा लेकिन एक जमाना लगता है।

​​

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-सात-

कहाँ जवाँ हैं ग़ज़लें-नातें,

पूज रहे सब छठ और सातें।

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नए साल को कर आईना,

कि बेपर्दा हुईं शहरी रातें।

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याद आएंगी आइंदा भी,

गए वर्ष की गुजरी बातें।

​​

कल की तरियां कल भी यारा,

काम करेंगी खुलकर घातें।

​​

रोजी-रोटी की चाहत में,

कल भी होंगी लम्बी पातें।

​​

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-आठ-

जीवन भर जीवन ना पाया,

उलझी लट सुलझा ना पाया।

​​

सारी उम्र बनाया घर पर,

घर अपना घर हो ना पाया।

​​

दुनिया से टकराने वाला,

खुद से ही टकरा ना पाया।

​​

ग़ैरों को तो समझाया पर,

खुद को वो समझा ना पाया।

​​

जिसने दुनिया को अपनाया,

वो दुनिया को रास ना आया।

​​

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-नौ-

तू भी एक कहानी लिखना,

बिस्तर को रजधानी लिखना।

​​

अंतर - अंतर राग- रागिनी,

आँखों – आँखों पानी लिखना।

​​

गए दौर की तरियां तू भी,

एक राजा एक रानी लिखना।

​​

शब्द अकेले ना –काफी हैं,

कुछ दाना, कुछ पानी लिखना।

​​

चेहरा – चेहरा चाँद सरीखा,

चूनर का रंग धानी लिखना।

​​

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-दस-

कोह –कोहरा सारा जंगल,

नई हवा का मारा जंगल।

​​

चिड़ियों ने आवाज उठाई,

इंसानों से हारा जंगल।

​​

कल तक जंगल में मंगल था,

आज हुआ आवारा जंगल।

​​

कल दिखता था चाँद सरीखा,

आज दिखे है तारा जंगल।

​​

जीवन-सत्ता का रखवाला,

’तेज’ हुआ अब नारा जंगल।

​​

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(‘गुज़रा हूँ जिधर से’ ग़ज़ल संग्रह से प्रस्तुत)

तेजपाल सिंह ‘तेज’ (जन्म 1949) की गजल, कविता, और विचार की कई किताबें प्रकाशित हो चुकी हैं- ‘दृष्टिकोण ‘ट्रैफिक जाम है’, ‘गुजरा हूँ जिधर से’, ‘तूफाँ की ज़द में’ व ‘हादसों के दौर में’ (गजल संग्रह), ‘बेताल दृष्टि’, ‘पुश्तैनी पीड़ा’ आदि (कविता संग्रह), ‘रुन-झुन’, ‘खेल-खेल में’, ‘धमा चौकड़ी’ आदि ( बालगीत), ‘कहाँ गई वो दिल्ली वाली’ (शब्द चित्र), पाँच निबन्ध संग्रह और अन्य सम्पादकीय।

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तेजपाल सिंह साप्ताहिक पत्र ‘ग्रीन सत्ता’ के साहित्य संपादक, चर्चित पत्रिका ‘अपेक्षा’ के उपसंपादक, ‘आजीवक विजन’ के प्रधान संपादक तथा ‘अधिकार दर्पण’ नामक त्रैमासिक के संपादक रहे हैं।

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स्टेट बैंक से सेवानिवृत्त होकर आप इन दिनों स्वतंत्र लेखन के रत हैं।

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सामाजिक/नागरिक सम्मान सम्मानों के साथ-साथ आप हिन्दी अकादमी (दिल्ली) द्वारा बाल साहित्य पुरस्कार ( 1995-96) तथा साहित्यकार सम्मान (2006-2007) से सम्मानित किए जा चुके हैं।

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आजकल आप स्वतंत्र लेखन में रत हैं।

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सम्पर्क : फोन—9911414511 : E-mail — tejpaltej@gmail.com

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