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कहानी - पानी - सुधा शर्मा

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पानी

श्रुति ने पुन: आशस्वत होने के लिए पुन: सारी व्यवस्था का निरीक्षण किया। क्योंकि आज रात में ही बारात आने वाली थी। उसमें अपूर्व जोश था। हो भी क्यों न आखिर उसकी इकलौती लाड़ली बेटी का विवाह था।

भारत में तो विवाह वैसे भी जीवन का सबसे बडा उत्सव होता है। अत: लोग पानी की तरह पैसा बहाते है। पानी का नाम आते ही श्रुति की भँवे तन गई। नहीं यह कहावत अब निर्मूल है ,बदल जानी चाहिए। आज के इस अति विकसित युग में मानव के पास हर सुख- सुविधा है,हर काम करने के लिए रोबोट है, ड्राईवर रहित गाडी है लेकिन जीवन के अस्तित्व बचाने के लिए अन्न,जल,और शुद्ध वायु नहीं है।

" अरे किन बातों में उलझ गई तू " सोचकर उसने सिर झटका और अलमारी खोलकर देखा अलमारी सोने -चाँदी,हीरे के गहनों से भरी है जो उसे बिटिया को उपहार में देने हैं। जिन्हें उसने एक घंटे पहले ही लॉकर से मँगवाये हैं। अलमारी के दूसरे खाने में कपडे हैं,जो बिटिया और उसके ससुराल वालों को भेंटस्वरूप देने के लिए हैं। पूर्ण आश्वस्त होने पर उसने रसोई की व्यवस्था पर निगाह मारी। बस नाश्ते और दोपहर के खाने की व्यवस्था देखनी थी। शाम की व्यवस्था तो बेंक्विट हॉल में थी।

मेहमान कल शाम से ही आने प्रारम्भ हो गए थे। वैसे पानी की शॉर्टेज को देखते हुए उसने मेहमानों की लिस्ट को छोटा और छोटा कर दिया था। घर आधुनिक सुविधाओं से लैस था लेकिन पानी पर अपना वश नहीं था। समरसीवर भी लगवाया था जिसको देखकर लगता था कि पानी हमारी मुट्ठी में है लेकिन यह भ्रम भी अब टूट गया दो वर्ष से इन्द्र देवता नाराज चल रहे थे। अत: पानी का तल बहुत नीचे चला गया था। इसीलिए श्रुति ने खाने का आर्डर स्वीगी और अमेजॉन को दे दिया था। लेकिन पीने के लिए, दैनिक दिनचर्या पूरी करने के लिए तो पानी अति आवश्यक था। नगर निगम वाले तो पानी निश्चित समय पर व निर्धारित मात्रा में ही देते थे। पति ने पानी का टैंक मँगवाने का प्रयास किया लेकिन गर्मी का मौसम होने के कारण टैंक की सप्लाई भी ठीक नहीं थी। पति ने शहर के प्रत्येक टैंक सप्लायर को फोन घुमा दिया था लेकिन हर जगह से निराशाजनक ही उत्तर मिला। कैसे कैसे जुगाड़ करके मेहमानों के नित्यकर्म से निबटने का काम चल पाया था। नहाने के लिए सबका मन मचल रहा था लेकिन पानी की टंकी सूखी पडी थी। हलक तर करने के लिए पानी मिल जाए इसके लिए ही प्रशासन को धन्यवाद था।

धीरे-धीरे दिन बीत रहा था। आखिर में हारकर परिस्थितियों से समझौता कर सबने बिन नहाये ही तैयार होने का फैसला लिया। वो तो ए सी के कारण शरीर की बेचैनी कम थी। समय हो जाने के कारण श्रुति ने भी पति के साथ हॉटेल के लिए प्रस्थान किया ही था कि होटेल मैनेजर का फोन घनघना उठा  "हैलो मि. सुनील जी आपका व आपके मेहमानों का हॉटेल में बहुत- बहुत स्वागत। यहाँ हॉटेल में बारात के स्वागत की पूरी व्यवस्था है लेकिन कृपया पानी की व्यवस्था कर लीजिए। हमारे यहाँ जो पानी का स्टॉक था वो खाना बनाने में व बर्तन साफ करने में समाप्त हो गया। " सुनकर सुनील बौखला उठे "क्या बात कर रहे हो यार! मुँहमाँगा तुम्हें पेमेंट कर रहे हैं। आपका फर्ज बनता है आप हमें सारी सुविधाएँ उपलब्ध कराएँ। बिन पानी के खाने का क्या मतलब रह जाता है। तुम जानते हो न यार! कि मेहमानों को सबसे पहले पानी ही सर्व किया जाता है। "

"सॉरी सर! मैं कुछ नहीं कर सकता सारे प्रयास असफल होने के बाद ही तुम्हें फोन कर रहा हूँ शायद तुम अपने लेबल पर कुछ करा सको।"

"अरे ऐसे समय में आप हमें धोखा दे रहे हैं बताओ कितने पैसे चाहिए तुम्हें।"

फोन पर हाथ रखकर श्रुति से "ब्लैकमेल कर रहा है साला।"

"सर पैसे की बात नहीं है। आप हमें गलत समझ रहे हैं। "

" तुम जानते हो अच्छी तरह ,किसी और हॉटेल में भी बात नहीं की जा सकती। आपका मैनेजमेंट इतना खराब होगा,   आपको पहले बताना चाहिए था।"

     "मैनेजमेंट खराब नहीं है सर! पानी हमारी निजि प्रोपर्टी नहीं है। पानी नगरनिगम से आता है या टैंक मँगवाये जाते हैं या समरसीवर लगाया जाता है।

लेकिन यदि तीनों ही धोखा दे जाएँ तो कहाँ जाएँ। प्राइवेट सप्लायर भी यही जवाब दे रहे हैं कि पानी ईश्वर की देन है उसे शुद्ध करने का प्लांट हमने लगा रखा है,पैदा करने का नहीं।"

ओह सिट! मुझे कुछ नहीं सुनना। आपको व्यवस्था करनी पडेगी। आपकी जिम्मेदारी है। आप अपनी जिम्मेदारी से कैसे भाग सकते हैं? आपका हॉटेल है, आप शादी अरेंज कराते हैं आपने हमसे पैसे लिए है।

आप पैसे की बात बार- बार कर रहें हैं सर! आपसे हमने चार लाख माँगे है न ,आपके हमारे पास दो लाख आए हुए हैं दो लाख रूपये मैं पानी के नाम पर छोड़ता हूँ। पानी की व्यवस्था स्वयं कर लीजिए।

कहकर फोन रख दिया।

सुनील क्रोध से लाल- पीले हो रहे थे। अंत में उसने प्रशासन को फोन लगाया "सर! मेरी बेटी की शादी है मुझे पानी की सख्त आवश्यकता है। बारात आने वाली है प्लीज सर, मैं हाथ जोड़कर रिक्वेस्ट करता हूँ दो टैंक पानी की व्यवस्था करा दीजिए। आपका बहुत उपकार होगा। सर प्लीज-----।

" आपको कम से कम दो दिन पहले बताना चाहिए था। अर्जेंट तो नहीं हो पायेगा।"

  "सर! हॉटेलवाले ने धोखा दे दिया।"

"अरे तुम्हें गर्मियों में शादी करने की क्या जरूरत थी। सर्दी में तो फिर भी चल जाता लेकिन यू नो वैरी वैल गर्मियों में पानी की किल्लत बहुत बढ़ जाती है। यदि सुबह भी कह देते तो शायद व्यवस्था हो जाती लेकिन अब तो सवाल ही नहीं उठता।"

" प्लीज सर कुछ तो कीजिए।"

   "बार- बार कहकर क्यों शर्मिन्दा कर रहे हो। पानी तो ईश्वर की देन है। उसके अलावा जल, वायु व अन्न को कोई उत्पन्न नहीं कर सकता हम तो केवल पानी का संरक्षण कर सकते है। "

   "अब मैं क्या करूँ? कहाँ जाऊँ? कुछ समझ ही नहीं आ रहा।

   "सॉरी सर! कोई कुछ नहीं कर सकता। जो सब कर सकता है वो ही नहीं सुनता तो कोई क्या करे। उसे ही अपने बन्दों पर तरस नहीं आता।"

   " भगवान को क्यों कहते हो ? वैज्ञानिकों को कहो न। विकास की भी एक सीमा होती है। सारी व्यवस्था बिगाड़ दी है सृष्टि की। हर काम के लिए रोबोट बनाकर मनुष्य का अस्तित्व समाप्त कर दिया है, तो अन्न ,जल ,वायु उत्पन्न करके भगवान का अस्तित्व भी समाप्त कर दो न।समाप्त कर दो सब कुछ। समाप्त कर दो। सब अपनी करनी का फल है ,जब कोई रास्ता नहीं दिखता तो दोष भगवान को देते हैं। मक्कार कहीं के।

सुनील इतना बौखला गया कि उसे चक्कर आने वाला ही था कि भाई का फोन आया"कहाँ हो जल्दी आओ। बारात आ चुकी है। सुनकर श्रुति और सुनील बैंक्विट हॉल के लिए भाग लिए। समयानुसार रस्में हो गई थी। खाने तथा अन्य मैनेजमैंट की प्रत्ये क बाराती दिल से प्रशंसा कर रहे थे। अचानक खाते - खाते दूल्हे को खाँसी उठ गई। खाँसी इतनी जबरदस्त कि कन्ट्रोल ही नहीं हो रही थी। कोई पीठ थपथपा रहा था कोई छाती मल रहा था लेकिन खाँसी थी कि रूकने का नाम नहीं ले रही थी। चारों तरफ खडी भीड़ पानी लाओ पानी लाओ चिल्ला रही थी लेकिन सब एक दूसरे के चेहरे की तरफ देख रहे थे, पानी किसी के हाथ में नहीं था। धीरे- धीरे दुल्हे की साँसे ठंडी हो गई लेकिन पानी कोई भी नहीं ला रहा था।

सब कुछ चौपट हो गया था। बचे थे तो केवल आरोप- प्रत्यारोप। दो पक्ष आपस में मुकदमा लड़ रहे थे। दोषी कोई भी नहीं था।

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