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चंद्रभान सिंह मौर्य की कविताएँ

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सांध्य-दर्शन

यह शांत छवि
संध्या बेला में
नदी की जलधारा से
कुछ पूछ रही है
कुछ कहना चाहती है
नदी भी दूर से
अपनी जल तरंगों से
कोई संदेश देना चाहती है
इस शान्त छवि से
काफी गहन
निर्मलता छिपी है
इस संध्या
बेला की छवि में
शायद कुछ कहना है
उस जलधारा को
इस छवि से
वह व्याकुल है
उसे तकलीफ है
किसी के दंश
और बंधन से
उसने भार
उठा रखा है
  इस भारी-भरकम
अंबार का
उसे बहने में
रुकावट है
वह अपनी
तकलीफ को
कहना चाहती है
अपनी तरंगों से
उसे साथ चाहिए
  हर छवि की
जो उसे देखता है
जो उससे खेलता है
उसकी छाती पर
चढ़कर जो तांडव
करता है हर रोज
प्रकृति की सुंदरता
हर छवि के भीतर
निहित है
काफी सवाल है
हर छवि के भीतर
उसे कहने का
अवसर चाहिए
यह रहस्य हर
छवि में छिपी है
पुकारता है
प्रकृति का सौंदर्य
प्रकृति भी
पुकारती है
अपने परोपकारी
दृष्टि से
मानव उससे जुड़े
ऐसा जुड़े
फिर किसी तरह की
बाधा ना आए
हर छवि और
प्रकृति के बीच में।।


मुसाफिर

मुसाफ़िर तो
सारा जहां है
मंजिल हमारी
अब कहां है
चले जा रहे
हम अपनी धुन में
  कहीं ओट नहीं
कहीं छांव नहीं
प्यास की आस में
तड़पते चले जा रहे
बढ़े जा रहे
पर राह कठिन है
  सुकून नहीं
अब राह में
पेड़ छांव कहीं
  छिप गई
खो गयी राहो
  की छत
उखड़ गयी
उनकी जड़ें,
व्याकुल है
हर मुसाफिर
इस जलते हुए
आग से
कहीं ठंडक
  मिल जाए,
  गले की प्यास
  मिट जाए
मुसाफिर है
इस तलाश में।


जमीन और जिंदगी


जम जाती है जमीन
स्वयं में
जम जाते हैं लोग
जमीन में
जब होती नहीं है नई शुरुआत
जम जाती है मीन
जमीन में
जब होता नहीं है जल
है बहुत महत्त्व जमीन का
नई शुरुआत के लिए,
नई जिंदगी के लिए,
नए आगाज के लिए,
बिना जमीन के खुद की
कोई जमीन नहीं
यह जमीन से हटकर चलना भी
क्या चलना है?
जमीन से ही जिंदगी है;
जमीन में ही अंत है
यह परस्पर निर्भरता ही
सबसे सही सच है।
जिंदगी के लिए
जमीन का होना है जरूरी
छुटनी न पाए जमीन!


रात का सच
  रवि की लालिमा के लोप से
  जन्म लेती है रात
यह सच है रात का
चांद तारों का शीतल समूह
यह सच है रात का
उल्लू का दृष्टिगोचर समय
यह सच है रात का
पंछियों का शांत कलरव
यह सच है रात का
अनंत मौन की अभिव्यंजना
  यह सच है रात का
घनघोर अंधकार की छटा
  यह सच है रात का
ओस बून्दो का गिरना
यह सच है रात का
हर किसी का सो जाना
यह सच है रात का।
रात तो हर वक्त है
रात तो सर्वत्र है
यह तो केवल भ्रम है
यह सच है रात का।।


बचपन
होता है क्या बचपन?
कौन बताएं कैसे बचपन बीता
बचपन के दिन किसे है भूलता
वह दोपहर की कड़कती धूप में
निहंग - निभंग घूमता दोस्तों के झुंड में कभी खेतों की मेड़ पर
कभी गलियों के चौक पर
कोई फिक्र नहीं किसी का डर नहीं कहीं लघीयों से पतंग लूटता
कहीं  अमलोले की बौर तोड़ता
कभी आम के टिकोरे चुनता
कभी छिपकर जामुन के पेड़ में ढेले मारता
  बहुत मजा आता
ऐसा ही तो होता है बचपन
कोई फिक्र नहीं ना ही कोई चिंता केवल सुबह होते ही
एक नए दिन की शुरुआत
कुछ पाने की लालसा
कुछ नया खोजने की उमंग
यही तो होता है बचपन
चलो फिर से ढूंढे उस बचपन को
न जाने किस गहरी गुफा में
गुम सा हो गया
अपने बचपन को याद करके उसे मन मस्तिष्क के पन्नों से निकालकर
उस बचपन को फिर से जी ले।


मजदूर

हूं मजदूर मैं
जाना हमें दूर
लड़ रहे
समय से हमेशा
घोट रहे
गला खुद की
ख्वाहिशों का
माज रहे
अपने कर्मों से
विश्व की
कालिख को
फिर भी
मजदूर हूं मैं
थकूंगा नहीं
रुकूंगा नहीं
हार नहीं मानूंगा
तुम्हारी यातनाओं से 
लेकर रहूंगा
अपने कर्मों का फल
लडूंगा हर दौर से
क्योंकि मजदूर हूं मैं
हमें दूर जाना
जीवन की हर खुशी
लेकर रहूंगा
मजदूर हूं मैं
जाना हमें दूर।।



परिचय- चंद्रभान सिंह मौर्य का साहित्यिक उपनाम "भानु" है| 18 सितंबर 1994 को वाराणसी (उत्तर प्रदेश) में जन्मे है| वर्तमान में छत्तीसगढ़ के धमतरी जिले के कुरुद ब्लाक में रहते है | जबकि स्थाई पता - दीनदयालपुर जिला वाराणसी है | आपको हिन्दी, भोजपुरी, संस्कृत, अँग्रेजी, छत्तीसगढ़ी, सहित अवधी, ब्रज, खड़ी बोली, भाषा का ज्ञान है| उत्तर प्रदेश से नाता रखने वाले चंद्रभान की पूर्व शिक्षा- बी. ए.( हिन्दी प्रतिष्ठा ) और एम. ए. ( हिन्दी ) है| वर्तमान में अजीम प्रेमजी फाउंडेशन (छत्तीसगढ़) में एसोसिएट के पद पर कार्यरत है| सामाजिक गतिविधि में शिक्षा में नवाचार, बाल साहित्य और छत्तीसगढ़ी स्थानीय शब्दकोश को लेकर क्रियाशील है| लेखन विधा में कविता, कहानी, नाटक, शिक्षा और सामाजिक सरोकार से जुड़े लेख और पुस्तक समीक्षा तथा स्वतंत्र समीक्षा करते है| आपकी विशेष उपलब्धि शिक्षक प्रशिक्षक और समाज सेवक के रूप में है| आपकी लेखनी का उद्देश्य साहित्य के विकास को आगे बढ़ाने के साथ - साथ शिक्षा के क्षेत्र में किए जा रहे नवाचार व प्रयोग तथा सामाजिक समस्याओं से सभी को रूबरू कराना है| आपके पसंदीदा हिन्दी लेखक- नागार्जुन, निराला, प्रेमचंद, दुष्यंत कुमार और रामधारी सिंह दिनकर है| आपके लिए प्रेरणा पुंज- नागार्जुन है| अपने राष्ट्र और हिन्दी भाषा के प्रति मेरे विचार- "हिन्दी नही है केवल एक भाषा, यह तो है बड़े सपने की भाषा, हिन्दी ही वह द्वार है जो अभिव्यक्ति के खतरो को उठाने से पीछे नही हटती||


चंद्रभान सिंह मौर्य

एसोसिएट, अजीम प्रेमजी फाउंडेशन

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