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--- पुस्तक समीक्षा --- नव्य चिंतन की चुनौतियां पेश करता लघुकथा संग्रह - नोटबंदी

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विषय वस्तु, रचनात्मक कौशल और विजन इन तीनों का सम्यक संतुलन जिस लघुकथा संग्रह में स्थापित हो जाता है वह संग्रह श्रेष्ठ हो जाता है। वह बिना किसी शोर - शराबे के ही भीड़ में अलहदा दिखने लगता है।  इस संग्रह में कुल 98 लघुकथाएँ संकलित हैं।

   यही खूबी है लखीमपुर खीरी के युवा साहित्यकार सुरेश सौरभ में वे यकीनन कम शब्दों में बड़ी बात कहने वाले साहित्यकार हैं उनका यह लघु कथा संग्रह अपने आप में श्रेष्ठ है। वे मजदूरों, किसानों, बेरोजगारों, मजलूमों, लाचारों,किन्नरों और औरतों को अपने साहित्य का विषय बनाकर अपनी बात कहते हैं। यही प्रमुख कारण है कि वे आम जनमानस के हृदय स्थल तक  बड़ी आसानी से पहुँच जाते हैं। इस लघु कथा संग्रह की एक और खूबी है कि इसमें संकलित सभी लघु कथा सत्य की जमीन पर टिकी हैं। और हाँ साहित्यकार की इक और अदा लोगों को पसन्द आती है। कि वे बात को डंके की चोट पर बड़ी ईमानदारी के साथ प्रस्तुत करते हैं। यह लघु कथा संग्रह पाठक को पढ़ने के लिए इस लिए मजबूर करता है क्योंकि इक्कीसवीं सदी में वैश्वीकरण की अवधारणा ने जिस तरह हमारी ज़िंदगी में सेंध लगाकर हमारी तमाम अवधारणाओं, जीवन शैलियों, आदर्शों और मानदंडों को विखंडित कर दिया है, उससे ऊपर उठकर यह लघु कथा संग्रह अपनी प्रस्तुति देता है। इस संग्रह में संकलित निम्नवत  लघुकथाएं मार्मिक और मन को छकछोरने वाली हैं जैसे तार, जेवर,सीख, लूट, प्रधानी, दाग बहुत हैं,पसंद,उतरन, वार्तालाप, मुखौटा आदि लघुकथाएं नव्य चिंतन को स्पर्श करती हैं। इस पुस्तक को पढ़ने के बाद आपको अपने जीवन में हजारों सत्य के प्रस्शत मार्ग मिलेगें जो आपका जीवन सफल बनाएंगे। अंत में इतना ही कहूँगा कि 84 प्रष्ठो की नमन प्रकाशन लखनऊ से प्रकाशित यह लघु कथा संग्रह हर दृष्टिकोण से पढ़ने योग्य है।

प्रकाशक- नमन प्रकाशन लखनऊ

मूल्य 60 रू०

लेखक- सुरेश सौरभ

समीक्षक- शिव सिंह सागर

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