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​​ ‘तेज’ तपता रहा जेठ की धूप-सी, वो सावन के जैसी बरसती रही। तेजपाल सिंह ‘तेज’ की दस ग़ज़लें


तेजपाल सिंह ‘तेज’ की दस ग़ज़लें

-एक-

धूप सावन की करवट बदलती रही,

कि समन्दर-सी चढ़ती-उतरती रही।

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चाँद सोता रहा अर्श पर बेखबर,

चाँदनी दर-ब-दर है भटकती रही।

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धनिया की नाजुक जवानी मगर,

दुष्ट आँखों में रह-रह उतरती रही।

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चाँद-तारों से लेकर कोई ताजगी,

कि बिटिया-सी बनती-सँवरती रही।

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‘तेज’ तपता रहा जेठ की धूप-सी,

वो सावन के जैसी बरसती रही।

​​

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-दो-

बात पर कुछ बात कहना,

प्यार को ज़ज़्बात कहना।

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तू बारहा गमगीन मत रह,

हास कुछ उतपात कहना।

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कि टूटती इंसानियत को,

कलियुगी प्रपात कहना।

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रक्त में नहाई धरा को,

तू बेसबब अपवाद कहना।

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आग का घर है ज़माना,

टूटकर हिमपात कहना।

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-तीन-

बिदा हुई जब घर-आँगन से बिटिया रे,

बरस पड़ी बूढ़े बाबुल की अँखिया रे ।

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भाभी की आँखों के आँसू सूख गए,

हवा हुई छोटे भैया की निंदिया रे ।

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बाहर-बाहर बिटिया भी थी दुखी बहुत,

अन्दर-अन्दर चमक रही थी बिंदिया रे।

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दुल्हा-दुलहन पल-भर में ही एक हुए,

हाथ लगी ज्यूँ निज मंजिल की बटिया रे।

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‘तेज’ अकेला नाहक थक-थक रोवे है,

जीवन तो जीवन है बहती नदिया रे।

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-चार-

बेटे वालों की सरदारी क्या कहने,

ढोल-ढपाले, गोलाबारी क्या कहने।

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सब दुल्हे के आगे-पीछे घूम रहे,

बेटी वालों की लाचारे क्या कहने।

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लेना-देना, खाना-पीना सब कुछ है,

ऊपर से है तह-बाज़ारी क्या कहने।

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मित्रजनों ने मिलकर सारा काम किया,

रिश्तेदारों की मेहमानी क्या कहने।

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‘तेज’ पड़ौसी आए खाकर चले गए,

नए दौर की आपसदारी क्या कहने।

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-पांच-

सीख सके तो चलना सीख,

गिरना और संभलना सीख।

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सोना तप कुंदन बनता है,

प्रेम-अगन में जलना सीख।

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जीने की चाहत है ग़र तो,

बर्फ सरीखे गलना सीख।

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राजनीति में आना है तो,

खुद अपने को छलना सीख।

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‘तेज’ अकेला क्या कर लेगा,

हाथ मिलाकर चलना सीख।

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-छ:-

कफस टूटे गगन विचरूँ तो कुछ-कुछ हो,

आँबला-पा बजें घुंघरू तो कुछ-कुछ हो ।

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अमावस्या की रातों में जो जुगनू बन,

कभी दुबकूँ, कभी चमकूँ तो कुछ-कुछ हो।

​​

पतझर के बियाबाँ में मैं सरसों – सा,

फलूँ-फूलूँ, बनूँ-सँवरूँ तो कुछ-कुछ हो।

​​

कि बैशाखी दुपहरी में, मैं बन बादल,

कभी गरजूँ, कभी बरसूँ तो कुछ-कुछ हो।

​​

‘तेज’ का क्या मेरी सोचो, मैं बन मजनूँ,

इश्क के नाम हो गुजरूँ तो कुछ-कुछ हो।

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-सात-

वो आई भी, सकुचाई भी,

कुछ मिलने से कतराई भी।

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लगता है डसती है अब तो,

उसे भीड़-भरी तन्हाई भी।

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नए दौर ने छीन ली जैसे,

तरुणाई भी, अंगनाई भी ।

​​

आँख चुरा के हौले-हौले,

वो शर्माई भी, इठलाई भी।

​​

‘तेज’ जिंदगी तू क्या जाने,

है रुतवा भी, रुसवाई भी।

​​

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-आठ-

इतना - भर अपराध किया कर,

दिल से दिल को याद किया कर।

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कौन है अपना, कौन पराया,

जितना हो इमदाद किया कर।

​​

चुप-चुप जीना भी क्या जीना,

कुछ-कुछ तो संवाद किया कर।

​​

कोई नहीं यहाँ सुनने वाला,

नाहक ना फरियाद किया कर।

​​

शायद फिर हाज़त हो निकले,

आँसू ना बरबाद किया कर।

​​

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-नौ-

जब मैं पारी हार खड़ा था,

सुधियों से हर-साँस लड़ा था।

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चंदा अंधियारों में गुम था,

सूरज का प्रभाव बढ़ा था ।

​​

मेरा भी अस्तित्व था कोई,

लेकर इतनी बात अड़ा था।

​​

आज की तरियाँ कल भी यारा,

मन-आँगन कुछ गला-सड़ा था।

​​

‘तेज’ अकेला क्या कर लेता,

लड़ने को यूँ रोज लड़ा था।

​​

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-दस-

जाने कब-कब क्या-क्या खोया,

सोच-सोच यह मन में रोया

कि मजदूरन का भूखा बच्चा,

माँ का थप्पड़ खाकर सोया।

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जब-जब नींद न आई मुझको,

तो आँसू पी-पी करके सोया।

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हैं चंदा की आँखें खुजलाईं,

औ’ सूरज घोड़े बेचके सोया।

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‘तेज’ पहनकर काला चश्मा,

छत पे चादर तानके सोया।

​​

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(‘गुज़रा हूँ जिधर से’ ग़ज़ल संग्रह से )

तेजपाल सिंह ‘तेज’ (जन्म 1949) की गजल, कविता, और विचार की कई किताबें प्रकाशित हो चुकी हैं- ‘दृष्टिकोण ‘ट्रैफिक जाम है’, ‘गुजरा हूँ जिधर से’, ‘तूफाँ की ज़द में’ व ‘हादसों के दौर में’ (गजल संग्रह), ‘बेताल दृष्टि’, ‘पुश्तैनी पीड़ा’ आदि (कविता संग्रह), ‘रुन-झुन’, ‘खेल-खेल में’, ‘धमा चौकड़ी’ आदि ( बालगीत), ‘कहाँ गई वो दिल्ली वाली’ (शब्द चित्र), पाँच निबन्ध संग्रह और अन्य सम्पादकीय।

​​ तेजपाल सिंह साप्ताहिक पत्र ‘ग्रीन सत्ता’ के साहित्य संपादक, चर्चित पत्रिका ‘अपेक्षा’ के उपसंपादक, ‘आजीवक विजन’ के प्रधान संपादक तथा ‘अधिकार दर्पण’ नामक त्रैमासिक के संपादक रहे हैं।

​​ स्टेट बैंक से सेवानिवृत्त होकर आप इन दिनों स्वतंत्र लेखन के रत हैं।

​​ सामाजिक/नागरिक सम्मान सम्मानों के साथ-साथ आप हिन्दी अकादमी (दिल्ली) द्वारा बाल साहित्य पुरस्कार ( 1995-96) तथा साहित्यकार सम्मान (2006-2007) से सम्मानित किए जा चुके हैं।

​​ आजकल आप स्वतंत्र लेखन में रत हैं।

​​

सम्पर्क : फोन—9911414511 : E-mail — tejpaltej@gmail.com

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