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“तोत्तो-चान” – ( तेत्सुको कुरोयानागी ) अनुवादक : - पूर्वा याज्ञिक कुशवाहा

“तोत्तो-चान” – ( तेत्सुको कुरोयानागी )

अनुवादक : - पूर्वा याज्ञिक कुशवाहा

भूमिका –

तोत्तो – चान पुस्तक सृजनात्मक शिक्षा की वकालत करता है जिसमें स्कूली शिक्षा के भोगे हुये यथार्थ अनुभवों की जमीनी हकीकत को पुस्तक की लेखिका ने स्वयं भोगा है | और फिर उन्होने उसे अपने अनुभव सहित विचार जगत से सम्पूर्ण जगत को समर्पित कर दिया और वो भी कुछी पन्नों ( 140 पेज  ) में | ताकि हर एक पाठक जो इस पुस्तक को पढे तो उन तमाम परिस्थितियों की विचारशृंखलाओं से गुजरते हुये एक नवीन सोच और उमंग के साथ अपने कार्य में प्रगति की ओर अग्रसर हो सके | तोत्तो – चान जापानी साहित्य की एक अप्रतिम रचना है जिसमे कथा की लेखिका तेत्सुकों कुरोयानागी ने अपने मूल जीवन की सच्ची घटना पर आधारित देश-काल व वातावरन का यथार्थ रूप उजागर किया है | जिसमे एक शिक्षक व छात्र शिक्षा की ज्योति से सम्पूर्ण जगत को प्रकाशित करने व एक नवीन दृष्टि के साथ शिक्षा की परिकल्पना को व्यवस्थित करते है | और आगे भविष्य मे भी इस शिक्षा रूपी गंगा की अविरल धारा को प्रवाहमान रखने की भी प्रतिज्ञा करते है | जापान की यह लोकप्रिय पुस्तक पुस्तक पूरी शक्ति के साथ यह संदेश देता है –       

खिलने दो सैकड़ों फूल

                     होने दो हजारों विचारधाराओं में संघर्ष

समीक्षा -

सच कहूँ तो यह पुस्तक केवल एक पुस्तक नहीं अपितु बचपन की पूरी अवधारणा का एक मौलिक एहसास है जिसे साहित्य के रूप में मूर्तता प्रदान करने का प्रयास किया गया है | ताकि शिक्षा जगत व अन्य क्षेत्रों में कार्य कर रहे हर पाठक का मार्गदर्शन किया जा सके जिससे पठन – पाठन की प्रक्रिया पूर्णतया उन्मुक्त वातावरण में सम्भव हो पाये | लेखिका ने अपने प्रथम स्कूल के बारे में कुछ अनुभव साझा करते हुये कहा है कि उन्हें उनके पहली प्राथमिक शाला से निकाल दिया गया था जो लेखिका को स्वयं भी नहीं याद था, वो तो उनकी माँ ने उन्हे उनके बीसवें जन्मदिन पर बताते हुये कहा था कि “ पता है तुम्हें अपना स्कूल क्यों बदलना पड़ा था क्योंकि तुम्हें पहले स्कूल से निकाल दिया गया था”| पर यहाँ मूल बात यह है कि लेखिका की माँ ने उस वक्त इस बात को नहीं बताया जब उन्हें विद्यालय से निकाला जाता है और यही पर एक बड़ा प्रश्न उभरता है कि जब भी किसी कारणवश किसी बच्चे को विद्यालय से निकाल दिया जाता है तो फिर उस बच्चे के माता – पिता दूसरे विद्यालय में दाखिला कराते वक्त अपने बच्चे से ढेर सारे कटु प्रश्न और सवाल करते है जैसे – आखिर तुम्हारा क्या होगा? अब अगर दूसरे स्कूल से निकाल दिया गया तो तुम क्या करोगे ?, तुम्हें तो कुछ नहीं आता, तुम बहुत शरारती हो इसलिए निकाल दिया गया वगैरा – वगैरा | जिन्हें हम बिना सोचे कह देते हैं कि ये पढ़ने में एकदम गधा है या फिर इनका तो पढ़ने के प्रति रवैया ही ठीक नहीं है  इसलिए आगे पढ़ नहीं पाया, किताब तक पढ़ना नहीं जानता है | ऐसे अनेकों बाते हमें कक्षा कक्ष और उससे बाहर चाहे-अनचाहे सुनने को मिल ही जाती हैं | यह बातें बताती हैं कि बच्चे में कोई कमी नहीं थी बल्कि कमी तो स्कूली शिक्षण व्यवस्था में थी ,जो इनकी जड़ों को मज़बूत नहीं कर पाई और ये हालातों के सामने उखड़ते चले गए | पर लेखिका की माँ ने इस तरह कोई बात का आभास तोत्तो – चान को नहीं होने दिया कि वह बहुत शरारती है इसलिए उसे स्कूल से निकाल दिया गया है | और इसी प्रश्न पर हर माता – पिता व अभिभावक को जरूर ध्यान देना चाहिए ताकि बच्चा जब किसी कारणवश दूसरे विद्यालय में प्रवेश करे तो उसके मुख पर हँसी और आनंद की रेखाएँ खिची हुयी दिखाई दें |

यह किताब जब तेत्सुको कुरोयानागी ने लिखी थी तो उन्हे बिल्कुल भी नहीं सुझा था कि यह किताब बेस्ट- सेलर बनेगी! जापान में किसी महिला द्वारा लिखी यह पहली बेस्ट – सेलर किताब थी | इस किताब का कई भाषाओ में प्रकाशन हुआ है | जापान और अन्य देशो में इस किताब का इस्तेमाल शिक्षा के क्षेत्र में किया जाता  हैं। शिक्षक, बच्चे, शिक्षाविद् सब इस किताब को पढ़ते है और अपने जानकार लोगों को पढ़ने की सलाह देते हैं। तोत्तो- चान किताब से प्रेरित होकर विद्यालयों में खेती करने के पाठ व अन्य पद्धतियों को शामिल किया गया। यूनिसेफ की सद्भावना दूत तेत्सुको उर्फ तोत्तो-चान अपने जीवन की सफलता का श्रेय अपने प्राथमिक स्कूल और स्कूल के प्रधान अध्यापक एवं स्थापक सोसाकु कोबायाशी को देती हैं। तोमोए गाकुएन नामक यह स्कूल 1937 में कोबायाशी ने अपनी निजी जमा-पूंजी से बनाया था जो की दूसरे विश्वयुद्ध के दौरान 1945 में बी-29 लड़ाकू जहाज के द्वारा गिराए गए बमो से जल कर राख हो गया ।

यह हेडमास्टर की शिक्षण पद्धति का ही नतीजा था कि तोत्तो- चान और अन्य बच्चे स्कूल खत्म होने के बाद भी स्कूल में रहना पसंद करते हैं और स्कूल में पुस्तकालय खुलने या नए डिब्बों के आने का बेहद इंतज़ार करते हैं। यह बच्चो का प्रेम ही है कि वो अपने स्कूल की बुराई नहीं सुन सकते और स्कूल के लिए खुद से गाना गाते हैं - “तोमोए स्कूल बढ़िया है, अंदर से भी, बाहर से भी, बढ़िया हैं।’’ इन वाक्यों को पढ़कर मैं सोच में पड़ गया कि क्या कभी मेरे स्कूल का भी माहौल ऐसा था ? मैंने कभी-भी छुट्टी के बाद स्कूल में रुकना नहीं चाहा और ना ही कभी स्कूल जाने को उतावला ही रहा |

हेडमास्टर छोटे बच्चों को चॉक से ज़मीन पर लिखने की इजाज़त देते हैं और खुद उन्हे साफ करने को बोलते हैं उनके अनुसार ऐसा करने से बच्चे कला में रुचि लेते हैं और सफाई करना उन्हें यह एहसास दिलाता है कि कितना मुश्किल है चॉक से पुती ज़मीन या दिवारों को साफ करना । हेडमास्टर शिक्षकों और बच्चों में समानता और एक दूसरे के प्रति इज्ज़त का भाव देखना चाहते है, इसकी छवि तोत्तों चान के स्वभाव में देखने को मिलती है जब वो अपने पेड़ पर अपने मित्र यासुकी-चान को चढ़ने में मदद करती हैं। वह इतनी भोली है कि उसे इशारों में बात कर रहे गूंगे- बेहरे बच्चे विकलांग नहीं बल्कि सुंदर लग रहे हैं । तोत्तों चान को नाटक का पात्र बनने का कोई शौक नहीं पर माँ के साथ खाना बनाना सीखना, रॉकी के साथ खेलना उसे बहुत पसंद हैं। माँ ने उसे हमेशा नेक सलाह दी चाहे वो देख कर कूदने की हो या टॉइलेट के हॉल में न झाकाने की। उन्होने उसे स्वान-लेक सीखने नृत्यशाला भेजा वो अलग बात है कि तोत्तो ने कुछ समय बाद खुद जाना छोड़ दिया। तोत्तो-चान के बड़ी होकर कुछ बनने के लक्षण निरंतर बदलते रहते है वह कभी टिकिट- कलेक्टर… तो कभी जासूस बनने की बात कहती है | और फिर अंत में उसने हैडमास्टर को वादा किया कि वो बड़ी होकर तोमोए में पढ़ाएगी परंतु यह हो न सका! “दिल- दिमाग का समान विकास हो” एसी सोच रखने वाले सोसाकु का स्कूल जल कर नष्ट हो गया। आग की लपटो ने नए स्कूल खोलने की इच्छा उनके ह्रदय में उजागर कर दी थी, परंतु 1963 में कोबायाशी की मृत्यु हो गई | हालांकि युद्ध खत्म होने के बाद उन्होंने तोमोए की ज़मीन पर बालशाला खोली और कुनिताची प्राथमिक स्कूल की स्थापना में मदद करी । मम्मी-डैडी और रॉकी ( जर्मन शेफर्ड कुत्ता) के साथ तोक्यो में रहने वाली एक नटखट बच्ची तोत्तो-चान बहुत ही जिज्ञासु और बातूनी लड़की है। संगीत में रुचि रखने वाली प्यारी तोत्तो-चान रेडियो में प्रसारित होने वाले मसखरे माजको का आनंद लेती है और जनवारों के लिए संवेदना रखती हैं । उसकी जिज्ञासा और बचपने को पंख तोमोए ने दिए, ऐसा स्कूल जहाँ न किताबें रटाई जाती है और न ही मार का डर । ट्रेन के डिब्बों में स्थित कक्षाएं, बच्चों को  स्वतंत्रता देती है कि वह कक्षा में कही भी बैठ सकते हैं । तोमोए मे शिक्षण का तरीका अन्य स्कूलों से काफी भिन्न था - शिक्षक, दिन भर जिन विषयों को पढ़ाना होता था या जिन प्रश्नों के उत्तर लिखने होते थे उनकी सूची तैयार करते और फिर बच्चे अपनी रुचि के अनुसार खुद चुनते थे कि पहले उन्हें क्या करना हैं। कोई भी कुछ भी शुरू कर सकता है, बाकी विद्यालयों की तरह यहाँ कालांश- विषय अनुसार निश्चित या बधित नहीं हैं। यहाँ बच्चों को पूर्व-निश्चित सांचों में ढाला नहीं जाता, उन्हें मौके दिए जाते है कि वो अपनी रुचि के अनुसार अपनी प्रतिभा को पहचान व निखार सके। उन्हें गलती करने और उन गलतियों से खुद सीखने के अवसर प्रदान किए जाते हैं | इतना ही नहीं उन्हे प्रकृति और संगीत से जोड़ा जाता हैं, आत्म निर्भर और निडर बनाया जाता हैं। समान्यतः खाना खाने से पहले कोई प्रार्थना कहने का चलन होता है जो वर्तमान समयावधि में हमारे विद्यालयों में भी देखने – सुनने को मिलता है | किन्तु तोमोए में कुछ अलग ही चलन था वहाँ पर बच्चे भोजन से पहले एक साथ मिलकर एक गीत गाते जोकि हेडमास्टर जी द्वारा ही लिखा गया था - 

चबाओ,चबाओ,ठीक से चबाओ,

जो कुछ भी तुम खाओ;

चबाओ,चबाओ,ठीक से चबाओ,

चावल,मछ्ली, मांस !

वैसे हम इन बातों के ताने-बानों को पकड़े तो हर बात के सिरे तक पहुँचा जा सकता है, और तब हम पाएँगे कि वो बच्चे जिन्होंने बीच में अपनी पढ़ाई छोड़ दी है या फिर जो कक्षा में अलग तरह का रवैया इख्तियार किए हुये है या जिन्हें बड़ी कक्षाओं में पहुँचने के बाद भी लिखना या पढ़ना नहीं आता | उन सबके जिम्मेदार बच्चे नहीं हैं बल्कि जिम्मेदार है प्राथमिक शाला की शिक्षा पद्धति और  अपनी सहूलियत अनुसार बच्चो को पढ़ाने वाले शिक्षक साथी | उनके संदर्भ में तेत्सुको लिखती हैं कि  ‘अपने स्कूल की कक्षाएँ वे छोटी और पाठ्यक्रम मुक्त रहते थे , ताकि बच्चों की वैयक्तिकता उभर सके और उनमें आत्मसम्मान बढ़े |’ (पेज नंबर -14 / तोत्तो-चान)  पर क्या वास्तव में भारत की शिक्षा पद्धति इस तरह की है | जो सच्चे मायने में एक छात्र के वैयक्तित्व का विकास कर सके और उसमें  आत्मसम्मान की भावना को जागृत करे | यहाँ यह कैसे संभव होगा ? यहाँ तो शिक्षक मात्र एक शिक्षक नहीं बल्कि ईश्वर का दूसरा रूप है वैसे हम इन बातों के ताने-बानों को पकड़े तो हर बात के सिरे तक पहुँचा जा सकता है, और तब  हम पाएँगे कि वो बच्चे जिन्होंने बीच में अपनी पढ़ाई छोड़ दी है या फिर जो कक्षा में अलग तरह का रवैया इख्तियार किया हुआ है या जिन्हें बड़ी कक्षाओं में पहुँचने के बाद भी लिखना या पढ़ना नहीं आता | उन सबके जिम्मेदार बच्चे नहीं हैं बल्कि जिम्मेदार है प्राथमिक शाला की शिक्षा पद्धति और  अपनी सहूलियत अनुसार बच्चों को पढ़ाने वाले शिक्षक साथी | तोत्तो-चान की लेखिका लिखती हैं कि ...कोबायाशी शिक्षकों को कहते कि वे बच्चों को पूर्व-निश्चित खांचों में डालने की कोशिश न करें | वो आगे लिखती है कि “उन्हें प्रकृति पर छोड़ो | उनकी महत्वाकांक्षाओं को कुचलो नहीं , उनके सपने तुम्हारे सपनों से कहीं विशाल हैं”(पेज नंबर- 14 / तोत्तो-चान) | तोमोए के बारे में लेखिका लिखती हैं कि “...स्कूली घंटे ख़त्म होने के बाद कोई बच्चा घर लौटना ही नहीं चाहता था ,और हर सुबह सबको स्कूल पहुँचने की उतावली रहती थी | ऐसा था हमारा वह स्कूल |” (पेज नंबर – 13 / तोत्तो-चान ) |

तोत्तो-चान को पढ़ने से पहले तक मेरे जहेन में विचार उलझे हुए से थे | पर इसे पढ़ने के बाद उपरोक्त सभी बातों का तार मैं एक दूसरे से जोड़ पाया हूँ | पुस्तक की लेखिका ने अपने स्कूली जीवन की घटनाओं को आधार बनाकर जो कहानी पाठकों को समक्ष रखी है | वह केवल लेखिका की नहीं बल्कि हर बच्चे की कहानी है | जिसे जबरन स्कूल में हर रोज़ स्वर और वर्ण रटवाए जाते हैं | उसकी जिज्ञासा को शैतानी कह कर उसे सबके सामने डाटा जाता है | कोई यह नहीं जानना चाहता है कि तोत्तो-चान कक्षा की खिड़की के बाहर जाते साजिन्दों को क्यों बुलाती है | किसी ने दीवार पर पैंसिल या चौक क्यों रगड़ी है, क्या वो दीवार को और भी ज़्यादा सुंदर बनाना चाहते हैं ? उपरोक्त शिकायतों को भूल कर अगर हम एक पल को सोचे कि हमने (व्यवस्था) स्कूल क्यों बनाया है ? रोज़ स्कूल जाने का उद्देश्य क्या है ? क्या हम उन्हें बस लिखना और पढ़ाना चाहते हैं या कुछ और भी सीखना चाहते हैं ? जर्जर हो चुकी शिक्षण व्यवस्था से निकले हम सभी के पास क्या कुछ नया है ? आज हम किसी भी पढे-लिखे व्यक्ति को कहेंगे कि स्कूल के बच्चों को एक दिन के लिए पढ़ाओ तो वो क्या करेगा सिवाए पाठ पढ़ाने और कविता गवाने के | उसके पास कुछ और होगा ? जो बच्चे को पढ़ने-लिखने के कौशल से भी महत्वपूर्ण चीज़ दे जाए | जिसकी बात काबायाशी और हारुजी कहते हैं | बच्चों को दुनिया का सच ढूँढने के लिए व्यवस्था उन्हें स्कूल में मुक्त क्यों नहीं छोड़ देती है ? कोबायाशी अब नहीं रहे पर उनसे मैंने भी एक बात सिखी है- बच्चों को मौके देने की...ज़रूरी नही के आप हर गलती बच्चे हो जताए कभी कभी उन्हें खुद से सीखने को मौका देना चाहिए। सबसे खास बात जो हम सभी को सीखनी चाहिए बच्चों की बातों को ध्यानपूर्वक सुनना... अगर ऐसा उन्होंने नहीं किया होता तो तेत्सुको को एक आदर्श हैडमास्टर नहीं मिलते |

तोत्तो-चान हमारे सामने एक आदर्श स्कूल की अवधारण प्रस्तुत की है | एक ऐसा स्कूल जहां बच्चों को समाज में जीने और रहने की ट्रेनिंग नहीं दी जाती बल्कि दुनिया को अपने संपनों के रंगों से रंग कर बेहतर बनाने के लिए प्यार और स्नेह का केनवास दिया जाता है | ये कोबायाशी जी की सोच का ही कमाल है कि तोमोए में पढ़े हुये बच्चे आज समाज का प्रतिनिधित्व करने के साथ उन्हें बहुत कुछ दे रहे हैं | इस प्रक्रिया में तोमोए की प्राथमिक शाला का योगदान सबसे सराहनीय है | जिसने अपने बच्चों को किसी पाठ्यक्रम या विषय की चौहदी में नहीं बांधा बल्कि उन्हें उससे बाहर निकालकर अपने ख्वाहिशों को पूरा करने का भरपूर मौका दिया | जिससे उनकी जड़ें इतनी मजबूत होती चली गईं | जिससे वो कभी हालातों के आगे छूके नहीं | उदाहण के आधार पर अगर मैं “कुनियो ओए” की बात करू तो तोमोए के ख़त्म होने के बाद वो स्कूल नहीं गया पर वो जापान का अग्रणी विशेषज्ञ बना | उसके बनाए आर्चिड बल्ब की कीमत हजारों डालर होती है | यह सब कोबायाशी जी का प्रयास ही रहा है | जिन्होंने उसके सपनों को साकार करने के लिए उसके आत्मविश्वास को बढ़ाया | बस यही काम हमें अपने स्कूलों में करना है ताकि उसका प्रभाव क्षणिक न होकर दूरगामी हो | लेखिका ने अपनी पुस्तक में पक्का विश्वास जताया है कि आज के वर्तमान दौर में तोमोए जैसे ढेरों स्कूल होते तो अवश्य ही समाज में व्याप्त हिंसा और भय रूपी आग इतनी प्रबल नही होती और अंततः इतने बच्चे स्कूलों से पलायन नहीं होते | और अंत में बस इतना कहते हुये मैं अपनी बात को समाप्त करूँगा कि “ तुम सब एक हो , यह पता है ना तुम्हें | तुम कुछ भी करो , इस दुनिया में तुम सब एक साथ हो |” यह कथन श्री कोबायाशी का है |

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                                                                                             चंद्रभान सिंह मौर्य

                                                                                 एसोसिएट, (अजीम प्रेमजी फाउंडेशन)

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