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कविताएँ - उनके हिस्से का रंग - मेनिका सिंह

29

(चित्र - देवीलाल पाटीदार की कलाकृति)


उनके हिस्से का रंग

मेनिका सिंह

1

आओ, तुम्हारे सूखे होठों पे

अपनी मुसकान डाल दूं

और सुलझा दूं

तुम्हारे उलझे बालों को

उनमें अपनी उंगलियां

उलझाकर

आओ, जहां

अपनी धड़कनों के बीच

तिल की गहराई से

रंग दूं मैं

तुम्हारी सूनी आँखें

कि थम जाए उसमें

गहरे लाल तिल का

बौराया अहसास

उम्र भर के लिए....

2

नन्हीं ओस की

चमक से लगते हो

इस डर से

कभी तुम्हें

भरपूर छुआ नहीं

कि-पंखुरियों से कहीं

ढुलक न जाओ

और

इस अकेली

उदास तनहाई में

सहेजकर रख लिया

तुम्हारी कोमल छुअन

कुछ अपने लिए....

3

ये उदासी भरा गीत

लिखती किसके

लिए हूं

गुनगुनाते हुए

किस्से

जब ढलते आंसुओं के

साथ

ढल जाएंगे तो

किसे पहचान मिलेगी

तुम्हें ही न...

मगर ये आंसू तो

मेरे नाजुक लबों पर भी

ठहरते नहीं

फिर इतनी मोतियों का

बिखराव क्यूं.....???

4

तुमसे वादा किया था

तुम्हें ही

समर्पित करूंगी

शामों से डूबी याद.

पतझर की आवाज

रह-रह कर याद दिलाती रही

रात गहरा गई है

हमें जाना चाहिए वापस.

हम अकसर ही

विदा लिया करते थे

और विदा लेते-लेते

भोर

जग जाती थी...

5

तुम्हें देखकर

एक बार फिर

खालीपन का बौराया

अहसास

उतर सा गया है

मेरे भीतर...

तेरी आंखों की नमीं ने

खींच लिया है

मुझे दरिया में

एकबार फिर

जहां तेरी धड़कन में

सॅंवार लूं मैं

अपनी धड़कन...

6

उसके लिए कठिन न था

पूरी दास्तां से कागज काले करना

मगर उसके जीवन में

प्रेमी होते हुए भी

बहार जैसा कुछ न आया था

जिसे लिखने बैठती....

उसे तो प्रियतम की जगह

मिला था एक कठोर मर्द

और

अपनी लाल-अंसुआई

सूनी आंखें....

7

दूब से उठकर

नन्हीं बूंदों की चमक

छलक आई है

तुम्हारे माथे पर

आंखों में खिंच आए डोरों ने

सिंदूरी कर डाली है

मेरी सूनी मांग

और मात कर दिया है

धीमी हंसी ने

तुम्हारी ही नशीली मुस्कराहट को....

8

आंखों में आंसू

....तुम्हारी याद

तनहाइयों के समन्दर का गीत

बालों को छूता हुआ

ओस चुन रहा है

....ये शाम अकेला छोड़

गया है मुझे....

9

हर कहीं उसको ही तो

ढूंढा

सामने पड़ने वाले

अक्सों में

पर मिला कहां

कहीं नहीं मिला वो

वह अकेला था

और जिसे सपनों में

मैं अपना मान

बैठी थी.....

10

अपनी कोमलता को

बहुत तड़पाया है

मत खोलना मेरी

उदास डायरी

तुम्हारी आंखों में

आंसू आ जायेंगे

...धूसर कहानियों को लेकर

पीला पन्ना कहां तक जाएगा?

--

कुटुंब

भींगी

आँचल की सिलवटे

घिरी हैं

धुँआसे चूल्हे की आंच से

कि- सरकंडे भी नम

और आँखे लाल हैं

यह पकता ही नहीं . .  . .

यों पांत कुछ ज्यादा ही

लम्बी हो चली है . . .


भरोसा

दर्द से चीखती

खून से भींगी

रात

अन्दर आ जाएगी

यह जानते हुए भी

मैंने दरवाजे खुले रखे

इसलिए कि-

शुभ्र कोमलतम

थक न जाये .  . .


मेनिका सिंह

पीएच. डी. हिन्दी

जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय, नई दिल्ली

*****

नाम : मेनिका सिंह

माता/ पिता : श्रीमती सरस्वती देवी/ श्री राजेन्द्र सिंह

ग्राम : अरंगी, जिला : सोनभद्र, उत्तर प्रदेश (किसान परिवार)

शिक्षा :

बी ए : मिरांडा हॉउस, दिल्ली विश्वविद्यालय, 2014

एम. ए. : काशी हिन्दू विश्वविद्यालय, वाराणसी, 2016

एम. फिल. : जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, नई दिल्ली, 2018

विषय : ‘एस. आर. हरनोट की कहानियों में सामाजिक चेतना’

पीएच. डी. : जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, नई दिल्ली से शोधरत

प्रकाशन :

1. पांच कवितायेँ , 19 मई 2019 https://phanishwarnathrenu.com/%E0%A4%AE%E0%A5%87%E0%A4%A8%E0%A4%BF%E0%A4%95%E0%A4%BE-%E0%A4%B8%E0%A4%BF%E0%A4%82%E0%A4%B9-%E0%A4%95%E0%A5%80-%E0%A4%AA%E0%A4%BE%E0%A4%82%E0%A4%9A-%E0%A4%95%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%A4%E0%A4%BE/

2.जंतर मंतर आये तमिलनाडु के किसान’ कविता, सारस (संपादक : संजीव कुमार) सितम्बर 2017. पृष्ठ संख्या : 55 https://drive.google.com/file/d/0B7V8ek0jx3PHampUemxWUWRoalk/view

3. ‘तुम यहीं कहीं (कविता) , सृजन लोक (संपादक : संतोष श्रेयांश)

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