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कबीर हरमोट की कविताएँ

25

(चित्र - देवीलाल पाटीदार की कलाकृति)


(१)
यह विहाग का समय है

बलात्कृत चीख का गूंगापन 
पसीने की लूट
हत्यारे द्वरा तोड़ी गई मुट्ठियां
ख़ूनी जबड़ों द्वरा चबाये जा रहे पहाड़
एकलव्यों के कटते अंगूठे
ऐसे में विरही
चिरही..
फाग..
सब को छोड़कर
बिखरी हड्डियों के कतरों को समेटकर
गले में जमी बर्फ को सुलगाकर
जमें आंसुओं के खारेपन को पीकर
सिर्फ और सिर्फ
रात को गाना है
क्योंकि यह विहाग का समय है ।

कबीर हरमोट


( 2)
स्त्री तुम्हारे लिये सिर्फ योनि है
----------------------–---------------

तुम्हारे हवशी इतिहास में,
दिव्य सम्राटों ने
स्वर्णानकित करवाई हैं
योनि - गुलामी की लड़ाइयां

तुम्हारी काली आत्मा में आता है जब भी किसी जाति की गुलामी का ख्याल
तुम उसकी स्त्रियों की योनि को रौंदते हो।

(कोई अलवर ऐसे ही नहीं घटता है)

योनि जब स्त्री- भेद का आधार बनाई जा रही थी,
तुम उसे नायिका भेद कहके इतराते थे,
तुम्हारे साहित्य से उस हवशिपन की घिन्न अभी तक नहीं गई है।

तुम्हारे देवताओं, ऋषियों को आकंठ देखत हूँ  डूबते हवश में,
तो मेरा लहू यही सोचता है-

"स्त्री तुम्हारे लिये सिर्फ योनि है"

कबीर हरमोट


(३)
तुम्हारा जाना

तुम्हारा जाना 
ख़ुद से अलग होने जैसा था,
जैसे मौत...
पर तुम्हारा जाना एक ज़िंदा का जाना था
इसलिय आशान्वित हूँ
क्योंकि ज़िंदा और मुर्दों में यही तो फर्क है-
ज़िंदा कभी किसी मोड़ पर टकरा जाते हैं
हां
ज़िन्दगी कभी तुम्हें मौका दे,
तो लौटना,
उस पहाड़ी प्रदेश में
जिनको भेड़ियों ने अभी तक नहीं चबाया है।
इसलिय जहाँ-
हरियाली है
शीतल हवा है
पीछे से झांकता चांद है
और तो और
चांदनी के आगोश में लिपटी-
तुम हो
मैं तो हूँ हीं
आना

कबीर हरमोट
27-07-2018

(४)
लहू ने एक बार फिर सफेद को रक्ताभ कर दिया था

घाटी के बहते लहू में आकंठ डूबकर
जभी तुमने 'कॉमरेड' कहकर पुकारा
उस वक़्त भी मैंने यही चाहा-
तुम्हारी डबडबाई ताजा हंसी
चट्टानों पर बिखरे
कि चट्टानें फटें,और
एक बार फिर तुम सफेद होकर निकलो

सफेदपन हर लहू का समाधान रहा है

पर तुम चिल्लाकर धीरे धीरे डूब गई थी
लहू ने एक बार फिर सफेद को रक्ताभ कर दिया था

'कबीर हरमोट'

(५)
आंसुओं का खारापन
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आँसुओं का खारापन पीना ही हमारी नियति रही है
हमारी हड्डियों में
हमारे लहू में
वही खारापन जमा है
तब, तुम मिठ्ठेपन की आश कैसे कर सकते हो

"कबीर हरमोट

(६)
हत्यारा एक बार फिर
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शब्दों किताबों में लेट जाओ
एक बार फिर तुम्हें दुगने जोश से मरना है

रक्ताभ लहू सफेद हो जा
एक बार फिर तुझे पानी की तरह बहना है

क्योंकि

भारत माता के सीने पर बैठकर
हत्यारा एक बार फिर,
गोमूत पीकर तेज़ाब उगलेगा।

"कबीर हरमोट"

(७

बलात्कृत चीख

बलात्कृत चीख का गूंगापन चारों और पसरा है
बुहार कर उसको
भरता हूँ अपने अंदर
चिल्लाता हूँ
उन सब चीखों के बदले।

"कबीर हरमोट"

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