नाका - विश्व की पहली, यूनिकोडित हिंदी की सर्वाधिक प्रसारित, लोकप्रिय ई-पत्रिका. 

विविध विधाओं में से चुनकर पढ़ें -

* कहानी  || * उपन्यास || * हास्य-व्यंग्य  || * कविता  || * आलेख  || * लोककथा  || * लघुकथा  || * ग़ज़ल  || * संस्मरण  || * साहित्य समाचार  || * कला जगत  || * पाक कला  || * हास-परिहास  || * नाटक  || * बाल कथा  || * विज्ञान कथा  ||  * समीक्षा  ||

---***---

यहाँ की विशाल ऑनलाइन लाइब्रेरी में मनपसंद रचनाकार अथवा रचनाएँ खोज कर पढ़ें -

 नाका में प्रकाशनार्थ  रचनाएं इस पते पर ईमेल करें : rachanakar@gmail.com  रचनाकार के वाट्सएप्प नंबर 8989162192 (कृपया कॉल नहीं करें, कॉल रिसीव नहीं होगी, तथा इसका उपयोग केवल प्रकाशनार्थ रचना भेजने के लिए ही करें) पर भी वाट्सएप्प से रचनाएँ अथवा रचना पाठ के वीडियो प्रकाशनार्थ भेजे जा सकते हैं. अधिक जानकारी के लिए यह पृष्ठ [लिंक] देखें.

--

जनतंत्र के पहरुये - देवेन्द्र कुमार पाठक


सत्ता के भुख्खड़ और
पदलिप्साओं के मारे
टपकाते लार लुलुआते
पहनने को बेचारे
जीत के वज़नी पुष्पहार
नहीं सोचेंगे एक भी बार
वे नहीं देंगे ध्यान
इन दिनों जब उन्हें
सुन- देख रहा समूचा हिंदुस्तान........

दुबराते दुर्बलों की प्यास
चीख-चीख,गला फाड़
हो रही है हलाकान...........
जिस जनमत के लिये की हैं
रैलियां-सभायें हजारों,
किया एक जमीं-आस्मान
जबरजोर-बकझौंसियों से
इनने उनसे,उनने इनसे
दागे सवाल, मांगे ज़वाब
फूंके हैं लाखों हिसाब से,
करोड़ों रुपये बेहिसाब
पी-पी कर पानी मंहगा-बोतलबन्द
वे कोस रहे जिनको
ये पोस रहे उनको..........

. फिलवक्त मत करो उन्हें परेशान......
   बहुसंख्यक जनों के अटके होने दो प्राण
किसी भी हाल में है देश के लिए
जनमत जुटाने के लिए है उन्हें जीना है अभी
दम तोड़ते लोकतान्त्रिक तालाब का कीचड़ निथार
कतई न पी सकने लायक पानी पीना है फिर भी..........

तुम जो मुस्कराते हो
हजारों मीटर बैनर-पोस्टरों पर,
आता है रहम कभी एक पल उन पर?
वे मासूम,अधनंगे कबाड़ बीनते फिरते भूखे
जो हैं भविष्य में आपके जनमत के
उन मूलाधारों का
बुनियाद के पत्थरों का
कितना रखा ख्याल,
कभी नहीं उठाये सदन-सभाओं में
वे निहायत ज़रूरी वाज़िब सवाल.......
किये गैरज़रूरी बवाल............

कोई भी क्यों सोचे ?
खिसियानी बिल्ली कितने भी खम्भे नोचे
बबुये,अगुये,लगुये,भगुये चाहे कितने मारें कोचें
अभी लोकतन्त्र का महाकुंभ चल रहा है
फूंके गये डीजल-पेट्रोल के खर्चे का,
बिजली की भारी खपत का;
जिनसे हो सकती थी
सिंचाई खेतों की सूखती फसलों की,
और गर्मी से हलकान हजारों लाखों बीमारों को
जच्चाओं-नवजात शिशुओं को राहत मिल जाती..............

(हम ही क्यों सोचें,
जब फुरसत नहीं भगवान को ही
सोचने-देखने की)..................

बांटी और गटकी गईँ हजारों बोतलें
देशी-विदेशी  दारू की
चाहते तो ले सकती थीं, नहीं ले सकीं- शक्ल
ऐसी ज़रूरी प्राणरक्षक दवाओं की,
जिन्हें पचासों गुने लाभ को जोड़
तय की गई कीमत पर खरीदने-लुटने को
है विवश-बाध्य वह मतदाता,
जिसे कहते हो जनमत निर्माता;.......

जो धोखे पर धोखे खाकर
करता है विश्वास तुम्हारी बातों पर
आश्वस्त हो तालियाँ बजाता
इतने सारे अंधों में कोई एक ही काना राजा
खोजे भी नज़र नहीं आता........
मीलों चलता पीछे-पीछे जयकार गाता............
बार बार जिस राह पर ठोकर खाता
उसी पर उसी के पीछे भागा जाता
अंखमूंद उसी को गाता दोहराता.........

लोकतंत्र की रक्षा करने को
उसकी खूबसूरती कायम रखने को
अरबों रूपये के चुनावी खचों से
कमजोर होती जनगण की क्रयशक्ति की चिंता से अछूते
अर्थव्यवस्था के विशेषज्ञ कछुआ-धरम धरे
बंगलों में पड़े या हाथ बाँधे होंगे खड़े ............
हानि-लाभ के हिसाब में होगा व्यस्त दरबार
लोकतन्त्र की रक्षक बनने जा रही सरकार

जनमत की ताकत के बूते
सत्तासुख के दिवास्वप्न देखते होंगे .........
चैनलों पर लगातार किकियाते होंगे
खबरी काबिल माहिर कौए,
पिंजरों के शातिर सुग्गे
नमकहलाली के गीत गाते होंगे
जिस वक़्त; ..........

बहा रहे होंगे धूप में अनथक
जिस्म के पहाड़  से पसीने का नमक
जनतन्त्र के पहरुये  गांव,शहर,महानगर
दिहाड़ी मजूर,करोड़ों नवजवान,खेतिहर ........

केंचुली बदलते इन ठलुये-कामचोर साँपनाथों की
वादाखोर-लफ़्फ़ाज ,लबार नागनाथों की
तिकड़मी और गलतफहमी की जीत के बाद
लोकतन्त्र की पहरेदार सरकार बनाने को
उसे पांच साल बेहतरी से चलाने को
नमकहलाली की सौगन्ध खा रहे होंगे
उस वक़्त;............

सैकड़ों टन मिठास बाँटकर भी
कम नहीं कर सकेंगे कड़वाहट
हार के हिस्से के जनमत की
न  उतरे थे ,न उतरे हैं और न उतरेंगे
कभी भी कसौटी पर खरे
न जीत के हिस्से के जनमत की .....
आँधियाँ वहशत-नफरत की
अभी पारा चढ़ा रही हैं
अभी अमराइयों में सुस्ता रही हैं
बदल गये हैं इस बदलते मौसम में
कोयलों के कंठस्वर
कई कई नामों वाले आम
हैं अब खास मुकाम पर
चढ़ चुके हैं अब नीलामी पर.........

चौतरफ कोहरे सा होता घनीभूतअसमंजस,
साँसत में हर साँस कर रही सुख आस,
आकुल हर जन जन का मन-अंतस.............

*******************************नवगीत-

भागते उस भूत की छूटी लँगोटी हाथ लेकर

                                                           देवेंद्र कुमार पाठक


लस्त तन,मन पस्त,अन्तस त्रस्त,संवेदन अचेतन;
इस विषम परिवेश में भी गीत कोई गा रहा है.

कामयाबी आंकड़ों की तालियाँ पिटवा रही,
सीढ़ियाँ चढ़ती तरक्की लबर-दावों की;
दे रही छलना-छछूँदर सुदिन के सन्देश घरघर,
   मन लुभाती बतकही वह हाव-भावों की.

    भागते उस भूत की छूटी लँगोटी हाथ लेकर
     आज के मुद्दों से सबका ध्यान वह भटक रहा है

     शत्रुदल -सी हमलावर हैं विसंगतियां-विषमतायें
    प्रश्न करता 'आज' गिन-गिन जो हुये अब तक न हल,
       मेंढकों को तौलने बगुले जुटे हैं दलदलों में ;
      हो रहा बहुसंख्य जन-अंतस बहुत  बेसब्र-बेकल;

चढ़ रहा है भाव इतना गिर रही ऊंचाइयों का;
और बेपर्दा सचों पर पर्दा डाला जा रहा है

  है भभकता भय कहीं, टूटा कोई भ्रमजाल है
   दर्प-मद किस सर चढ़ा, लोभ ने बदला है खूंटा;
   किसका ध्वज उतरा,घिरीं किस पर बदलियां,
बेबसों पर बन कहर कब कौन क्यों टूटा;

बज रहा है एक सहमति-सुर सभी के साज़ पर,
एक ही कीर्तन-भजन गाया- बजाया जा रहा है.
--

नीमबयान-

                  किसके नाम का रोना है?

                                                  देवेन्द्र कुमार पाठक

.कमोबेश समूचा असफल,निरर्थक और नामालूम-सा लेखन गांव-कस्बे के दलित-उत्पीड़ित मजूर-किसानों,स्त्रियों के संघर्षरत जीवन की विसंगतियों,उम्मीदों और उनकी सामाजिक,आर्थिक समस्याओं पर केंद्रित.....न क़िताबों के लोकार्पण हुये न.कोई चर्चा!फिर भी लिखता हूँ.  कितना-कुछ अप्रकाशित  अप्रकाशित पड़ा है......
न छपने की कोई सार्थकता,न अनछपे से कोई नुकसान. बस,लिखे जा रहे हैं,बेसबब,जिए जा रहे हैं बेसबब;  चाहकर भी नहीं छूटती लत की तरह लगता है अब, लिखना या जीना. .....
ऐसे-इतना भी लिखकर जी लेना कुछ कमतर नहीं;बड़ी बात है. अपने गांव-गंवई के मेहनत-मजूरी कर बमुश्किल गुजर करनेवालों की ज़िन्दगी की पीड़ा,चाहत,अभाव,ज़द्दोज़हद और उस पर भी उम्मीद,भरोसा कि बहुरेंगे सुदिन; कुछ तो होंगे सपने सच,कोई तो होगा-लाखों बेईमानों,बतलबरों,खुदगर्ज़ों और हरामखोरों में से एक भलामानुष,बात का धनी नेता-अगुआ,जो हमारी सुध लेगा,ऊपर तक  हमारे सच को पहुंचायेगा,लड़ेगा; हमारी भूख-प्यास,हारी-बीमारी,बेकारी-लाचारी और तमाम आपदा-दुखों,अभावों पर सवाल उठायेगा.हमारे लिये कुछ सुख-सुविधायें ले आकर, हमें राहत देगा........
एक ही ठौर-ठीये पर ठहरी-ठिठकी उनकी ज़िन्दगी को कुछ चल-बढ़ सकने लायक तो बनायेगा.....इतना भी लिखे का अघाव सुकूनदेह है. जर्जर,स्थूलकाय,वात पीड़िता पत्नी के साथ उम्र के सातवें दशक में बीमार,अकेला बेऔलादआदमी करे भी क्या?..... बड़े आदमीनुमा लेखकों की बड़ी बातें. हम तो देश के उन  करोड़ों बहुसंख्यकों में से एक हैं,जिनका न कोई अत-पता,न पहचान,चर्चा; न कोई खूंटा-ठीया समकालीनता का.न कोई गुट-संगाती, न चेला-चपाटी और न अपनी कोई खानदानी परम्परा,न  विरासत-थाती. नहीं गाया कभी भी राग दरबारी किसी की सहमति का, न बांधा मोर्चा किसी के विरोध -प्रतिशोध में. न कभी हो सके हमप्याला-हमनिवाला किसी बिरादरी में.....
  गाते रहे अकेले मेहनत कश की पीर के गान.जिस पर नहीं देता कोई ध्यान,बस देते रहते हैं बड़े ओहदेदार,नामी-खानदानी,दल-बल-नायक,छल-छद्म में दक्ष,बाहुबलियों की लम्बी जुबान,थोथे बयान.उतार लाते हैं जो धरती पर बड़बोलों से सातों आसमान. गज़ब की हाज़िरज़वाबियों और लफ़्फ़ाजियों के कलाबाज; जिनने हथियाये तख्तो-ताज़; वे ही बस हांकते हैं हर मौके पर अपनी मनबतियों से इक्का-दुक्का कोई करोड़ों पर कामयाबी की प्रायोजित कहानी.खरी सच्चाई इसके उलट,की उस खेतिहर मजूर की,न नेता न अफसर, नहीं कोई सुनता-गुनता.......आज भी बाजार का मारा खेतिहर,जला देता है, समूचा खेत टमाटर का,पेड़ मौसम्मी के बारह बरस तक पाले-पोसे. 'पूस की रात' के घीसू की तरह.....
  यही सब जो आँखिन देखा-भुगता,वही  लिखा............
वही हल-बैल,खेत-खलिहान,प्यास-पसीना,लू-घाम,बारिश-सर्दी,छानी-छप्पर,गैल-खोरी,जंगल-बीहड़,नदिया-तालाब,सूखा-बाढ़, काई-कीच,हल्कानी-हीच,हारी-बीमारी,जात-जमात,छूत-छात,व्याह-बारात,बीवी-बच्चा और जिंदगी पर भरोसा .....बस.
ऐसे ही किसी दिन सरक लेंगे,अपने अकेलेपन से छुड़ाकर हाथ, अनाहट......हाशिये में भी नहीं रहे हम कभी,न होना है......."आख़िरकार अगिन-शय्या पर नंगे ही तो सोना है;
कौन यहाँ अपना-बेगाना,किसके नाम का रोना है......?'

********************
आत्मपरिचय-देवेन्द्र कुमार पाठक
म.प्र. में कटनी जिले के दक्षिणी-पूर्वी सीमांत पर,छोटी- महानदी ग्राम्यांचल के एक गांव में जन्म.शिक्षा-M.A.B.T.C. शिक्षा विभाग मध्यप्रदेश से सेवानिवृत्त.
कमोबेश हर विधा में लेखन-प्रकाशन;'महरूम' तखल्लुस से गज़लें कहीं...................

.प्रकाशित किताबें- 2 उपन्यास, ( विधर्मी/अदना सा आदमी ) 4 कहानी संग्रह,( मुहिम/मरी खाल : आखिरी ताल/धरम धरे को दण्ड/चनसुरिया का सुख ) दिल का मामला है,कुत्ताघसीटी ;( व्यंग्य संग्रह ) दुनिया नहीं अँधेरी होगी; (गीत-नवगीत संग्रह) ओढ़ने को आस्मां है;(ग़ज़ल संग्रह ) सात आंचलिक नवगीतकारों के संग्रह 'केंद्र में नवगीत' और 'आँच' लघुपत्रिका के कुछ अंकों का नवगीतकार मित्रों के सहयोग से संपादन किया और मंचों से कविताई की भूलें भी कर लीं...... ' वागर्थ', 'नया ज्ञानोदय','मनस्वी', 'अक्षरपर्व','चकल्लस', 'अन्यथा', ,'वीणा',आजकल','दिशा','नई गुदगुदी','वैचारिकी', 'कथन','कहानीकार','आज','अवकाश','उन्नयन','कदम', 'नवनीत', 'अवकाश' ', 'शिखर वार्ता', 'हंस','राष्ट्रदूत', 'भास्कर','बालहंस'आदि पत्र-पत्रिकाओं और 'रचनाकार', 'साहित्यम्', 'प्रतिलिपि'आदि बेव पत्रिकाओं में रचनायें प्रकाशित.आकाशवाणी,दूरदर्शन से प्रसारित. 'दुष्यंतकुमार पुरस्कार','पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी पुरस्कार' आदि कुछ पुरस्कार भी जाने कैसे हाथ लगे.!...अब बेव पत्रिकाओं पर जब-तब हाज़िरी हाज़िरी दे लेते हैं.
                

सम्पर्क-1315,साईंपुरम् कॉलोनी,साइन्स कॉलेज डाकघर-
कटनी,कटनी,483501,म.प्र.
ईमेल-devendrakpathak.dp@gmail.com

1 टिप्पणियाँ

रचनाओं पर आपकी बेबाक समीक्षा व अमूल्य टिप्पणियों के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद.

स्पैम टिप्पणियों (वायरस डाउनलोडर युक्त कड़ियों वाले) की रोकथाम हेतु टिप्पणियों का मॉडरेशन लागू है. अतः आपकी टिप्पणियों को यहाँ प्रकट होने में कुछ समय लग सकता है.