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'व्हाट्सएप्प ' से क्षय होती आत्मीयता • सिंघई सुभाष जैन

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'व्हाट्सएप्प ' से  क्षय होती आत्मीयता

                            •  सिंघई सुभाष जैन

               वर्तमान में सोशल मीडिया , अंतरजाल  में सबसे अधिक प्रचलन में  WHATSAPP  ' व्हाट्सएप्प ' हो गया है। सुबह होने से देर रात तक लोगबाग इसमें व्यस्त दिखाई दे रहे हैं। घर परिवार हो या कार्यालय लोगबाग बारम्बार यह एप्प खोल - खोलकर देखा करते हैं। ऐसा लगता है कि यह अब सांस की तरह जीवनदायी बन गया है।

              एप्प दिन -रात चलते रहने से लोगबाग अपनी सारी सूचनायें इस पर डालकर मुक्त हुआ समझने लगे हैं। घर में आ रही नयी बहूंएं  सास - ससुर की बुराईयां मां को तुरंत भेजने में बुद्दिमानी का कार्य जान रही हैं।  कार्यालय में किसी भी तरह तकलीफ़ होने पर मित्रों को  इसी एप्प से सूचनायें भेजी जा रही हैं। तत्काल सूचना भेजे जाने से  बाद में पछतावा भी हो जाता है।बाद में लगता है कि अरे जल्दी क्यों कर दी ।गलतफ़हमी में यह कार्य हो गया ।

              अभी यह भी देखा जा रहा है कि किसी परिवार में वैवाहिक कार्य होने पर उसके कुटुम्बियों से जानकारियाँ  भी इसी एप्प से  ली जा रही हैं। पूछा जा रहा कि ताऊजी का मोबाईल नहीं लग रहा है। अगर एप्प  ना होता तो कार्यक्रम की सारी रूपरेखा घर - परिवार के सदस्यगण व्यक्तिगत , सामूहिक बैठक ,चर्चा में आमने - सामने चेहरे भांपते हुए कोई निर्णय पर पहुँचते। ये तो व्हाट्सएप्प है कि पता  नहीं लगता कि दूसरे सदस्यों  के मन में क्या हैं ।

          परसों सुबह मैं  भोजन कर रहा था कि मेरे मोबाईल पर बारम्बार फोन आ रहा थे । आखिर में बहू से रहा नहीं गया । वह बोली " पापा एक ही नम्बर  से बारम्बार फोन आ रहे हैं। मैं बैचेन हो गया। मैंने सोचा क्या पता कोई जरूरी बात हो। मैंने भोजन बीच में छौड़कर चूक गये नंबर पर मोबाईल लगाया। वहाँ से सवाल आया  कि  "आप मुकेश की शवयात्रा में नहीं आये ।"  मैं आश्चर्यचकित हुआ " कब शांत हुआ ।"

उधर से उत्तर आया कि सुबह 6 बजे। सभी मित्रों को व्हाट्सएप्प पर सूचना दे दी गई थी। मैंने कल रात के बाद अभी तक व्हाट्सएप्प नहीं खोला था। शवयात्रा में नहीं जा पाया।                   अनेक व्यक्ति अभी भी ऐसे हैं जो व्हाट्सएप्प चलाना नहीं जानते । वे अपने पोते के भरोसे रहते हैं। जब वह आयेगा , व्हाट्सएप्प खोल देगा। कई लोग अभी भी ऐसे होंगे कि उनके मोबाईल पर वह एप्प  सक्रिय नहीं होगा। यह भी देखने में आ रहा है कि कोई झूठी ख़बर आग की तरह इसी एप्प से  फैल जाती है। जो गलत बात एक बार प्रसारित हो गई , वह वापस आने से तो रही।

                 पिछले दिनों एक कोचिंग समूह का विज्ञापन आया कि सारा पाठ्यक्रम व्हाट्सएप्प पर पढ़ाया जायेगा। अब यह विचारणीय प्रश्न स्वतहः बन रहा है कि इस एप्प  से वैसी पढ़ाई होने से तो रही जो हमारे समय में आमने - सामने चेहरे के हाव -भाव पढ़कर होती थी। व्हाट्सएप्प  के कारण हम अपनी आत्मीयता खो रहे हैं। इस एप्प  के कारण सामाजिक व घरेलू रिश्तों में दरार आ रही हैं।

           यातायात अवरूद्य होने पर चौराहे पर राहगीर वह एप्प खोलकर उस पर लिखकर वार्ता करने लगते हैं। विद्यालय, महाविद्यालय, वाचनालय से बाहर आते - आते व्हाट्सएप्प में लगे रहते हैं। मार्ग में किसी से टकरा जाते हैं। मुख्य मार्ग पर तो दुर्घटना होने का भय भी रहता है। पर उन उपयोगकर्ताओं का दिल है कि मानता नहीं।

           आजकल वैवाहिक , सामाजिक कार्यक्रमों के आमंत्रण भी व्हाट्सएप्प  पर दिये जा रहे हैं। जिन्हें कार्यक्रम में जाने की इच्छा नहीं होती वे यह कहते हुये पाये गये कि उनके मोबाईल पर व्हाट्सएप्प  तो नहीं है या फिर समाचार नहीं मिला अथवा मैंने जब व्हाट्सएप्प  खोला तब तक देर हो चुकी थी अतः शामिल नहीं हो सके। यदि आमंत्रण व्यक्तिगत रूप में मिलकर दिया जाता तो बात आत्मीयता की होती। किसी भी समाज में यह ख़बर आती है कि उस युवती का अथवा उस  युवक का उससे रोमांस चल रहा है तब इसी एप्प से ज्वाला की भांति ख़बर फैलने में देरी नहीं लगती।

          लेखक  • सिंघई सुभाष जैन

                     "स्वाश्रया भवन"

                      41 - बी , बखतावररामनगर,

                 :    डाकघर के पीछे , तिलकनगर,

                      इन्दौर  452018

                      मध्यप्रदेश

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