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सौरभ पाण्डेय की कविता - शून्य से शिखर तक

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शून्य से शिखर की ओर,

बढ़ते हुए कदम।

कभी गिरते कभी उठते

चलते रहे हम।

आधी दूरी भाग के, और फिर रुक से गये हैं।

जिंदगी के बोझ से, कुछ थक से गये हैं।

जो मंजिल आसान थी, थोड़ी धुंधला सी गई है,

जल्दी पहुंचने की आस, थोडी़ अकुला सी गई है।


कभी देखता हूँ शून्य को,कभी शिखर को।

और कभी अपनी इस थकी हुई नज़र को।

कभी देखता उनको, जो आस लगाए बैठे हैं।

दिखते वो भी कभी कभी, जो व्यंग्य सुनाए बैठे हैं।

लक्ष्य  प्राप्ति तक गिरना उठना,इस जीवन की यही नियति है ।


इसी पहेली को सुलझाने में, अपनी मध्यम यह गति है।

कुछ आशाएँ, सिसकियाँ, संवेदनाएं, ऐसी ललकार दिखाती हैं।

और कदम के धीरे होते ही, ऐसी फटकार लगाती हैं।

यही भाव, शक्ति ,विश्वास ,  जो आत्म जनो से मिलता है।

सतत निरन्तर चलने का,  साहस यहीं से पलता है।


सौरभ पाण्डेय,

लखनऊ।

2 टिप्पणियाँ

  1. उत्कृष्ट रचना

    जवाब देंहटाएं
  2. आधी दूरी भाग के, और फिर रुक से गये हैं।

    जिंदगी के बोझ से, कुछ थक से गये हैं।

    वाह।
    बहुत सुन्दर रचना।

    जवाब देंहटाएं

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