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ज्ञानदेव मुकेश की 2 लघुकथाएँ

दुःख की आंधी

शाम का समय था। तड़पाती हुई गर्मी थी। मैं पसीने से ऊभ-चुभ हुआ जा रहा है। मौसम के तेवर बदलने के कोई लक्षण नहीं दिख रहे थे। मैंने सबेरे ही भोजन निपटाया और सोने चला गया।

सुबह उठा तो पाया कि मौसम बेहतर है। तभी पत्नी आई। उसने कहा, ‘‘कल आधी रात को बड़ी तेज आंधी आई थी। बादल घिर आए थे। बिजली कड़कने लगी थी। देखते-देखते ही तेज फुहार पड़ने लगी थी। मौसम बड़ा खुशगवार हो गया था। मैं बरामदे में जाकर देर तक बैठी रही। बड़ा अच्छा लग रहा था। तेज हवाएं और ठंडी फुहारें। अहा ! क्या आनन्ददायक थीं। आंधी का मजा आ गया!’’

मैने नाराजगी में कहा, ‘‘तुमने मुझे जगाया क्यों नहीं ? ऐसी आनन्ददायक आंधी का मैं भी लुत्फ उठाता। रात मैं गर्मी से कितना परेशान था। मुझे भी राहत महसूस होती। तुम्हें मुझे जगाना चाहिए था। मैं प्रकृति के इस सुख से वंचित रह गया।’’

पत्नी ने कहा, ‘‘तुम गहरी नींद में सो रहे थे। मुझे जगाना ठीक नहीं लगा।’’

मैं चुप रहा। फिर सोचा, चलो अखबार आता है तो उसी में इस आनन्ददायक आंधी के बारे में समाचार पढ़ लूंगा। थोड़ी ही देर में अखबार आ गया। मैंने उत्साह के साथ अखबार का पहला पन्ना पलटा। मगर यह क्या ? यहां तो उस ‘सुखद’ आंधी के बारे में दुखों से भरे समाचार छपे थे। छपा था- कल रात राज्य में आंधी का भारी कहर। कई पेड़ गिरे। पेड़ गिरने से कई राष्ट्रीय राजमार्ग बंद। भीषण जाम। खड़ी फसल को भारी नुकसान। कच्चे मकान की दीवार गिरने से दस लोग दबकर मरे। दूर गांव में ठनका गिरने से चार की मौत।

मेरे रोंगटे खड़े हो गए। मुझसे अखबार आगे पढ़ा न गया। मैंने अखबार मोड़कर टेबुल के नीचे छुपा दिया, मानो मैं इन समाचारों को झुठलाना चाह रहा था। तभी पत्नी चाय ले आई। चाय बहुत फीकी लगी। मैंने कहा, ‘‘अच्छा हुआ, मैंने कल रात की तुम्हारी सुहानी आंधी नहीं देखी। यह आनन्ददायक कहां थी ? वह तो बहुत विकराल और बुरी थी।’’

पत्नी हैरान थी।

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अंधकार का विजेता

दीपावली के आगमन की आहट हो चुकी थी। एक कुम्हार पूरी तल्लीनता से मिट्टी के दीए बनाने के काम में जुटा था। वैसे उसे अच्छी तरह से ज्ञात था कि शहर के बाजार में दीयों की अब कोई कद्र नहीं रही। बिजली के झालरों और मोमबत्तियों ने दीयों को पदावनत कर दिया था। फिर भी गीली मिट्टी को दीयों का आकार देने में उसे एक तरह की प्रफुल्लता और उमंग का अहसास हो रहा था। वह हर वर्ष की तरह इस वर्ष भी इस प्रफुल्लता और उमंग से वंचित रहना नहीं चाहता था।

दीयों ने अपना रूप धारण किया, धूप में सूखे और आग में तपकर जब वे मुक्कमल हुए तो कुम्हार उन्हें बोरी में भरकर शहर ले आ गया। सड़क किनारे दीयों की ढेर लगाकर वह ग्राहकों की राह देखने लगा। अंधेरे से लड़ने वाले दीए की लौ की कद्र करने वाले कुछेक ग्राहक जरूर आए और उन्होंने दीए मोल लिए। सुबह से शाम हो गई। मुश्किल से आधे दीए बिके। जो पैसे हाथ में आए, उनसे कुम्हार ने तेल और बाती खरीद लिए। वह बचे हुए दीए लेकर गांव वापस आ गया।

रात घिरने लगी तो कुम्हार ने बचे हुए सारे दीए तेल और बाती की मदद से प्रज्ज्वलित कर दिए और उन्हें अपने घर के चारों तरफ इस छोर से उस छोर तक कतारबद्ध कर दिया। झिलमिलाती रोशनी की लकीरें जैसे दिग-दिगंत तक खिंच गइंर्। उसे लगा, अंधेरे से घिरे आसमान में दूर तक रोशनी समा गई हो। कुम्हार ने दीयों के व्यापार के संदर्भ में जरूर एक छोटी-सी हार झेली थी, मगर आज उन जगमगाते दीयों के साथ अंधकार के सामने वह रोशनी का हरकारा बन एक विजेता की तरह खड़ा हो गया था।

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-ज्ञानदेव मुकेश

पता-

फ्लैट संख्या-301, साई हॉरमनी अपार्टमेन्ट,

अल्पना मार्केट के पास,

न्यू पाटलिपुत्र कॉलोनी,

पटना-800013 (बिहार)

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