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कर्ज - राजेश गोसाईं की कविताएँ

1.......कर्ज .....

छोड़ के इस दुनिया को जब मैं जाऊंगा
कर्ज प्रकृति का मैं कैसे चुकाऊंगा

ना मैने पेड़ लगाया , ना कोई फर्ज निभाया
जब से दुनिया में आया , घाव कुदरत को लगाया
के जब मैं मर जाऊंगा
अग्नि तो इस पेड़ से ही पाऊंगा

जब तक सांसे हैं चलती , फुर्सत नहीं है मिलती
कोई ऐसा समय निकालूं , इक पेड़ ही लगा लूं
घाव इस धरती को फिर ना लगाऊंगा
कर्ज प्रकृति का चुका कर , मैं चला जाऊंगा

अपनी धरती पे मैं हरियाली लाऊंगा
मर कर भी मैं सबको याद आऊँगा
लगा के पेड़ मैं सबके दिलों में बस जाऊंगा
छांव इस धरती को दे जाऊंगा

राजेश गोसाईं
********
2....
सवेरे सवेरे......

सवेरे सवेरे
कलम तू मेरे
नये नये गीत लिख दे

कुछ देशभक्ति के
कुछ प्रभुभक्ति के
कोई प्रेम रस के तू मेरे
नये नये गीत लिख दे

जल रहा है दीया मेरा
लेकिन तेल बाकी है
बुझने से पहले इस लौ में तू मेरे
नये नये गीत लिख दे

फड़फड़ा रही ये बाती है
जिन्दगी थोड़ी बाकी है
कभी हो ना अंधेरे
कलम तू नये नये गीत लिख दे
राजेश गोसाईं
*******
3.......रंग बदलती दुनिया.....

इस रंग बदलती दुनिया में
हम किसी को क्या पहचाने
कोई दिल का है काला
कोई पेट का भी है काला
कोई समझ ना पाये किसी को
इस बस्ती में हैं गिरगिट के घराने
मै भी तो इस दुनिया का हिस्सा हूँ
लोगों के लिये बस इक किस्सा हूँ
रंग बदलता हूँ अक्सर मौके पर
कभी प्यार के कभी नफरत के
कौन जाने कौन पहचाने
राजेश गोसाईं
*****
4....
.....सितारा.....

लिखा रातों की स्याही से
हमने किस्मत का सितारा
ना हम हुये किसी के
ना कोई हुआ हमारा

बड़ी चोट खाई अंधेरों में हमने
दर्द बहुत मिले रिश्तों की बस्ती में
पर ना मिला कोई हमदर्द- सहारा
रहा गर्दिशों में किस्मत का सितारा

कोई चराग नहीं था राह में मेरे
अपनों के दिल में मिले बहुत अंधेरे
लिख दिया जख्मों से मैंने सवेरा
बड़ी उलझन में है यह सितारा
राजेश गोसाईं
*******
5.........घर मेरे.....

लौट आना तू
घर में मेरे
खेलेंगे फिर से
घर घर बनेरे

तू छुप जाना
कहीं पर
मैं ढूंढ लूंगा
पग ये तेरे

लौट आना तू फिर से
घर में मेरे

कभी मुझको तू हराना
लुडो में आकर
कभी एक ही कुल्फी
खाना साथ मेरे

लौट आना तू फिर से
घर में मेरे

खूब आ के लड़ना
ओ साथी मेरे
रूठने मनाने के
लगेंगे फेरे

लौट आना तू फिर से
घर में मेरे

कैरम की गोटी रखना
छुपा के दरी के नीचे
पिट्ठू गर्म खेलना
कहीं से तू आ  के

चार दिनों की
जिन्दगी में
कैसे कटेंगे
तेरे बिना लम्हे मेरे

लौट आना तू फिर से
घर में मेरे

राह देखे अंखियां मेरी
कब आयेंगे वो दिन सुनहरे
जवां राहों में फिर कब मिलेंगे
वो बचपन के फेरे
ऐक बार तो लौट आ
तू घर पे मेरे
राजेश गोसाईं
******
6.....
....गाड़ी.....

मैं जिन्दगी की गाड़ी को चलाता चला गया
विषयों औ वासनाओं में फसाता चला गया
अभी अभी पास से गुजरा इक जमाना
कह रहा था बच के चलना पर मैं नहीं माना

लोभ और स्वार्थ की गठरी लादे ईमान धर्म छोड़
मैं पाप के रस्तों पर गाड़ी चलाता चला गया
हर सच और झूठ का ईंधन रिश्तों में मिला कर
मैं जिन्दगी की गाड़ी को गड्डों में फंसाता चला गया
राजेश गोसाईं
******
7......चार लाईने....

इक दिन कागज पर लिखी
मैने चार लाईने ...2
पसन्द नहीं आई मुझे
वो चार लाईने...2
उठा कर रखा कागज
मैने जब जेब में
बोर हो गया था
मैं भी थोड़ी देर में
मगर जब घूमा दिमाग
याद आ गई चार लाईने
तुरन्त लिख दी मैने आज
ये चार लाईनें....2
पता नहीं पसन्द है आपको
या नहीं ये चार लाईनें
मैंने तो यूँ ही बना दी हैं
ये चार लाईने
राजेश गोसाईं
*****
8......
.....इमारत....

क्यूँ शब्दों की कोई इमारत
नहीं बन रही है आज
क्युँ कल्पनाओं के धागों में
उलझ नहीं हूँ आज

ये क्या हो गया है मेरे जज्बातों को
जो बाहर  नहीं आ रहे आज
मैं ढूंढ रहा हूँ शब्दों की तितलियां
भावनाओं के मधुबन में
बन के दीवाना सा भंवरा आज
राजेश गोसाईं
*****
9.......राजा आसमां का.....

जरा पूछो सूरज से
क्यों अंधेरा चुराया है
निकला जब भी चाँद
क्यों तूने उसे चुराया है

जब सांझ केसरिया हुई
तूने छदम रूप बनाया
जब सितारों ने
रंग खूब जमाया
तूने चुपके से आ के
ये चाँद चुराया

ना पवन की ना मेघों की
ना परवाह थी तुझे
बस आसमां से ही
तूने राजा आसमां का चुराया
राजेश गोसाईं
******
10.....


...हम कहाँ जायेंगे......

हम चार दिन की छुट्टी पर
अब बाहर जायेंगे
लेकिन कहाँ जायेंगे
हम कहाँ जायेंगे

कोई कहता है शिमला
कोई कह रहा है मसूरी
कोई कहता है हम
गंगा में डुबकी लगायेंगे

इक हल्का हल्का सा
अहसास आनंद का
दिल में सबके समाया है
बाहर जाने का उत्साह
हमारा और बढ़ाया है
जायेंगे कहीं पर तो
ये इरादा बनाया है
लेकिन कहाँ जायेंगे
ये तय नहीं हो पाया है
राजेश गोसाईं

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