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गुरुपूर्णिमा---व्यासपूर्णिमा - गोवर्धन यादव

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गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णुर्गुरुदैवों महेश्वरः // गुरुः साक्षात्परं ब्रह्म तस्मै श्रीगुरुवे नमः

गुरुपूर्णिमा अर्थात सदगुरु के पूजन का पर्व. इस दिन गुरुओं की पूजा-.... गुरु का आदर.... किसी व्यक्ति की पूजा नहीं है,.... किसी व्यक्ति का आदर नहीं है अपितु गुरु की देह के अंदर जो विदेही आत्मा है....परब्रह्म पर्मात्मा है उसका आदर है,... ज्ञान का आदर है...., ज्ञान का पूजन है,... ब्रह्मज्ञान का पूजन है.

गुरुपूर्णिमा को व्यासपूर्णिमा भी कहा जाता है. एक पौराणिक कथा के अनुसार वसिष्ठ जी महाराज के पौत्र परासर ऋषि के पुत्र वेदव्यास जी जन्म के कुछ समय पश्चात अपनी माँ से कहने लगे-“ अब हम तपश्चर्या के लिए प्रस्थान करेंगे.” माँ ने स्नेहवश कहा-“पुत्र ! पुत्र का कर्तव्य है कि वह अपने माता-पिता की सेवा करे और जो कार्य हमसे अधूरे रह गए हैं, उसे पूरा करे. बिना हमारा कर्ज उतारे तुम वन में तपस्या के लिए कैसे जा सकते हो.?” अपनी प्रिय माँ की बातों को सुनकर व्यासजी ने बड़ी ही विनम्रता से हाथ जोड़कर कहा-“ माँ ! आप जब भी याद करेंगी और कभी बहुत ही जरुरी काम रहा, तब मैं आपके सामने तत्काल प्रकट हो जाऊँगा”. इस तरह माँ को वचन देकर और आज्ञा लेकर तप करने के लिए वन में चले गए. वे सीधे बद्रीकाश्रम पहुँचे और एकान्त में समाधि लगाकर रहने लगे.

बदरिकाश्रम में बेर पर जीवन-यापन करने के कारण उनका एक नाम “बादरायण” पड़ा. चुंकि व्यासजी का जन्म द्वीप पर हुआ था, इसलिए उनका एक नाम “द्वैपायन” भी पड़ा. चुंकि उनका रंग कृष्ण अर्थात काले रंग का होने के कारण “कृष्णद्वैपायन” भी पड़ा. उन्होंने वहाँ रहकर वेदों का विस्तार किया, इसलिए उनका एक और नाम “वेदव्यास” भी पड़ा. ज्ञान के असीम सागर, भक्ति की आचार्य, विद्वत्ता की पराकाष्ठा और अथाह कवित्व-शक्ति आदि जैसी परम शक्तियों से सुसंपन्न “वेदव्यास जी” से शायद ही कोई बड़ा कवि इस धरती पर मिल पाएगा, कहना मुश्किल है. भगवान वेदव्यास नाम से ही आषाढ़ शुक्ल पूर्णिमा का नाम “व्यासपूर्णिमा” पड़ा है.

इस दिन पड़ने वाली पूर्णिमा को सबसे बड़ी पूर्णिमा मानी जाती है, क्योंकि परमात्मा के ज्ञान, परमात्मा के ध्यान और परमात्मा की प्रीति की तरफ़ ले जाने वाली है यह पूर्णिमा. इसको गुरुपूर्णिमा भी कहते हैं. जब तक मनुष्य को सत्य के ज्ञान की प्यास रहेगी, तब तक ऐसे व्यास पुरुषों का, ब्रह्मज्ञानियों का आदर-पूजन सदैव होता रहेगा.

व्यासजी ने वेदों के विभाग किए. “ब्रह्मसूत्र” व्यासजी ने ही बनाए. पाँचवा वेद “महाभारत” आपने ही बनाया, भक्ति-ग्रन्थ “भाग्वतपुराण” भी व्यासजी की ही रचना है एवं अन्य सतरह पुराणों का प्रतिपादन भी भगवान वेदव्यासजी ने ही किया है. विश्व में जितने भी धर्मग्रन्थ हैं, फ़िर वे चाहे किसी भी धर्म-पन्थ के हों, उनके अगर कोई सात्विक और कलयाणकारी बातें हैं, वेदव्यासजी के शास्त्रों से ही ली गयी हैं. इसलिए “व्यासोच्छिष्टं जगत्सर्वंम” कहा गया है.

व्यासजी ने समूची मानव-जाति को सच्चे कल्याण का खुला रास्ता बता दिया है. जिन-जिनके अन्तःकरण में ऐसे व्यासजी का ज्ञान, उनकी अनुभूति और निष्ठा उभरी, ऐसे पुरुष अभी भी ऊँचे आसन पर बैठते हैं तो कहा जाता है कि भागवतकथा में अमुक महाराज “व्यासपीठ” पर विराजेंगे.

व्यासजी के शास्त्र-श्रवण के बिना भारत तो क्या विश्व में भी कोई आध्यात्मिक उपदेशक नहीं बन सकता----व्यास जी का ऐसा अगाध ज्ञान है. व्यासपूर्णिमा का पर्व वर्ष भर की पूर्णिमा मनाने के पुण्य का फ़ल तो देता ही देता है, साथ ही नयी दिशा, नया संकेत भी देता है और कृतज्ञता का सदगुण भी भरता है. जिन महापुरुषों के प्रति कृतज्ञता ज्ञापन का अवसर.......- ऋषिऋण चुकाने का अवसर,.... ऋषियों की प्रेरणा और आशीर्वाद पाने का एक महान अवसर है...”व्यासपूर्णिमा”

गुरुजनों, श्रेष्ठजनों एवं अपने से बड़ों के प्रति अगाध श्रद्धा का यह पर्व, भारतीय सनातन संस्कृति का एक विषिष्ट पर्व है. कृतज्ञता व्यक्त करने का और तप, व्रत, साधना में आगे बढ़ने का भी यह त्योहार है. संयम, सहजता, शान्ति और माधुर्य तथा जीते-जी मधुर जीवन की दिशा बताने वाली पूर्णिमा है यह “गुरुपूर्णिमा”. ईश्वर की सहज प्राप्ति, सहज-सलफ़-साफ़-सुथरी दिशा बताने वाला यह त्योहार है...गुरुपूर्णिमा. आस्था का.... श्रद्धा का और समर्पण का पर्व है “गुरुपूर्णिमा”.

गोवर्धन यादव.

103, कावेरी नगर,छिन्दवाड़ा (म.प्र.) 480001

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