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डा. कौशल किशोर श्रीवास्तव की रचनाएँ

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सकुचि दीन्ह रघुनाथ

डा. कौशल किशोर श्रीवास्तव

सुन्दर कांड के दोहा क्रमांक 49 (ख) के अनुसार

जो संपति सिव रावनहिं दीन्हि दिये दस माथ

सोई संपदा विभीसन्हि सकुचि दीन्ह रघुनाथ।।

अब यहां प्रश्न उठता कि जब भगवान श्रीराम ने सुन्दर कांड तक लंका पर विजय ही प्राप्त नहीं की थी तब वह लंका भगवान विभीषण को कैसे दे सकते थे ?

अस कृपा सिव जगत प्रावनी।

देह सदा सिव मन भावनी।।

एवं मस्तु कह प्रभु रन धीरा।

मांगा तुरत सिंधु कर नीरा।।

जदपि सखा तब इच्छा नाहीं।

मोर दरस अमोघ जग माही।।

अस कहि राम तिलक लेहि सारा।

सुमन वृष्टि नभ भई अपारा।।

रावण क्रोध अनल निज स्वास समीर प्रचण्ड।

जरत विभीषणु राखेऊ दीन्हेहु राज अखण्ड।।

जो सम्पति सिव रावनहि दीन्ह दिये दस माथ।

सोई सम्पदा विभीषनहि सकुचि दीन्ह रघुनाथ।।

उपरोक्त पंक्तियों से विदित होता है कि हालांकि विभीषण व्यक्त रूप में भगवान की मात्र भक्ति मांग रहे थे पर अव्यक्त रूप में उनके मन में लंकाधिपति बनने की आकांक्षा थी। भगवान ने किस विश्वास के साथ विभीषण का राज तिलक कर दिया ? वह इसलिये कि भगवान में अदम्य आत्म विश्वास था। उसकी पहली परख महर्षि विश्वामित्र को हुई थी। इसीलिये ताड़का मारीचि एवं सुबाहु जैसे दुर्दम्य राक्षसों से लड़ने के लिये किशोर वय में ही भगवान राम एवं लक्ष्मण को महाराज दशरथ से मांग कर ले गये थे। इसी आत्म विश्वास के भरोसे राम दुर्गम वन में चैदह वर्ष तक जाने के लिये तैय्यार हो गये।

भगवान राम ने नीति निपुण भी थे। श्रीमदभागवत् गीता के दसवें अध्याय में भगवान ने कहा है कि नीति रश्मिजिगीषताम्। यानि कि विजय की इच्छा रखने वालों में मैं नीति हँू। यहाँ गुण विशेष रूप से तब उजागर होता है जब उन्होने बलि को छिप कर मारा था। उन्हें मालूम था कि जो व्यक्ति भी सामने से बालि से लडे़गा उसका आधा बल बालि में चला जायेगा अतः आत्म विश्वास एवं नीति निपुणता के बलबूत पर ही उन्होने सुग्रीव से वह दिया था कि वे बालि का वध कर देंगे एवं राज्य सुग्रीव को दे देंगे।

भगवान ने विभीषण का राज्य तिलक कर यह स्पष्ट कर दिया कि उन्हें लंका का राज्य नही चाहिये। वे रावण से लंका राज्य छीनने नहीं आये थे। वे मात्र सीता जी को मुक्त कराने आये थे। जिससे बगैर सीताजी के अयोध्या लौट कर उन्हें शर्मिन्दा न होना पड़े।

भगवान ने कमजोरों को ताकत देकर उनकी कमजोरी को अपनी ताकत बनाया फिर चाहे विश्वामित्र जीे हों या सुग्रीव हों या विभीषण। एक विद्वान ने मेरा ज्ञान वर्द्धन किया कि भगवान ने सुग्रीव का राजतिलक इसलिये किया कि वह उनसे विद्रोह न करे। पर ऐसा नहीं है। भगवान सुग्रीव के भरोसे रावणपर विजय प्राप्त करते नहीं आये थे। बल्कि सुग्रीव को ही डर था कि यदि भगवान ने उन्हें ठुकरा दिया तो रावण उन्हें मार डालेगा।

कहते हैं कि समुद्र में सारी नदियों का जल मिला रहता है जो पावन पवित्र माना जाता है इसलिए राजतिलक समुद्र के जल से ही किया जाता है।

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घटनाओं पर आधारित रावण के चरित्र का विश्लेषण

डा. कौशल किशोर श्रीवास्तव

वर्ग विशेष रावण को अत्यंत विद्धान, अत्यन्त सहनशील, मृत्युजित एवं अनेक गुणों से विभूषित मानते है। उनके अनुसार भगवान राम ने उसका हनन अन्याय पूर्वक किया। मगर घटनायें इसके विपरीत ही कथन करती है। पहले हम उसके ऊपर आरोपित गुणों का विश्लेषण करेंगे तत्पश्चात घटनाओं के आधार पर उसके चरित्र की कमियों का विश्लेषण करेंगे।

रावण अत्यंत विद्धान था:-विद्या दो तरह की कही गई है। परा एवं अपरा। अपरा अर्थात अश्रेष्ठ। इसमें वेद, न्याय, दर्शन, मीमांसा, निरूक्त, ज्योतिष गणित एवं आयुर्वेद इत्यादि है। परा यानि श्रेष्ठ। यह वह एक ज्ञान है जिससे सब जाना जाता है। वह है यया तदधिगम्यते। वह जिससे जाना जाता है।

यदि प्राप्त शिक्षा को व्यौहार में न लाया जाये तो वह कचरा घर में मोती फेंकने जैसा है। इसके लिये जीसस क्राइस्ट ने चेतावनी दी है कि “डू नाट थो योर पल्र्स बिफोर स्वाइन्स” यानि अपने मोती सूअरों के सामने मत फेंको। मान लिया कि रावण को अपरा विद्या का ज्ञान था पर उसे परा विद्या का ज्ञान नहीं था इसी प्रकार के लोगो को कहा गया है कि मनुवरा रूपेण मृगारचन्ति। कथा है कि भगवान राम ने श्री लक्ष्मण को रावण की मृत्यु शय्या पर उससे उपदेश प्राप्त करने के लिये भेजा था। तब श्री लक्ष्मण रावण के सिराहने पहंुचे और उपदेश देने की प्रार्थना की इस पर रावण ने श्री लक्ष्मण से कहा की शिक्षा ग्रहण करने वालों को पैरो के पास बैठना चाहिये।

यहां प्रश्न उठता है कि क्या श्री लक्ष्मण विद्धान नहीं थे। फिर रावण उनके बाजू में बैठने के लिये भी कह सकता था। लक्ष्मण जी को पैरो के पास बिठलाना उसके अदम्य अहंकार का परिचायक है।

रावण सहनशील था - हालांकि भगवान राम ने सूर्पनखा के नाक और कान काट दिये थे पर रावण ने माता सीता के साथ बलात् उनकी इच्छा के विरूद्ध शरीर का स्पर्श तक नहीं किया। इस तरह रावण भगवान राम की अपेक्षा महिलाओं का अधिक आदर करता था। पर ऐसा नहीं है। रावण ने रंभा का बलात् शील भंग किया था। अतः उसे रंभा ने श्राप दिया था कि यदि वह किसी स्त्री का स्पर्श उसकी इच्छा के विरूद्ध करेगा तो उसके सिर के सौ टुकड़े हो जायेंगे। दूसरा बिंदु यह है कि सूर्पनखा भगवान राम के निकट कागासक्त होकर रह गई थी। वह भी धोखा देकर रूप परविर्तन करके। जबकि सीता का रावण ने धोखा देकर चोरी से अपहरण किया था। सीता जी का उनकी इच्छा के विरूद्ध अपहरण किया था। इसके पश्चात भी वह सीताजी को डरा धमका कर एवं प्रलोभन देकर समर्पण के लिये विवश करता रहा।

रावण मृत्युजित था-जब रावण की यमराज जी से युद्ध हो रहा था जब यमराज की बराबर उसे टक्कर दे रहे थे। मृत्यु को केवल ब्रह्नण ही जीत सकते है एक दम्भी, कामी, क्रोधी नहीं जीत सकते। चंूकि उसे ब्रह्नना ने वर दिया था अतः वह मृत्यु से निवेदन करने आये थे कि मृत्यु अन्तर्धान हो जाये। उनके अन्तर्धान होने पर रावण ने मान लिया कि उसने मृत्यु पर विजय प्राप्त कर ली है। वह बहादुर होता तो मृत्यु को पुनः खोजता फिर उन्हें हराता।

क्या रावण ब्राह्मण था - रावण वियावा का पुत्र था। इस आधार पर उसे ब्राह्नाण माना जाता है। ब्रह्नना ने मनुष्यों में एक ही वर्ण बना था वह ब्राह्नण था। बाद में ब्राह्नणों से क्षत्रिय उत्पन्न हुये तब भी उनमें आपस में वैवाहिक संबंध होते थे। जैसे भगवान परशुराम की माता क्षत्रिय थी। बाद में वैश्य और शूद्र हुये। मूलतः सभी वर्ग ब्राह्नाण हैं। अतः सनातन धर्मियों को आपस में नफरत नहीं करना चाहिये और आपस में अन्तर्जातीय विवाह करने में हिचक होना भी नहीं चाहिये। हर्ष का विषय है कि ऐसा होने भी लगा है। यह भारत की स्वतंत्रता को अक्षुघ्ण बनाये रखने में भी सहायक होगा। अब हम रावण की कमजोरियों की तरफ ध्यान दें।

(1) वह वीर नहीं था-सहस्त्रार्जुन और बालि से तो वह हारा ही था। उसमें यदि साहस होता तो वह सीता जी का अपहरण भगवान राम से युद्ध करके करता।

(2) वह धोखेबाज था - उसने सीता जी का अपहरण मारीचि को स्वर्ण मृग के रूप में विवश करके माया की रचना की और धोखा देकर सीताजी का अपहरण किया।

वह चोर था-उसने सीता जी की चोरी करके सिद्ध किया कि उसकी मूल भावना चोरी की ही थी।

(3) वह लम्पट था - रम्भा एवं सीताजी तो ऐसे उदाहरण हैं ही कि वह लम्पट था।

(4) वह अत्यन्त क्रोधी था - उसने मारीच को मृत्यु डर बतला कर उसे कनक मृग बनने के लिये विवश किया। उसने उसके भाई को लात मार कर निष्कर्षित किया था। ऐसा ही व्यौहार उसका अन्य मंत्रियों के साथ भी रहा।

(5) वह अविवेकी था- जिस व्यक्ति ने स्वयं की वासना एवं हठ से पूरे कुल का नाश करवा दियाा उसे विवेकी कैसे कह सकते है ?

(6) रावण झपट मार था-रावण ने स्वयं कोई निर्माण कार्य नहीं किया। त्रिकूट पर्वत पर स्वर्ण लंका का निर्माण उसके भाई कुबेर ने किया था। (कुबेर को कोई ब्राह्नाण नहीं कहता) और पुष्पक विमान भी कुबेर का था। रावण ने कुबेर पर आक्रमण किया और दोनो छीन लिये। उसने स्वयं कोई निर्माण नहीं कराया।

(7) रावण अहसान फरामोश था-रावण ने भगवान शंकर से भी वरदान प्राप्त किये थे फिर उन्हीं के निवास स्थान को उखाड़ने चला गया था।

(8) वह बड़बोला और दम्भी था- ये उदाहरण रामायण एवं रामचरित मानस में भरे पड़े है। उसके अविवेक एवं दम्भ ने राक्षस कुल का नाश करवा दिया। उसका शासन मात्र उस छोटे से द्वीप पर ही सीमित रहा। दक्षिण भारत में तो किरिकिंधा नरेश बालि का शासन ही चलता था। जिनसे रावण बहुत डरता था। हां यदाकदा राक्षस लूटपाट कर चले जाते थे।

अन्त में-जो वर्ग विशेष उसे विवेकी एवं विद्धान मान कर उसकी आराधना करते हैं उन्हें यह ध्यान रखना चाहिये कि रावण एक विदेशी था बिल्कुल बिन लादेन की तरह। वह आतताई था। वह ब्राह्नाण भी नही था। हमारी ऐसी ही विदेशी आतताइयों और आक्रमणकारियों की प्रशंसा करते रहने की आदत ने हमें गुलाम बना कर रखा। भारतवासियों को यह ज्ञात होना चाहिये कि स्वयं  रावण के देश में भी उसका एक भी स्मारक या मंदिर नहीं है। भगवान राम का तो होना ही नहीं था।

वहां कुछ शिव मंदिर अवश्य हैं पर उनके आगे भी बौद्ध स्तूप इस तरह से बना दिये गये हैं कि भगवान शंकर के मंदिर पूर्ण रूप से छिप गये है। कहीं कहीं कुछ संदेहास्पद स्थानों को अवश्य भारत के यात्रियों को आकर्षित करने के लिये विदेशी मुद्रा कमाने हेतु विकसित किया जा रहा है।

पता 171 विष्णु नगर

परासिया मार्ग छिंदवाड़ा

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