नाका - विश्व की पहली, यूनिकोडित हिंदी की सर्वाधिक प्रसारित, लोकप्रिय ई-पत्रिका. 

विविध विधाओं में से चुनकर पढ़ें -

* कहानी  || * उपन्यास || * हास्य-व्यंग्य  || * कविता  || * आलेख  || * लोककथा  || * लघुकथा  || * ग़ज़ल  || * संस्मरण  || * साहित्य समाचार  || * कला जगत  || * पाक कला  || * हास-परिहास  || * नाटक  || * बाल कथा  || * विज्ञान कथा  ||  * समीक्षा  ||

---***---

यहाँ की विशाल ऑनलाइन लाइब्रेरी में मनपसंद रचनाकार अथवा रचनाएँ खोज कर पढ़ें -

 नाका में प्रकाशनार्थ  रचनाएं इस पते पर ईमेल करें : rachanakar@gmail.com  रचनाकार के वाट्सएप्प नंबर 8989162192 (कृपया कॉल नहीं करें, कॉल रिसीव नहीं होगी, तथा इसका उपयोग केवल प्रकाशनार्थ रचना भेजने के लिए ही करें) पर भी वाट्सएप्प से रचनाएँ अथवा रचना पाठ के वीडियो प्रकाशनार्थ भेजे जा सकते हैं. अधिक जानकारी के लिए यह पृष्ठ [लिंक] देखें.

--

अविनाश ब्यौहार की काव्य रचनाएँ

image

दोहे

बिजली तड़की गगन में, कहीं गिरी है गाज।
आँसू जैसे बरसते, मेघ धरा पर आज।।

झूम झूम के बरसता, माह हुआ आषाढ़।
सरिता है उफना रही, ताँडव करती बाढ़।।

कोंपल फूटी डाल पर, वर्षा ऋतु का प्यार।
हरे हरे पत्ते हुए, चढ़ने लगा खुमार।।

पावस की ऋतु यूं लगे, जैसे भीगा नेह।
पड़ती जब बौछार है, सिहर उठी है देह।।

()  * () 

[post_ads]

दोहे

अच्छे अच्छे सूरमा, हो जाते नादान।
उसके आगे सब झुकें, समय बड़ा बलवान।।

इस समाज को क्या कहें, ब्यक्ति हो गया साँप।
मानवता के नाम पर, रूह रही है काँप।।

दफ्तर सट्टा घर हुए, डाले कौन नकेल।
पैसों के दम पर मिले, न्यायालय में बेल।।

सारी दुनिया मतलबी, स्वार्थ सिद्धि की बात।
आज हमारे दोस्त हैं, कल कर देंगे घात।।

पुलिस ब्यवस्था यूं हुई, शातिर को सम्मान।
हवलदार के खींचता, चोर यहाँ पर कान।।

सहकर्मी चालाक हैं, चकमा देते रोज।
करनी हमको पड़ेगी, सच्चाई की खोज।।

जनता के प्रतिनिधि हुए, औ मुश्किल दीदार।
लोकतंत्र में हो रहा, वोटों का व्यापार।।
---
दोहे

आज हमें जनतंत्र में, बस दिखता है खोट।
प्रशासन पंगु हो गया, नेता माँगें वोट।।

बादल भी घिरने लगे, पर्दा करती धूप।
निखरा निखरा लग रहा, है वर्षा का रूप।।

अंकुर फूटे धान के, करते खेत दुलार।
आसमान को कब लगे, काले बादल भार।।

मुझे अभी तक याद हैं, वही गाँव के मोड़।
शहर भागते ही रहे, ऐसी क्या थी होड़।।

ताल, नदी, नाले करें, वर्षा का गुणगान।
कजरी सावन में सुनी, गाता रहा जहान।।
--

[post_ads_2]
नवगीत

पूरा विश्व सिमटा
कंप्यूटर औ
लेपटाप में।

ई मेल है,
पेनड्राइव है।
खुल्लम खुल्ला
अब ब्राइब है।।

ओन पोन मिलती
चीजें फेयर प्राइस
शाप में।

गूगल इंटरनेट
का भेजा।
दुनिया का
संज्ञान सहेजा।।

कोई लाभ नहीं
दुर्गा सप्तशती
के जाप में।
--

नवगीत

चिकने पात
हुए हैं
तरु के।

हरे हरे
जंगल दिखते हैं।
सावन में
कजरी लिखते हैं।।

प्यास सुनाए
किस्से
मरु के।

चूल्हे में
पक रही रसोई।
नेह धरा
मुस्कानें बोई।।

सूनी है
थाली बिन
चरु के।
---

हिंदी गजल

अपराध हुआ पर सजा नहीं।
जरूरी बात पर रजा नहीं।।

बन गए जो महान हस्तियाँ,
उनका प्रयाण पर कजा नहीं।

नृत्य देख शोख सुंदरी का,
हुई बेरुखी पर मजा नहीं।

गद्दी मिल गई रहनुमा को,
मिलते सब सुख पर प्रजा नहीं।

गर वहशत फैली तो मानो,
अमन जरूरी पर गजा नहीं।
--

नवगीत

ऋतु पावस की
आ गया रक्षा बन्धन।

सुवास घुली है
बहती पुरवाई में।
राखी बाँधी
मौसम की
कलाई में।।

सावन करता
बारिश से
अभिनन्दन।

घर घर डाकिया
बाँट रहा
है चिट्टी।
परदेश में भाई
यादें खटमिट्टी।।

लगने लगे ठहाके
गायब क्रन्दन।


--


अविनाश ब्यौहार
रायल एस्टेट कटंगी रोड
जबलपुर।

0 टिप्पणियाँ

रचनाओं पर आपकी बेबाक समीक्षा व अमूल्य टिप्पणियों के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद.

स्पैम टिप्पणियों (वायरस डाउनलोडर युक्त कड़ियों वाले) की रोकथाम हेतु टिप्पणियों का मॉडरेशन लागू है. अतः आपकी टिप्पणियों को यहाँ प्रकट होने में कुछ समय लग सकता है.