नाका - विश्व की पहली, यूनिकोडित हिंदी की सर्वाधिक प्रसारित, लोकप्रिय ई-पत्रिका. 

विविध विधाओं में से चुनकर पढ़ें -

* कहानी  || * उपन्यास || * हास्य-व्यंग्य  || * कविता  || * आलेख  || * लोककथा  || * लघुकथा  || * ग़ज़ल  || * संस्मरण  || * साहित्य समाचार  || * कला जगत  || * पाक कला  || * हास-परिहास  || * नाटक  || * बाल कथा  || * विज्ञान कथा  ||  * समीक्षा  ||

---***---

यहाँ की विशाल ऑनलाइन लाइब्रेरी में मनपसंद रचनाकार अथवा रचनाएँ खोज कर पढ़ें -

 नाका में प्रकाशनार्थ  रचनाएं इस पते पर ईमेल करें : rachanakar@gmail.com  रचनाकार के वाट्सएप्प नंबर 8989162192 (कृपया कॉल नहीं करें, कॉल रिसीव नहीं होगी, तथा इसका उपयोग केवल प्रकाशनार्थ रचना भेजने के लिए ही करें) पर भी वाट्सएप्प से रचनाएँ अथवा रचना पाठ के वीडियो प्रकाशनार्थ भेजे जा सकते हैं. अधिक जानकारी के लिए यह पृष्ठ [लिंक] देखें.

--

रिक्शेवाला (लघुकथा) - सुरेश सौरभ

     पसीने से तरबतर वह सरदार पायडल मारते हुए सड़क किनारे अपना रिक्शा खड़ा करके, एक झुग्गीनुमा होटल पर रुका और अंगोछे से अपना बदन ओंछते-पोंछते हुए उस होटल वाले से एक चाय की फरमाइश करके टूटी-फूटी कुर्सी पर निढाल हो गया, फिर वहीं बेंच पर रखें एक मग से पानी सोंखते हुए, सुस्ताने लगा, कुछ घड़ी बाद होटल वाले ने उसे चाय थमा दी।

     अब वह सिप-सिप करते हुए तसल्ली से चाय पीने लगा। तभी एक लग्जरी गाड़ी उसके सामने आकर रुकी। उसमें से चार-पांच हट्टे-कट्टे सरदार बहुत तेजी से निकले, तड़ाक.. एक जोरदार तमाचा रिक्शेवाले सरदार की कनपटी पर पड़ा। चाय भरा कांच का गिलास दूर जाकर गिरा और चिंदी- चिंदी हो गया। अब तड़ा-तड़ तमाचों बरसात होने लगी।..साला,सरदार होकर रिक्शा चलाता है, और कोई काम नहीं मिला अरे! कोई काम नहीं मिला था, तो हम सब सरदार क्या मर गये थे। फिर मूसलाधार घिनी-घिनी गलियां वहां बरसने लगीं । रिक्शेवाले सरदार ने सफाई देने की कोशिश की....चोSप! ..अब ज्यादा सफाई न देना‌। हम लोगों से कहना चाहिए था, तूने तो पूरे सिख कौम की नाक कटा दी,  फिर उसको घसीटते हुए

अपनी लग्जरी गाड़ी में बिठा  लिया। ब गाड़ी चल पड़ी। रिक्शेवाला सरदार गाड़ी में चुपचाप उदास बैठा था, उसके चेहरे पर अनगिनत भाव आ, जा रहे थे और चेहरे की सिलवटें उसकी उसकी मजबूरियों का लेखा जोखा करने में जुटीं थीं। ब उसे पीटने वाले सरदार कह रहे थे- तुमको जो रोजगार करना है, हम को बताओ हम करवायेंगे ,पर हमारी वीर कौम पर यह कलंक न लगाओ।  रिक्शेवाला सरदार अब यह सोच रहा था इन लोगों का प्रतिकार करें या उपकार करने के लिए धन्यवाद ज्ञापित करे‌। उसकी कुछ समझ में नहीं आ रहा था। अब वह शर्म गड़ा जा रहा था। सिर पर मानो घड़ों पानी पड़ा हो।

लेखक-सुरेश सौरभ

निर्मल नगर लखीमपुर खीरी

पिन-262701


कापीराइट-लेखक

email-sureshsaurabhlmp@gmail.com

0 टिप्पणियाँ

रचनाओं पर आपकी बेबाक समीक्षा व अमूल्य टिप्पणियों के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद.

स्पैम टिप्पणियों (वायरस डाउनलोडर युक्त कड़ियों वाले) की रोकथाम हेतु टिप्पणियों का मॉडरेशन लागू है. अतः आपकी टिप्पणियों को यहाँ प्रकट होने में कुछ समय लग सकता है.