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अविनाश ब्यौहार के दोहे व हिंदी ग़ज़लें

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दोहे

पावस की ऋतु आ गई, लगे बरसने मेह।
सौंधी सौंधी गंध से, महकी वसुधा देह।।

धरती तब अंगार थी, दिया सूर्य ने त्रास।
सुखद सुखद बौछार है, बुझी धरा की प्यास।।

खेत लबालब हो गए, मेड़ करे आदाब।
जो देखे थे ग्रीष्म में, पूरे होंगे ख्वाब।।

रटे पपीहा बाग में, नाच रहा है मोर।
सूने से आकाश में, घिरी घटा घनघोर।।

घर में फाँके पड़ रहे, चूल्हा हुआ उदास।
बेटी हुई जवान है, औ शादी की आस।।
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हिंदी गज़ल

कितना यहाँ शनासा है।
दुनिया एक तमाशा है।।

माना मैने स्थाई है,
कि पानी का बताशा है।

हमने उन्हें अज़ीज़ कहा,
किया भरोसा, झाँसा है।

हम जैसी भी चाल चलें,
उल्टा पड़ता पाँसा है।

हम सोना जैसे आँकें,
मिलता हमको काँसा है।

तनहाई में भी देखा,
बजता रहता ताशा है।

वफा समझे,जफा निकली,
पल में तोला माशा है।

संकेतों में बात न कर,
चोटिल होती भाषा है।

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हिंदी गज़ल

फुहार है, नम हवा है तूं।
जलती ॠतु की दवा है तूं।।

अंधकार फैला हर ओर,
रूप रंग में जवा है तूं।

बोल गन्ने की मिठास है,
या चीनी का रवा है तूं।

बहुत बोझ उठा लेते हैं,
मजदूरों का खवा है तूं।

चूंकि ऋतु पावस की आई,
झूमती पुनर्नवा है तूं।
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हिंदी गजल

आदमी लाचार है।
या तो सोगवार है।।

फूलों का जीवन या,
कंटकों का हार है।

नदिया से झड़पेगी,
वाहिनी की धार है।

अपना ही घर भरता,
बोलते दातार है।

घातक शस्त्रों का ही,
हो रहा व्यापार है।

कुंठा उसी ने दिया,
औ वह गमख्वार है।

भेड़ चाल जो चलती,
निरंकुश सरकार है।

न नायक न खलनायक,
यही तो किरदार है।

नफ़ासत जिसमें न हो,
वो बशर बेकार है।
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हिंदी गजल

रिश्ता बड़ा अनोखा है।
बस धोखा ही धोखा है।।

आगमन अंधियारे का,
कैसा खुला झरोखा है।

गड़बड़ियाँ ही गड़बड़ियाँ,
जीवन लेखा जोखा है।

भ्रष्टाचार हुआ दलदल,
काम कहाँ पर चोखा है।

जल को अपने नदिया ने,
बिला सबब क्यों सोखा है।
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दोहे

तरस रहे सम्मान को, ज्ञानी कोविद लोग।
गधहे अब नेता बने, यह कैसा संयोग।।

स्वारथ ही दिखने लगा, चप्पे चप्पे आज।
श्वेत कबूतर शांति के, नोंच रहे हैं बाज।।

आज अदालत भ्रमित है, न्याय हुआ है दूर।
वादी की अब आत्मा, हुई दुखित भरपूर।।

सत्ता के आकाश में, काले काले मेह।
मख्खन जैसी हो गई, है नेता की देह।।

महँगाई है चरम पर, जनसंख्या विस्फोट।
अपराधों के सरगना, अधिवक्ता के कोट।।

दुबकी बैठी नीति है, बाज भरे परवाज।
वक्त बहुत ही बुरा है, सिसक रहे हैं साज।।

जगह जगह थाने खुले, ज्यों मछली बाजार।
आज स्वयंभू हो गए, श्रीयुत थानेदार।।
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हिंदी गजल

एक नगर शादाब।
ज्यों सरिता में आब।।

घन देख नर्तन को,
मयूर है बेताब।

वर्षा ॠतु नशीली,
जैसे हुई शराब।

हर तरफ अंधेरा,
जबकि है आफताब।

डाल पे पंछी हैं,
मीठे मीठे ख्वाब।
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हिंदी गजल

कितनी बड़ी कचहरी है।
लोगों की वो प्रहरी है।।

खुद को सुपर डुपर समझे,
वही आदमी शहरी है।

झाड़ू, पोंछा, चौका कर,
बनी ठनी सी महरी है।

मटका गली गली बेचे,
उसकी देह छरहरी है।

भ्रष्टाचार फला फूला,
जड़ भी उसकी गहरी है।

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अविनाश ब्यौहार
रायल एस्टेट कटंगी रोड
जबलपुर

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