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अहसास (लघुकथा) - देवी नागरानी

(देवी नागरानी के लघुकथा संग्रह - और गंगा बहती रही से लघुकथाएँ)


. अहसास (लघुकथा)

"मैं केटी को ले जा सकती हूँ?"

सधी हुई आवाज़ कानों पर पड़ते ही सर उठाया। देखा सामने सुंदर सी, तीखे नाक नक्श वाली ११-१२ साल की लड़की खड़ी थी.

" आपका नाम ?"

" मैं टीना हूँ, केटी की बहन, उसे लेने आई हूँ।" संक्षिप्त उत्तर के बाद वह चुप रही।

" हर रोज़ तो उसकी नानी उसे लेने आती है…… ।"

" वो तो ठीक है, पर अचानक मेरे पिता का फ़ोन आया कि मुझे केटी को स्कूल से पिकअप करना है।"

" आपकी नानी कहाँ है और वो क्यों नहीं आई।?"

" वो मेरी नहीं, केटी की नानी हैं। आज क्यों नहीं आई मुझे नहीं मालूम।"

जवाब सुन मेरे माथे पर सिलवटें पड़ने लगीं। ये कैसा रिश्ता है ? वो केटी की नानी है पर टीना की नहीं!

" तुम केटी को कहाँ ले जाओगी?"

" इसके मम्मी-पापा के घर।" टीना का छोटा-सा उत्तर पाकर मैं फिर उलझ गई।

" और तुम कहाँ जाओगी?"

" अपने घर" सरलता से उसने मुस्कराकर जवाब दिया।

" तुम वहाँ क्यों नहीं जाओगी?"

" क्योंकि मैं अपनी मम्मी के पास रहती हूँ, और मेरे पापा केटी की मम्मी के साथ।"

ऐसे जवाब सुनकर कौन कहता है भावनाओं को ठेस नहीं लगती ? कौन कहता है रिश्तों की ज़रूरत नहीं पड़ती ? पर जो रिश्ते बेमतलब के हों, उनका न होना ही बेहत्तर है. मैं अपनी सोच की दुनिया में खोई थी, इस बात से बेख़बर कि केटी और टीना अभी तक वहीं मौजूद हैं.

" मैम क्या मैं केटी को ले जा सकती हूँ?" टीना की इस आवाज़ ने मुझे जगा दिया.

" हाँ! रजिस्टर में साइन करके उसे ले जा सकती हो."

.....और मेरे आँखों के सामने स्वार्थ के सिंहासन पर बैठे आदम और मासूमियत से मुस्कान छीनने वाले अपराधी चेहरे साफ़-साफ़ नज़र आने लगे!

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