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अनोखी मां - कहानी - प्रियंका कौशल

अनोखी मां...

सुबह-सुबह फोन की घंटी बजी तो दौड़कर मीरा ने रिसीवर उठाया। उसे पता था कि आज सबसे पहला फोन उसकी बेटी का ही आएगा। दीदी, जन्मदिन मुबारक हो, फोन के दूसरी तरफ से आवाज आई। जी हां, मीरा की बेटियां उसे “दीदी” ही बुलाती हैं। आज मीरा का जन्मदिन है। मीरा की दो बेटियां हैं, एक बेटी दिल्ली में और दूसरी बेटी छत्तीसगढ़ में रहती है। बड़ी बेटी आईएएस है और केंद्रीय विभाग में पदस्थ है। वहीं छोटी बेटी आईपीएस है और छत्तीसगढ़ के सुदूर आदिवासी इलाके में उसकी पोस्टिंग है। एक-एक कर दोनों बेटियों के फोन आए। उनसे बात करने के बाद मीरा को फुलवा याद आ गई। बरसों पहले की घटना उसकी आंखों के सामने घूमने लगी।

गर्मी के दिन थे। फुलवा नहाकर निकली और गैलरी में खड़े होकर बाल सुखाने लगी। उसे बड़ी जोर की भूख भी लग रही थी। फुलवा को मां की हाथ की बने फरा और चीला की याद आ गई। हर दूसरे दिन घर में बनने वाले चावल के फरा खाने के लिए वह कितनी लालायित रहती थी। उडदा बड़ा भी बहुत याद आ रहा है और बासी (रात के बचे चावल से बनना वाला एक छत्तीसगढ़ी भोज्य पदार्थ) तो यहां नसीब ही नहीं। खैर, बाल सुखाकर वह जल्दी-जल्दी सीढ़ियां उतरने लगी। जिस मकान में फुलवा को रखा गया है, उसमें दो तल हैं। रसोई नीचे वाले हिस्से में है। अभी फुलवा सीढ़ियों पर ही थी कि उसे संतोष दीदी और शन्नों की बातें सुनाई पड़ी। बात कुछ ऐसी थी कि सुनकर फुलवा के होश ही उड़ गए।

संतोष दीदी, हां फुलवा संतोष को दीदी ही तो कहती थी। यही संतोष तो उसे उसके गांव फूलपुर से दिल्ली ले आई थी, रोजगार दिलाने। कितनी अच्छी है संतोष दीदी। हमारे परिवार की कितनी मदद की है इसने। मेरे मां-बाबा कितना यकीन करते हैं संतोष दीदी पर। तभी तो मुझे मेरी छोटी बहन “छुटकी” के साथ दिल्ली भेज दिया घरवालों ने। संतोष दीदी ने बताया था कि यहां घरों में काम करने के अच्छे-खासे पैसे मिलते हैं। यदि मैं और छुटकी मिलकर कहीं काम करेंगे तो हमें खूब सारे पैसे मिलेंगे और हमारे घर-परिवार के दिन फिर जाएंगे।

फूलपुर, जहां कि फुलवा निवासी है, बहुत ही पिछड़ा जनजातीय गांव है। रोजगार के साधन ना के बराबर हैं। बच्चे क्या, बूढ़े क्या, सब कुपोषित हैं। सिर में भी तेल डाला जाता है, ये यहां के लोगों को नहीं पता होता। अरे उन्हें तो खाने के लिए भी कभी तेल नसीब नहीं हुआ। लोगों के शरीर से सूखी चमड़ी झड़ती रहती है। गांव की अधिकांश लड़कियों को संतोष दीदी रोजगार दिलाने दिल्ली ले आई है।

फुलवा गहरी सोच में डूब गई थी कि अचानक किसी बर्तन के गिरने की आवाज आई। शायद शन्नो के हाथ से कुछ गिर गया था। रसोई का काम वही संभालती है। फुलवा जैसे नींद से जागी, उसने सुना कि संतोष शन्नों से कह रही थी कि छुटकी का सौदा तो मुंह मांगे दाम में तय हो गया है, लेकिन ये कलूटी फुलवा इसके सही दाम नहीं मिल रहे हैं। मैं दो दिन और देखूंगी, नहीं तो इसे भी छुटकी के साथ भेज दूंगी। उसके एवज में जो मिल रहा है, वहीं ले लेंगे। फुलवा ज्यादा पढ़ी-लिखी तो नहीं थी, लेकिन सौदा शब्द का अर्थ वो जानती थी। उसे लगा सौदा तो जमीन का, सब्जी-भाजी का, कपड़े-लत्तों का होता है। ये मेरा और छुटकी का सौदा करने की बातें कर रही हैं। फुलवा को समझते देर ना लगी कि उसे और उसकी छोटी बहन को बेचने की बातें चल रही हैं। वो उल्टे पांव ऊपर की ओर भागी। छुटकी अभी सो ही रही है। फुलवा से उसे उठाया। 7 वर्ष की छोटी सी लड़की छुटकी, अपने नाम के ही अनुरूप। गुड्डे-गुड़ियों के खेल से बिलकुल अपरिचित। स्कूल का तो मुंह भी नहीं देखा कभी। मां की गोद से निकलकर बहन की गोद में बैठ दिल्ली आ गई थी। फुलवा कौन सी बहुत बड़ी उम्र की थी। लेकिन 13 वर्ष की फुलवा को दुनियादारी की थोड़ी समझ थी। उसने छुटकी को गोद में लिया। धीरे-धीरे सीढ़ियां उतरी, संतोष और शन्नो अभी भी अपनी बातों में ही गुम थीं। मौके का फायदा उठाकर फुलवा घर के बाहर निकल गई। उसने गली में सरपट दौड़ लगाई और अपनी बहन को बगल में दबाए तब तक दौड़ी, जब तक उसे अहसास नहीं हो गया कि वो बहुत दूर निकल आई है।

क्या हुआ बेटा? सड़क पर खड़े एक बूढ़े आदमी ने फुलवा से पूछा। कुछ नहीं बाबा। हमें रेलवे स्टेशन जाना है। फुलवा ने कहा। बूढ़ा बोला, तुम दोनों तो इतनी छोटी बच्चियां हों, अकेले रेलवे स्टेशन क्यों जाना चाहती हो। फुलवा कुछ नहीं बोल पाई। आदमी समझ गया कि इन लड़कियों का कोई नहीं है। उसकी नीयत भी इन दो छोटी बच्चियों पर बिगड़ गई। वो बड़े प्यार से बोला, मैं गाड़ी लेकर आता हूं और तुम्हें स्टेशन छोड़ दूंगा। ऐसा बोलकर वह गाड़ी लेने चला गया। फुलवा थी तो छोटी उम्र की, लेकिन थोड़ी देर पहले ही जो धक्का उसने खाया है, उसने उसे यकायक बड़ा बना दिया। वह समझ रही थी कि उस पर खुद के साथ छुटकी की भी जिम्मेदारी थी। वह वहां से भी भागी। आदमी जब लौट के आया तो उसे कोई नहीं मिला। आखिर दिन भर भटकने के बाद पूछते-पूछते फुलवा स्टेशन पहुंच ही गई। स्टेशन पर जहां फुलवा बैठी थी, वहीं मीरा का परिवार भी मौजूद था।

मीरा पेशे से आर्किटेक्ट है, लेकिन शादी के पांच साल बाद भी उसे कोई संतान नहीं हुई। वह बच्चा गोद लेना चाहती थी, लेकिन नियम इतने कड़े थे कि यह एक लंबी प्रकिया से गुजरने जैसा था। उसके पति को बच्चा गोद लेना ही पसंद नहीं था, तो वह उस पचड़े में क्यों पड़ता। इसलिए उसने कभी बच्चा गोद लेने के लिए भी अप्लाई नहीं किया। मीरा बड़ी देर से दोनों बच्चियों पर गौर कर रही थी। फुलवा बिलकुल किसी मां की तरह अपनी छोटी बहन ध्यान रख रही थी। यह देखकर मीरा बहुत प्रभावित हुई। उसने अपने पति शंकर से कहा कि क्या हम ऐसे ही किसी बच्चे को अपने पास नहीं रखकर पाल-पोस सकते। शंकर बोला- पागल हो क्या, कहां के बच्चे हैं, किसके बच्चे हैं। क्या पता किसी गिरोह के सदस्य हैं। तुम भी बचकानी बाते करने लगती हो। अपने पति की प्रतिक्रिया सुनकर मीरा ने चुप रहना ही बेहतर समझा। थोड़ी देर बाद वो सड़क पर मिला बूढ्ढा बच्चियों को ढूंढते-ढूंढते स्टेशन पहुंच गया। आखिर बुढ्ढे ने फुलवा और उसकी बहन को खोज निकाला। वो उनके पास पहुंचा तो उसे देख फुलवा सहम गई। मीरा की नजर भी फुलवा पर लगातार बनी हुई थी। फुलवा की मासूमियत ने उसके मन पर गहरा असर डाला था। उसे बुड्ढे और फुलवा के बीच चल रहे संघर्ष में वह भी कूद पड़ी। अरे कहां ले जा रहे हो बच्चियों को..छोड़ो..छोड़ो। शंकर कुछ समझ पाते, तब तक मीरा कूदकर फुलव के पास पहुंच चुकी थी। मीरा के इस तरह से हस्तक्षेप करने से बुड्ढा सकपका गया। बच्चियां मीरा से चिपक गईं। फुलवा बोली, ये आदमी हमें जबरदस्ती अपने साथ कहीं ले जा रहा है। झूठ क्यों बोलती है, मैं तो तेरा दादा हूं ना बेटा। ये घर से गुस्सा होकर अपनी छोटी बहन को लेकर भाग आई है। बुड्ढा अपने बचाव में बोला। मीरा ने फुलवा की तरफ देखा।

फुलवा कुछ बोलती, इसके पहले ही मीरा ने कहा, देखो चचा, तुम्हारी शक्ल ओ सूरत और पहनावा से ये बच्चियां कहीं भी मेल नहीं खाती हैं। दोनों बच्चियां खालिस किसी गांव की नजर आ रही हैं और तुम शहरी लग रहे हो। अपने बेटे और उनके बच्चों को गांव में रखते हो और खुद शहर में रहते हो क्या? मीरा का बात सुनकर बुड्ढे की बोलती बंद हो गई। इतने में आरपीएफ के जवान भी पहुंच गए। बुड्ढे को समझ में आ गया कि आज पाला उलटा पडने वाला है। वह भागा, लेकिन पकड़ा गया। बच्चियां मीरा पकड़कर को रोए जा रही थीं। अन्न की भूखी तो थी हीं, प्यार के लिए भी तरस गई थीं। मीरा में उन्हें अपनी मां नजर आ रही थी। फुलवा बोली, दीदी आप ने आज भगवान बनकर हमें बचा लिया। मीरा ने प्यार से उसके सर पर हाथ फेरा और पूछा कि बेटा तुम्हारा घर-मां-बाप कहां हैं? फुलवा ने उन्हें सारी कहानी सुना दी। मीरा ने शंकर को पास बुलाया और बोली कि मैं मां बन नहीं सकी। हम बच्चा गोद ले नहीं रहे। लेकिन क्या मैं एक मां का फर्ज अदा कर सकती हूं। शंकर को लगा कि मीरा कैसी पहेलियां बुझा रही है। वो बोला, मीरा हमारी ट्रैन आने ही वाली है और अब तुम ये फिर मत कहना कि तुम इन बच्चों को पालना चाहती हो। तुमने इन बच्चों को बचाने के चक्कर में अभी स्टेशन पर इतना बखेड़ा खड़ा किया, तब भी मैं चुप रहा, लेकिन अब और कुछ नहीं। तो ठीक है, ट्रैन आएगी तो तुम अकेले ही चले जाना। मैं तो इन बच्चों के लिए जो करना चाहती हूं, आज जरूर करुंगी। शंकर को लगा कि बात बिगड़ रही है। वो नम्र होकर बोला, अच्छा बताओ क्या करना चाहती हो। शंकर मैं इन बच्चों को इनके मां-बाप तक सुरक्षित पहुंचाना चाहती हूं और आजीवन इनके खर्च उठाना चाहती हूं। ये पढ़-लिख जाएं, ये सुनिश्चित करना चाहती हूं। ये पलेंगी अपने मां-बाप के पास ही, लेकिन हम भी इनके अभिभावक बनकर ताउम्र इनका ख्याल रखेंगे। बोलों ना, इतना तो कर ही सकते हैं ना। मैं इनकी यशोदा बनकर ही मां बनने की खुशियां मना लूंगी। मीरा की बात सुनकर शंकर का मन भी पिघल गया। मीरा और शंकर ने फूलपुर की टिकट ली। बच्चियों को सुरक्षित घर पहुंचाया और उनके खर्च जीवन भर उठाए। और हां, जो बेटियां मीरा से फोन पर बात कर रहीं थी ना, वो कोई और नहीं फुलवा और छुटकी ही थीं। है ना हमारी मीरा, बिलकुल अनोखी मां।


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प्रियंका कौशल
संक्षिप्त लेखक परिचय -लेखिका पिछले 15 वर्षों से पत्रकारिता के क्षेत्र में सक्रिय हैं। नईदुनिया, दैनिक जागरण, लोकमत समाचार, जी न्यूज़, तहलका जैसे संस्थानों में सेवाएं दे चुकी हैं। वर्तमान में भास्कर न्यूज़ (प्रादेशिक हिंदी न्यूज़ चैनल) में छत्तीसगढ़ में स्थानीय संपादक के रूप में कार्यरत् हैं। मानव तस्करी विषय पर एक किताब "नरक" भी प्रकाशित हो चुकी है।

ईमेल आई.डी-priyankajournlist@gmail.com

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