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जिधर भी देखिये उधर पानी, कर गया सब तितर-बितर पानी - देवेन्द्र पाठक 'महरूम' की ग़ज़लें

ग़ज़ल
                                    देवेन्द्र पाठक 'महरूम'

जिधर भी देखिये उधर पानी.
कर गया सब तितर-बितर पानी.

पानी-पानी हुई सारी धरती;
घर से बेघर गया कर  पानी.

उसका खूं भी सफ़ेद हो जाये;
आँख का जिसके मर गया पानी.

सरहदे-वतन पर क़ुर्बां होकर
नाम को कर गया अमर पानी.
.
पियें न गर तो प्यासे मर जायें;
पियें कैसे हो जब ज़हर पानी

आदमी कुछ भी कर गुज़र जाये;
सर से जाये अगर गुज़र पानी.

गाँव,कस्बा हो या शहर 'महरूम';
   सभी पे ढा रहा क़हरपानी.

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              *********गज़ल

                                           देवेन्द्र पाठक 'महरूम'

घूमें खुल्ले-आम,लुटेरे अस्मत के.
कर दें चैन हराम,लुटेरे अस्मत के.

कोई भी बंदिश हो देते तोड़ उसे;
मचा रहे कोहराम,लुटेरे अस्मत के.

वर्दी,कुर्सी,ओहदे सब इनसे डरते;
रहते बिना लगाम,लुटेरे अस्मत के.

नियम,नीतियाँ,ढीली पड़ जातीं;
बतलाते जब नाम,लुटेरे अस्मत के.

मुँह काला करते हैं रोशनियों में ;
छोड़के शर्म तमाम लुटेरे अस्मत के.

क़ैद सलाखों के पीछे भी होकर ये;
करते अपना काम,लुटेरे अस्मत के.

खाये खौफ़ सियासत भी 'महरूम'
कर दें कत्ले-आम,लुटेरे अस्मत के.

               *********
ग़ज़ल

                                              देवेन्द्र पाठक 'महरूम

दिल मेरे वतन का है जहाँ पर है धड़कता.
उसी ठाँव-ठौर मेरा भी गाँव-घर है पड़ता.

क्यों हो रहा है ऐसा ही ये कई बरस से ;
बादल बहुत गरजता पर कमतर है बरसता.

कई मेहनतकशों ने घर-गाँव ही अब छोडा ;
रोज़ी कोई रोज़गार गाँव में न है मिलता.

कीमत-ओ-कद्र मेहनत की शहर में बहुत है;
   यहाँ जात-पाँत पर कोई झगड़ा न है करता.

'महरूम' ठेकेदारी हो या भले दिहाड़ी;
यहाँ काम हर इक हाथ को हर सुबह है मिलता.
                    
                    ***********

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ग़ज़ल
                                             देवेन्द्र पाठक 'महरूम'                  

कोई तो अपनी-सोच-समझ ख़यालात हों;
अपना अज़ब हुनर हो ग़ज़ब करामात हों.

कहना था उन्हें जो भी सब कह चुके हैं वो;
अब उनसे मुख़ातिब मेरे कुछ सवालात हों.

रोशन हों शब तमाम उनकी राजधानी पर
क्यों कैदे-तीरगी हमारे मकानात हों.

क्यों चुन के हमने भेजा उन्हें ही सभाओं में;
चलते अदालतों में जिनके मामलात हों.

उनके किसी भी झूठ पे बजती हैं तालियाँ;
मेरे इक  बयाने-हक़ पर मगर फसादात हों.

खुशहाल हैं उनके घरों में कुत्ते भी लेकिन;
क्यों आदमी के बद से भी बदतर हालात हों.

गायब वे सभी नाम उनकी फेहरिस्त से;
जिस भी किसी की उनसे ज़ुदा जात-पाँत हों.

तब तक नहीं सरकारी मदद मिलेगी तुम्हें;
जब तक न भारी वज़न रखे काग़ज़ात हों.

दरकार हमें क्या किसी की कृपा-दृष्टि की;
'महरूम' हाथ अपना ही जब जगन्नाथ हो.

                ************ग़ज़ल

देवेन्द्र पाठक 'महरूम'

पुरशाद ज़िन्दगी के वे नगमे सुना रहे.
अपने ज़हाने-दर्द में हम मुब्तिला रहे.

करते हो आज तब्सरा जिस दौरे-वक़्त का;
आका ही उसमें आपके तब गुमशुदा रहे.

दिन-रात कोसते हो जिन्हें नाम लेके तुम;
उनकी ही जमा-पूंजियों को बेच-खा रहे.

सत्ता-ओ-सियासत की अंधी दौड़-होड़ में;
आवाम को किस अंधकूप में गिरा रहे.

पहले तो पिया खून और मांस खा चुके;
अब हड्डियां बची हैं उन्हें भी चबा रहे.

आमादा बेचने को हैं हर एक विरासत;
हर शै को वो बाज़ारू बिकाऊ बना रहे.

तौरे-तरक्की उनका है बस फेरो-बदल ही;
'महरूम' आंकड़ों की फ़सल लहलहा रहे.

                ************
ग़ज़ल


जो चल रहा है भेड़ियाधसान चल रहा.
पाले मुगालता मुग़ालते में पल रहा.

नीरो बजाये बाँसुरी बेफिक्र  महल में;
रोम सारा धधका-धू सुलग-जल रहा.

फेहरिस्त हसीं और नये ख़्वाबों की लेकर;
लफ़्ज़ों का बाज़ीगर जो आया था छल रहा.

सब कुछ ही बदल देने के थोथे ही थे दावे;
अब उसकी दलीलों से नहीं पेट भर रहा.
'
'महरूम' बहुत हो चुकीं बातें लबर-जबर;
   ख़ामोशियों के सीने में तूफां मचल रहा.

                      *******

आत्मपरिचय

देवेन्द्र कुमार पाठक.

( जिला- कटनी,मध्यप्रदेश ) जिले के  दक्षिणी-पूर्वी सीमांत पर आबाद छोटी-महानदी ग्राम्यांचल
के एक गांव में जन्म. (02/03/1955)

शिक्षा-M.A.B.T.C.(हिंदी/शिक्षण)

कविता,कथा,व्यंग्य,निबन्धादि विधाओं में लेखन, पत्र-पत्रिकाओं में 1981 से प्रकाशन और आकाशवाणी-दूरदर्शन से प्रसारण.
'महरूम' तखल्लुस से  गज़लें कहते हैं.

'विधर्मी' उपन्यास  'दुष्यन्त कुमार पुरस्कार' ( म.प्र. साहित्य परिषद) से सम्मानित.
आत्मकथ्य-
"मुझसे शुरू हुयी थी मुझ पर खत्म कहानी मेरी होगी;
एक चिराग बुझे,बुझ जाये,दुनिया नहीं अँधेरी होगी."


2 उपन्यास,(विधर्मी/अदना सा आदमी)
4 कहानी-संग्रह,(मुहिम/ मरी खाल ; आखिरी ताल/धरम धरे को दंड/ चनसुरिया का सुख)
2 व्यंग्यसंग्रह,( दिल का मामला है/कुत्ताघसीटी )
ग़ज़ल संग्रह,(ओढ़ने को आस्मां है)
गीत-नवगीत संग्रह; (दुनिया नहीं अँधेरी होगी)
10 किताबें प्रकाशित.
सम्पादन- 'केंद्र में नवगीत' ( कटनी जिले के 7 नवगीतकारों का संग्रह)

मध्यप्रदेश के शिक्षा-विभाग में लगभग 40 साल सेवायें देने के बाद सेवानिवृत्त. 1981 से 2007 तक पत्र-पत्रिकाओं में लेखन- प्रकाशन.10 साल अंतराल के बाद पुनः लेखन में सक्रिय.

सम्पर्क-1315,साईपुरम् कॉलोनी,साइन्स कॉलेज डाकघर-कटनी-483501(म.प्र.)
Email - devendrakpathak.dp@gmail. com

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