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मुझे खुद से ज़्यादा जिस पर यकीं था, मेरे ग़म में वह साथ मेरे नहीं था. - देवेन्द्र पाठक 'महरूम' की ग़ज़लें व मुक्तक


                                          
अब खौफ़े-शब से बारहा डरा रहे हैं वो.
   लो,दीया आफ़ताब को दिखा रहे हैं वो.
 
दहशतजदा बहुत हैं दिलो-ज़हन सभी के;
दिल से दिलों की दूरियाँ बढ़ा रहे हैं वो.

नाकामियाँ ज़ाहिर न हों उनकी इसीलिये;
पुरखों की कामयाबियां भुला रहे हैं वो.

गिरती ही गयी है ज़ुबान हर बयान पर;
पर अपना क़द बुलन्द किये जा रहे हैं वो.

रुख सामने है उनका पैर पीछे जा रहे ;
अफ़साना-ए-माज़ी हमें सुना रहे हैं वो.

पुरआब थी तो नोचा बदन रेत का उसका;
जो मर गयी नदी तो अश्क ढा रहे हैं वो.

'महरूम' शर्मसार हूँ इक झूठ पर उनके;
सौ झूठ बोल झूठ इक छुपा रहे हैं वो. 

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ग़ज़ल
मुझे खुद से ज़्यादा जिस पर यकीं था.
मेरे ग़म में वह साथ मेरे नहीं था.

तलाशा किया ताउमर जिसको बाहर
मुझे ढूंढता मुझमें ही वह कहीं था.

ज़मीं-आस्मां,चाँद-सूरज हैं वैसे
मगर वैसा रुख अब हवा का नहीं था.

चला वक़्त धरती चली चाँद-ओ-तारे
खड़ा शख़्स पीछे जो है वह वहीँ था.

जिधर भी निगाहे-मुहब्बत से देखा
'महरूम' मंज़र उधर का हसीं था.ग़ज़ल
                                   

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जिधर भी देखिये उधर पानी.
कर गया सब तितर-बितर पानी.

पानी-पानी हुई सारी धरती;
घर से बेघर गया कर  पानी.

उसका खूं भी सफ़ेद हो जाये;
आँख का जिसके मर गया पानी.

सरहदे-वतन पर क़ुर्बां होकर
नाम को कर गया अमर पानी.
.
पियें न गर तो प्यासे मर जायें;
पियें कैसे हो जब ज़हर पानी

आदमी कुछ भी कर गुज़र जाये;
सर से जाये अगर गुज़र पानी.

गाँव,कस्बा हो या शहर 'महरूम';
   सभी पे ढा रहा क़हरपानी.

              *********


देवेन्द्र पाठक 'महरूम' के मुक्तक

किसी लानत-मलानत का असर उस पर नहीं होता,
कभी भी जगहँसाई का उसे कुछ डर नहीं होता;
मुक़ाबिल है नहीं लफ़्फ़ाज़ कोई भी हुआ उसके,
किसी भी झूठ पर उसका नीचा सर नहीं होता.
किसी की आस्तीं या खाली घर में छुप के आ बैठें;
कहावत है कि साँपों का अपना घर नहीं होता.
जो ओहदे और दौलत के लिये बिकने को आमादा;
उन बेशर्मों को बदनामी का भी डर नहीं होता.
न  कोई जात मजहब कौम होती है गरीबी की ;
किसी का दुःख किसी से भी कभी कमतर नहीं होता.
किसी के भी ज़हन में और ज़हाँ में जा पहुँचती हैं;
इन अफ़वाहों के 'महरूम' पाँव पहिया पर नहीं होता.


 
गर्दो-गुबार झूठ के उड़ाएगा कब तक,
लफ़्फ़ाजियों से बेतरह बहलायेगा कब तक;
जब तार-तार होंगे ये फ़रेब के बादल,
'महरूम' हमें सच न नज़र आयेगा कब तक.
        
बेसबब हो गई है मेरी ज़िन्दगी,
बेतलब हो गई है मेरी ज़िन्दगी,
'महरूम' जिसकी सुबह ही नहीं,
वो ही शब हो गई है मेरी ज़िन्दगी.

बंद कमरों में में अंधेरों की वहशतें देखी,
पाक़ रिश्तों में भी नापाक हसरतें देखी;
कभी रोटी,कभी कपड़ा,कभी मकां के लिये,
ख़ुद-ब-ख़ुद बिकने को आमादा अस्मतें देखी.

हम अपने गिरेबां में कभी झांकते नहीं,
अपने क़द-ओ-क़ुव्वत को आंकते नहीं;
हँसते हैं किसी का फटाअ लिबास देखकर,
   कपड़ों में भी है नंगा जिस्म ढाँकते नहीं.

वो नयी नींद,नये ख़्वाब लाया है फिर से,
वो नयी शब-ओ-माहताब लाया है फिर से,
तुम्हारे वास्ते शब सारी जागकर 'महरूम';
वो नयी सहर-ओ-आफ़ताब लाया है फिर से.

ज़वाब एक नहीं पर सवाल कितने हैं,
सुलह न समाधान पर बवाल कितने हैं,
दूसरों को नमकहराम कह रहे 'महरूम';
सोचिये,आप खुद नमकहलाल कितने हैं?

शिकारी बदले हैं लेकिन मचान बदले क्या?
तरकशो-तीर बदले पर कमान बदले क्या?
ज़ुबान-ओ-बयां खूब बदले हैं 'महरूम';
काबिज़े-जहन आपके हैवान बदले क्या?

रिश्तों के इस ज़हान में अंकल ही रह गया,
फूला न फला पेड़ ये खंखड़ ही रह गया;
जो पा गये मंजिल वो खुशनसीब हैं 'महरूम',
ये बदनसीब राह का कंकड़ ही रह गया.

रह गया अब तो बस मुगालता ये कविताई,
ज़रा भी तंग़ ख़यालात न बदल पाई;
गयी 'महरूम' थी बंजर ज़मीं जो हरियाने
वो नदी लहलहाती खेतियाँ डुबा आई.

आग पिया अंगार कहा,
बारम्बार पुकार कहा;
गुले-गुलामी को 'महरूम',
उसने कहा जब ख़ार कहा!

लबरी-जबरी बात न कर,
हाथ मिलाकर घात न कर;
मैं प्रतिघात करूँ 'महरूम',
ऐसे बद हालात न कर.

पद पाकर अभिमान न कर,
जनमत का अपमान न कर;
है ये वक़्त तेरा 'महरूम',
इसका बहुत गुमान न कर.

ओहदे का दम भरता है,
हवा से बातें करता हैं;
हमें डराता जो 'महरूम',
वो ही ज़्यादा डरता है.

हाँक रहा है इधर-उधर की,
फ़िक्र नहीं करता है घर की;
दिनद्विसे सपने दिखलाता,
वो 'महरूम' लगे है ठरकी.

रोज़ी न रोज़गार मयस्सर,
औषधि न उपचार मयस्सर;
न्याय मांगने पर  महरूम',
क़ैदे-कारागार मयस्सर.

गांव की खेती,कस्बे का रोज़गार गया,
मिल-मजूर,कारीगर हो बेकार गया.
लुटा सरे-बाजार और कोई गुपचुप,
कोई 'महरूम' ज़ंगे-ज़िन्दगी हार गया.


ग़ज़ल
तुझ पर मेरे यकीं की ज़मीं थरथरा गयी.
तेरी शक्ल में जब सर पे मेरी मौत आ गयी.

जिसकी जड़ों ने छोड़ दी अपनी ज़मीन ही;
ज़रा तेज -सी हवा भी वो शज़र गिरा गयी.

शब ढह गया बारिश में पीढ़ियों पुराना घर :
आँखों में घर की आंसुओं की बाढ़ आ गयी.              

तादाद बढ़ी जितना  तेरे तरफदारों की;
उतना दिलों में ज्यादा फ़ासले बढ़ा गयी.

जो किताबे-याद में तेरी तस्वीर रखी थी;
वो हवा-ए-गर्दिश-ए-उमर ले उड़ा गयी.

मुद्दत से था छुपाये दिल में राजे-मुहब्बत
मेरी ज़ुबां पर आज वो सच्चाई आ गयी.

जज़्बा-ए-दिल बयानी की तुम्हारी ये अदा
'महरूम' तुझसे ज़्यादा मेरे दिल को भा गयी.
                    ************
                                            


ग़ज़ल

सब 'ठीक-ठाक' चल रहा है सब को लग रहा.
ये लफ़्ज़ ठग रहा था तब भी,अब भी ठग रहा.

शब सो गयी चराग़े-चश्मे-जाग बुझाकर;
हर साँस में लेकिन चराग़े-आस जग रहा.

गुज़रा हुआ हर दौर हमने साथ  गुज़ारा;
अपना हर इक तज़ुर्बा पर अलग-अलग रहा.

कटता था मैं कितनी दफे नाख़ून था उसका;
तू जिस अनामिका की अंगूठी का नग रहा.

'महरूम' वो लाता है खेप ख़्वाबों की नयी;
हर कोई गोया नींद में उस तरफ भग रहा.
           **************                 

देवेन्द्र पाठक 'महरूम'

साईपुरम् कॉलोनी,कटनी.म.प्र.

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