साहित्य मनीषी डॉ.बलदेव जी की (26 सितम्बर 2019) प्रथम पुण्यतिथि पर विशेष

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हिन्दी साहित्य के दुलर्भ रत्न-डाँ. बलदेव ----------------------------------------------------- (जयन्त कुमार थोरात)             उन दिनों मैं ...

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हिन्दी साहित्य के दुलर्भ रत्न-डाँ. बलदेव

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(जयन्त कुमार थोरात)

            उन दिनों मैं रायगढ़ जिले में पदस्थ था। पदस्थापना के बाद साहित्यिक अभिरुचि के कारण वहां के साहित्यकारों से मेरा जल्दी ही परिचय हो गया। वहाँ के ख्याति लब्ध साहित्यकार डा. आनन्दी सहाय शुक्ल जी से मेरी अच्छा खासा मित्रता हो गयी थी। वे प्रतिदिन शाम चार बजे मेरे कार्यालय में आते थे व आधे घंटे बैठ कर चले जाते थे।उनके साथ अधिकतर साहित्य की बात होती थी। चूंकि वे उम्र में मुझ से काफी बड़े थे इस कारण मेरी इच्छा के अनुसार मुझे 'जयन्त जी'  ही कहा करते थे। एक दिन उनके साथ एक अपरिचित व्यक्ति भी आये। जब वे दोनों मेरे कमरे के भीतर आये उस समय में किसी जरूरी फाईल में उलझा था। इस कारण मैंने शुक्ल जी को बैठने को कहा व एक एक उड़ती नजर उनके साथ आये व्यक्ति पर डाल कर काम में लग गया। अपने कार्य से मुक्त हो कर मैंने शुक्ल जी की ओर देखा।

         तभी मेरी नजर उनके साथ आये व्यक्ति पर पड़ी। वे कद से छोटे, थोड़ा भारी बदन,सर पर खिचड़ी बाल,आँखों पर मोटे फ्रेम का चश्मा। पैजामा कुर्ता पहने आ। मैंने शुक्ल जी से पूछा "कैसे है आप"?

        वे बोले "मैं बिल्कुल ठीक हूँ। इनसे मिलिये , ये हैं डाँ. बलदेव। रायगढ़ निवासी तथा प्रदेश व देश के ख्याति प्राप्त साहित्यकार।" मैंने उन्हें ध्यान से देखा। उन्होंने मुझे नमस्कार

किया मैंने भी उन्हें जवाब दिया। वे अपने बारे में बताते रहे। वैसे मैंने उनका नाम जो बहुत सुना था। पर रूबरू  मुलाकात पहली बार हो रही थी। उनसे काफी देर तक चर्चा होती रही। कुछ देर बाद फिर मिलने की बात कहकर दोनों ने विदा ली। ऐसी हुई थी मेरी डाँ. बलदेव जी से पहली मुलाकात।

           इसके बाद समय समय पर मेरी डाँ. बलदेव जी से मुलाकात होती रही। उनसे साहित्य व अध्ययन के बारे में ही चर्चा होती थी। वे रायगढ़ कि नव साहित्यकारों को ले कर बड़े चिंतित रहते थे। वे अक्सर कहा करते थे कि रायगढ़ के नये साहित्यकारों को ऐसा कोई मंच नहीं मिल रहा जो उनके दिशा व सही  मार्गदर्शन दे सके। वे इस दिशा में कोई ठोस समाधान चाहते थे।एक दिन मैं शुक्ल जी और डाँ. बलदेव बैठे इसी  बात पर चर्चा  कर रहे थे। तभी यह सुझाव आया कि क्यों न एक पत्रिका प्रकाशित की जाय जो इन नव साहित्यकारों को मंच प्रदान करेगा। सभी इस प्रस्ताव पर सहमत हुये। इसकी जिम्मेदारी डाँ. बलदेव जी को दी गई। वे इसके लिए तैयार भी हो गये। उसी दिन से वे इसकी रूप रेखा बनाने में जुट गये। इस दिशा में उन्होंने काफी काम भी किया। पर किसी कारणवश योजना पूर्ण नहीं हो  सकी। और उनकी इच्छा अधूरी रह गई।

           2008 में मेरा रायगढ़ से तबादला हो गया। फिर मेल मुलाकात का सिलसिला कम हो गया। पर फोन से सम्पर्क बना रहा। मैं जब भी रायगढ़ भ्रमण को जाता तो, दो व्यक्तियों से जरूर मिलता। एक आनन्दी जी दूसरे डाँ. बलदेव । डाँ. बलदेव बड़े ही सौम्य ,सरल व धीरे बोलने वाले व्यक्ति थे। उनके व्यक्तित्व से सादगी झलकती थी। हिन्दी साहित्य में उनकी गहरी पैठ थी। हिन्दी साहित्य जगत में उनका नाम बड़े अदब व सम्मान से लिया जाता है। उनकी जितनी अच्छी पकड़ गद्य में थी उतना ही नियंत्रण उनका पद्य में भी था। मेरी जानकारी के अनुसार उनकी करीब सत्रह पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। उनकी रचनाओं में भाषा की सरलता, गति में निरंतरता मिलती है। शैली मौलिकता लिये हुये है। शब्दों के चयन में क्लिष्टता से बचते थे। इन्होंने हिंदी व छत्तीसगढ़ी दोनों में साहित्य सृजन किया है।

          उनकी कृति 'रायगढ़ का सांस्कृतिक वैभव"  बेमिसाल है। इसे पढ़ने से ज्ञात होता है कि इसे लिखने में उन्होंने काफी मेहनत व शोध किया है।वे रायगढ़ के साहित्य जगत के एक रत्न थे। उनके जाने से साहित्य क्षेत्र में एक अपूर्णीय रिक्तता आई है। उनका नाम हिंदी साहित्य के इतिहास में विशिष्टता से लिया जाता रहेगा। अपनी हार्दिक श्रध्दाजंलि के साथ बात यहीं समाप्त करता हूँ।

                                 जयन्त कुमार थोरत(भा.पु. से)

                                     सेवा निवृत्त डी.आई.जी.

                                          रायपुर छ.ग.

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छत्तीसगढ़ी के परम उन्नायक:डाँ. बलदेव

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(कृष्ण कुमार त्रिवेदी)

           डाँ. बलदेव एक व्यक्ति नहीं, एक संस्था थे। उन्होंने गंभीर अध्ययन करके , अपने सीमित सांधनों के बावजूद, वह कर दिखाया जो बड़े-बड़े प्रोफेसर और शोधकर्ता भी नहीं कर सके। उनका हिंदी -साहित्य का ज्ञान अप्रतिम था। छत्तीसगढ़ के इतिहास-भूगोल, साहित्य, साहित्येतिहास और संस्कृति के तो वे अव्दितीय ज्ञाता थे। नए साहित्यकार उनका मार्गदर्शन लेने के लिए उन्हें घेरे रहते थे उनके अनेक प्रकार से प्रोत्साहन एवं प्रेरणा देकर उन्होंने छत्तीसगढ़ में साहित्य की अद्भुत खेती की।प्राचीन एवं समकालीन साहित्यकारों पर उन्होंने खोज-खोजकर लिखा।अपने धुर विरोधियों पर भी उन्होंने उदारता के साथ लिखा। अनेक साहित्यकार तो उनकी भूमिकाओं और समीक्षाओं से ही चर्चित हो गए।

         "छत्तीसगढ़ी कविता के सौ साल" उनका ऐसा प्रामाणिक ग्रंथ है जो युगों-युगों तक विव्दानों एवं शोधकर्ताओं का मार्गदर्शन करता रहेगा।गुरु घासीदास पर उन्होंने एक अत्यंत प्रामाणिक तथा मानक ग्रंथ की रचना की। राजा चक्रधर सिंह की स्मृति में आयोजित किये जाने वाले रायगढ़ का चक्रधर संगीत समारोह बहुत कुछ डाँ. बलदेव के ही प्रयासों का प्रतिफल है। उसके माध्यम से वहां प्रतिवर्ष देश भर के जाने-माने कलाकारों का विशद सम्मेलन होता था और चक्रधर सिंह की स्मृति को ताजा किया जाता है। छायावाद के प्रथम कवि , पद्यश्री पं. मुकुटधर पाण्डेय के एक लम्बे समय तक मौन रहने के कारण जब हिन्दी-जगत उन्हें स्वर्गीय मान बैठा था, तब डाँ. बलदेव ने अथक

परिश्रम करके देश के कोने-कोने से उनकी रचनाओं(विशेषकर छायावाद संबंधी निबंधों)को संकलित और उनको प्रकाशित कराकर पाण्डेय जी को "पुनर्जीवित" करके साहित्य -संसार को प्रीतिकर आश्चर्य से भर दिया था जिससे लगभग तंद्रा से उठी भारत-सरकार ने भी उन्हें पद्मश्री से अलंकृत करके भूल-सुधार की थी और देश को गौरवान्वित किया था।

       यह सब कार्य सरल नहीं रहा। अनेक विश्वविद्यालयों के हिन्दी -विभागाध्यक्षों को आग्रह पर उन्होंने मुकुटधर जी की दो कृतियों -"छायावाद एवं अन्य श्रेष्ठ निबंध"और "विश्वबोध"  का प्रकाशन कराकर पुस्तकें उनके हाथों में दी तो उन्होंने अपने पुस्तकालयों के लिए पुस्तकें माँगी और डाँ. बलदेव ने दे दी। पर वे उनका मूल्य देने में आनाकानी करते रहे और फिर हमेशा के लिए मौन हो गए। इससे भी विचलित न होकर वे बड़े निर्विकार भाव से उन ग्रंथों की प्रतियां बिना मूल्य मुक्तहस्त बाँटते रहे, यह कहकर कि "दीमकों का भक्ष्य बन जाने से अच्छा है कि विव्दानों का ही भक्ष्य बन जायें!" उनके ग्रंथों से लाखों कमा लेने वाले अवसरवादी तथाकथित मित्रों एवं शिष्यों ने पलटकर उनकी ओर नहीं देखा, न उनका तय किया हुआ मानदेय दिया, न कभी रायल्टी देने की ही सोची।साहित्य -सेवा उनके लिए घाटे ही घाटे का सौदा रही। वे बताया करते थे कि उनके पास शोध-ग्रंथों - हेतु सामग्री लेने आने वाले अनुसंधितु तक पुस्तकें एक न एक  बहाने निःशुल्क ही मार ले जाते थे।

          दर्जन भर से अधिक उनकी पुस्तकें प्रकाशन में आ चुकी हैं, पर उनका बहुत सा साहित्य अब भी अप्रकाशित हैं। क्या ही अच्छा हो कि विव्दान, शुभचिंतक तथा छत्तीसगढ़ की सरकार उनका समग्र प्रकाशित कराकर इस साहित्य -महायज्ञ में शाश्वत आहुति दे कर उनकी स्मृति को चिर-स्थायी बनाए।

           वे मेरे अभिन्न मित्र थे। 1962 में अकलतरा में मेरा और उनका परिचय हुआ था जो घनिष्ठ संबंध के रूप में आजीवन बना रहा। 1966 में मैं विदेश चला गया तो हमारे बीच लम्बे - लम्बे पत्रों का आदान-प्रदान होता रहा। उनके सैकड़ों पत्र मेरे पास सुरक्षित हैं। हमारे परस्पर निमंत्रणों पर  हम एक-दूसरे के अतिथि भी बने। उनका देहावसान मेरे लिए अपूरणीय  व्यक्तिगत क्षति है। बार-बार यही लगता रहता है कि उनसे पूँछू ,"बल्देव तुम इतनी जल्दी क्यों चले गए?  वे मुझसे दो वर्ष छोटे थे, पहले चले अ, इसका सर्वाधिक क्लेश  है। उनकी स्मृति को चिर- स्थायी बनाने के किसी भी कार्य में मेरा आत्मिक सहयोग सदैव रहेगा।

सम्पर्क- व्दीपान्तर, ला.बा.शास्त्री मार्ग

             फतेहपुर (उ.प्र.)-212601

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स्मरणांजली

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(सरला शर्मा)

तत्कालीन मध्यप्रदेश के छत्तीसगढ़ अंचल के एक सामान्य गांव नरियरा के साव परिवार में पुत्र का जन्म हुआ वह असामान्य दिन था 27 मई 1942 बालक का नामकरण हुआ बलदेव।निश्चय ही उस दिन नरियरा के पुराने तालाब में असंख्य कमल खिले होंगे तो वहीं मंदिर के पास खड़े बूढ़े पीपल ने तालियां बजाकर स्वागत किया होगा, मुहल्ले की महिलाओं ने सोहर गाकर नवजात शिशु को आशीर्वाद दिया होगा। ग्रामीण संस्कृति, परिवेश, माटी प्रेम बालक बलदेव के मन में आजीवन रचे बसे रहे।

        तत्कालीन ग्रामीण प्रथानुसार 14 साल की उम्र में ही विवाह हो गया जिसे बाल विवाह  ही कहेंगे, बालिका वधू  सत्या देवी ने आजीवन सत्य निष्ठा के साथ पति का साथ दिया सच्चे अर्थों में जीवन सहचरी बनी, बलदेव जी की शिक्षा, साहित्य रचना, शिक्षण व्यवसाय में सहधर्मिणी की भूमिका का उन्होंने सफल निर्वहन किया तभी उनकी साहित्य साधना अनवरत चलती रही। समयनुसार साव दम्पत्ति को दो पुत्र, दो पुत्रियों की प्राप्ति हुई।

मैं तब जाजंगीर हाईस्कूल की छात्रा थी श्री बलदेव साव हिंदी पढ़ाते थे, डाँ. शिवमंगल सिंह "सुमन" की कविता जाग रही मरघट की ज्वाला की व्याख्या करते हुये बताते कि उज्जैन के महाकालेश्वर  मंदिर में भस्म आरती क्यों की जाती हैं।घर आकर मैंने अपने पिता शेषनाथ शर्मा "शील"जी को बताया तब उन्होंने बताया कि तुम्हारे बलदेव साव सर स्वयं कवि हैं। कुछ दिनों बाद हमारे घर की काव्य गोष्ठी में साव सर की कविता सुनी फिर तो विद्याभूषण मिश्र, डाँ श्याम सुंदर त्रिपाठी, नरेंद्र श्रीवास्तव के साथ उन्हें कई बार सुनी। शायद चार साल बाद ही जांजगीर  स्कूल से दो  हिंदी शिक्षकों का चयन प्राध्यापक पद पर हुआ प्रथम डाँ. बलदेव साव , द्वितीय जन थे आनंद कुमार श्रीवास्तव इस तरह साव सर धरमजयगढ़ फिर रायगढ़ चले गये.....। समय अपनी चाल चलता रहा, तकरीबन पच्चीस सालों बाद रायपुर के एक साहित्यिक आयोजन में भेंट हुई, वे मंचस्थ थे, मैं श्रोता वर्ग प्रथम पंक्ति में बैठी थी, ध्यान आकर्षित हुआ  मेरे बाजू में परिचित सी सौम्य महिला बैठी थीं याद करने लगी कहां देखी हूं? धीरे से मन ने कहा ये तो साव भाभी हैं उत्सुकता चैन तो लेने नहीं दे रही थी, तभी मुझे मंच पर बुलाया गया मेरा नाम सुनते ही भाभी ने बड़ी आत्मीयता से मेरा हाथ पकड़ कर कहा "सरला"! उन्हें नमस्कार की आयोजन की समाप्ति पर साव सर के साथ भाभी से फिर स्नेहाशीष हमारी रचनाओं सहित स्थान दिया। याद आ रहा है ऐसो को उदार जग माहीं....।

डाँ. बलदेव साव की कृतियों में "वृक्ष में तब्दील हो गई औरत" कविता संग्रह हैं जो छन्दबद्ध न होते हुए भी लयात्मकता से भरपूर है। विदग्धता हर कविता में प्रगट होती है स्त्रियों के प्रति जो पारम्परिक सोच है उससे अलग सृजनकत्रीं स्त्री की क्षमता को नई सोच, उदारतावादी दृष्टिकोण के साथ कविताओं में ढाला है कवि ने तो दूसरे ओर स्त्री के आंतरिक सौंदर्य को अग्निशिखा सी तेज,ओज से उद्भासित बताया है।

        "छायावाद और पंडित मुकुटधर पांडेय"पुस्तक पाठक के समक्ष न सिर्फ मुकुटधर पांडेय की रचनाधर्मिता को रेखांकित करती है, पाठकों को उनके प्रदेय से भी परिचित कराती है वस्तुतः पाठक इस पुस्तक के जरिये छायावाद को भी जानने समझने का सुयोग प्राप्त करता है।

          "छत्तीसगढ़ी कविता के सौ साल"अपने भीतर सौ सालों का इतिहास छिपाये हुए हैं, शोधार्थियों के साथ साथ अध्ययनशील , जिज्ञासु पाठक के लिए भी यह महत्वपूर्ण पुस्तक है। अनमोल ऐतिहासिक ग्रंथ भी कह सकते हैं।

          " छत्तीसगढ़ के कुछ महत्वपूर्ण कवि" इस पुस्तक में तत्कालीन और आधुनिक कवियों की कविताएं और जीवनी महत्वपूर्ण टिप्पणियों के साथ उपलब्ध है यह भी सर्वकालिक रचना है जो पाठक का उचित मार्गदर्शन करती है। सहज,सरल,प्रवाहमयी भाषा, पूर्वाग्रह मुक्त लेखन है लेखक की महत्वपूर्ण रचनाओं में से एक है।

          लोकाक्षर में डाँ. साव की छत्तीसगढ़ी रचनायें पढ़ती  रही हूं हिंदी के समान ही छत्तीसगढ़ी भी सशक्त भावाभिव्यक्ति का माध्यम रही विशेषकर उनकी समीक्षाएं, स्वतंत्र निबंध छत्तीसगढ़ी गद्य की धरोहर हैं। समीक्षक, कवि, गद्यकार के रूप में उनका योगदान सदैव स्मरणीय रहेगा।

          शास्त्रीय संगीत ,नृत्य पर लिखे उनके विचारों ने पाठक को नई दृष्टि दी तो राजा चक्रधर सिंह के योगदान, कथक घराने पर पाठक का ध्यान आकर्षित किया।

        विचारों की दृढ़ता ,अध्ययनशीलता, अभिव्यक्ति क्षमता उनकी कतिपय विशेषताएं उल्लेखनीय हैं तो बेबाक कथन उन्हें आजीवन अपनी राह खुद बनाना और उस राह पर चलना के विचार का प्रतिनिधित्व करती हैं सम्भवतः गुरूदेव रवींद्र नाथ ठाकुर ने ऐसे लोगों के लिए ही लिखा है....

"जदि तोर डाक शुने केउ ना आसे

         मिला, गुरु शिष्य के नाते मैं एक नव अध्याय जुड़ा, बड़े भाई, भाभी का स्नेह मिला। फोन पर बातें होती तो दोनों का स्नेह मिलता, साहित्यिक आयोजनों में भेट होती अपनी  अपनी कृतियों का आदान प्रदान भी होता, विगत कुछ सालों से बलदेव भैय्या की अस्वस्थता के कारण उनसे मुलाकात नहीं हो पाई थी पर सम्पर्क बना रहा, विधि का विधान 6 अक्टूबर 2018 को डाँ बलदेव साव यशःशेष  हो गये, साहित्य जगत ने प्रवीण समीक्षक,माटी के गीत रचने वाला कवि, सशक्त लेखक प्रखर वक्ता खो दिया, हिंदी और छत्तीसगढ़ी दोनों साहित्य की अपूरणीय क्षति हुई है।

          "छत्तीसगढ़ी कविता के सौ साल' के रचनाकार में बलदेव जी का फोन मिला शील जी की और अपनी कवितायेँ भेजो यह पुस्तक आगामी साहित्य अध्येताओं के लिए ऐतिहासिक कृतियों में शामिल होगी, यथासमय आदेश का पालन हुआ, रायगढ़ जाना फिर भी नहीं हो सका जिसका मुझे आजीवन खेद रहेगा पर गुरूजन की गुरुता देखिये..... वे किसी आयोजन में भाग लेने जांजगीर गये तो यह अमूल्य पुस्तक मेरे भाई प्रेमचंद शर्मा के घर शील सदन में एक प्रति मेरे लिए छोड़कर आये अभी पुस्तक मेरे पास उनके स्नेहाशीष स्वरूप है ,जो इसलिये और भी मूल्यवान है कि उन्होंने हम दोनों पिता, पुत्री को इसमें

      तबे एकला चलो रे..... तुमि एकला चलो गो...

             अपने इन विचारों के माध्यम से मैं अपने शिक्षक, अग्रज, मूर्धन्य साहित्यकार डाँ. बलदेव साव को सादर स्मरणांजली देती हूँ।

         इत्यलम्

               शब्दांकन

सरला शर्मा/ पद्मनाभपुर (दुर्ग)/

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*नवोदित रचनाकारों के प्रेरणास्त्रोत थे डॉ. बलदेव*

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छत्तीसगढ़ के महत्वपूर्ण साहित्यकार व शिक्षाविद् डॉ. बलदेव जी से मेरी मुलाकात अक्सर शिवकुटीर करमागढ़ में होता था । जब भी ललित निबंधकार जय प्रकाश 'मानस' जी का रायगढ़ आगमन होता तो , डॉ. बलदेव जी के साथ करमागढ़ अवश्य आते थे । वहीं करमागढ़ के सुरम्यवादी में बना बालकवि 'वसंत' जी का निवास स्थल - शिवकुटीर में , उनसे मुलाकात होती थी ।

वे मुझे बाल साहित्य के एक नवागत रचनाकार के रूप में कुशल मागर्दर्शन देते रहते थे ।

उनका कहना था कि - "बाल कविता यदि सृजन करनी हो तो , सबसे पहले बच्चों के हाव -भाव को समझना सिखो । क्योंकि , उसी से बालकाव्य का प्रथम पुट निकलकर सामने आता है ।

डॉ. साहब व्याकरण संबंधित जानकारी देते हुये कहते थे - " पति - पत्नी , इन दो छोटे शब्द का भेद समझ लोगे तो पूरे व्याकरण को समझना तुम्हारे लिए आसान हो जायेगा ।

वे ऐसी छोटी - छोटी युक्ति के माध्यम से , बड़ी - बड़ी बातों को समझाने की कोशिश किया करते थे।

डॉ.बलदेव जी , जब भी करमागढ़ आते उनकी सेवा करने का मुझे सुअवसर मिलता था ।

वे मुझे नाम से नहीं बल्कि , 'पुष्प' कहकर संबोधित किया करते थे ।

उनके साथ रहते हुए उनकी कुछ बातें नोटिस करता था । जैसे - उन्मुक्त उड़ते हुये पंक्षी , कू - कू करता कोयल का राग , हरियाली , पहाड़ और झरने को वे लंबे समय तक एकटक देखा करते थे ।

जब मैं उनसे पूछ बैठता कि -- यह आप क्या देख रहे हैं । तो वे हंसते हुये कह उठते थे --- "ये प्रकृति हमें कुछ कहना चाह रही है । अपनी व्यथा - अपनी ख़ुशी हमसे बाँटना चाह रही है ।

ये पंक्षी जाने क्यों हमें देखकर इस डाल से उस डाल पर नांच रही है ।

इस कल कल करती झरने के निनांद को सुनों , ये सभी हमसे कुछ माँगना चाह रहे हैं । जाने क्या ? हमें नहीं मालूम ।

उस समय मुझे उनकी बातें बड़ा अजीब लगता था ।

पर वह स्मृतिशेष , महान आत्मा प्रकृति से नाता जोड़कर अमर सृजन कर गया ।

*पहाड़*

स्खलित वसना घाटियों

मत लजाओ

पास आओ

मैं हूँ धूपगढ़ का

धूप का टुकड़ा

मत जलाओ

पास आओ

बजने दो अन्धेरे को

झिलमिलाती लहरों पर

चढ़ने दो आग की नदी

गिरि शिखरों पर

उतरने दो

बहने दो

अपनी गहराइयों में

अतल गहराइयों में

*आत्मदर्शन*

हल्दी सी चढ़ रही है धूप मुझमें

चाँदनी के लिए

आज तक जी रहे तन्हाईयों में हम

सिर्फ चाँदनी के लिए

उनकी आँखों में तारे बन के खिले हैं

चाँदनी के लिए

अमावस की रात में जुगनू से -

बुझ बुझ के जले हैं

सिर्फ चाँदनी के लिए

स्मृतिशेष डॉ. बलदेव जी नवीन रचनाकारों को खूब प्रोत्साहित किया करते थे । उन्हें कई महत्वपूर्ण पुस्तक उपलब्ध कराकर अधिक से अधिक पढ़ाई करने के लिये कहा करते थे ।

डॉ. साहब नवागत रचनाकारों को विनय पत्रिका , रामचरित्र मानस , साहित्य लहरी व सूरसारावली जैसे श्रेष्ठ साहित्य को अध्ययन करने हेतु कहा करते थे ।

वे , ज्यादा पढ़ो और कम लिखो के ज्ञान को अपने जीवन का केन्द्र बिन्दु बनाने के लिए कहते थे ।

जब भी मैं , उनके निवास पर उनसें मिलने के लिए जाता तो उन्हें रामधारी सिंह दिनकर , पंत , निराला व मुंशी प्रेमचन्द्र जी के साहित्य को अध्ययन करते हुए पाता था । वे एक कुशल एकाकी अध्येता व अतुलनीय साहित्यिक मनीषी थे ।

उनका पारिवारिक जीवन पूरी तरह से साहित्य , संगीत व कला से युक्त था ।

उन्हें अध्ययन , लेखन - सृजन के साथ - साथ बागवानी का भी शौंक था । वे अक्सर गमलों में तरह - तरह के फूलों का पौधा लगाया करते थे ।

मैं , जब भी उनसे मिलता मुझे कोई न कोई पुस्तक भेंट स्वरूप देते ही थे ।

डॉ. साहब मुझे कहा करते थे - " गाँव में जो करमा गीत , ददरिया व पुरानी कहानी जो बड़े बूढ़ों के द्वारा गायी जाती है या कही जाती है , उन सभी को संग्रहित करना । क्योंकि , विलुप्त हो रही गाँव के संस्कृति को बचाना हमारा प्रथम धर्म है । "

हमेशा ही साहित्यकार को काव्य सृजन के पूर्व गद्य लेखन सीखनी ही चाहिए । क्योंकि गद्य , साहित्य का मूल जड़ है । इस तरह ना जाने कितनी बातें बताकर वे मुझे मार्ग प्रशस्त किया करते थे ।

डॉ. बलदेव जी अपने जीवन के अंतिम चरण तक साहित्य , संस्कृति व कला के लिए पूर्णतः समर्पित रहे ।

वे एक अच्छे पति - अच्छे पिता व परिवार के कुशल मार्गदर्शक के साथ साथ नवोदित रचनाकारों के युग पुरुष थे ।

डॉ. बलदेव जी का स्मृतिशेष हो जाना , साहित्य जगत के लिए एक बहुत बड़ी क्षति है ।

ऐसा लगता है मानों , पिता का हाथ पुत्र के सिर से हट गया है ।

साहित्य व संस्कृति की धनी नगरी जिला रायगढ़ के साहित्यिक पुरोधा स्मृतिशेष डॉ.बलदेव जी साहित्य जगत के साथ - साथ हमारे ह्रदय में भी हमेशा अजर - अमर रहेंगे ।

उन्हें मेरा शत् शत् नमन ।

डॉ. प्रमोद सोनवानी पुष्प

तमनार/पड़िगाँव - रायगढ़

(छ.ग.) पिन - 496107

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*रायगढ़ जिले के कालजयी हस्ताक्षर .. - डॉ. बलदेव*

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कृतिशेष डॉ. बलदेव भैया जी के साथ मेरा पाँच दशक से अधिक समय तक घनिष्ठ एवं घरेलू संबंध रहा है । वे जीवन पर्यन्त नवोदित रचनाकारों को सदैव प्रोत्साहन एवं मार्गदर्शन देते रहे। गीत , कहानी , निबंध , आलेख , आलोचनात्मक लेख आदि साहित्य के हर विधा को निरंतर पोषण दिया। जिनकी प्रतिभा ने नवोदित रचनाकारों को खूब प्रभावित किया । ऐसे बहुमुखी व्यक्तित्व के धनी बलदेव भैया आज स्मृतिशेष हैं ।

उनके हिन्दी व छत्तीसगढ़ी साहित्य में शिल्प सौन्दर्य का एक सहज रूप ---- दृष्टिगोचर होते हैं , इसमें बिम्बों तथा प्रतीकों का प्रयोग सुन्दर बन पड़ा है । भाषा सरल है , पढ़ते ही आत्मसात हो जाते हैं। इसलिए उनकी रचनाएँ आज साहित्य जगत के राष्ट्रीय फलक पर जगमगा रहे हैं ।

भैया जी के इस साहित्यिक यात्रा में आदरणीया भाभीश्री जी ने उनको सदैव प्रोत्साहित किया । वे हमेशा उनकी ख्याल रखतीं थीं । भैया जैसे जीवन साथी पाकर अपने आप को बहुत सौभाग्यशाली मानतीं हैं । बलदेव भैया जी भी यही कहते थे कि , "आज मैं साहित्य के क्षेत्र में जो कुछ भी हूँ , तुम्हारी भाभीश्री जी की बदौलत है" । वे हमेशा यह भी कहते थे कि ----- "मैं भाग्यशाली हूँ , जो मुझे ऐसी धर्मपत्नी मिली है " । भैया के लेखन एवं सम्मान होने पर भाभीश्री को बड़ी संतुष्टि मिलती , ताकि उनकी लेखनी की गति निरंतर चलती रहे। दाम्पत्य जीवन के कठिन से कठिन मार्ग में भी दोनों ने एक - दूसरे का साथ नहीं छोड़ा । कहीं भी जाना होता था , दोनों साथ - साथ आना - जाना करते थे तथा भैया जी के हर आवश्यता का भाभीश्री ध्यान रखतीं थीं ।

स्मृतिशेष डॉ. बलदेव भैया जी के साहित्यकारों की एक मित्र मंडली थी , ----- जिसमें जीवन सिंह ठाकुर , स्मृतिशेष रामलाल निषाद , जय प्रकाश 'मानस' , संतोष रंजन शुक्ल और खुद मैं शामिल था । हम लोग सप्ताह में एक बार रविवार को एक जगह बैठते थे । खासकर मेरे घर में उन सभी का जमवाड़ा होता था तथा साहित्यिक चर्चायें होती थी । उसमें आसपास के कुछ नवोदित रचनाकार एवं दो - तीन प्रबुद्ध वर्ग के लोग होते थे । जिसमें --- डॉ . प्रमोद सोनवानी 'पुष्प' , श्री चन्द्रमणी ठेठवार एवं स्व. सदानंद नाग गुरु जी निश्चित रूप से शामिल होते थे । मैंने एक बात जो देखी-- उसमें बलदेव भैया का प्रकृति के साथ गहरा लगाव था , वन - पर्वत , नदी - नाले , पशु - पक्षी के साथ गाँव की सादगी उनके ह्रदय में विद्यमान थे । जो पाठक को आकृष्ट करते हैं । क्योंकि , गाँव का निराला जीवन प्रकृति के गोद में ही पलता है । उनकी लेखनी की एक ख़ास विशेषता है - सरल भाषा , सरसता , कल्पना की ऊँची उड़ान के द्वारा पाठकों के मन में जिज्ञासा भर देते हैं । हिंदी एवं छत्तीसगढ़ी के सभी विधाओं में भैया जी ने अपनी लेखनी चलाई है । भैया जी के कलम की बात का तो कहना ही क्या ।

गाँव एवं प्रकृति से जुड़े उनके कुछ शब्द चित्र देखिये .....

छुही लिपाय रगबग बिथिहा ,

गोबर लिपाय अंगना ।

पइरी पहिरे नोनी के देखा ,

ठुमुक - ठुमुक के रेंगना ।।

***

चंवर ढाल ले बोहिस केलो

पिघलत चांदी के झरना ।

पथरा - पहार एको नइ हे जै

जइसे कोटरी - हिरना ।।

इस तरह भैया जी की लेखनी में अजब की जादू और उसकी बात ही अलग है ।

अंत में स्मृतिशेष डॉ . बलदेव भैया जी के साथ बिताये गये स्वर्णिम पल को कदापि नहीं भुलाया जा सकता । भैया जी मेरे ही नहीं , ना जाने कितने साहित्यकारों की हृदय में निवास करते हैं । मेरी दृष्टि उनके कनिष्ठ पुत्र चि. वसंत राघव पर टिकी रहेगी । जो कि - भैया जी के साहित्यिक अवदानों को अनवरत जारी रखने का व्रत लिया है ।

अंत में स्मृतिशेष डॉ. बलदेव भैया जी को मेरा शत् शत् नमन ।।

- शंभूलाल शर्मा 'वसंत'

शिवकुटीर करमागढ़-रायगढ़

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बल देने वाले डा बलदेव भैया

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  "प्रिय देवधर । तुम निराला की तरह महाप्राण हो  ।अपनी कन्या के शोक से उबरो ।तुम्हारे भीतर अपार प्रतिभा है। तुम्हें अभी बहुत कुछ सृजन करना है । तुम निराला की सरोज स्मृति को पढ डालो।" मैं अपने गांव में था .जैसे ही डाकिया ने डा बलदेव की यह दुर्लभ  पाती दी,मेरे शोक विदग्ध मन पर शीतलता के छींटे पड गये ।सन् 1993 में वज्रपात हुआ था. मेरी सात वर्षीया दुहिता रेणुकाश्री का सफदरजंग हास्पिटल दिल्ली मे निधन हो गया था ।हम दोनों पति -पत्नी लंबे समय तक शोकाकुल रहे ।डा बलदेव ने मानो झकझोर दिया था। मैं"सरोज स्मृति " में डूब गया था ।शनै:-शनै: मैं अपनी दुनिया में लौटने लगा । ड्यूटी ज्वाइन किया । ऐसे थे डा बलदेव ।

      डा बलदेव जैसा घनघोर अध्ययनशील,शोधकर्ता और समर्पित रचनाधर्मी  मैंने अपने जीवन में दूसरा नहीं पाया । उन्होंने मुझे साहित्य सृजन को सांस की तरह लेना सिखाया ।वे स्वप्न में भी कविताएं रचा करते थे। 

           अक्टूबर सन् 1988 से 1992-93 तक शासकीय सेवा के बहाने  मेरा रायगढ़  प्रवास रहा ।इस अवधि में डा बलदेव का निरंतर सानिध्य मेरे जीवन की अमूल्य धरोहर  रहा है। तब रायगढ़ में डा बलदेव ,रामलाल निषाद और इस खाकसार की त्रयी मशहूर थी ।रायगढ प्रवास  मेरे साहित्यिक जीवन का इसलिए भी स्वर्ण काल है ,कि डा बलदेव के साथ छायावाद प्रवर्तक पद्मश्री मुकुटधर पांडेय का सतत सामीप्य मिलता रहा ।पांडेय जी से मिलते रहना जैसे उनके युग को जीना होता था ।

      वे प्रसाद ,पंत ,निराला और महादेवी वर्मा तथा अनेक कवियों के दुर्लभ संस्करण सुनाया करते थे ।उनके आखिरी दिनों में मैं और डा बलदेव भैया उनके बहुत करीब रहे. उनके निधन पर उनकी शव यात्रा एवं अंत्येष्टि में भी प्रोटोकॉल के तहत शासन की ओर से सहभागी बनने का  मुझे अवसर  मिला। डा बलदेव भी उस दिन साथ -साथ रहे । मैंने उस दिन उन्हें बहुत - बहुत उदास पाया । पांडेय जी डा बलदेव को बहुत सम्मान देते थे । डा बलदेव को जनकवि आनंदीसहाय शुक्ल  भी बहुत मानते थे ।जनकवि के निधन की सूचना डा बलदेव ने मुझे तत्काल दी थी । शुक्ल जी के संयोजन में प्रायः कवि गोष्ठियां होती रहती थी।तत्कालीन पुलिस अधीक्षक और गजलगो विजय वाते डा बलदेव के यहाँ प्रायः आते रहते थे और हमारी साहित्यिक गोष्ठियां गुलजार हुआ करती थीं ।

     रहस के लिए ख्यात ग्राम नरियरा  से अकलतरा होते हुए अंततः  संगीत और कलाप्रेमी राजा चक्रधरसिंह की नगरी में  रमना डा बलदेव के स्वभाव के अनुरूप था ।

  डा बलदेव के रहते मैंने कभी भी निर्बलता महसूस नहीं की । वे मुझे सदैव प्रेरित -प्रोत्साहित करते रहते थे । एक वाक्या सन् 1989 का है ,तब जगदीश मेहर चक्रधर समारोह के प्रमुख सूत्रधार हुआ करते थे ।पैलेस के सामने सभागारनुमा हाल में भव्य कवि सम्मेलन आयोजित हुआ था ।छत्तीसगढी के अग्रपांक्तेय कवि गण पधारे थे ।पं.श्यामलाल चतुर्वेदी ,हरि ठाकुर , लक्ष्मण मस्तुरिया ,रामेश्वर वैष्णव प्रभृति ।स्थानीय कवि चंद्रशेखर शर्मा ,कस्तूरी दिनेश ,रामलाल निषाद भी थे । सहसा डा बलदेव भैया ने आदेश दिया ।देवधर  तुम्हें ही इस भव्य कवि सम्मेलन का सफल संचालन करना है । उनका आशीर्वाद था कि कवि सम्मेलन ऐतिहासिक बन पडा । ऐसी थी डा बलदेव की परख ।दूसरे दिन कवि गण मुकुटधर पांडेय जी के घर जाकर उनके कर कमलों से सम्मान पत्र ग्रहण किये ।

       एक बार मैं रायगढ़ आया था। शायद घर आ रहा था ।

   तब मैं सरगुजा में पदस्थ था ।  डा बलदेव मुझे सीधे पाठक मंच के कार्यक्रम में ले गये ।अशोक झा संचालन कर रहे थे । उस दिन  केदारनाथसिंह की कविता की  किताब "जमीन पक रही है" पर चर्चा हो रही थी ।डा बलदेव ने मुझे त्वरित समीक्षा के लिए आदेशित किया और यह खाकसार उस अग्नि परीक्षा में खरा उतरा । ऐसा था उनका विश्वास ।एक बार आकाशवाणी से "छत्तीसगढ़ के अनाम साहित्यकार " विषय पर मेरी वार्ता प्रसारित होनी थी । शायद सरगुजा से ही आ रहा था ।उन्होंने इतनी महत्वपूर्ण जानकारियां उपलब्ध करा दी कि मेरा आलेख समृद्ध बन पडा । वे जानकारियों के मानों इनसायक्लोपीडिया थे ।

               -डा देवधर महंत

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डाँ. बलदेव महत्व

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(डॉ.राजू पाण्डेय)

डॉ बलदेव का निधन छत्तीसगढ़ के साहित्य जगत में जो रिक्त स्थान छोड़ गया है उसकी पूर्ति असंभव है।

डॉ बलदेव ने शोध और अन्वेषण के जो उच्च मानक स्थापित किए थे, उन्हें स्पर्श करने की कल्पना भी कठिन है।

छत्तीसगढ़ के साहित्यिक और सांस्कृतिक वैभव को सामने लाने के लिए छत्तीसगढ़ की चर्चित-अचर्चित विभूतियों के सुदूर ग्रामों में जाकर पांडुलिपियों का संग्रहण और अन्य प्रदेशों में जाकर अनेकानेक पुस्तकालयों में महीनों बिताते हुए इन मनीषियों पर दुर्लभ सामग्री का संकलन- यह सब इतना परिश्रम साध्य था कि उनके समर्पण को देखकर चमत्कृत हो जाना पड़ता है।

यदि आज छायावाद के प्रवर्तक पद्मश्री पंडित मुकुटधर पाण्डेय पर प्रामाणिक शोध सामग्री वर्तमान शोध छात्रों हेतु उपलब्ध है तो इसका सम्पूर्ण श्रेय डॉ बलदेव को है। राजा चक्रधर सिंह और रायगढ़ के कथक घराने पर उनका शोध चमत्कृत कर जाता है। रायगढ़ की साहित्यिक-सांस्कृतिक विरासत को समझने के लिए केवल एक ही रास्ता है और वह डॉ बलदेव के अन्वेषण परक लेखों से होकर गुजरता है।

बतौर आलोचक डॉ बलदेव ने कितने ही युवा और उदीयमान साहित्यकारों को हाथ पकड़ कर लिखना सिखाया और गुमनामी के अंधकार में खो चुकी कितनी ही विभूतियों को वह सम्मान दिलाया जिसकी वे अधिकारी थीं।

डॉ बलदेव अपने जीवन में खूब छले गए, उनके मौलिक शोध कार्य का श्रेय अन्य लोगों ने लेने की कोशिश की। किन्तु न तो डॉ बलदेव हतोत्साहित हुए न उन्होंने किसी के प्रति मनोमालिन्य रखा।

बतौर रचनाकार छत्तीसगढ़ी भाषा को समृद्ध करने के लिए उन्होंने हर विधा में गुणवत्तापूर्ण लेखन किया और छत्तीसगढ़ी वाङ्गमय को समृद्ध किया।

आज जब वे नहीं हैं तो उनके शिष्यों का यह दायित्व बनता है कि वे अपने 'बलदेव सर' की परंपरा को आगे बढ़ाएं और छत्तीसगढ़ महतारी की गौरव स्थापना में योगदान दें।

डॉ बलदेव के योग्य सुपुत्र श्री बसंत राघव पर न केवल अपने पिता द्वारा संकलित दुर्लभ पांडुलिपियों को सुरक्षित रखने अपितु डॉ बलदेव की अनेक अधूरी शोध परियोजनाओं को पूर्ण करने का उत्तरदायित्व है। हमें पूर्ण विश्वास है कि वे इस कठिन कार्य को अपने पिता के सूक्ष्म संरक्षण में सहजता से संपादित कर सकेंगे।

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स्मरण :

आलोचना में विनम्र उपस्थिति के साथ डा.बलदेव

-    विनोद साव

यह वर्ष १९९३ के आसपास की बात होगी जब रायगढ़ में व्यंग्यकार कस्तूरी दिनेश ने अपने व्यंग्य-संग्रह ‘फ़ोकट का चन्दन लगा मेरे नंदन’ का विमोचन करवाया था और हम सब व्यंग्यकारों को आमंत्रित किया था. कार्यक्रम के मुख्य अतिथि कस्तूरी दिनेश के मित्र प्रसिद्द पत्रकार एवं लेखक ललित सुरजन थे. व्यंग्यकार लतीफ़ घोंघी, त्रिभुवन पांडेय और प्रभाकर चौबे थे. वहां कवि आनंदी सहाय शुक्ल जी को पहली बार देखा और सुना था तब अपनी प्रसिद्द कविता ‘बारहमासी’ का उन्होंने वहां पाठ किया था. उसके बाद उनका सम्मान हुआ. विमोचन कार्यक्रम संपन्न हुआ और हम सब रचनाकारों ने अपनी व्यंग्य रचनाओं का पाठ किया. रात में भोजन करने के बाद सारे अतिथि अपने अपने साधनों से लौट गए थे पर मैं और विनोद शंकर शुक्ल रुक गए थे दूसरे दिन की ट्रेन पकड़ने के लिए.

हम सुबह रायगढ़ स्टेशन पहुंचे सामने जे.डी पैसेंजर खड़ी थी उसमें बैठ गए इस विश्वास के साथ कि हमें बिलासपुर में छत्तीसगढ़ एक्सप्रेस मिल जाएगी रायपुर और दुर्ग जाने के लिए. ट्रेन में बैठे तो समय काटने के लिए कल संपन्न हुए कार्यक्रम की हम समीक्षा कर रहे थे तब हमारी बातचीत को सुनकर हमारे सामने बैठे हुए सज्जन ने मुस्कुराते हुए धीरे से हमें पूछा कि ‘आप लोग साहित्यकार हैं क्या?’ इससे हम लोगों को बड़ी प्रसन्नता हुई क्योंकि ट्रेन बस में साहित्यकार को पूछने वाले कम मिलते हैं.

प्रसन्न होकर विनोद शंकर शुक्ल ने कहा कि ‘हाँ!’

तब उन्होंने अपना परिचय दिया कि ‘मैं डा.बलदेव हूं.’

शुक्ल जी ने बताया कि ‘मैं विनोद शंकर शुक्ल हूं और ये विनोद साव हैं. हम लोग व्यंग्य लिखते हैं और कल कस्तूरी दिनेश के कार्यक्रम में यहाँ आए हुए थे.’

डा.बलदेव ने तब अपनी व्यस्तता के कारण उस कार्यक्रम में नहीं पहुँच पाना बताया था. विनोद शंकर जी ने उनसे कहा कि ‘बलदेव जी मैं आपको जानता हूं. आप अच्छे कला समीक्षक हैं.’ बलदेव जी के चेहरे पर खिल उठने वाली वही मुस्कान थी जो बाद में उनकी चिर-परिचित मुस्कान बन गई थी. उनकी मध्यम कदकाठी, सांवले रंग, सिर के फुरफुरे बालों और आंखों में झांकने वाली सहज आत्मीयता के बीच वह मुस्कान खिल उठती थी.

अब वे भी हमारी बातों में रस लेने लग गए थे और हम उनकी. प्रारंभिक परिचय में विनोदशंकर शुक्ल को उन्होंने कवि विनोद कुमार शुक्ल समझा था .. तब ऐसा विनोदशंकर जी के साथ साहित्य समारोहों में अक्सर हो जाता था. उन्हें संचालक भी प्रस्तुत करते समय कई बार विनोद कुमार शुक्ल कह उठते थे. कभी कभार विनोद कुमार शुक्ल को कोई विनोद शंकर शुक्ल कह उठता था तब उन्हें भी हिसाब बराबरी कर लेने का मौका मिल जाता था. इससे उन्हें सुकून मिलता था.

बलदेव जी को जब मेरे नाम में साव दिखा तब उन्होंने बताया कि ‘मैं भी साव हूं.’ परिचय के बाद यह जानकर कि मैं दुर्ग के वयोवृद्ध साहित्यकार व समाजसेवी पतिराम साव जी का पोता हूं तब उन्हें आत्मीय ख़ुशी हुई और कहा कि ‘पतिराम साव गुरूजी हमारे समाज के बड़े मुखिया और मार्गदर्शक रहे हैं.’ अब वे मुझसे ज्यादा अपनेपन के साथ बाते करने लग गए थे.

जब मैंने उन्हें पूछ दिया कि ‘आपकी विधा क्या है?’ उन्होंने कहा कि ‘आलोचना’. तब मैंने अपने अल्पज्ञान में पूछ दिया कि ‘आलोचना के अतिरिक आपकी कोई विधा होगी?’ तब मेरे भोलेपन पर मुस्कुराते हुए वे बोल उठे कि ‘अरे! आप आलोचना को विधा नहीं मानते क्या? यह भी साहित्य की एक विधा है.’ तब एक लेखक होने की प्रक्रिया में मुझे अपने संकुचित ज्ञान पर हंसी आ गई कि मैं आलोचना को एक विधा नहीं मान रहा हूं जैसे कि आलोचक व्यंग्य को एक विधा नहीं मानते.

ट्रेन की धीमी गति की तरह डा.बलदेव हमें अपने टिप्स देते रहे जिससे हम लोगों में साहित्यिक समझ बढ़ती जाती. बलदेव जी अपनी व्याख्या में ‘लाउड’ नहीं होते थे. वे आहिस्ते से अपनी उपस्थिति दर्ज करते थे. उनके व्यवहार और आलोचना दृष्टि में आक्रामकता नहीं थी. वे प्रमोद वर्मा से प्रभावित थे और उनके बारे में उन्होंने कहा कि ‘प्रमोद वर्मा जी आलोचना में आचार्य की पदवी प्राप्त कर चुके हैं.’ भिलाई बख्शी सृजन पीठ के अध्यक्ष के रूप में जब प्रमोद जी भिलाई में थे तब उन्होंने भी डा. बलदेव के काम की सराहना की थी. प्रमोद जी और बलदेव जी दोनों रायगढ़ से जुड़े हुए भी थे और उनमें एक समानता यह दिखी थी कि उन दोनों की आलोचना में ‘क्लैरिटी’ (स्पष्टता) थी. दूसरी एक मज़ेदार समानता यह थी कि प्रमोद जी व्यंग्यकार शरद जोशी के मित्र रहे और अशोक वाजपेयी से दूरी बनाए रखे. बलदेव जी ने भी एक बार हम लोगों के बीच यह मज़ेदार टिप्पणी की थी कि ‘अशोक वाजपेयी के दो बड़े विरोधी थे एक शरद जोशी और दूसरा मैं.’

मंचीय कवियों पर भी टिप्पणी करते हुए उन्होंने कहा था कि ‘छत्तीसगढ़ के मंचीय कवियों में लक्ष्मण मस्तुरिया और रामेश्वर वैष्णव अपनी विशेष छाप छोड़ते हैं.’

बलदेव जी के साथ इस सरस बातचीत में रायगढ़ से बिलासपुर तक की यात्रा आसानी से कट गई थी. मैं और विनोदशंकर जी जे.डी. से उतरकर छत्तीसगढ़ एक्सप्रेस में बैठ गए और डा.बलदेव बिलासपुर ही उतर गए थे.

एक लम्बे अरसे बाद वर्ष २००९ में बलदेव जी से दूसरी मुलाकात तब हुई जब हमने दुर्ग में ‘समाज रत्न पतिराम साव सम्मान’ से अलंकृत करने के लिए उन्हें आमंत्रित किया था. दादा जी पतिराम साव के नाम से हम लोग हर साल एक साहित्यकार, एक शिक्षक या समाजसेवी को समारोह में सम्मान अलंकरण दिया करते थे. यह आयोजन लगभग पंद्रह वर्षों तक चला.

बलदेव जी हम लोगों से मिलने के उत्साह में एक दिन पहले आ गए थे. मैं उन्हें अपनी कार में लेने स्टेशन गया. वे रात पास में ही हमारे छोटे भाई संतोष के घर में रुके थे. दूसरे दिन सबेरे हमारे चाचा जी प्रो.ललित कुमार साव के घर वे नाश्ते पर आमंत्रित हुए. दोपहर का भोजन हमारे घर किया तब पत्नी चन्द्रा की पाक कला को उन्होंने न केवल सराहा बल्कि तन्मयता से स्वाद लेकर उसके बनाए भोजन को खाया भी.

दूसरे दिन दुर्ग के भव्य आयोजन में उनके साथ रायपुर के प्राध्यापक डा. सुखदेव साहू ‘सरस’ को भी सम्मानित किया गया था. सम्मान समारोह के मुख्य अतिथि छत्तीसगढ़ प्रदेश हिन्दी साहित्य सम्मलेन के अध्यक्ष ललित सुरजन थे और तत्कालीन विधायक ताम्रध्वज साहू ने अध्यक्षता की थी. सम्मान कार्यक्रम के बाद वे ललित जी के साथ ही रायपुर चले गए थे अपने साहित्यिक मित्र पुलिस महाधिवक्ता विश्वरंजन से मिलने. वही उनसे अंतिम मुलाकात थी.

फिर एक अरसे बाद फेसबुक में उनके पुत्र बसंत साव की यह पोस्ट दिखाई दी कि ‘डा.बलदेव नहीं रहे.’ इस तरह इस कला समीक्षक की मौन उपस्थिति उनकी मौन अनुपस्थिति में तब्दील हो गई थी. पर हमारी स्मृतियों में उनकी मध्यम कदकाठी, सांवले रंग, सिर के फुरफुरे बालों और आंखों में झांकने वाली सहज आत्मीयता के बीच उनकी वह मुस्कान अब भी खिल उठती है.

-    विनोद साव, मुक्तनगर, दुर्ग मो.9009884014 

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परिचय - विनोद साव

20 सितंबर 1955 को दुर्ग में जनमे विनोद साव समाजशास्त्र विषय में एम.ए.हैं. मूलतः व्यंग्य लिखने वाले विनोद साव उपन्यास, कहानियां और यात्रा वृतांत लिखकर भी चर्चा में हैं. उनकी रचनाएं हंस, पहल, लहक, अक्षरपर्व, ज्ञानोदय, वागर्थ और समकालीन भारतीय साहित्य में छपी हैं. उनके दो उपन्यास, चार व्यंग्य संग्रह, दो यात्रावृत्तांत, दो संस्मरण, कहानी संग्रह व छत्तीसगढ़ माध्यमिक शिक्षमंडल के लिए मुक्तिबोध और दाऊ मंदराजी साव पर चित्र पुस्तिकाओ सहित सत्रह पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं.  तीन पत्रिकाओं के विशेषांक उन पर निकले हैं. उन पर शोध हुए हैं. उन्हें कई पुरस्कार मिल चुके हैं. उपन्यास के लिए डा. नामवर सिंह और व्यंग्य के लिए श्रीलाल शुक्ल से पुरस्कृत हुए हैं. विगत दिनो छत्तीसगढ़ प्रदेश हिन्दी साहित्य सम्मलेन, रायपुर द्वारा उन्हे समग्र साहित्यिक योगदान के लिए ‘सप्तपर्णी सम्मान’ से नवाज़ा गया. उनकी यायावर प्रकृति उन्हें देश के अतिरिक्त विदेशों की यात्राओं में भी ले जाती हैं. वे भिलाई इस्पात संयंत्र में सहायक प्रबंधक(सी.एस.आर.) थे.

उनका पता है: मुक्तनगर, दुर्ग (छत्तीसगढ़) 491001,

नाम

 आलेख ,1, कविता ,1, कहानी ,1, व्यंग्य ,1,14 सितम्बर,7,14 september,6,15 अगस्त,4,2 अक्टूबर अक्तूबर,1,अंजनी श्रीवास्तव,1,अंजली काजल,1,अंजली देशपांडे,1,अंबिकादत्त व्यास,1,अखिलेश कुमार भारती,1,अखिलेश सोनी,1,अग्रसेन,1,अजय अरूण,1,अजय वर्मा,1,अजित वडनेरकर,1,अजीत प्रियदर्शी,1,अजीत भारती,1,अनंत वडघणे,1,अनन्त आलोक,1,अनमोल विचार,1,अनामिका,3,अनामी शरण बबल,1,अनिमेष कुमार गुप्ता,1,अनिल कुमार पारा,1,अनिल जनविजय,1,अनुज कुमार आचार्य,5,अनुज कुमार आचार्य बैजनाथ,1,अनुज खरे,1,अनुपम मिश्र,1,अनूप शुक्ल,14,अपर्णा शर्मा,6,अभिमन्यु,1,अभिषेक ओझा,1,अभिषेक कुमार अम्बर,1,अभिषेक मिश्र,1,अमरपाल सिंह आयुष्कर,2,अमरलाल हिंगोराणी,1,अमित शर्मा,3,अमित शुक्ल,1,अमिय बिन्दु,1,अमृता प्रीतम,1,अरविन्द कुमार खेड़े,5,अरूण देव,1,अरूण माहेश्वरी,1,अर्चना चतुर्वेदी,1,अर्चना वर्मा,2,अर्जुन सिंह नेगी,1,अविनाश त्रिपाठी,1,अशोक गौतम,3,अशोक जैन पोरवाल,14,अशोक शुक्ल,1,अश्विनी कुमार आलोक,1,आई बी अरोड़ा,1,आकांक्षा यादव,1,आचार्य बलवन्त,1,आचार्य शिवपूजन सहाय,1,आजादी,3,आत्मकथा,1,आदित्य प्रचंडिया,1,आनंद टहलरामाणी,1,आनन्द किरण,3,आर. के. नारायण,1,आरकॉम,1,आरती,1,आरिफा एविस,5,आलेख,4290,आलोक कुमार,3,आलोक कुमार सातपुते,1,आवश्यक सूचना!,1,आशीष कुमार त्रिवेदी,5,आशीष श्रीवास्तव,1,आशुतोष,1,आशुतोष शुक्ल,1,इंदु संचेतना,1,इन्दिरा वासवाणी,1,इन्द्रमणि उपाध्याय,1,इन्द्रेश कुमार,1,इलाहाबाद,2,ई-बुक,374,ईबुक,231,ईश्वरचन्द्र,1,उपन्यास,269,उपासना,1,उपासना बेहार,5,उमाशंकर सिंह परमार,1,उमेश चन्द्र सिरसवारी,2,उमेशचन्द्र सिरसवारी,1,उषा छाबड़ा,1,उषा रानी,1,ऋतुराज सिंह कौल,1,ऋषभचरण जैन,1,एम. एम. चन्द्रा,17,एस. एम. चन्द्रा,2,कथासरित्सागर,1,कर्ण,1,कला जगत,113,कलावंती सिंह,1,कल्पना कुलश्रेष्ठ,11,कवि,2,कविता,3240,कहानी,2361,कहानी संग्रह,247,काजल कुमार,7,कान्हा,1,कामिनी कामायनी,5,कार्टून,7,काशीनाथ सिंह,2,किताबी कोना,7,किरन सिंह,1,किशोरी लाल गोस्वामी,1,कुंवर प्रेमिल,1,कुबेर,7,कुमार करन मस्ताना,1,कुसुमलता सिंह,1,कृश्न चन्दर,6,कृष्ण,3,कृष्ण कुमार यादव,1,कृष्ण खटवाणी,1,कृष्ण जन्माष्टमी,5,के. पी. सक्सेना,1,केदारनाथ सिंह,1,कैलाश मंडलोई,3,कैलाश वानखेड़े,1,कैशलेस,1,कैस जौनपुरी,3,क़ैस जौनपुरी,1,कौशल किशोर श्रीवास्तव,1,खिमन मूलाणी,1,गंगा प्रसाद श्रीवास्तव,1,गंगाप्रसाद शर्मा गुणशेखर,1,ग़ज़लें,550,गजानंद प्रसाद देवांगन,2,गजेन्द्र नामदेव,1,गणि राजेन्द्र विजय,1,गणेश चतुर्थी,1,गणेश सिंह,4,गांधी जयंती,1,गिरधारी राम,4,गीत,3,गीता दुबे,1,गीता सिंह,1,गुंजन शर्मा,1,गुडविन मसीह,2,गुनो सामताणी,1,गुरदयाल सिंह,1,गोरख प्रभाकर काकडे,1,गोवर्धन यादव,1,गोविन्द वल्लभ पंत,1,गोविन्द सेन,5,चंद्रकला त्रिपाठी,1,चंद्रलेखा,1,चतुष्पदी,1,चन्द्रकिशोर जायसवाल,1,चन्द्रकुमार जैन,6,चाँद पत्रिका,1,चिकित्सा शिविर,1,चुटकुला,71,ज़कीया ज़ुबैरी,1,जगदीप सिंह दाँगी,1,जयचन्द प्रजापति कक्कूजी,2,जयश्री जाजू,4,जयश्री राय,1,जया जादवानी,1,जवाहरलाल कौल,1,जसबीर चावला,1,जावेद अनीस,8,जीवंत प्रसारण,141,जीवनी,1,जीशान हैदर जैदी,1,जुगलबंदी,5,जुनैद अंसारी,1,जैक लंडन,1,ज्ञान चतुर्वेदी,2,ज्योति अग्रवाल,1,टेकचंद,1,ठाकुर प्रसाद सिंह,1,तकनीक,32,तक्षक,1,तनूजा चौधरी,1,तरुण भटनागर,1,तरूण कु सोनी तन्वीर,1,ताराशंकर बंद्योपाध्याय,1,तीर्थ चांदवाणी,1,तुलसीराम,1,तेजेन्द्र शर्मा,2,तेवर,1,तेवरी,8,त्रिलोचन,8,दामोदर दत्त दीक्षित,1,दिनेश बैस,6,दिलबाग सिंह विर्क,1,दिलीप भाटिया,1,दिविक रमेश,1,दीपक आचार्य,48,दुर्गाष्टमी,1,देवी नागरानी,20,देवेन्द्र कुमार मिश्रा,2,देवेन्द्र पाठक महरूम,1,दोहे,1,धर्मेन्द्र निर्मल,2,धर्मेन्द्र राजमंगल,2,नइमत गुलची,1,नजीर नज़ीर अकबराबादी,1,नन्दलाल भारती,2,नरेंद्र शुक्ल,2,नरेन्द्र कुमार आर्य,1,नरेन्द्र कोहली,2,नरेन्‍द्रकुमार मेहता,9,नलिनी मिश्र,1,नवदुर्गा,1,नवरात्रि,1,नागार्जुन,1,नाटक,152,नामवर सिंह,1,निबंध,3,नियम,1,निर्मल गुप्ता,2,नीतू सुदीप्ति ‘नित्या’,1,नीरज खरे,1,नीलम महेंद्र,1,नीला प्रसाद,1,पंकज प्रखर,4,पंकज मित्र,2,पंकज शुक्ला,1,पंकज सुबीर,3,परसाई,1,परसाईं,1,परिहास,4,पल्लव,1,पल्लवी त्रिवेदी,2,पवन तिवारी,2,पाक कला,23,पाठकीय,62,पालगुम्मि पद्मराजू,1,पुनर्वसु जोशी,9,पूजा उपाध्याय,2,पोपटी हीरानंदाणी,1,पौराणिक,1,प्रज्ञा,1,प्रताप सहगल,1,प्रतिभा,1,प्रतिभा सक्सेना,1,प्रदीप कुमार,1,प्रदीप कुमार दाश दीपक,1,प्रदीप कुमार साह,11,प्रदोष मिश्र,1,प्रभात दुबे,1,प्रभु चौधरी,2,प्रमिला भारती,1,प्रमोद कुमार तिवारी,1,प्रमोद भार्गव,2,प्रमोद यादव,14,प्रवीण कुमार झा,1,प्रांजल धर,1,प्राची,367,प्रियंवद,2,प्रियदर्शन,1,प्रेम कहानी,1,प्रेम दिवस,2,प्रेम मंगल,1,फिक्र तौंसवी,1,फ्लेनरी ऑक्नर,1,बंग महिला,1,बंसी खूबचंदाणी,1,बकर पुराण,1,बजरंग बिहारी तिवारी,1,बरसाने लाल चतुर्वेदी,1,बलबीर दत्त,1,बलराज सिंह सिद्धू,1,बलूची,1,बसंत त्रिपाठी,2,बातचीत,2,बाल उपन्यास,6,बाल कथा,356,बाल कलम,26,बाल दिवस,4,बालकथा,80,बालकृष्ण भट्ट,1,बालगीत,20,बृज मोहन,2,बृजेन्द्र श्रीवास्तव उत्कर्ष,1,बेढब बनारसी,1,बैचलर्स किचन,1,बॉब डिलेन,1,भरत त्रिवेदी,1,भागवत रावत,1,भारत कालरा,1,भारत भूषण अग्रवाल,1,भारत यायावर,2,भावना राय,1,भावना शुक्ल,5,भीष्म साहनी,1,भूतनाथ,1,भूपेन्द्र कुमार दवे,1,मंजरी शुक्ला,2,मंजीत ठाकुर,1,मंजूर एहतेशाम,1,मंतव्य,1,मथुरा प्रसाद नवीन,1,मदन सोनी,1,मधु त्रिवेदी,2,मधु संधु,1,मधुर नज्मी,1,मधुरा प्रसाद नवीन,1,मधुरिमा प्रसाद,1,मधुरेश,1,मनीष कुमार सिंह,4,मनोज कुमार,6,मनोज कुमार झा,5,मनोज कुमार पांडेय,1,मनोज कुमार श्रीवास्तव,2,मनोज दास,1,ममता सिंह,2,मयंक चतुर्वेदी,1,महापर्व छठ,1,महाभारत,2,महावीर प्रसाद द्विवेदी,1,महाशिवरात्रि,1,महेंद्र भटनागर,3,महेन्द्र देवांगन माटी,1,महेश कटारे,1,महेश कुमार गोंड हीवेट,2,महेश सिंह,2,महेश हीवेट,1,मानसून,1,मार्कण्डेय,1,मिलन चौरसिया 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रचनाकार: साहित्य मनीषी डॉ.बलदेव जी की (26 सितम्बर 2019) प्रथम पुण्यतिथि पर विशेष
साहित्य मनीषी डॉ.बलदेव जी की (26 सितम्बर 2019) प्रथम पुण्यतिथि पर विशेष
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https://www.rachanakar.org/2019/09/26-2019.html
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