नाका - विश्व की पहली, यूनिकोडित हिंदी की सर्वाधिक प्रसारित, लोकप्रिय ई-पत्रिका. 

विविध विधाओं में से चुनकर पढ़ें -

* कहानी  || * उपन्यास || * हास्य-व्यंग्य  || * कविता  || * आलेख  || * लोककथा  || * लघुकथा  || * ग़ज़ल  || * संस्मरण  || * साहित्य समाचार  || * कला जगत  || * पाक कला  || * हास-परिहास  || * नाटक  || * बाल कथा  || * विज्ञान कथा  ||  * समीक्षा  ||

---***---

यहाँ की विशाल ऑनलाइन लाइब्रेरी में मनपसंद रचनाकार अथवा रचनाएँ खोज कर पढ़ें -

 नाका में प्रकाशनार्थ  रचनाएं इस पते पर ईमेल करें : rachanakar@gmail.com  रचनाकार के वाट्सएप्प नंबर 8989162192 (कृपया कॉल नहीं करें, कॉल रिसीव नहीं होगी, तथा इसका उपयोग केवल प्रकाशनार्थ रचना भेजने के लिए ही करें) पर भी वाट्सएप्प से रचनाएँ अथवा रचना पाठ के वीडियो प्रकाशनार्थ भेजे जा सकते हैं. अधिक जानकारी के लिए यह पृष्ठ [लिंक] देखें.

--

नाथ गोरखपुरी की कविताएँ

image

01" परिंदे"

परिंदे एक साथ बैठें हैं , ग़मों की चादर ओढ़ के
क्या मिला मानव बता ,तुम्हें  घर हमारा तोड़ के

रात को थक कर के हम,आते थे अपनी डाल पर
गुस्सा  नहीं, हँसी आ रही ,  हमें तो तेरी चाल पर

जिसनें तुझे जीवन दिया   , क्यों काट डाला है उसे
हर कदम पे साथ जो दिया, क्यों ना संभाला है उसे

हम तब भी देखो साथ थे, हम अब भी देखो साथ हैं
हाँ है नहीं बस आशियाना,पर साथ तो मेरे "नाथ" हैं

02
!! दोहे !!

मुहब्बता तुम ना करो, जग से रहियो दूर ।
इश्क का हर एक लम्हा,कर देता मजबूर ।।

पीर हृदय कि पीर है, मत रहियो अंजान ।
सारे कारज होइहें , इश्क नहीं आसान ।।

हर लमहा आसान है, जीता है इंसान।
इश्क का लम्हा वो घड़ि, पल पल निकले जान ।।

दिल की अभिलाषा रही, इश्क मुझे मिल जाए।
पहिले तड़पे इश्क कुफिर् , इश्क उसे तड़पाए ।।

रहो इश्क से दूर तो , मन दुनिया घबराय ।
नयन निरेखे मीत को, चैन हृदय को आय।।

03

अनंत ब्रह्माण्ड में ,
अनंत जीव जंतु हैं
अनंत पंचतत्व से ,
निमित्त रक्त तंतु है

रुधिर की एक बूंद में ,
अनंत सूक्ष्म कण मिले
अनंत जीव जोर था ,
तभी तो मानव तुम हिले


अनंत जीव जंतु से
तू बिल्कुल स्वतंत्र है
क्यों बुद्धि औ विवेक में
अलग ही तेरा तंत्र है

क्यों प्रकृति ने दिया तुझे
अलग ही एक मंत्र है
धरा पे आके क्यों रे जीव
तूं कर रहा षड्यंत्र है

बाह्य आवरण हटा,
तू चुप्पी साधे मौन है
बता अंह को त्याग के,
तू ब्रह्म जीव कौन है?

04

पढ़े खातिर पहिला पहिला स्कूले जब गीन
का बताईं कईसन कईसन गुरु जी मीलीन
एगो गोरा एगो काला
एगो गुरु जी मतवाला
अलगा अलगा सबका बुद्धि
केहू चाक कहे केहू दुद्धि
ऐ बी सी डी ,क ख ग घ केहू कहे गिन
का बताईं कईसे कईसे बीतल रहे दिन

नव बजे हम जाईं पढ़े
तबले गुरु जी रहें घरे
हमनी छः दिना जब जाईन
गुरुजि एक दिना भेटाईन
तब्बो नौ से बारे कुर्सी कब्बो छोड़ीबो नाही कीन
का बताईं कईसन कईसन गुरु जी मीलीन

दूरवें से उ मनई चिन्हें
ऊपर ताकें चिरई गिने
करें सासन कबो कड़ाई
कब्बो होखे ना पढ़ाई
पेपर पढ़े उहो उल्टा कहें छोटूआ अक्षर चीन्ह
का बताईं कईसन कईसन गुरु जी मीलीन

जवना दिने गुरु जी आवें
उ आपन चऊपाल लगावें
गुरु जी ओह दिन चढ़े बदरे
बइठे जे पतरकी मेडम पजरे
जब दुपहरिया हो जा तब्बे कुर्सी उ छोड़िन
का बताईं कईसन कईसन गुरु जी मीलीन

05
बारिश बूंदों सा बहते हैं
अपने दुख को खुद सहते हैं
दिल का अपने हाल बताएं ?
हम तुम बिन अब खुश रहते हैं

तेरी चिंता नहीं सताती
तेरी यादें नहीं रुलाती
हम अपनी आपाधापी में
हरदम ही तो गुम रहतें हैं
हम तुम बिन अब खुश रहते हैं

रात रहे या रहे सवेरा
पृथ्वी सूर्य का ना ले फेरा
जीवन से कोई चाह नहीं है
अब तेरी परवाह नही है
डंका बजा-बजा कहते हैं
हम तुम बिन अब खुश रहते हैं

नाथ गोरखपुरी

0 टिप्पणियाँ

रचनाओं पर आपकी बेबाक समीक्षा व अमूल्य टिप्पणियों के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद.

स्पैम टिप्पणियों (वायरस डाउनलोडर युक्त कड़ियों वाले) की रोकथाम हेतु टिप्पणियों का मॉडरेशन लागू है. अतः आपकी टिप्पणियों को यहाँ प्रकट होने में कुछ समय लग सकता है.