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(सांस्कृतिक धरोहर) :-‘‘छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक पावन धरा में सतनामधर्मियों के सात धाम’’ - डॉ.रामायणप्रसाद टण्डन (सतनामी)

सतनामियों के धर्मगुरू प्रातः स्मरणीय गुरू घासीदास बाबा जी की जन्म स्थली एवं तपोस्थली गिरौदपुरी धाम की फिजाओं से उठने वाले साहेब सतनाम! सतनाम की अनुगूंज समाज के अन्य धामों जैसे भण्डारपुरी धाम, तेलासी धाम, अमरधाम (चटुआपुरी), अगमधाम (खड़वापुरी), गुरू बालकदास धाम (कुंआ बोड़सरा), एवं गुरू आसकरणदास धाम (खपरीपुरी) में सुनाई पड़ती है, जहां गुरू घासीदासजी एवं उनके वंशज गुरूओं की गुरू गद्दी, गुरूद्वारा, समाधि जैतखाम मंदिर, तपोस्थली, चरणकुण्ड, अमृतकुण्ड, पंचकुंड, के अतिरिक्त धामों में निर्मित बाड़ों की भव्यता एवं उनके भीतर निर्मित गुरूगद्दी, हाथी, अस्तबल में उनका इतिहास छिपा हुआ है।

सतनाम धर्म के अनुयायी इन सातों धामों में न केवल दर्शन करने जाते हैं बल्कि गुरूओं के अलौकिक एवं चमत्कारिक कार्यो को जिज्ञासावश जाकर अपनी श्रद्धासुमन श्रीफल गुरू गद्दी में अर्पित करते हुए श्री गुरू प्रसाद पाकर परमशांति का अनुभव करते हैं।

समाज के साहित्यकारों ने सतनामियों के मात्र चार धार्मिक स्थल बताए हैं यथा-गिरौधपुरीधाम, भण्डारपुरीधाम, तेलासीधाम, और अमरदासधाम (चटुआपुरी), को रेखांकित कर गुरू बालकदास धाम (कुंआ बोड़सरा), एवं गुरू आसकरणदास धाम (खपरीपुरी) अगमधाम (खड़वापुरी), को अनदेखा कर दिया गया है, जबकि वास्तविक रूप से सतनामियों के सात धाम हैं। जिनके दर्शन करने प्रतिदिन श्रद्धालुओं का तांता लगा रहता है, यह धाम गुरूओं के अद्भुत कार्यो एवं अलौकिक स्मृतियों जैसी कई अनकही कहानियां बयां करती है।

1.गिरौधपुरीधामः-गिरौधपुरीधाम की प्रसिद्धि और महत्व छत्तीसगढ़ ही नहीं बल्कि पूरे भारत सहित विदेशों में भी इनका बड़ा महत्व है। छत्तीसगढ़ का सबसे बड़ा मेला लगने का भी इन्हें सर्वप्रथम दर्जा प्राप्त है। यह सतनामधर्मी सतनामियों के लिए बहुत ही पावन स्थल भी माना गया है। यहां फाल्गुन शुक्ल पक्ष के पंचमी से सप्तमीं तक तीन दिवसीय मेला गिरौदपुरी गांव से लेकर छाता पाहाड़ 10 किमी. की दूरी तक लाखों दर्शनार्थियों की वजह से दुपहिया एवं चार पहिया वाहनों का चलना भी दुश्कर होता है। ऐसे विशाल मेला का विहंगम एवं मनोमुग्धकारी दृश्य छत्तीसगढ़ के किसी भी मेले में देखने को नहीं मिलता। यह मेला सतनाम धर्म के अनुयायियों का अपने पूज्य गुरूओं के प्रति अटूट आस्था और श्रद्धाभक्ति, संगठन एवं शक्ति प्रदर्शन का अनूठा उदाहरण बन गया है। मेले की पवित्रता एवं दर्शनार्थियों की अटूट भक्तिभाव का अंदाजा इसी से लगता है कि सदियों से लगने वाले इस मेले में आज तक कोई अप्रिय घटना नहीं घटी है एवं किसी भी जीव जन्तुओं द्वारा दर्शनार्थियों को पीड़ा पहुंचाने की बात तो दूर चींटी काटने की घटना भी सुनने को नहीं मिली है। किन्तु सात मार्च को हुई भगदड़ में दो लोगों की मौत ने सतनाम धर्म से जुड़े लोगों की आस्था को आहत किया है। गुरू घासीदासली की जन्मस्थली एवं तपोभूमि गिरौदपुरीधाम सतनाम धर्म के अनुयायियों की आस्था, श्रद्धा एवं विश्वास का ऐसा संगम है, जहां मनुष्य दर्शनमात्र से ही परम शांति का अनुभव करता है। गिरौधपुरीधाम में बाबा की जन्मस्थली, मकान की गुरूगद्दी, तपोभूमि, गुरू गद्दी, चरणकुण्ड, अमृतकुण्ड, पंचकुण्ड, छाता पाहाड़, जोंकनदी, में हाथियों एवं शेरों की आकृति की पाषाण मूर्तियां दर्शनीय है।

2.भण्डारपुरीधामः-सतनाम धर्म के इतिहास में भण्डारपुरी को गुरू वंश को जन्म देने वाली जननी के रूप में जाना जाता है। बाबा गुरूघासीदास गिरौदपुरी छोड़ने के बाद भण्डारपुरी में अपने ज्येश्ठ पुत्र अमरदास का विवाह कर गुरू वंश परंपरा को आगे बढ़ाने कार्यो का निर्वहन किया। भण्डारपुरी में स्थापित गुरू गद्दी, प्रतापपुरहिन माता का सालों से बिछा हुआ पलंग, गुरू गद्दी की तिजौरी, भण्डारपुरी का बाड़ा, गुरूओं की समाधि आदि स्मृतियां अपने अंदर कई कहानियों को समेटे हुए हैं। गुरूघासीदास की पांचवी पीढ़ी के गद्दीदार धर्मगुरू बालदास साहेब जी हैं। धर्म गुरू बालदास के नेतृत्व में भण्डारपुरी में निर्माणाधीन गुरूद्वारा मंदिर की भव्यता देखते ही बनता है, कहते हैं धर्मगुरू बालदास को अद्भुत नेतृत्व क्षमता एवं साहस विरासत से मिली है। भण्डारपुरीधाम में दशहरा पर्व पर दो दिवसीय गुरूदर्शन मेला लगता है। इसके अतिरिक्त प्रतिदिन सैकड़ों दर्शनार्थी गुरू गद्दी पर श्रीफल अर्पित कर अपने को धन्य मानते हैं।

3.तेलासीधामः- गुरूघासीदास जी के चमत्कारी व्यक्तित्व के कारण तेलासी गांव के अन्य जाति के लोग भी सतनामी समाज में शामिल हो गए, कोढ़ से ग्रस्त लोगों को अमृत पिलाकर जीवनदान देना, अभिशप्त तालाब का शुद्धिकरण करना आदि जनश्रुतियां इस धाम से जुड़ी हुई हैं। गुरूघासीदास के ज्येष्ठ पुत्र गुरू अमरदास और द्वितीय पुत्र गुरूबालकदास एवं तीसरी पीढ़ी के वंशज गुरू अगरमनदास और गुरू अजबदास सपरिवार तेलासी बाड़ा में रहते थे। तेलासीबाड़ा को सेठ हस्तीमल लुक्कड़ के पास गिरवी रखे जाने से लेकर मुक्ति कराने तक की दिलचस्प कहानियां गुरू भक्ति की जिज्ञासा को प्रबल कर देती है। तेलासीबाड़ा के गुरूगद्दी कक्ष में बने सुरंग की जनश्रुतियों पर आधारित कहानी और भी अधिक दिलचस्प हैं। कहते हैं यह सुरंग का अंत गिरौदपुरी पर होता है।

तेलासीबाड़ा मुक्ति आंदोलन का नेतृत्व गुरू आसकरणदास जी ने किया। महंतों एवं जन सहयोग से यह संभव हो पाया। प्रतिवर्श तेलासीधाम में दो दिवसीय गुरूदर्शन मेला, दशहरा में आयोजित होता है। यहां एक दिवसीय गुरू बालकदास जयंती एवं मुक्ति का मेला लगता है। तेलासीबाड़ा की मुक्ति के बाद सतनामी समुदाय के लोगों में अपने आराध्य के प्रति आस्था और श्रद्धा और भी बढ़ गई है।

4.अमरधाम (चटुवापुरी):- शिवनाथ नदी के तट पर रमणीय एवं सुरम्य वातावरण के बीच स्थापित है, अमरधाम चटुवापुरी दुर्ग जिले के बेरला तहसील से 29 किमी. की दूरी पर स्थित है। जहां चटुवापुरीधाम में बाबागुरू घासीदासजी के ज्येष्ठ पुत्र गुरू गोसाई अमरदास जी ने मानव के दुख-दर्द के निवारण तथा उपदेश हेतु पढ़ाव डाला। वहां उन्होंने समाधि भी लगाई। जनश्रुतियों के अनुसार समाधि स्थल पर गुरू अमरदास को मृत समझकर लोंगों ने अंतिम संस्कार कर दिया। गुरू गोसाई अमरदास बचपन से ही तेजस्वी थे। कहा जाता है कि इसे गुरू घासीदास के सदृश्य चमत्कारिक एवं अलौकिक शक्तियां प्राप्त थीं। बाल्यावस्था से ही आध्यात्मिक एवं वैराग्यमय जीवन यापन करते थे। अपनी विवाहित पत्नी प्रतापपुरहिन माता से पृथक रहकर समाज को सत्य का संदेश देते रहे। अमरधाम चटुवापुरी में हरिनभट्ठा के गौटिया महंत आधारदास ने मंदिर का निर्माण कर गुरू गद्दी स्थापित किया। वहां पर श्री भुजबल महंत के निर्देशन में तीन दिवसीय मेला लगना प्रारंभ हुआ। सतनाम धर्म के अनुयायी सतनामी जन आज भी मृत्यु संस्कार के बाद अस्थि को अमरधाम से लगे शिवनाथ नदी में विसर्जित कर अपनी श्रद्धा भक्ति का अनूठा नमूना पेश कर रहे हैं।

5.अगमधाम (खड़ुवापुरी):- छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर से 50 किमी. दूर बिलासपुर रोड पर सिमगा से तीन किलोमीटर की दूरी पर खड़ुवापुरी नामक ग्राम में अगमधाम स्थित है। इस धाम को सामाजिक उत्थान एवं समाज को राजनीतिक पहचान देने वाली जननी माना जाता है। जहां गुरू अगमदास, मिनीमाता, करूणामाता एवं विजय गुरू की अहम् भूमिका से सारा समाज नतमस्तक है। इस धाम की मिट्टी में सामाजिक राजनीतिक एवं सांस्कृतिक सोच की महक है। छत्तीसगढ़ की प्रथम महिला सांसद एवं समाज की गुरूमाता मिनीमाता का संपूर्ण जीवन काल जनकल्याण, सामाजिक उत्थान एवं समाज के बेहतर जीवन की सोच अगमधाम की मिट्टी की महक में व्याप्त है। वर्तमान में धर्मगुरू विजय कुमार गुरू इस धाम के गद्दीनशीन है जो अन्त्याव्यवसायी विकास निगम के अध्यक्ष पद पर रहते हुए समाज को बेहतर दिशा निर्देश कर रहे हैं। इन्हीं के परिवार से गुरू अगमदास के पौत्र एवं विजयगुरू के सुपुत्र आज युवा और उर्जावान गुरू रूद्रकुमार जी मंत्री मडल में शामिल छत्तीसगढ़ राज्य के केबिनेट मंत्री लोक स्वास्थ्य यांत्रिकी एवं ग्रामोद्योग विकास के रूप में सरकार और सतनामी समाज का सक्रियता के साथ निर्वहन कर रहे हैं।

6.गुरू बालकदास धाम (कुंआ बोड़सरा):- सतनामियों के सात धामों में से एक है-गुरू बालकदास धाम कुंआ बोड़सरा बिलासपुर जिले के बिल्हा तहसील से 29 किमी दूर ग्राम कुंआबोड़सरा में स्थित है। यहां चार एकड़ के परकोटे पर बना बाड़ा विगत 4 सालों से पुलिस के पहरे में है। जिससे बाड़े के भीतर स्थापित गुरू गद्दी के दर्शन से लाखों श्रद्धालु वंचित हो जाते हैं। बाड़ा मुक्ति आंदोलन समिति के अध्यक्ष धर्मगुरू बालदास साहेब के नेतृत्व में सतनामी समाज धैर्यपूर्वक अपनी धर्मस्थली के मुक्त होने का इंतजार कर रहे हैं। जो दुर्गाप्रसाद और अखिलेश बाजपेयी बंधुओं के कब्जे में है। इस धाम में गुरू बालकदास के 178 एकड़ खेत भी है, जो बाजपेयी बंधुओं के कब्जे में है, जो पड़त भूमि के रूप में तब्दील होती जा रही है। ग्रामवासी बृजलाल चतुर्वेदी, पूर्व सरपंच धनसाय बघेल, उप सरपंच अगरमन जोशी एवं जामदास का कहना है कि सतनामी समाज के प्रथम राजा गुरूबालकदास के राजसी ठाट-बाठ के अवशेश बाड़ा में आज भी देखे जा सकते हैं। इस धाम में चैत्र शुक्ल पक्ष के पंचमी से सप्तमी तक तीन दिवसीय गुरू दर्शन मेला आयोजित होती है। यहां के अमृत कुंड से अविरल प्रवाहित जलधारा कभी समाप्त नहीं होती ह,ै इसके पवित्र जल से अपशकुन भी टल जाते हैं। बाड़े से दस फीट दूर स्थित तालाब में जैत खाम का ठूंठ पाया जाना भी उसे सामाजिक पूंजी निरूपित करती है। यह सामाजिक पूंजी ही है जिसे छल-बल और अन्याय पूर्ण तरीके से बाजपेयी परिवार अपने कब्जे में कर लिया है। लेकिन उस बाजपेयी परिवार को एक दिन छोड़ना ही पडे़गा। सतनामियों के सीधे-सादेपन का फायदा उठाकर एक निरीह और भिखारी ब्राहमण सतनामी गुरूओं के तलुए चाटते थे और उन्हीं के टुकड़ों पर पलते थे। वही बाजपेयी ब्राम्हण परिवार कालांतर में गुरू की भूमि पर अजगर की तरह कुण्डली मारकर बैठ गया है, और कह रहा है कि यह बाड़ा मेरे स्वयं के नाम पर है। उसे यह नहीं मालूम कि गलत तरीके से अपने नाम किया गया सम्पति एक दिन सतनामी और सतनाम धर्मियों को देना ही पड़ेगा। हम देखते है कि सतनामियों की धरती और उनके सम्पत्ति को इन दुष्टों के द्वारा छल-बल एवं कपटपूर्वक,षड्यंत्र के तहत हथियाने का कार्य कल भी होता रहा है, और आज भी गलत तरीके से कब्जा कर लिया जाता है। और अब अगर सतनामी समाज सचेत और सजग नहीं हुआ तो आने वाले समय में भी हमारे धार्मिक स्थल गुरूओं के धरोहर को लूटते ही रहेंगे। अब हम सतनाम धर्मी किसी भी हालात में अपनी सांस्कृतिक धरोहरों को लूटने नहीं देंगे। क्योंकि यह सतनाम धर्मानुयायियों की सांस्कृतिक धरोहर है। सतनामी अपने गुरू की पूंजी और धरोहर जो कि सतनामी समाज की आस्था एवं श्रद्धा से जुड़ी हुई है। जिसे किसी भी हालात में उसे छोड़ा नहीं जा सकता है।

7.गुरू आसकरण धाम (खपरीपुरी):- रायपुर से बलौदाबाजार रोड पर भैंसा गांव से डेढ़ किलोमीटर की दूरी पर गुरू घासीदास की छठीं पीढ़ी के सर्वोच्च गुरू आसकरणदास के देह त्याग करने के बाद उनके ज्येश्ठ पुत्र गुरू आसामदास गद्दीनशीन हैं। इसी तरह गुरू आसकरण के भाई गुरू संतनदास के देह त्यागने के बाद गुरू मुक्तिदासजी गद्दीदार हैं। गुरू आसकरणदास एवं गुरू संतनदास के आवास में स्थापित गुरू गद्दी एवं गुरू अतिबलदास (डंडाफटकार), गुरू प्रकाशदास, गुरू उबारनदास एवं गुरू आसकरणदास की समाधि स्थल का दर्शन कर दर्शनार्थी गुरू दर्शन का लाभ प्रतिवर्ष दशहरा पर्व में आयोजित एक दिवसीय मेले में करते हैं। सातों धामों की अपनी विशिष्टता को हम इन पंक्तियों के माध्यम से उल्लेखित कर सकते हैं:- ‘‘आओ ऐसा कर गुजरे हम, विश्व करे जिसका अभिनंदन, एक धर्म सतनाम धर्म हो, कहीं न हो करूणा के क्रंदन।’’

जीर्णोद्धार के इंतजार में गुरू घासीदास की जन्स्थलीः- सतनाम धर्म के संस्थापक एवं सतनाम पंथ के प्रणेता परम पूज्य संत गुरू घासीदस बाबाजी की जन्म स्थली गिरौधपुरी धाम का वह मकान ढाई सौ से भी अधिक साल से उपेक्षित सा है, जहां उनका जन्म हुआ था। स्वतंत्रता के 70 साल बीत गए, मध्यप्रदेश से अब छत्तीसगढ़ राज्य भी बन गया। इस दौरान कई सरकार भी आई और गई हो गई, पर सतनाम के सहारे सामान्य नागरिकों को संतत्व की शिक्षा देने वाले संत बाबा गुरू घासीदास का नेरूवा (नाभिकमल,नाल) गड़ा जीर्ण-शीर्ण मकान जीर्णोद्धार की बाट जोह रहा है। गिरौदपुरी धाम में मेले तो हर साल लगते हैं, दर्शनार्थियों की संख्या सैकड़ों से अब लाखों में पहुंच गई है किंतु किसी ने इस दिशा में चिंतन नहीं किया कि बाबा का जन्म स्थान को उपेक्षा से बचाएं, सतनामियों की तीर्थ स्थल गिरौधपुरी पर गुरूगद्दी और जैतखाम की पूजा अर्चना करने वाले पुजारी भरतलाल रात्रे का कहना है कि मेले और सामान्य दिनों में श्रद्धालु आते तो हैं, पर जीर्णोद्धार के बारे में कोई कुछ नहीं कहते। बड़े-बड़े मंत्री, अफसर और जिम्मेदार लोग भी आते रहते हैं लेकिन बाबा के जन्म स्थान का नमन कर वापस चले जाना ही अपने कर्तव्य की इतिश्री मान लेते हैं। शायद यह पवित्र स्थान सतनामी समुदाय के भोले-भाले और सीधे-साधे लोगों की निष्क्रियता का भी परिणाम हो। अब आज गुरू घासीदासजी के ही वंश परंपरा में पांचवी पीढ़ी के गुरू रूद्रकुमारजी केबिनेट मत्री में शामिल हैं और पावरफुल मंत्री भी हैं। अगर वो इस तरफ जरा ध्यान दें तो गुरू बाबा घासीदास जी की जन्म स्थली को भव्य भवन में तब्दील किया जा सकता है। ताकि लोग दूर-दूर से आकर दर्शन लाभ लेकर गद्गद हो सकते है। और इससे सतनामियों की शान-बान और स्वाभिमान में इज़ाफा भी हो सकता है।

गिरौधपुरीधाम की आहत हुई आस्थाः- गुरू घासीदासजी की तपोभूमि गिरौदपुरीधाम में सात मार्च 2006 को हुई हिंसक वारदात ने सतनामी समाज को झकझोर कर रख दिया है। इसे न केवल सतनाम पंथ से जुड़े लोगों की आस्था आहत हुई है बल्कि अहिंसा पर विश्वास करने वाले और गुरू घासीदास जी के बताए मार्ग पर जीवन यापन करने वाले लाखों श्रद्धालुओं की भावनाओं पर कुठाराघात हुआ है। सन् 1935 से निरंतर लग रहे इस तीन दिवसीय मेले के दौरान कभी कोई हिंसक घटनाएं नहीं घटी थी। लेकिन इस बार अहिंसा के तीर्थ पर हिंसा का दाग लग गया। यह घटना तब घटी जब प्रदेश के मुख्यमंत्री डॉ.रमनसिंह मेला स्थल से राजधानी रायपुर के लिए रवाना हुए थे। मुख्यमंत्री के जाने के बाद बिहार और झारखण्ड के लोगों द्वारा अबोध बच्चों को बोरों में भरकर ले जाने की अफवाह फैलाई गई। इस अफवाह ने मेला स्थल पर मौजूद श्रद्धालुओं के धैर्य को तोड़ दिया, प्रत्यक्षदर्शियों के मुताबिक घटना को अंजाम देने वाले लोग लघु व्यापारी थे, जो श्विरीनारायण मेले की समाप्ति के बाद यहां अपना व्यवसाय करने आए थे।

बिहार व झारखण्ड से आए इन व्यापारियों की दुकाने लूट ली गई। कईयों को आग में झोंक दिया गया। इस हादसे में महादेव और बबलू केसरी की मौत हो गई। पुलिस ने क्षत-विक्षत शव भी बरामद किया। वहां पर उपस्थित श्रद्धालुओं ने इसे सतनामी समाज के अन्तर्द्वन्द और राजनीतिक कटुता का परिणाम कहा है। बहरहाल, घटना के बाद समाज से जुड़े लोगों, मेला आयोजकों ने और आस्थावान नागरिकों ने शासन-प्रशासन से इसकी त्वरित जांच करने की मांग की है। ताकि छत्तीसगढ़ के लाखों लोगों की आस्था का केन्द्र बन चुके गिरौदपुरीधाम को रक्तरंजित धरती न कह सके।

अंत्यावसायी विकास निगम छत्तीसगढ़ के अध्यक्ष एवं सतनामी समाज के धर्मगुरू विजय गुरू ने कहा-‘‘ मेलास्थल पर चिन्हित लोगों को मारना किसी षड्यंत्र का हिस्सा जान पड़ता है। बच्चों को बोरे में भरकर ले जाने की अफवाह फैलाई गई। मुख्यमंत्री को जांच का आग्रह किया गया है। यह हादसा समाज के वैचारिक मतभेद का हिस्सा कतई नहीं है।’’ वहीं सतनामी समाज के दूसरे धर्मगुरू बालदास साहेब का कहना है कि-‘‘ सतनामी समाज के इतिहास को कलंकित करने की साजिश में किसी न किसी जिम्मेदार लोगों का हाथ हो सकता है। इस हादसे ने न केवल सतनामी समाज के लोगों की आस्था को ठेस पहुंचायी है अहिंसा की इस पवित्र धरती पर हिंसा का बीजारोपण करने का कुत्सित प्रयास किया है। इसकी निष्पक्ष जांच की जानी चाहिए।’’

प्रस्तुतकर्ताः-डॉ.रामायणप्रसाद टण्डन (सतनामी)

90,आदर्शनगर कांकेर जिला-कांकेर, छत्तीसगढ़

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