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समीक्षा - वर्तमान वास्तविकता का दस्तावेज-" पापा बिजी हैं " वीरेन्द्र सरल

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साहित्य हर युग मे सामाजिक संचेतना का वाहक रहा है। भाषा की उतपत्ति के साथ ही साहित्य की सरिता अनवरत और अविराम प्रवाहित होती आ रही है भले ही प्रारम्भ में इसका स्वरूप मौखिक ही रहा हो। साहित्य की सरिता वैचारिकता की भूमि को अभिसिंचित कर सदविचारों को पुष्पित औऱ पल्लवित कर रही है। भले ही विभिन्न साहित्यिक मठों और गुटों के अपशिष्ट विचारों के कारण अब यह सरिता भी प्रदूषण मुक्त नहीं रही पर कहीं न कहीं आज भी इसमें स्वच्छ निर्झरणी का स्रोत और निर्मल धारा शेष है जो इसकी प्रवित्रता को बनाये हुए है। आज भी उत्कृष्ट साहित्य का उतना ही महत्व है। जितना इसे समाज का दर्पण कहलाते हुए मिला था।

आज के व्यस्तम समय में साहित्य की सर्वाधिक लोकप्रिय विधा है लघु कथा। लघु कथा की सर्जना सागर मंथन कर अमृत निकालने जैसा ही श्रम साध्य है। अब यह बात अलग है कि पाठक अमृत का रसपान तो करता है पर रचनाकार के उस श्रम को विस्मृत कर देता है। जिससे यह अमृत निकला है। डॉ शैल चन्द्रा वैचारिक मंथन कर ऐसे ही अमृत निकालने में सिद्धहस्त है। सर्जक स्वयं अपनी सर्जना के लिए किये गए श्रम को नजरअंदाज करता है क्योंकि उसका लक्ष्य समाज को अमृत पान कराना होता है न की अपनी उपलब्धियां गिनाना। डॉ शैल चन्द्रा की गिनती ऐसे ही सर्जकों में होती है।

अयन प्रकाशन दिल्ली से प्रकाशित उनकी नई कृति पापा बिजी हैं। वर्तमान पारिवारिक परिवेश का जीवंत दस्तावेज है । इस लघुकथा संग्रह के शीर्षक लघुकथा हमारी आंखे खोलने के लिए पर्याप्त है। आज दौलत के पीछे भागती हमारी जिंदगी में दूसरों के लिए तो छोड़िए अपने प्राणप्रिय बच्चों के लिए भी समय नहीं है। यही बच्चे बड़े होकर जब व्यस्त हो जाते हैं तो हम उन पर अपनी उपेक्षा का , संस्कारहीनता का , आलस्यता और अन्यान्य तरह तरह का दोषारोपण करते हैं। जब हमने उन्हें उनके बचपन में समय ही नही दिया है, कुछ सिखाया ही नहीं है तो फिर उनसे सम्मान और सेवा की अपेक्षा क्यों? यह केवल प्रश्न चिन्ह नहीं बल्कि यक्ष प्रश्न है।

संग्रह में समाहित हर लघु कथा उद्देश्यपूर्ण है। जिसमे जीवन और जगत के विविध रंग समाहित है। सामाजिक, पारिवारिक, राजनैतिक और शैक्षणिक वातावरण की खबर लेते हुए लघुकथाकार ने अपनी लेखनी के माध्यम से सावधन रहकर जागते रहो का सन्देश देने में सफलता प्राप्त की है। इस छोटी समीक्षा में संग्रह के सभी कथाओं की चर्चा सम्भव नहीं है। इसका महत्व तो इसे पढ़कर ही समझा जा सकता है। पढ़कर ही इनमें समाहित संदेशों को आत्मसात किया जा सकता है। डॉ शैल चन्द्रा को वैचारिकता के असीम सागर के अतल गहराई से ज्ञान के बहुमूल्य मोती चुन चुन कर संग्रह में समाहित करने के लिए हार्दिक बधाई एवम अशेष शुभकानाएं देता हूँ।

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