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सुनील कुमार की कविताएँ

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राह कांटों की चलना होगा—

खुशियों की तलाश में राह कांटों की चलना होगा,

तप कर सोने की तरह निखरना होगा।

देखे हैं जो तुमने ख्वाब सुनहरे,

सच उनको करना होगा,

दिन हो चाहे रात,

तुमको निरंतर चलना होगा।

निकलोगे जब तुम घर से बाहर

खुशियों की तलाश में,

ये दुनिया तुमको बहुत कुछ सुनाएगी,

इतना कि आंखें तुम्हारी नम हो जाएंगी,

पर अश्रुधारा तुमको नहीं बहाना होगा,

मंजिल की ओर कदम बढ़ाना होगा।

सफलता जिस दिन तुम्हारे हाथ आएगी,

यह दुनिया तेरे कदमों में झुक जाएगी,

खुशियों पर राज तुम्हारा होगा,

सुंदर कल वो तुम्हारा होगा।।

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बढ़ते रहो निरंतर पथ पर.....

बढ़ते रहो निरंतर जीवन पथ पर,

अडिग रहे संकल्प तुम्हारा।

जाड़ा गर्मी बरसात न देखो,

दिखे तुम्हें सिर्फ लक्ष्य तुम्हारा।

कीर्ति तुम्हारी अजर अमर हो,

ऐसा हो हर कर्म तुम्हारा।

चमको ऐसे तुम नील गगन में,

चमके जैसे ध्रुव तारा,

करुणा मैं हो हृदय तुम्हारा,

बनो निर्बलों का तुम सहारा।

युग परिवर्तन के सूत्रधार बनो तुम,

चहुदिश हो गुणगान तुम्हारा।

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जीवन पथ.....

जीवन पथ है अंजाना,

मंजिल तक हमको है जाना।

दिल में हैं जो अरमान मेरे,

पूरा करके है दिखलाना।

राह में मुश्किलें अनेक आएंगी,

कर्तव्य पथ से हमें डिगाएंगी,

पर राह गलत हमको नहीं जाना,

सपने सच कर है दिखलाना,

मंजिल तक हमको है जाना।।

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जीवन का न कोई ठिकाना.....

जीवन का न कोई ठिकाना,

जाने कहां हमें है जाना।

संग अपने सांसों का अनमोल खजाना,

लुट जाए किस क्षण ये कोई न जाना,

छूट जाए साथ किस पल किसका,

राज नहीं कोई ये जाना,

जीवन का न कोई ठिकाना,

जाने कहां हमें है जाना।

डगर जीवन की किधर मुड़ जाए,

वक्त का परिंदा कब किसे कहां ले जाए,

बात समझ ये किसी के न आए।

चलते चलते इस दुनिया से,

पाक चुनरिया कहीं मैली न हो जाए,

बात सदा ये दिल में बिठाए,

सोच समझकर पग बढ़ाए।

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मैली मत कर काया अपनी....

मैली मत कर काया अपनी,

दूर सफर पर जाना है।

धन दौलत और महल अटरिया

सब यहीं रह जाना है।

सत्कर्म ही है पूंजी तेरी,

यही तेरा खजाना है,

भाई बंधु और कुटुंब कबीला

कोई नहीं संग जाना है,

मैली मत कर काया अपनी

दूर सफर पर जाना है।

दिन-रात भागे तू माया के पीछे,

इसका न कोई ठौर ठिकाना है,

पद प्रतिष्ठा और माल खजाना

सब यहीं रह जाना है।

काम कोई ऐसा न कर बंदे,

अंत समय पड़े पछताना है,

मैली मत कर काया अपनी,

दूर सफर पर जाना है।।

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रैन बसेरा ...

क्या तेरा क्या मेरा है,

दुनिया रैन बसेरा है।

माया ने ऐसा पांव पसेरा है,

छाया चारों ओर अंधेरा है।

असीमित इच्छाओं ने

ऐसा जाल बिखेरा है,

कहीं खुशी कहीं गम का डेरा है,

दुनिया रैन बसेरा है।

स्वार्थ के सब मीत यहां,

वक्त पड़े मुंह फेरा है,

दुनिया रैन बसेरा है,

क्या तेरा क्या मेरा है ।

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दिल से दिल की दूरी है....

दिल से दिल की दूरी है,

न जाने कैसी मजबूरी है।

राह चलते एक रोज

हुई थी उनसे मुलाकात,

मुलाकात वो आज भी अधूरी है,

दिल से दिल की दूरी है,

न जाने कैसी मजबूरी है।

सोचा था सीने से लगाएंगे

एक रोज हम उनको,

चाहत मेरी आज भी वोअधूरी है,

दिल से दिल की दूरी है,

न जाने कैसी मजबूरी है।

बहुत सोचा तो राज समझ ये आया,

शायद उनकी भी कोई मजबूरी है,

तभी तो चाहत मेरी आज भी अधूरी है,

दिल से दिल की दूरी है।

दिल की हर ख्वाहिश

कभी होती नहीं पूरी है,

तभी तो चाहतें बहुत सी

आज भी अधूरी हैं।

दिल से दिल की दूरी है,

न जाने कैसी मजबूरी है।।

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घर अपना सजाए हैं ....

चाहत से अपनी, घर अपना हम सजाए हैं,

न जाने क्यों लोग दिल अपना जलाए हैं।

मीत अपना जिनको हम बनाए हैं,

खंजर पीठ पीछे वही छिपाएं हैं।

बड़ा मुश्किल है यहां अपना पराया परखना,

एक चेहरे पर कई चेहरे यहां लोग लगाएं हैं।

सूरत जिनकी हम दिल में बसाए हैं ,

आज वही हमसे गैरों की तरह पेश आए हैं।

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परवरिश.....

परवरिश बच्चों की होती आसान नहीं,

कच्ची मिट्टी से मूर्ति गढ़ना सहज काम नहीं।

नन्हे से बीज को विशाल वृक्ष बनाना आसान नहीं,

परवरिश बच्चों की होती आसान नहीं।

गढ़ने को मिट्टी से मनोवांछित मूर्ति,

मिट्टी को चाक पर चढ़ाना पड़ता है,

धीरे-धीरे हाथों से उसको सहलाना पड़ता है।

बीज संस्कार के बोने को बच्चों में,

कभी कठोर तो कभी कोमल बन जाना पड़ता है,

भेद सही गलत का उनको बतलाना पड़ता है।

राह जीवन की दिखलाना सहज काम नहीं,

परवरिश बच्चों की होती आसान नहीं।।

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दीप पर्व मनाना तुम—

दीप पर्व अबकी जब मनाना तुम,

एक दीप स्नेह का भी जलाना तुम।

घर आंगन दीपों से सजाना तुम,

पर एक दीप अपनत्व का भी जलाना तुम।

भोग लक्ष्मी गणेश को बेशक लगाना तुम,

पर भूख किसी भूखे की भी मिटाना तुम।

खुशियां सिया राम घर वापसी की मनाना तुम,

पर वनवास किसी और को न कराना तुम।

दीप खुशियों के बेशक जलाना तुम,

पर दर्द भी किसी का मिटाना तुम।

राग द्वेष सभी मिटाना तुम,

एक दीप स्नेह का भी जलाना तुम।

दीप पर्व अबकी जब मनाना तुम।


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प्रस्तुति- सुनील कुमार,

पता ग्राम फुटहा कुआं,

निकट पुलिस लाइन,

जिला बहराइच,

उत्तर प्रदेश।

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