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समीक्षा - आज़ादी का जश्न

आजादी का जश्न, जेहन में यह शब्द आते ही ऐसा महसूस होता है मानों स्वतंत्रता के बाद देश खुशहाल हो गया हो, आम आदमी की गरीबी मिट गई हो, समाजवाद का साम्राज्य आ गया हो और देश का अंतिम आदमी विकास के शिखर पर बैठ गया हो। पर हकीकत तो यह है कि देश में अभी कई लोग ऐसे हैं जिन्हें भरपेट दो जून की रोटी तक नसीब नहीं होती। तन ढकने को कपड़े तक मयस्सर नहीं है। विकास किस चिड़िया का नाम है उन्हें तो यह भी पता नहीं है। वह आज भी अन्याय और शोषण का शिकार है। वह न्याय पाने के लिए न्याय देवता के दरवाजे पर सिर पटकते हुए दर दर भटक रहा है पर न्याय देवता के दर्शन ही नहीं हो रहे हैं। न्याय की आशा में पूरी जिंदगी बीती जा रही है, न्याय का राह देखते देखते उनकी आंखें पथरा गई है और विश्वास दम तोड़ने लगा है। आम आदमी आश्वासनों के झूले में झूलते हुए भाषण और नारों से तृप्ति महसूस करने को अभिशप्त है। आज भी कई गांव ऐसे है जहां विकास की किरणें नहीं पहुंच पाई है, कई गांव निराशा के गहन तिमिर में डूबे हुए हैं । क्या देश की स्वतंत्रता के लिए अपना सब कुछ कुर्बान कर देने वाले शहीदों ने यही स्वप्न देखा था?

   फिर आजादी का जश्न मनाने वाले लोग कौन हैं? क्या कुर्सियों पर चिपके हुए चंद लोग य गरीबों का हक मार कर उनका गला दबाकर अपनी तिजोरी भरने वाले कुछ धनकुबेर य बेईमानी और भृष्टाचार कर अकूत सम्पत्ति के मालिक बने बैठे मुट्ठी भर रिश्वतखोर? यह यक्ष प्रश्न आज भी हमारे सामने खड़े होकर उत्तर की प्रतीक्षा कर रहा है।

     और इन्हीं प्रश्नों के उत्तर ढूंढने के लिए देश के विचारवान लोग, बौद्धिक जगत अपनी प्रखर मेघा के माध्यम से सर्जना कर आम आदमी की पीड़ा को स्वर देकर मुखरित करने के लिए कलम की मशाल लिए निराशा के अंधेरों में आशा की किरणें ढूंढ रहे हैं और  ढूंढे भी  क्यों नहीं आखिर आम आदमी की पीड़ा को अभिव्यक्त करने की महती जिम्मेदारी तो कलम के सिपाहियों पर ही होती है।

  राजशेखर चौबे जी कलम के एक ऐसे ही सिपाही हैं जो अब तक अपनी अनुभवी आंखों से जो देखा, सचेत मस्तिष्क से जो चिंतन किया और संवेदनशील हृदय से जो महसूस किया उसे अपने व्यंग्य संग्रह आजादी के जश्न के माध्यम से समाज के सामने रखा है। लगभग बहत्तर पृष्ठ में संग्रहित लगभग उन्नीस व्यंग्य  विभिन्न विसंगतियों की ओर समाज का ध्यान आकृष्ट करता है। संग्रह के अधिकांश व्यंग्य निबंधात्मक शैली में लिखे गए हैं और उनके साथ फुट नोट शैली का सुन्दर समायोजन किया गया है। वैसे तो व्यंग्य में ज्यादातर कच्चा माल राजनीति से ही मिलता है। इसलिए ज्यादातर व्यंग्यकारों के व्यंग्य के विषय राजनीति प्रेरित ही होते हैं और हों भी क्यों नहीं आज राजनीति हमारे जीवन को हर तरह से नियन्त्रित करती है। छद्म नैतिकता और मूल्य हीनता का संकट भी सबसे ज्यादा राजनीति में ही है। पर राजशेखर चौबे जी ने राजनीति के अतिरिक्त सामाजिक, धार्मिक और रूढ़ि एवम कुरीतियों को भी अपने व्यंग्य का केंद्रीय विषय बनाया है। आजकल मूल्यहीनता का संकट केवल राजनीति में ही नहीं बल्कि जीवन के हर क्षेत्र में  व्याप्त है।

   संग्रह के ज्योतिष की कुंजी, धवल  बाबा का अभ्युदय, प्रवचन का लाभ जैसे व्यंग्य जहां धार्मिक विसंगतियों पर प्रहार करते हैं तो जुमलों के अर्थ, भृष्टाचार उन्मूलन, चमचागिरी एक शाश्वत सत्य , भाई भतीजावाद पर परिचर्चा राजनीतिक विसंगतियों पर। सबसे बड़ा त्यौहार छत्तीसगढ़ राज्योत्सव शासकीय फिजूलखर्ची पर चोट करता है तो बधाइयों एवम शुभकामनाओं का मारा सामाजिक ढोंग पर।

   भाई राजशेखर चौबे जी के व्यंगय पैने एवम नुकीले हैं यद्यपि यह उनका पहला व्यंग्य संग्रह है फिर भी पर्याप्त परिपक्वता और पठनीयता लिए हुए है। उम्मीद है भविष्य में उनकी कलम के तरकश से और भी ज्यादा धारदार और मारक व्यंग्य के वाण निकलेंगे जो समाज को सजग और सचेत करने में सफल होंगे। संग्रह के व्यंग्यों का रसास्वादन तो पढ़कर ही किया जा सकता है। सफल और पठनीय व्यंग्य संग्रह के लिए राजशेखर चौबे जी को मेरी हार्दिक बधाई।

वीरेन्द्र सरल

ग्राम  बोडरा ( मगरलोड)

पोस्ट   भोथीडीह

व्हाया  मगरलोड

जिला  धमतरी, छत्तीसगढ़।

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