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‘‘संत गुरू घासीदास जी के जीवन-दर्शन, जीवन-सतचरित्र एवं उनका सतनाम धर्म’’

‘‘संत गुरू घासीदास जी के जीवन-दर्शन, जीवन-सतचरित्र एवं उनका सतनाम धर्म’’

(गुरू घासीदास जयंती 18 दिसम्बर 2019 के लिए विशेष लेख)

मध्यप्रदेश के पूर्वी भाग में छत्तीसगढ़ स्थित है। इस भूमि में अनेक संत पैदा हुए, गुरू घासीदासजी इसी श्रृंखला में पैदा हुए एक प्रकाशमान मणि के रूप में छत्तीसगढ़ की पावन भूमि रायपुर जिले के गिरौदपुरी ग्राम में आज से 267 साल पूर्व 18 दिसम्बर 1756 को अवतरित हुए थे। घासीदास जी के बचपन का नाम ‘घसिया’ था, बाद में ये गुरूघासीदास कहलाये। इनके पिता का नाम मंहगूदास तथा माता का नाम अमरौतीन बाई था। अमरौतीन के गर्भ से चार पुत्र उत्पन्न हुए ननकू,मुनकू, झुनकू, और घसिया था, भाईयों में सबसे छोटा घसिया ही था जिन्हे बाद में गुरू घासीदास के नाम से पुकारा गया। जिस समय गुरू घासीदास जी का अवतरण हुआ सम्पूर्ण छत्तीसगढ़ में अराजकता और विषमताएं व्याप्त थी, समाज पतन की दशा में था और समाज में जाति-पांति एवं छुआछूत के बन्धन में बुरी तरह से जकड़ा हुआ था। गुरू घासीदास जी ने इन समस्त कुरीतियों और अंधकार को दूर कर सम्पूर्ण मानव जाति को एक आशा और विश्वास, हर्ष एवं उल्लास का सत संदेश दिया। गुरू घासीदास बचपन से ही संत और साधु प्रकृति के थे। इनका स्वभाव सरल, शांत, सीधा-सादा, काम, क्रोध, लोभ, मद, मोह आदि से विरक्त ‘‘सतनाम’’ धर्म के अनन्य उपासक सच्चे भक्त थे। गिरौधपुरी में औंरा-धौंरा वृक्ष के नीचे गुरू घासीदास जी को सतनाम का ‘‘सत्यज्ञान’’ की प्राप्ति तथा उस सतपुरूष सतनाम से सीधा सम्पर्क एवं दर्शन हुए और उस सतपुरूष सतनाम में तल्लीन होकर सदैव उनका जीवन चरित्र निर्मल जल की भांति प्रवाहमान होने लगा है-

‘‘घासीदास के चरित सुहावन, गंगा जल जिमि निर्मल पावन।

सुनी-सुनी भक्ति पुलकित अंगा, भक्ति विभोर कथा रस रंगा।।’’(महाकवि-मनोहरदास नृसिंहजी)

छत्तीसगढ़ के सतनामी समाज में उत्पन्न संत गुरू घासीदासजी एक ऐसे अलौकिक प्रकाश लेकर आए जिन्होने अपने सतज्ञान के दिव्य किरणों से मानव समाज को एक नया मार्ग दिखाया। जिसे अपनाकर आज उनके बताये हुए सतमार्ग का अनुसरण कर संत गुरू घासीदास जी के स्मरण में प्रति वर्ष 18 दिसम्बर को गुरू घासीदास जयंती के रूप में मनाते हैं। ‘सतनाम’ धर्म के अनुयायी सतनामी कहलाये। क्योंकि घासीदास ने ‘सतनाम धर्म’ को प्रशस्त किया और छत्तीसगढ़ में जो ‘सतनाम धर्म’ के मानने लोग हैं वही सतनामी कहे जाते हैं। ‘सतनाम’ ये दो शब्द ‘सत्’ और ‘नाम’ सत्य शब्द का अस्तित्व सूचक है, जो संतो ंके अनुसार परम तत्व का बोधक माना जाता है। यह ‘नाम’ उस वस्तु के अंग की ओर संकेत करता है, जो साधक के अपने निजी अनुभव में आ चुका है उसके लिए सभी प्रचलित नामों का एक प्रकार से प्रतिनिधि भी समझा जा सकता है उस ‘सतनाम’ का महत्व संतों ने सब कहीं दर्शाया है और उसी को सब कुछ मानते हैं, उसके स्मरण का उद्देश्य ‘सत्य’ का उतना ही अंश उसके लिए परिचित है। उसी की अनुभूति उसे लाभदायक हो सकती है। दादूदयाल ने लिखा है-‘‘ गउ बच्छ का ज्ञान गहि, दूध रहे ल्यो लाई।

सींग पूंछ पग पर हरै, अस्थन लागै लाईं।।’’

अर्थात्‘‘ हमें ज्ञान का ग्रहण उस बछड़े की भांति करना चाहिए जो दौड़कर गाय के स्तन में लग जाता है और उसके दूध को पीता है वह उसकी सींग, पूंछ, व पैरों की ओर दृष्टि नहीं डालता है। संतों के नाम स्मरण का भी वास्तविक रहस्य यही प्रतीत होता है। संत गुरू घासीदासजी की भक्ति भावना स्वभावतः निर्गुण एवं निराकार की उपासना के अन्तर्गत आती है, जिसे अभेद शक्ति का नाम भी दिया जाता है, किन्तु उन्होंने अपने इष्ट ‘‘सत’’ को कोरे अशरीरी व भावात्मक रूप में नहीं समझा है।

संत गुरू घासीदासजी एक महामानव और एक महान आत्मा के रूप में अवतरित हुए थे। जो सांसारिक दुनिया से अलग उस परम-सत्ता की ओर ही तल्लीन निर्गुण ब्रह्म के उपासक थे। उन्होंने सिर्फ और सिर्फ ‘‘सतनाम’’ का ही स्मरण किया और ‘‘सतनाम’’ में ही उन्होंने सतपुरूष सतनाम को प्राप्त किया जो सत्, चित्, आनंद है। उस सतपुरूष सतनाम ने संत गुरू घासीदासजी को माया रूप धारण कर कई तरह से छलने की कोशिश की किन्तु वह अपने मार्ग पर अडिग रहे और उन्होने ‘सत’ के मार्ग से जरा भी विचलित नहीं हुए। अन्ततः माया को हार माननी ही पड़ी। गुरू घासीदासजी का वास्तविक जीवन चरित्र कवि मनोहरदास नृसिंह कृत ‘‘श्री सत्यनाम गुरू घासीदास नामायण’’ में मिलता है। यह ग्रंथ सात सर्ग में विभक्त है। यहां पर यह पंक्ति द्वितीय ‘‘वैराग्य काण्ड’’ से उद्यृत हैः-

‘‘भक्ति कहती कर जोरि कै, साहेब विनती तोरि।

घासीदास पावन चरित, आगे कहो बहोरि।।’’

गुरू घासीदासजी का विवाह माता सफुरा बाई के गर्भ से हुआ था। उन्होंने अपने गर्भ से चार पुत्र और एक पुत्री को जन्म दिया- ‘‘जेठ पुत्र अमरू रहे, बालक आगर, अड़गडि़यादासू।

डेढ़ वर्ष की बालिका, आज हूं खेलत गोदू।।’’(घा.ना.प्र.अ.पृ.-7)

संत गुरू घासीदासजी के साथ सतपुरूष ने माया रूप धर कर अनेक छल किया उन्होंने सत्य के मार्ग से कभी विचलित नहीं हुएः-‘‘चारो लरिका इक संग मरिगे, सफुरा के संसार उजरगे।’’(घा.ना.प्र.अ.पृ.17)

गुरू घासीदास तो पहले से ही घर-बार छोड़कर वैराग्य के लिए निकल पड़े थे। माता सफुराबाई के चारो पुत्र और उनकी लाडली पुत्री के निधन हो जाने पर उनके जीवन में विपत्ति का पहाड़ टूट पड़ता है इस तरह पुत्र शोक और पति का परित्याग सहन नहीं हो सका। वह भी अपना प्राण त्याग देती है, तब भी गुरू घासीदास अपने वैराग्य पर अटल रहे और अपनी पत्नी की लाश को दफनाने भी नहीं आते अतः लाश को ग्रामवासी दफनाते हैं। दोहाः- ‘’तब ते घासीदास कर, अटल हुआ वैराग्य।

प्ति त्यागत तनु त्यागेउ, धन्य सफुरा के भाग।।’’(घा.ना.प्र.अ.पृ.13)

ग्राम के जन साधारण लोगों ने गुरू घासीदास जी को यहां तक छली-कपटी आदि कहा किन्तु उन्होंने उसके प्रतिकार में कटु वचन का प्रयोग नहीं किया। और अपने सत्य के मार्ग पर अटल रहेः- दोहा-

‘‘ढोगी झूठा पाखण्डी कही, पागल मूर्ख ठग आदि।

ते ही संगी दुई चारि मिली, करन लगे बकवादी।।’’(घा.ना.द्वि.अ.पृ.18)

इन सब के बावजूद भी घासीदासजी ने इन मूर्खों एवं अज्ञानियों को क्षमा ही किया और कभी भी अपने मुख से कठोर वचन का प्रयोग नहीं किया और यह कहकर क्षमा कर दिया-

‘‘ अनुचित करही मूर्ख अज्ञानी, करही क्षमा ते ही साधु सयानी।’’(घा.ना.द्वि.अ.पृ.19)

‘‘घासीदास नामायण’’ में उनके ‘सत’ चरित्र का सुन्दर चित्रण किया गया है जिसमें ‘‘सतवाणी’’ एवं ‘‘सतनाम’’ की चर्चा अति सुन्दर ढंग से हुआ है जो महान संत के रूप में हमारे समक्ष आते हैं- दोहा- ‘‘घासीदास पावन चरित, सुनहीं सहित विश्वास।

ताके संकट कटही सब, कहै मनोहर दास।।

भूत-प्रेत बाधा गृहा, घर में परे बिमारी।

पाठ करै नामायण, मन में सत्य विचारी।।

श्रद्धा भक्ति युत पढ़ई नित, सदा वाणी सत बोल।

सतगुरू कृपा प्रसाद से, पाव ही ज्ञान अमोल।। (घा.ना.द्वि.अ.पृ.19)

संत गुरू घासीदासजी का चरित्र अति पावन है। और उन्होंने सदा सतनाम का ही सुमिरन किया है। और सतनाम का ही जाप करने का उपदेश दिया है। जिन्हें पढ़कर आज हम अपनी सतज्ञान की चक्षु को खोल सकते हैंः- ‘‘सतपुरूष सतनाम, सफल विश्व के कारण।

सत-सत कोटि प्रणाम, अंतस दृग पट खोलिए।।

ध्यान पटल के माहि, चरित चित्र दर्शाईए।

गुप्त प्रकट यहां आहो, कर गही कलम लिखाइए।।

गुरू घासीदासजी का सतनाम की महिमा भारी है। जिसे देखकर साधारण जन समुदाय आश्चर्य चकित से रह जाते हैं- ‘‘एक तरफ धासीदास खड़े, दूसर ओर बछड़ा गाय।

सत के अंश सत बात करे, भेद कोई नहीं पाय।

गांव बाहर से बिदा करी, सत संदेश भेजाय।

वक्त परे सत ध्याान देई, सतनाम गुण गाय।

गुरू चरित सतदेव कथे, संत दास धरे ध्याान।

पन्द्रह वर्ष के गुरू भयों, जंगल करत पयान।

संत सखा सब मिल के, सुमता एक बनाय।

जन्म भवन सब आई के, गुरू को कहेउ समझाय।

जंगल में मंगल करो, आन्न्द खुशी होई जाय।

संग देउ गुरू बाबा, सब कोई चरण मनाय।

आदेश पिता मुझे दीजिए, आशीर्वाद सतनाम।


संग सखा सो जाई हौंव, सब की है यह मांग। (महाकवि-राजमहंत नंकेसरलाल टण्डन, सत्यवंश सतनाम धर्म ग्रंथ से)

आगे गुरू घासीदासजी ने अपने जीवन में ‘सतनाम’ ज्ञान के अनेक चमत्कार दिखलाएः-

‘‘चमत्कार सतनाम को, गुरूजी करे पुकार। सत तप प्रकाश करो, संतन के हितकार।

आगी नहीं पानी नहीं, सुखा चाउर दार। स्वच्छ कपडा ढ़ांक दियो, जेवन करेउ तैयार।

देखे दशा संग के, खिचड़ी भात पकाय। दाल चावल मिलाई के, सब पात्र को जमाय। (महाकवि-राजमहंत नंकेसरलाल टण्डन, सत्यवंश सतनाम धर्म ग्रंथ से)

अर्थात् गुरू बाबा घासीदास जी ने बिना आग पानी के भोजन बनाया जिसका इस महाकाव्य में कवि ने सुंदर वर्णन है। गुरू धासीदास जी दाल चावल को बर्तन में भरकर इकटठा रखकर के बीच में गुरू बाबाजी हाथ जोड़कर वह साहेब सतपुरूष सतनाम के नाम की स्तुति प्रार्थना करने लगे और साथ में सभी संग साथी भी प्रार्थना करने लगे। इस प्रकार सतनाम धर्म के संस्थापक गुरू घासीदास जी का जीवन चरित और उनका जीवन दर्शन चमत्कार से भरा पड़ा है। चमत्कार ही नहीं बल्कि वास्तविक सच्चाई से उनका जीवन दर्शन सब के सामने खुली किताब की तरह है। जिस पर उनके अनुयायी सतनाम के ज्ञान के सागर में जितना डूबते जाएंगे उतना ही सतनाम ज्ञान की गहराई मिलेगी। जिस पर आप डूबते जाएंगे और ज्ञान की मोतियों का अर्जन करते जाने की आपमें ललक पैदा होगी।

डॉ.रामायणप्रसाद टण्डन (सतनामी)

90,आदर्श नगर कांकेर छत्तीसगढ

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