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यात्रा संस्मरण - गुलाबी नगर - श्रीमती नीलम कुमार नील

गुलाबी नगर

श्रीमती नीलम कुमार नील


हवा महल


वैसे तो मुझे भ्रमण का शौक शुरु से ही रहा है, गत वर्ष मैं उत्तर-पूर्व की यात्रा पर गई थी जिसमें सिक्किम व दार्जीलिंग शामिल था। इस बार मेरी यात्रा गुलाबी नगर अर्थात जयपुर, राजस्थान की रही जिसे हमने अपने निजी वाहन द्वारा पूर्ण किया।

जयपुर जो राजस्थान की राजधानी है गुलाबी नगर के नाम से प्रसिद्ध है। इसकी स्थापना 1728 में आमेर के महाराजा जयसिंह द्वितीय ने की थी। इस नगर में हवेलियाँ व किले अत्यधिक हैं। जयपुर का शाब्दिक अर्थ है ‘ जीत का नगर ‘। मुगलों ने यहाँ जो भी भवन बनवाए उसमें लाल पत्थर का प्रयोग किया गया जबकि बाद में राजा जयसिंह ने उसे गुलाबी रंग में रंगवा दिया गया तभी से यह गुलाबी नगर के नाम से विख्यात हो गया।

जयपुर राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली से 262 किमी दूर है। सर्वप्रथम हम लोग जयगढ़ किला देखने गए जो भारत की सैनिक इमारतों में से एक है। यहाँ पर महल, बगीचे, टंकियाँ, भंडार, शस्त्रागार, अनेक मंदिर, एक लम्बा बुर्ज़ और एक विशालकाय तोप जय-बाण भी है, कहा जाता है कि यह तोप देश की सबसे बड़ी तोपों में से एक है।

नाहरगढ़ को गुलाबी नगर का पहरेदार कहा जाता है। यहाँ पर सवाई माधव सिंह द्वितीय द्वारा बनाई गई कई सुंदर इमारतें हैं।

हमारा अगला पड़ाव आमेर का किला था। यह किला एक प्रसिद्ध किला है जिसे राजा मान सिंह, मिर्ज़ा राजा जयसिंह और सवाई जयसिंह द्वारा बनवाया गया जहाँ विभिन्न महल, मंडप, बगीचे व मंदिर हैं। यहाँ शिला माता का मंदिर है जिसे राजा मानासिंह ने स्थापित करवाया जिसकी पूजा हजारों श्रद्धालु करते हैं। यहाँ एक दीवाने – आम और एक दोमंज़िला चित्रित सुंदर प्रवेश द्वार है। गलियारे के पीछे चारबाग की तरह का एक रमणीय छोटा बगीचा है जिसकी दाईं तरफ सुख निवास व बाईं ओर जसमंदिर है। यहाँ राजपूताना व मुगल कला का अद्भुत मिश्रण है। दीवारों पर नक्काशी खूबसूरती से की गई है यहाँ दीवाने –खास व शीशमहल भी है यहाँ शाही परिवार कई पीढियों तक रहा है। आमेर का किला देखने के लिए आपको पूरा दिन व्यतीत करना पडेगा, यहाँ पर लोग हाथी की सवारी करते हुए भी किला देखते हैं। ऐसा प्रतीत होता है मानो किसी राजा के राज्य में प्रवेश कर गए हों जहाँ बाग, बगीचे, महल बुर्ज़ इत्यादि हों। यहाँ एक विशेषता और थी कि यहाँ लोकवाद्य जैसे सारंगी बजाने वाले अनेक व्यक्तियों से परिचय हुआ जिनके कौशल, बजाने की कला ने मंत्रमुग्ध कर दिया, धन्य हैं ये लोग जिन्होंने यहाँ की लोककला को संग्रहित कर रखा है। मैंने दो व्यक्तियों से सारंगी सुनी और उनकी वीडिओ भी बनाई।

इसके पश्चात हम जलमहल देखने गए जो मानसागर झील के मध्य एक एतिहासिक महल है यह महल झील के मध्य में होने के कारण इसे ‘आईबॉल भी’ कहा जाता है। राजा इस महल को अपनी रानी के साथ खास वक्त बिताने के लिए इस्तेमाल करते थे व इसका प्रयोग राजसी उत्सवों पर भी करते थे। जयपुर- आमेर मार्ग पर मानसागर झील के मध्य स्थित इस महल का निर्माण सवाई जयसिह ने अश्वमेध यज्ञ के बाद अपनी रानियों व पंडितों के साथ स्नान करने के लिए करवाया था। इस महल मे तपते रेगिस्तान मे भी गरमी नहीं लगती क्योंकि इसके कई तल जल के अंदर बनाए गए हैं। इस महल से अरावली पहाड़ियाँ और झील का बेहद आकर्षक नज़ारा भी देखा जा सकता है। चाँदनी रात मे झील अत्यंत सुंदर लगती है।

तत्पश्चात हम सिटी पैलेस देखने गए जिसे सवाई जय सिंह ने 1729 से 1732 के मध्य बनवाया। यहां पर दीवाने आम, दीवाने खास, महारानी पैलेस, मुबारक महल,चंद्रमहल, गोविंद मंदिर आदि हैं। अब चंद्रमहल, संग्रहालय में परिवर्तित हो गया है, जहाँ हथकरघा उत्पाद व अन्य सामान मौजूद हैं। यहाँ की वास्तुकला अत्यंत मनोहारी है।

इसके पश्चात हमारा रुख हवामहल की ओर हुआ जिसमें 953 खिड़कियाँ बनी हैं इसीलिए इसे हवामहल का नाम दिया गया है। यह जयपुर का प्रमुख आकर्षण है। यह पाँच मंज़िला इमारत है परंतु इसमें सीढ़ियाँ नहीं हैं केवल ढलान है यह पूरा गुलाबी पत्थरों से बनवाया गया है। हवामहल राजपूताना महिलाओं के लिए बनवाया गया था जिससे वो अंदर से खिड़कियों से झाँककर बाहर के दृश्य देख सकें कि बाहर क्या हो रहा है। यहाँ एक पुरातात्विक संग्रहालय भी है।

हमारा अगला लक्ष्य जंतर – मंत्र वेधशाला देखना था। यह विश्व की सबसे बड़ी वेधशाला के अनतर्गत आती है। महाराजा जयसिंह द्वितीय ने इसे बनवाया था। यहाँ विश्व की सबसे बड़ी धूपघड़ी है। राजा जयसिंह को वास्तुकला, खगोल विज्ञान व दर्शन शास्त्र में विशेष रुचि थी इसी लिए उन्होने इस वेधशाला का निर्माण कराया।

इसे देखने के पश्चात हम जयपुर का चिड़ियाघर देखने गए जिसका निर्माण 1877 में हुआ था यहाँ पचास से भी अधिक पक्षियों की प्रजातियाँ हैं। वर्ष 1999 में घड़ियाल प्रजनन फार्म की यहाँ स्थापना की गई जो भारत का चौथा सबसे बड़ा प्रजनन फार्म है। यहाँ से चीता, शेर, तेंदुए जैसे कुछ जानवर दूसरे स्थान पर स्थानांतरित कर दिए गए हैं।

तत्पश्चात हम संजय शर्मा संग्रहालय गई जहाँ हमने विभिन्न पाण्डुलिपियाँ, हथियार, वस्त्र, जानवरों के चित्र आदि देखे, वास्तव में यह दर्शनीय है, यह हमें हमारी संस्कृति से जोड़े रखता है फिर हम कनक वृन्दावन देखने गए यह जयपुर शहर से 8 किमी दूर है इस उद्यान परिसर के निकट भरपूर हर - भरा वन क्षेत्र है जैसे आमेर, जयगढ़ व नाहरगढ़ आदि। उद्यान का निर्माण जयपुर के राजा सवाई जयसिंह ने करवाया था। कनक वृन्दावन नाम राजा कि एक पत्नी के नाम पर रखा गया। इसमें गोविंद की एक मूर्ति लगी है जिसे वृन्दावन से लाया गया था इसीलिए इसका नाम कनक वृन्दावन पड़ा।

इसके बाद हम रामनिवास गए जो एक वनस्पति संग्रहालय से युक्त हरभरा विस्तृत बाग है तथा खेल का मैदान भी है इसे भी सवाई जयसिंह ने बनवाया था यहाँ अल्बर्ट हौल जो भारतीय वास्तुकला शैली का परिष्कृत रूप है जिसे बाद में उत्कृष्ट मूर्तियों, चित्रों, सुसज्जित बर्तनों, प्राकृतिक विज्ञान के नमूनों, इजिप्ट के एक ममी और प्रख्यात फारस के कालीनों से सुसज्जित कर खोला गया। हम लोग और घूमना चाहते थे परंतु समयाभाव के कारण यात्रा यही तक सीमित करनी पड़ी। मेरी यह यात्रा अत्यंत सुखद, लाभकारी, ज्ञानवर्धक रही, साथ ही पाठकों को एक परामर्श देना चाहूंगी कि जहाँ भी भ्रमण के लिए जाएँ वहाँ की विस्तृत जानकारी अवश्य लें क्योंकि यह हम एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी को स्थानांतरित करते हैं।

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श्रीमती नीलम कुमार नील

अध्यापिका

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