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व्यंग्य - बिना पाँव झूठ कैसे दौड़ता है ? प्रभात गोस्वामी


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हमारे क्षेत्र के नेताजी की हम से हमेशा यह शिकायत रही कि हम इधर-उधर की फालतू रिपोर्ट्स अपने अखबार में छापते रहते हैं लेकिन उनका साक्षात्कार नहीं लेते . यह समय काफी संघर्षों से भरा है . लोगों को दिशा दिखाने की ज़रूरत है . यदि नेताजी का इंटरव्यू हमारे अख़बार में छपा तो उसकी लोकप्रियता ज़मीन से आसमान तक पहुँच जाएगी . सो, समय को और अधिक जाया न करते हुए तुरंत हमारी कुटिया में आएं और अपने अखबार का सर्कुलेशन बढाएं .

नेताजी के इस प्रेम भरे निमंत्रण को स्वीकार कर, एक शाम हम उनकी सात मंज़िली कुटिया में पहुँच गए . नेताजी धवल वस्त्र में माथे पर चन्दन का तिलक लगाए हमारे आने की बाट देख रहे थे . कुछ देर, उनकी कुटिया से लेकर दिल्ली तक उनकी टिकट पाने (जो कभी मिला ही नहीं) की दुरूह राजनीतिक यात्रा के चित्र देखने के बाद हमने अपनी नोटबुक खोली और साक्षात्कार शुरू करने की मुद्रा में बैठ गए . हमारे पेन का ढक्कन खुलते ही नेताजी ने भी घी के डब्बे से ढक्कन निकालने की मानिंद अपने मुंह से ढक्कन हटा लिया .

हमने पहला सवाल शुरू किया – आप नेता कैसे बने ?

नेताजी-(असहज होते हुए) क्या संध्यावेला में ये सुबह के बासी सवाल से शुरुआत कर रहे हो ? खैर , हम नेता बने नहीं , हम तो जन्मजात नेता ही थे . माँ के पेट से नेतागिरी करते हुए धरती पर आए और उम्र के हर पड़ाव पर नेतागिरी ही करते रहे .

प्रश्न – आजकल प्रदूषण बहुत फ़ैल रहा है , चारों तरफ सांस लेना दूभर हो रहा है ?

नेताजी- कहाँ है प्रदूषण , ये धुँआ तो हमारे विपक्षियों के दिलों से उठ रहा है .मुए , ये खरदूषण ही हमारी प्रगति से जल रहे हैं और प्रदूषण का हल्ला कर रहे हैं . ये धूंआ तो वहीँ से उठ रहा है . इंटरव्यू खत्म होने के बाद तुमको हमारी फैक्ट्री में बना आई ड्राप देंगे . उसे डालना सब साफ़ दिखाई देने लगेगा .

प्रश्न – आजकल हमारी बेटियों की सुरक्षा को लेकर रोज़ हंगामा हो रहा है . स्कूलों और कालेजों के बाहर मनचले सुबह से शाम तक लड़कियों पर डोरे डाल रहे हैं . आप इस ओर क्या कार्यवाही करवाएंगे ?

नेताजी –(चिन्तन की मुद्रा में) हम जल्दी ही कपड़ा जगत के कुछ बड़े उद्योगपतियों से बात कर शिक्षण संस्थानों के निकट कुछ कपड़ा मिल लगवाने का प्रयास करेंगे ताकि बेरोजगार युवा अपने "डोरे" इन मिलों को सप्लाई कर कुछ पैसा कमा सकें . अगर फिजूल में डोरे डालेंगे तो उसमें खुद ही उलझेंगे . बेरोज़गारी के साथ जेल में चक्की भी पीसनी पड़ेगी .

प्रश्न- (माथा पकड़ते हुए ) आजकल पडोसी मुल्क खिसियाकर हमारे देश में टिड्डियों से छद्म हमला कर अपनी खीज मिटा रहा है , क्या आपकी सरकार पेस्ट कंट्रोल करवाने की कोई नीति बना रही है ?

नेताजी- (ऑफ द रिकॉर्ड कहते हुए) अमां यार , ये कोई बड़ी समस्या नहीं है . देश में कई और भी संकट हैं . आजकल सरकार के सामने 'पेस्ट कंट्रोल' से ज्यादा 'प्रेस कण्ट्रोल' एक बड़ी समस्या है . तभी तो आपको बुलाया है ताकि आप सच्चाई जान सकें .

प्रश्न- लोगों की शिकायत है कि आप चुनाव जीतने के बाद क्षेत्र में दिखाई नहीं देते ?

नेताजी-(बेफिक्री से) हम तो खुले घूम रहे हैं . ये लोगों का दृष्टि भ्रम है जो हमें देख नहीं पा रहे हैं . यार, इन दिनों पास के सिनेमाहाल में अनिल कपूर की फिल्म " मि. इंडिया," लगी हुई है . उसी का असर लगता है . आज ही इसका विरोध कर फिल्म और सिनेमाघर को बंद करवाएँगे . और हाँ , हम जल्दी ही क्षेत्र के हर मोहल्ले में नेत्र चिकित्सा शिविर लगवाएँगे ताकि लोगों की आँखें मोतियाबिंद जैसे रोग से दुरुस्त हो सके और अगले चुनाव से पूर्व जनता हमें साफ –साफ देख सके .

प्रश्न-(दुखी हो कर) शहर के लोगों में आपके विरूद्ध गुस्सा है . शहर में ये जुमला खूब चल रहा है कि सड़कें टूटी हुईं हैं ,तो लोग कहते हैं " और दो नेताजी को वोट ? गंदगी का आलम है , विकास कार्य ठप्प पड़े हुए हैं , शिक्षण संस्थाओं की कमी से शहर के बच्चों का भविष्य चौपट हो रहा है,चारों तरफ भ्रष्टाचार पनप रहा है ,दूध, पानी , बिजली का संकट हो रहा है , तो लोग फिर यही कहेंगे न कि " और दो नेताजी को वोट ?

नेताजी- कुछ तो लोग कहेंगे , लोगों का काम है कहना . यार , अफवाहें मत फैलाओ. हमारे विपक्षियों द्वारा ही ये झूठ का ठीकरा फोड़कर, हमारे भोले-भाले मतदाताओं को विकास की गलत जानकारी दी जा रही है .विकास तो सबको दिखाई दे रहा है (विकास नाम के अपने चेले की ओर इशारा करते हुए) फिर मीडिया भी तो खामख्वाह ही विपक्ष की भूमिका में आ कर गलत खबरें छाप देता है . इसका खामियाजा विपक्षियों को आने वाले चुनाव में भुगतना ही पड़ेगा . जल्दी ही दूध का दूध और पानी का पानी हो जाएगा .

अंतिम प्रश्न – नेताजी , शहर में काफी समय से दूध और पानी का भी तो संकट हो रहा है ? फिर कैसे होगा दूध का दूध और पानी का पानी ? सम्हल कर ज़वाब दीजिये सर , हमारे यहाँ कहावत है कि "झूठ के पाँव नहीं होते" .

नेताजी- (गुस्से से बोलते हुए) एक और सफेद झूठ . मुझे तो ये समझ में नहीं आ रहा है कि जब "झूठ के पांव" ही नहीं होते फिर भी ये इतनी तेज़ी से दौड़ कर सबको पीछे छोड़ते हुए पूरे शहर का चक्कर कैसे लगा लेता है ? लगता है अब हमें भाषा विशेषज्ञों पर भी जांच बैठानी पड़ेगी जो ऐसी कहावतें गढ़ते हैं !

चलिए , फिर मिलेंगे .अगले चुनाव की घोषणा के बाद .

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प्रभात गोस्वामी ,

15/27, मालवीय नगर ,

जयपुर - 302017 (राजस्थान)

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