[मारवाड़ का हिंदी नाटक] यह चांडाल चौकड़ी, बड़ी अलाम है। खंड 14 - लेखक - दिनेश चन्द्र पुरोहित

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[मारवाड़ का हिंदी नाटक]

यह चांडाल चौकड़ी, बड़ी अलाम है।

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लेखक - दिनेश चन्द्र पुरोहित

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काळज़े की कोर [खण्ड १४]

लेखक दिनेश चन्द्र पुरोहित

[मंच पर रौशनी फैलती है, पाली स्टेशन का मंज़र सामने आता है। प्लेटफोर्म की घड़ी दिन के ढाई बजने का वक़्त बता रही है। प्लेटफोर्म पर खड़े यात्री बैंगलूर चेन्नई एक्सप्रेस के आने का इंतज़ार कर रहे हैं। गर्मी बहुत अधिक बढ़ चुकी है, ऐसा लगता है..जैसे आसमान से, सूरज आग के गोले बरसा रहा है ? पसीने से तर-बतर यात्रियों के कपड़े ऐसे लग रहे हैं, मानो बरसात से उनके वस्त्र गीले हो गये हों ? ये यात्री, ठंडे पानी की मशीन के निकट चले आते हैं। पानी पीने के लिये नल चालू करते हैं, तब गरमा-गरम पानी बाहर आता है। ऐसा लगता है, मशीन अधिक काम लिए जाने से अब बाहर आ रहा पानी ठंडा नहीं हो रहा है। तभी एक लम्बा और मोटा आदमी आर.एम.एस. दफ़्तर वाले दरवाज़े से बाहर निकलकर प्लेटफोर्म पर आता है, जो सीधा आकर उस तख़्त [बेंच] पर अपना बैग सिर के नीचे रखकर लेट जाता है। इस तख़्त के पास ही, घेवरसा ने चाय का ठेला लगा रखा है, वे इस विशाल काया वाले आदमी को लेटे देखकर, चुप रहना ही अपनी समझदारी मानते हैं। असल में घेवरसा ठहरे, यात्रियों से टोचराई करने वाले खोड़ीले-खाम्पे। जो किसी भी यात्री को इस तख़्त पर बैठने या लेटने नहीं देते हैं, इस तख़्त पर बैठे या लेटे यात्री को वे डांटकर दूर हटा दिया करते हैं। मगर अब इस बलवान आदमी से झगड़ा करना, उनके हित में नहीं। इसलिये, वे चुप ही रहते हैं। घेवरसा के ठेले से कोई पांच क़दम दूर, पानी पीने का नल लगा है। वहां घेवरसा चाय की जूठी ग्लासें और प्याले ले जाकर, उन्हें धोना शुरू करते हैं। उस नल के कुछ नज़दीक, फर्श पर कुछ दारु पीये हुए मज़दूर बैठे ताश के पत्ते खेल रहे हैं। इनका यहां बैठकर, ताश के पत्ते खेलना घेवरसा को कतई पसंद नहीं। इन दारुखोरों के यहां बैठे रहने से, यहां चाय के ठेले के पास खड़े रहकर कोई मुसाफ़िर चाय पीना नहीं चाहता। इस कारण मुसाफ़िर अपने बैठने के स्थान पर, चाय मंगवाया करते हैं। इस तरह बार-बार स्थान-स्थान पर चाय पहुंचाते रहने से घेवरसा के पाँवों में दर्द होने लगा है। यही कारण है, ये दारुखोरे इन्हें फूटी आँख नहीं सुहाते। एक तो इनका धंधा चौपट हो जाना, और दूसरा जगह-जगह चाय पहुंचाना अब घेवरसा के लिये सरल रहा नहीं। चाय के जूठे बरतन धोते वक़्त, पानी के छींटे उन दारुखोरों के बदन पर गिर जाते हैं। दारुखोरे छींटे लगते ही, घेवरसा को खारी-खारी नज़रों से देखते हैं। उनका इस तरह खारी-खारी नज़रों से देखना, घेवरसा को काहे पसंद आता ? फिर क्या ? उस विशाल काया वाले आदमी पर आये क्रोध को, इन दरुखोरों पर उतारने के लिये, अब वे ठेले पर रखे हवलदार जीव राज़सा का डंडा उठाकर ले आते हैं। अब तो वे उस गंगा राम से उन दारुखोरों की पिटाई करते हुए, घेवरसा उन्हें मां-बहन की भद्दी-भद्दी गालियां बकते हैं। इस नल के पीछे, रेलवे का बिजली-घर है। उसके बाहर खड़े जीव राज़सा हवलदार, अपने गंगा राम को ढूंढ़ रहे हैं..जो इनको मिल नहीं रहा है। तभी उनकी निग़ाह में, दारुखोरों की पिटाई करते घेवरसा दिखायी दे जाते हैं। अब उन्हें याद आता है, वे चाय पीते वक़्त ‘उस गंगा राम को, उस ठेले पर भूल आये थे।’ अब इस डंडे को इस मक्खीचूष घेवरसा के हाथ में पाकर, क्रोध के मारे उनका रोम-रोम जल उठता है। अब उनके दिल में, घेवरसा के प्रति नाराज़गी बढ़ती जाती है। यह गंगा राम ठहरा, उनकी वर्दी का एक हिस्सा। उसे किसी सिविलियन के हाथ में पाकर पुलिस वालों का गुस्सा बढ़ना स्वाभाविक है...जहां किसी पुलिस वाले की वर्दी पर कोई हाथ लगा दे, तो ये पुलिस वाले तिलमिला जाते हैं। और अब इस घेवरसा के हाथ में गंगा राम का पाया जाना, जीव राज़सा के लिए नाक़ाबिले बर्दाश्त है। उनको इस बात पर भी गुस्सा आने लगा, इन दारुखोरों को मचकाने का काम पुलिस वालों का है..फिर यह सिविलियन उनके काम और हक़ के क्षेत्र में, हस्तक्षेप कैसे करता जा रहा है ? फिर क्या ? गुस्से से भरे हुए जीव राज़सा झट जाकर, घेवरसा के हाथ से अपने काळज़े की कोर यानि ‘गंगा राम’ को छीनकर उन दारुखोरों की पिटाई ख़ुद करने लगते हैं। अब पिटाई ठहरी एक पुलिस वाले के हाथ की, जो एक सिविलियन से ज्यादा असरदार होती है। मार खाते ही सारे दारुखोरे, ताश के पत्ते वहीँ छोड़कर नौ दो ग्यारह हो जाते हैं। इस तरह इस वाकया से ऐसा लगता है, जिस पर वश नहीं चलता..उससे दूरी बनायी रखनी, पड़ती है। उस पर आये क्रोध को किसी दूसरे कमज़ोर इंसान पर निकालना, एक मानव-स्वाभाव है। विशाल काया वाले इंसान पर घेवरसा का वश चलता नहीं, इसलिये उन्होंने दारुखोरों पर अपना क्रोध निकाल दिया है। उनका क्रोध उस विशाल काया वाले आदमी पर आना वाज़िब है, क्योंकि वह उनके तख़्त पर लेट गया है। उसके लेट जाने से, वे तख़्त पर लेटकर आराम कर नहीं पाए..बेचारे गाड़ी नहीं आये उस वक़्त तक, इस तख़्त पर लेटकर आराम कर लेते। इसी प्रकार जीव राज़सा को घेवरसा की तैयार की गयी मसाले वाली चाय की तलब, उन्हें मज़बूर कर डालती है के ‘वे घेवरसा से सम्बन्ध नहीं बिगाड़ें।’ यही कारण है, वे घेवरसा को अनाप-शनाप नहीं बककर, अपना सारा क्रोध उन दारुखोरों पर उतार देते हैं। कहावत सही है, कुम्हार का जब कुम्हारन पर वश नहीं चलता, तब वह बेचारे गधे के कान खींच लेता है।दारुखोरों के चले जाने के बाद, अब दोनों एक-दूसरे की तारीफ़ करते हुए गुफ़्तगू का दौर शुरू करते हैं।]

घेवरसा – जीव राज़सा। क्या करें, जनाब ? ये लातों के भूत बातों से नहीं मानते, अब इन पर पड़े जूत्त..और भग गए, माता के दीने।

जीव राज़सा – [नज़दीक आकर, कहते हैं] – आपसे तो सभी डरते हैं, घेवरसा। आपके डर से, कोई इस तख़्त पर..

[इतना कहते ही उनकी निग़ाह उस तख़्त पर लेटे आदमी पर गिरती है, उसे देखकर डर के मारे उनकी ज़बान तालू पर आकर चिपक जाती है। अब वे, उस आदमी के नज़दीक जाते हैं। वहां खड़े होकर, हाथ जोड़ते हुए कहते हैं..]

जीव राज़सा – [हाथ जोड़कर, कहते हैं] – पायालागू भा’सा। [ज़बान पर मिश्री घुले हुए शब्दों में ऐसे कहते हैं] जनाब आज़ देर से, कैसे पधारे..स्टेशन पर ?

[वह आदमी सामने देख़ता है, सामने जीव राज़सा को पाकर ज़ेब से रुमाल निकालकर ऐनक के कांच साफ़ करता है। इस तरह ध्यान न देने से, जीव राज़सा वापस दूसरी दफ़े पायलागन करके कहते हैं।]

जीव राज़सा – [प्रणाम करते हुए, कहते हैं] – सेणी भा’सा। मेरा पायलागन मालुम होवे। मालिक आपसे ही कर रहा हूं, अर्ज़। क्यों देख रहे हैं आप, इधर-उधर ? 

[अब सेणी भा’सा आँखों पर ऐनक चढ़ाकर जीव राज़सा की तरफ़ देखते हैं, फिर रौबीली आवाज़ में कहते हैं]

सेणी भा’सा – [अंगड़ाई लेते हुए, रौबीली आवाज़ में कहते हैं] – अंऽऽहाऽऽ, हां भाई जीव राज़ मज़ा में है ? क्या हाल है, तेरे ?

जीव राज़सा – हुकूम, आपकी मेहरबानी से सभी राज़ी-खुशी। मगर भा’सा यह बताओ, के ‘आज़ आप लेट कैसे आये ?’

सेणी भा’सा – ख़ाली दिमाग़ क्यों खा रहा है, जीवराज़ ? चाय-वाय का इंतज़ाम कर पहले, फिर यहां रख हल्दी राम भुजिया का पैकेट।

जीव राज़सा – जी हां, और कोई हुक्म ?  

सेणी भा’सा – [आंखें तरेरकर, कहते हैं] – तूने सुना नहीं, जीव राज़ ? क्या कहा, मैंने ?

जीव राज़सा – कुछ कहने की ज़रूरत नहीं है, जनाब। [पास खड़े घेवरसा से कहते हैं] घेवरसा, भा’सा जो चीज़ कहे, चाय, भुजिया सभी लाइये इनके पास। इनकी कोई शिकायत नहीं आनी चाहिये। इनसे कहने कोई ज़रूरत नहीं, ओळी मेरे खाते में मांड दीजियेगा। [सेणी भा’सा से कहते हुए] अब ठीक है, भा’सा ? 

सेणी भा’सा – हंऽऽऽ हां हां।

जीव राज़सा – [उतावली करते हुए, कहते हैं] – जल्दी लाइयेगा, घेवरसा। काहे देरी कर रहे हैं ?

[अब घेवरसा चाय से भरी ग्लास और भुजिया का पैकेट लाकर, सेणी भा’सा को थमाते हैं।]

घेवरसा – लीजिये मालिक, और कोई मेरे लिए हुक्म ?

सेणी भा’सा – [चाय और भुजिया का पैकेट लेते हुए, कहते हैं] – घेऽऽवर। करता जा सेवा ब्राह्मणों की, तू हमेशा पाता रहेगा मेवा।

घेवरसा – जो हुकूमसा। [होंठों में ही, कहते हैं] जी जनाब, आपकी सेवा का मेवा पा रहा हूं । मेरे पूरे तख़्त पर लेटकर, कब्ज़ा जमा दिया आपने ? अगर आप ना लेटते तो, मैं गाड़ी न आये तब-तक थोड़ा लेटकर आराम कर लेता ? आपके बाप का क्या जाता ? आ गये सरकारी जमाता, दफ़्तर छोड़कर ? 

सेणी भा’सा – अरे घेवर, क्या बड़-बड़ा रहा है ? मन में क्या गालियाँ बकता जा रहा है रे, गधे ?

घेवरसा – [स्टोव बंद करते हुए, कहते हैं] – कुछ नहीं मालिक, बैठा-बैठा ‘राम-राम’ जप रहा हूं।

सेणी भा’सा – [चाय पीकर ग्लास रखते हैं, फिर कहते हैं] - यही काम आयेगा, हेवार। [भुजिया खाते हुए, आगे कहते हैं] राम राम जप ले, घेवर।..दो नाम, मेरी तरफ़ से भी जप लेना।

[सेणी भा’सा आख़िर है, कौन ? इनका असली नाम है, सम्पत राज़सा। मगर ये घर में बोले जाने वाले नाम से, विख्यात हो गए हैं। इनको असली नाम से कोई पहचानता नहीं, बस ये सेणी भा’सा के नाम से ही पहचाने जाते हैं। दफ़्तर में जाने के बाद हस्ताक्षर करने के अलावा, इनका कोई काम नहीं। जो भी काम होता है, वह फील्ड में होता है। फील्ड का काम निपटते ही सेणी भा’सा, झट आ जाते हैं स्टेशन पर। वहां गाड़ी आये या न आये, तब-तक प्लेटफोर्म पर इधर-उधर घुमना, स्टेशन मास्टर साहब और वहां बैठे टी.टी.ई. महानुभवों से बातें करते करना..इस तरह, जनाब का वक़्त आराम से कट जाता है। फिर भी कुछ वक़्त बच जाय, तब ये जनाब केंटिन से डबल रोटी और नमकीन लेकर, खा लिया करते हैं। फिर वहीँ खड़े रहकर, केंटिन मैनेजर सिन्धी माणू [भाऊ] से गपें लगाते हुए चाय भी पी लिया करते हैं। इतने सारे काम निपटने के बाद भी अगर वक़्त मिल जाय, तो जाकर घेवरसा के सोने की ठौड़ उस तख़्त पर आकर लेट जाया करते हैं। वहां लेटे-लेटे, आती-जाती गाड़ियों को देखते रहते हैं। उन गाड़ियों से चढ़ने-उतरने वाले सारे टी.टी.ई. भा’सा के जान-पहचान वाले, वे इन्हें यहां देखकर इन्हें बतलाया बिना नहीं रहते। कोई इनसे पूछते, के ‘भा’सा कैसे हैं, आप ?’ कोई कहता ‘भा’सा, क्या हाल है आपके ?’ इस तरह सभी टी.टी.ई. इनके हाल-चाल पूछने के बाद ही गाड़ी में चढ़ते हैं। भा’सा इन टीटीयों से, बड़े प्रेम से ऐसे मिला करते हैं..मानो “वे सारे उतरने-चढ़ने वाले टी.टी.ई., इनके स्टाफ़ के ही बंधु हो।” भा’सा का व्यक्तित्व कुछ ऐसा है, अक़सर लोग इनको टी.टी.ई. समझने की ग़लती कर बैठते हैं। गाड़ी के शयनान डब्बे में चढ़े हुए सारे एम.एस.टी. वालों को, ये टी.टी.ई. लोग नीचे उतार दिया करते हैं। मगर भा’सा को देखते ही, वे इन्हें बड़े प्रेम से अपने पास बैठाकर गुफ़्तगू में मशगूल हो जाया करते हैं। कई बार ये बूट पोलिस करने वाले छोरे इन्हें टी.टी.ई. समझकर इनके बूट मुफ़्त में चमका दिया करते हैं। ऐसा भी होता है, कई बार..यात्री अपना टिकट चैक करवाने के लिए, इनको टिकट थमा देते हैं। भा’सा की इतनी मान-मनुआर, आख़िर हैं क्यों ? एम.एस.टी. वालों के मध्य, बड़े राज़ की बात है। कोई कहता है, ये जनाब जोधपुर शहर की एम.एल.ए. सुर्य कांताजी के भाणजे हैं, तो कोई कहता है जनाब रेलवे के ड्यूटी कंट्रोलर राजेन्द्रजी पुरोहित के सालाजी है। मगर आज़-तक किसी ने, इस रहस्य से पर्दा नहीं उठाया है ? अभी तक, यह राज़ की बात ही है। क्या कहें ? इन टीटीयों को छोड़ो, गाड़ी में घुम-घुमकर सलाद बेचने वाले वेंडर और हर स्टेशन पर मौज़ूद जी.आर.पी. पुलिस वाले भी भा’सा को बहुत मान देते हैं। गाड़ी में सलाद बेचने वाले भा’सा को देखते ही, वे अपने लबों पर मुस्कान बिखेर देते हैं। और अख़बार पर सलाद रखकर, वे भा’सा को ज़बरदस्ती मुफ़्त में थमा देते हैं। यह ठाट-बाट, मनुआर और रौब, फिर भा’सा क्यों अपनी बदली जोधपुर करवाने का प्रयास करेंगे ? मगर भा’सा है, आख़िर दिलदार। हर ज़रूरतमंद की, मदद किया करते हैं। तशरीफ़ लाइए इधर, भा’सा किस तरह एक ग़रीब-मज़लूम की मदद करते हैं..देख लीजिएगा। और, सुन लीजिएगा..सामने रेलवे बिजलीघर से ज़ोर से भड़-भड़ की आवाज़ आती है। तभी उस दफ़्तर से एक टेक्नीश्यन बाहर आता है, बाहर आकर वहां बैठे यात्रियों से कहता है]

टेक्नीश्यन – [ज़ोर से, कहता है] – भाइयों। तेज़ वोल्टेज़ आने से, मशीन ख़राब हो गयी है। अब आप लोग, बैठे रहिये चार घंटो तक..अब पानी ठंडा होने वाला नहीं।

[एक फ़क़ीर जग में नल से पानी भरकर, सेणी भा’सा के पास आकर खड़ा हो जाता है। इस फ़क़ीर ने अपने बदन पर, लुंगी और फटा हुआ कुर्ता पहन रखा है। अब वह भा’सा के निकट खड़े होकर, कहता है]

फ़क़ीर – साहब, इतनी गर्मी..? हाय अल्लाह, ख़ुदा रहम। ओ मेहरबान, या तो मशीन चालू करवा दीजिये..या फिर ख़ुदा के लिए, कहीं से बर्फ मंगवा दीजिये।

[फ़क़ीर को प्यासा मरता देखकर, भा’सा का दिल दया से भर जाता है। वे उसको अपने नज़दीक बुलाकर उसे कहते हैं]

सेणी भा’सा – नीचे बैठ जा, फ़क़ीर बाबा। अभी तेरे लिए, बर्फ मंगवाता हूं ।

[फ़क़ीर उनके पास आकर, ज़मीन पर बैठ जाता है। तभी भा’सा को बिजलीघर के बाहर खड़ा, आर.एम.एस. दफ़्तर का मुलाजिम अरुण दिखायी दे जाता है। उसे देखते ही भा’सा, झट उसे ज़ोर से आवाज़ देते हैं]

सेणी भा’सा – [ज़ोर से आवाज़ देते हुए, कहते हैं] – ए रे, अरुणीया। इधर आ रे, माता के दीने।

[उस वक़्त अरुण अपनी हथेली पर सुर्ती रखकर, उस पर ज़ोर की थप्पी लगा रहा था। भा’सा की तेज़ आवाज़, अरुण को शेर के दहाड़ने के समान लगती है। बेचारा भय से आक्रंत होकर दहल जाता है। हथेली पर रखी सुर्ती होठ के नीचे जानी चाहिए, मगर चली जाती है उसके नाक के अन्दर। फिर क्या ? छींको की झड़ी लग जाती है। छींकता हुआ आता है, भा’सा के निकट। रुमाल से नाक साफ़ करता हुआ, भा’सा से कहता है]

अरुण – [रुमाल से नाक साफ़ करता हुआ, कहता है] – फ़रमाइये भा’सा। हुक्म कीजिये, भा”सा। मेरे लिए, कोई काम हो तो..?

सेणी भा’सा – क्या हुकम है ? क्या हुकम है ? कहता कहता आ गया, डोफा ? यह क्या दशा बना रखी है तूने, अपनी ? बहू रोटियां बनाकर खिलाती नहीं क्या, तूझे ? ऐसा दुबला हो गया, तू ?

अरुण – भा’सा, आख़िर करें क्या ? भागवान यानि आपकी बहू की बदली सांडेराव स्कूल में हो गयी है, इसीलिए तड़के उठकर बस पकड़नी पड़ती है उनको। इसीलिए कभी खाना वे बनाती है,  तो कभी मैं। इस तरह तक़लीफ़ देखते हुए, वक़्त काट रहे हैं।

से’णी भा’सा – अरे डोफा, अभी इस वक़्त जीजी एम.एल.ए. है..ठोकिरा, उनकी सिफारिश लगवाकर बीनणी की बदली पाली क्यों नहीं करवा देता ?

अरुण – अरे हुज़ूर, एम.एल.ए. को लेकर, चाटूं क्या ? भागवान की स्कूल जिला-परिषद के अधीन है, अब इस महकमें से अनापत्ति प्रमाण-पत्र लाये बिना शहर की स्कूल में तबादला होता नहीं, और अब यह अनापत्ति प्रमाण-पत्र लाना आसान काम नहीं रहा।

फ़क़ीर – [उतावली करता हुआ, कहता है] – अरे साहब, जल्द मंगवावो ना बर्फ। कितनी गर्मी है, अल्लाह आपको सलामत रखे।

सेणी भा’सा – [फ़क़ीर से कहते हैं] – मंगवाता हूं, तुम बैठो बाबा। अभी आता है, बर्फ। [अरुण से कहते हैं] अरुणीया, यह ले पांच रुपये। [पांच रुपये देते हैं] साइकल पर बैठकर, जा मिल-गेट। और लेकर आ, बर्फ।

अरुण – [पांच रुपये लेकर, कहता है] – यह गया, भा’सा। अभी आया वापस, खोटे सिक्के की तरह।

[अरुण जाता हुआ दिखायी देता है, और सामने से दीनजी भा’सा आते हुए दिखायी देते हैं। दीनजी भा’सा नज़दीक आते हैं।]

दीनजी – [नज़दीक आकर, कहते हैं] – भा’सा जय श्री कृष्ण, आज़ आप देरी से कैसे आये ? आपके आये बिना, यह रेलवे स्टेशन सूना पड़ा है। आपके आने पर, यहां कुछ चहलपहल दिखाई देती है।

[बोलती-बोलते वे हाम्फ जाते हैं, लम्बी-लम्बी सांसे लेते हुए आकर तख़्त पर बैठ जाते हैं...सेणी भा’सा के, पहलू में]

सेणी भा’सा – देरी से आये, देरी से आये कहने की की रट लगा दी आपने ? आप कहां जल्दी आकर बैठ गए, यहां ? ऐसा कहकर, दीनजी भा’सा क्यों इस ग़रीब पर ज़ुल्म ढाह रहे हैं ?

दीनजी – जनाब, पानी के महकमें वालों की आदत है..जल्दी आने की। मगर हमारा महकमा ठहरा एज्युकेशन। यानि ‘ए’ ‘ज्यू’ ‘कै’ ‘शन’। बोलिये, इसका मफ़हूम क्या है ? मफ़हूम है “हमारे अफ़सर जैसा कहे, वैसा ही कीजिये।” सुनिए हमारे अफ़सर कहे अभी जल्दी है, काम निपटाइए। यह लीजिये, बैठ गए काम करने।

सेणी भा’सा – सच कहा, आपने। आपके महकमें की बात है, न्यारी। आख़िर ठहरा, बुद्धिजीवियों का महकमा।

[इन लोगों की गुफ़्तगू बढ़ती देखकर, प्यासा मरता फ़क़ीर हो जाता है, परेशान। इनकी झकाल, ख़त्म होने का नाम ही नहीं ? ऊपर से सेणी भा’सा ने, इस बेचारे फ़क़ीर को अलग से बैठा दिया यहां ? इधर दूर-दूर तक, अरुण कहीं नज़र नहीं आ रहा है ? अब बार-बार इस फ़क़ीर का उतावली करते हुए, इसका उचकना वास्तव में वाज़िब है।]

फ़क़ीर – अरे साहब, हजूरे आलिया। तिरसा मर रिया हूं मैं, अब अल्लाह कसम आपकी यह गुफ़्तगू कब ख़त्म होगी ?

[वह बेचारा फ़क़ीर उठना चाहता है, मगर सेणी भा’सा उसका कंधा पकड़कर उसे वापस बैठा देते हैं। फिर, उसे डपटते हुए कहते हैं]

सेणी भा’सा – [डपटते हुए, कहते हैं] – सीधा-सीधा बैठ जा, फ़क़ीर बाबा। कह दिया तूझे एक बार, बर्फ आ रहा है, फिर..

[आगे सेणी भा’सा क्या कहते ? उनको सामने से अरुण आता हुआ दिखायी देता है, उसे देखते ही वे ज़ोर से चिल्लाकर कहते हैं]

सेणी भा’सा – [ज़ोर से, उसे आवाज़ देते हुए कहते हैं] – डोफा। ऐसे क्या चल रहा है, डोलर हिंडे की तरह ? फ्रीज़ में जमाकर लाया है..[भद्दी गाली बोलते हुए कहते हैं] तेरी मां का..

अरुण – [समीप आकर, नाराज़गी से कहता है] – यह लीजिये भा’सा, आपका बर्फ। अब डालो इस बर्फ को, इस फ़क़ीर की...[गाली बोलता है] में। फकीरों के लिए, क्यों हमें गालियां देते जा रहे हैं भा’सा ? [होंठों में कहता है] यह फ़किरिया नालायक माता का दीना, आ गया कहां से ? नालायक के कारण, ऐसे लोगों की गालियां सुननी पड़ती है।

[अरुण सेणी भा’सा को बर्फ थमा देता है, फिर भा’सा उस फ़क़ीर के जग में बर्फ डाल देते हैं। बर्फ लेकर वह फ़क़ीर उठता है, मगर जैसे ही वह फ़क़ीर उठता है..उसकी लुंगी उसके पाँव के अंगूठे में, अलूज जाती है। बेचारा फ़कीर आज़ गलती से, लुंगी की गांठ लगाना भूल गया। अब उतावली में वह फ़क़ीर अपना पाँव आगे बढ़ा देता है, जो आगे लेटे काबरिये कुत्ते के ऊपर रख देता है। पाँव के नीचे कुचले जाने पर, वह कुत्ता दर्द के मारे किलियाता है। फिर झट उठकर वह, फ़क़ीर की पिंडली को काट जाता है। फिर क्या ? दर्द के मारे, वह फ़क़ीर ज़ोर से चिल्लाता है। इधर गांठ नहीं दी जाने से, लुंगी खुलती नज़र आती है। फिर क्या ? या तो जग नीचे गिराकर नंगे होने से बचे, या फिर वह जग में रखे बर्फ़ को बचाए ? बस उसके सामने, एक ही विकल्प बचता है। अपनी इज्ज़त को सलामत रखना ही, उसे वाज़िब लगता है। झट वह जग को कुत्ते के ऊपर गिराकर, दोनों हाथ से लुंगी थाम लेता है। इस तरह, वह नग्न होने से बच जाता है। अब बर्फ का सत्यानाश होते देखकर, भा’सा हो जाते हैं नाराज़। और लाल-पीले होकर, उस फ़क़ीर का गला पकड़ लेते हैं। फिर देते हैं, उसे...भद्दी-भद्दी गालियां।]

सेणी भा’सा – [फ़क़ीर की गरदन पकड़कर, कहते हैं] – ए फ़क़ीरड़े ज़ेब के पैसे ख़र्च करके बर्फ मंगवाया था, और तू मां का...[गाली की पर्ची निकालते हैं] मुफ़्त का माल समझकर बर्फ को नीचे गिरा दिया, हरामखोर।

फ़क़ीर – [गला छुड़ाता हुआ, कहता है] – अरे साहब, छोडो मुझे। आप मुझे, गाली क्यों देते हैं ? मेरी क्या ग़लती ? जग नहीं गिराता, तो सबके सामने नंगा हो जाता क्या ?

सेणी भासा – [गला छोड़कर, कहते हैं] साला मंगता फ़क़ीर, तूझे किसकी लाज़ ? तू तो साला, पहले से फ़क़ीर ठहरा ? तूझे कपड़ो से, क्या लेना-देना..? हो जाता, नंगा ?

[आस-पास खड़े यात्री सेणी भा’सा की बात सुनकर, ज़ोर का ठहाका लगाकर हंसते हैं।]

फ़क़ीर हुज़ूर हम फ़क़ीर बाबा ज़रूर हैं, इसीलिये हमें क्या करना है कपड़ो का ? अल्लाह ने आसमान की चादर व ज़मीन का बिछोना दिया है..वह ही कपड़ा, हमारे लिए पर्याप्त है। जनाब, हमारे लिए इन सांसारिक कपड़ो में रहना और बिना कपड़ो में रहना दोनों बराबर है। आप जैसे इंसानों के लिए होती है शर्म, बस इसी को बचाने के लिए गिरा दिया बर्फ़।

इतना कहकर, फ़क़ीर ख़ाली जग उठाता है और लुंगी को थामे वहां से चला जाता है।

[सन्नाटा छा जाता है, आख़िर इस सन्नाटे को तोड़ते हुए घेवरसा कहते हैं]

घेवरसा हम लोगों की इज़्ज़त कायम रखने के लिए, बेचारा फ़क़ीर प्यासा रह गया। वाह रे, फ़क़ीर बाबा। तू तो कमाल का निकला रे..सभ्य-समाज की लाज़-शर्म बचाने के लिए, तेरी यह क़ुरबानी व्यर्थ नहीं जायेगी।

[दयाल साहब दौड़ते-भागते आते दिखायी देते हैं, उनकी नज़र सर्वोदय नगर वाली फाटक पर गिरती है..जिसे गेट-मेन बंद कर रहा है। इधर बहुत दूर से, गाड़ी सीटी देती हुई दिखाई देती है। सीटी की आवाज़ सुनकर, अब दयाल साहब के दिल की क्या हालत हुई होगी ? या तो वे ख़ुद जाने, या उनका लाल सांई जाने। बेचारे प्लेटफोर्म दो की चारदीवारी फांदकर प्लेटफोर्म दो पर आते हैं। अब पटरियां पार करने की उनकी मंशा जानकर, प्लेटफार्म नंबर एक पर..तख़्त पर बैठे दीनजी भा’सा दयाल साहब को, आवाज़ देते हुए ज़ोर से कहते हैं]

दीनजी भा’सा – [ज़ोर से आवाज़ देते हुए, कहते हैं] – दयाल साहब। प्लेटफोर्म के नीचे कूदना मत, आपको पटरियां पार नहीं करनी है। यह अपनी, जोधपुर जाने वाली गाड़ी नहीं है। यह तो जनाब, मालगाड़ी है।

दयाल साहब – [लम्बी साँसे लेते हुए, कहते हैं] – आ हाss हाss ..लाल सांई झूले लाल आज़ बचा दिया मुझे, पापड़ तोड़कर। न तो अभी मैं, इस माल गाड़ी के नीचे आ जाता ?

[तभी तेज़ी से, मालगाड़ी गुज़रती दिखायी देती है। अब मालगाड़ी के गुज़रने के बाद, जोधपुर जाने वाली गाड़ी के आने की संभावना बढ़ जाती है। अत: दयाल साहब प्लेटफोर्म एक पर जाने के लिए, पुलिए की ओर क़दम बढ़ाते हैं..तभी उनके रास्ते को काट जाती है, एक काली बिल्ली। वह म्याऊं म्याऊं की आवाज़ निकालती हुई, उनके आगे से गुज़र जाती है। दयाल साहब विज्ञान के जानकार होने के बावजूद ठहरे, दकियानूसी..! बिल्ली क्या गुज़री, उनके आगे से ? जनाब का दिल बैठ जाता है, के ‘शगुन अच्छे न रहे, अब सही वक़्त गाड़ी मिलने से रही।’ यह ख़याल दिमाग़ में आते ही, वे ऊंची सांस लेते हैं। फिर ज़ोर से, दीनजी भा’सा से कहते हैं]

दयाल साहब – [ज़ोर से, दीनजी से कहते हैं] - ख़ुश हो गए भा’सा, बिल्ली को भेजकर ? मेरे शगुन अच्छे न रहे, अब गाड़ी सही वक़्त नहीं आयी तो इसके दोषी आप ख़ुद होंगे। यह सब, आपके कारण हो रहा है।

दीनजी – साहब मेरे कारण नहीं, जनाब आपका प्यार पाकर यह बिल्ली स्वत: आपके पास आयी होगी ? मेरे भेजने से, शेर भी नहीं आता आपके पास। यह हो सकता है, कहीं उसे आपके वस्त्रों में चूहे की गंध आ रही हो ? शायद कहीं आपने बगीचे की टंकी से, सांप पकड़ने के लिए रशीद भाई से चूहे मंगवाकर उस टंकी में डाले हो ?

दयाल साहब – ऐसा है, आपके पास भी आ जायेगी बिल्ली..आपका प्रेम पाकर। फिर आप भी पाल लीजिये, बिल्ली। इतना शौक है तो..

दीनजी – ऐसा है, जनाब। बिल्ली को छोड़िये, मैं एक जबरे बिलाव को पाल चुका हूं ।

सेणी भा’सा – [आश्चर्य करते हुए, कहते हैं] – जबरा बिलाव..? क्या कहा, भा’सा..जबरा बिलाव ?

दीनजी – इसमें आश्चर्य की क्या बात है, भा’सा ? जनाब आप इस बिलाव को छोड़िये, आप हुजूरे आलिया शेर, चीता, भालू, हाथी कुछ भी पाल सकते हैं। मगर आपके दिल में होना चाहिए, इन जानवरों के लिए थोड़ा सा प्यार।

सेणी भा’सा – हुज़ूर, मुझे तो आप बख्सिये। आप अपने पाले हुए बिलाव की गाथा ज़रूर सुना दीजिये, मुझे।

दीनजी - जिस बिलाव को मैंने पाला था, उसकी गाथा दर्द भरी है। जो इंसान के झूठे आडम्बर, स्वार्थ और बनावटी रूप का उज़ागर करती है।

सेणी भा’सा – विस्तार से सुनाइये, जनाब। बिलाव आया कहां से, और उसके साथ कौन-कौनसी घटनाएं घटी ? जो मानव और जानवर के स्वाभाव को, उज़ागर करती है।

दीनजी – यह जिक्र उन दिनों का है, जब मैं पाली के सरकारी क्वाटर में रहता था। उस दौरान क्वाटर के चारों ओर, मैंने शानदार बगीचा तैयार किया। भा’सा, आपको क्या कहूं ? क्या बढ़िया सुगंध छोड़ती पुष्प की लताएं व पौधे, लगाये इस बगीचे में..अरे जनाब मालती, हरसिंगार, मधु-मालती, गुलाब, पर्दा बेल वगैरा पादपों को जब आप देखेंगे..तब आप अपने मुंह से कह देंगे, वाह वाह..

सेणी भा’सा – भा’सा, मुझे बगीचे की सुगंध नहीं चाहिए। मुझे आप, बिलाव की गाथा सुनाइये।

दीनजी – गाथा कह रहा हूं, भा’सा। उतावली क्यों करते हैं, जनाब ? सुनिए, बगीचे में २५ छायादार वृक्ष तैयार किये। उनकी डालियों पर परिंदों के निवास के लिए, घोंसले व परींडे लटकाये। अरे जनाब, इन घोंसलों में रायकाणी, गोरैया, सोहन चिड़िया वगैरा नस्ल की चिड़ियाएं आकर बसेरा करने लगी।

सेणी भा’सा – [सर पर हाथ रखते हुए, कहते हैं] – कुछ और...?

दीनजी - इस बगीचे में सीमेंट के चबूतरे बने थे, उन पर प्रात: ज्वार-बाजरी के दानें बिखेर देता था। वहां चिड़िया, कबूतर, तोते आदि पक्षी झुण्ड के झुण्ड आकर दाना चुग लिया करते। लोबी का दरवाजा बगीचे में खुलता था, उसको खोलते ही ये सारे परिंदे उड़कर ऐसे सामने आते..मानो वे स्वागत के लिए, वहां पहले से मौज़ूद हो।

सेणी भा’सा – अभी-तक बिलाव का जिक्र नहीं आया है, जनाब। बिलाव के बारे में, कुछ कहिये ना।

दीनजी – धीरज रखिये, भा’सा। सुनिए, रोज़ रात के ८ बजे एक बिलाव आता था बगीचे में। वह लोबी के दरवाज़े के पास आकर, म्याऊं म्याऊं की आवाज़ निकालता हुआ दरवाज़ा खटखटाता था। उसकी आवाज़ सुनते ही, मैं दरवाज़ा खोलकर..कटोरी भरा दूध, उसके सामने रख देता। वह दूध पीकर, रवाना हो जाता।

सेणी भा’सा – इस गाथा में कहां है, जानवरों का प्रेम ? मुझे तो जनाब, कही दिखायी नहीं दिया ?

दीनजी – सुनिए। दूध पीकर वह बिलाव हर कमरे में चक्कर काटता, और बाद में मेरे पांवो में प्रेम से लोटता हुआ अपनत्व दर्शाता। मैं उसके बदन को, हाथ से सहलाता। इस तरह रोज़...

सेणी भा’सा – मगर, आगे क्या ?

दीनजी भा’सा – पड़ोस के क्वाटर नंबर एक में, जंगबहादुर सिंहजी का परिवार रहता था। ये जनाब, सेशन कोर्ट में नाज़ीर के पद पर कार्य करते थे। इनके तीन पुत्रियां थी। क्वाटर नंबर ६ में मुंसिफ़ कोर्ट के सरकारी वकील [ए.पी.ओ.] माथुर साहब का परिवार रहता था, इनके दो पुत्रियां थी..जिनके नाम, विनिता और सुनीता रखे गए।

सेणी भा’सा – बाकी का भी बखान कर दीजिये, जनाब।

दीनजी – लीजिये, अभी करता हूं..आप सुन लीजिये, शौक से। और क्वाटर नंबर दो में आयुर्वेदिक विभाग के दफ़्तरे निगार तुलसी दासजी का परिवार रहता था, उनके एक छोटा सा बेटा व एक एक बेटी थी। बेटे का नाम था, छोटा पप्पू। वह बहुत शैतान था।

सेणी भा’सा – मगर, आगे क्या ?

दीनजी भा’सा – जंगबहादुर सिंहजी के क्वाटर की खिड़की के पास, एक पाइप लगा था। छत पर रखी पानी की टंकियों से, पानी ओवरफ्लो होकर इसी पाइप से बाहर आता। इस पानी को काम में लेने के लिए, मैंने वहां पुष्पों का शानदार बगीचा तैयार किया। उस बगीचे में गुलदाउदी, मेरी गोल्ड, चमेली मोगरा आदि पुष्पों के पौधे तैयार किये।

सेणी भा’सा – आगे कहिये, भा’सा।

दीनजी - सुबह-सुबह वह बिलाव, पानी देते वक़्त मेरे पास आकर खड़ा हो जाता। मैं इधर इस बगीचे के पौधो को पानी दे रहा होता, और उधर माथुर साहब वहां आ जाते पीपल को सींचने के लिए। पानी सींचकर, वे मेरे पास आकर बगीचे के पुष्प मुझसे मांगकर लेते......

सेणी भा’सा – मुफ़्त के पुष्प लेते ? बाज़ार से खरीदते क्यों नहीं, जनाब ?

दीनजी – जहां मुफ़्त के पुष्प मिलते हैं, वहां बाज़ार जाकर कौन ख़रीदेगा..पुष्प ? सुनिए, एक रोज़ वकील साहब के आते ही मैंने इस बिलाव को जाने का इशारा किया। इशारा पाते ही वह बिलाव झट वहां से रुख्सत हो गया। फिर जाकर वह, लोबी के दरवाज़े के पास खड़ा हो गया। इस मंज़र को देख रहे माथुर साहब, आश्चर्य से कहने लगे “भा’सा, यह कैसे हो गया ? क्या आप, जानवरों को वशीकरण करना जानते हैं ?

सेणी भा’सा – सच कह रहे हो, भा’सा ?

दीनजी – सत्य है। मैंने माथुर साहब से कहा वशीकरण नहीं जनाब, प्रेम से ये जानवर स्वत: आकर्षित होकर आपके पास भी आ सकते हैं। इसमें, कोई आश्चर्य की बात नहीं। बस शर्त यही है...

सेणी भा’सा – फिर क्या ? आगे कहिये, जनाब।

दीनाजी – फिर मैंने आगे कहा कि, ‘आपको इन बेज़ुबान जानवरों से रखना होगा, प्रेम..। आपके प्रेम रुपी बंधन से आकर्षित होकर आपके पास भी आ सकते हैं वकील साहब, बस आपको अपना दिल साफ़ रखना होगा।

सेणी भा’सा – बात आपकी सौ फीसदी सही है, इस मामले में वशीकरण की कोई ज़रूरत नहीं। देखिये आप रोज़ गाय-कुत्तों को रोटी देते हैं, वे सही वक़्त आपके दरवाज़े पर आकर खड़े हो जाया करते हैं।

दीनाजी भा’सा – यह बात समझदार आदमी ही समझ सकता है, मगर स्वार्थ, लोभ माया में फंसे लोग कभी इस प्रेम को समझ नहीं पाते। उनके लिए, पैसा ही सब-कुछ होता है। माथुर साहब भी इसी तरह के आदमी ठहरे, शो-बिज़नस वाले..जिनको प्रेम-भावना की कोई कद्र नहीं।

सेणी भासा प्रेम ही इस ख़िलकत का अनुपम रत्न है, जिसे इसकी पहचान है..वही सच्चा जौहरी है।

दीनजी – आगे सुनिए, तब माथुर साहब बोले ‘मुझे भी बिलाव से प्रेम है। मैं भी बिलाव को दूध पिलाऊंगा।’ फिर वे धीमे से बोले ‘फिर मकान में चूहे नहीं रहेंगे।’ इस तरह सेणी भा’सा, माथुर साहब का स्वार्थ स्वत: सामने आ गया। [पुल की तरफ़ देखते हुए] लीजिये सेणी भा’सा, दयाल साहब सीढ़ियां उतरकर आ रहे हैं। अब बिलाव की बातें, बाद में करेंगे।

[दयाल साहब, पुलिया उतरकर आते हैं। प्लेटफोर्म पर लगी घड़ी, शाम के साढ़े चार बजने का वक़्त बता रही है। आज़ गाड़ी लेट है। यात्रियों की भीड़, प्लेटफोर्म पर बढ़ चुकी है। इतने में उदघोषक, रेडिओ पर घोषणा करता है]

उदघोषक – [घोषणा करता हुआ कहता है] – बैंगलूर-चेन्नई एक्सप्रेस, शीघ्र ही प्लेटफार्म नंबर दो पर आ रही है। जोधपुर जाने वाले यात्री गण उतरीय पुल का इस्तेमाल करके, प्लेटफोर्म नंबर दो पर चले जायें। कोई भी यात्री पटरियां पार नहीं करें, पटरी पार करना कानूनी अपराध है।

दयाल साहब – [नाराज़गी के साथ कहते हैं] – ओ भा’सा। अब देख लो, गाड़ी प्लेटफोर्म नंबर दो पर आ रही है, अब मुझे वापस इन पांवो को तक़लीफ़ देनी होगी। यह सब आपके कारण हुआ, यदि आप बिल्ली को मेरे सामने नहीं भेजते, तो शायद ऐसा नहीं होता। [अंगड़ाई लेते हुए, कहते हैं] अरे लाल सांई झूले लाल, क्या करूं ? अब वापस, उतरीय पुल चढ़ना होगा।

[बैग उठाये दयाल साहब, पुल चढ़ने के लिए क़दम आगे बढाते हैं। उनके जाते ही, आर.एम.एस. दफ़्तर वाले गेट से रतनजी, ओमजी और रशीद भाई बाहर निकलकर इधर इस तख़्त के पास आते दिखायी देते हैं। अब सेणी भा’सा, दीनजी से कहते हैं]

सेणी भा’सा – आगे क्या हुआ, जनाब ? क्या माथुर साहब ने, उस बिलाव को दूध पिलाया या नहीं ?

दीनजी – देखिये जनाब, गाड़ी आ रही है। और आप जानते ही हैं, भारी शरीर होने के कारण मैं दौड़कर गाड़ी पकड़ नहीं सकता। इस कारण अब अगली गाथा गाड़ी के अन्दर ही बांचेंगे। आप आगे चलिए, मैं पीछे आ रहा हूं ।

रतनजी – [नज़दीक आकर कहते हैं] – भा’सा, आप यहां बैठे हैं ? जनाब प्लेटफोर्म पर ठौड़-ठौड़ जाकर, आपको ढूढ़ने की भरसक कोशिश की है..मगर अब यहां आने पर, आपके दीदार हुए। क्या कहूं, आपसे ? ढूंढ़ते-ढूंढ़ते, इन आखों में दर्द होने लगा। अब संभालो, अपने सेवाभावी रशीद भाई को।

सेणी भा’सा – भा’सा मैं जा रहा हूं पटरियां पार करके, प्लेटफोर्म नंबर दो पर। अब आप संभाल लेना, अपने सेवाभावी रशीद भाई को। और इनको बैठाकर, तसल्ली से खैरियत पूछ लीजिये। लीजिये, मैं तो यह गया..प्लेटफोर्म नंबर दो पर।

[सेणी भा’सा जाते हुए दिखायी देते हैं, और रशीद भाई मुंह चढ़ाकर बैठ जाते हैं दीनजी भा’सा के पास। अब रशीद भाई तुनककर, कहते हैं]

रशीद भाई – [तुनककर कहते हैं] – मैं कोई, संभालने की चीज़ हूं ? ख़ुदा ने इनायत किये है, ये दो हाथ और दो पांव। ज़रूरतमंदों की मदद करने से, ये मेरे हाथ-पांव घिस नहीं जाते ? आपको ज़रूरत हो सेवा की, तो कह दीजिये मुझे। जैसी मेरी क़ाबिलियत होगी, मैं आपकी मदद कर लूंगा।

रतनजी – [रशीद भाई से, कहते हैं] - मुझे नहीं करवानी आपसे सेवा, जैसे आप मोहनजी को पानी पिला-पिलाकर उन्हें बनाते जा रहे हैं अकर्मण्य। वैसा, मुझे नहीं बनना। अब बेचारे..

रशीद भाई – काहे शर्म करते हैं, कह दीजिये..मोहनजी को, कैसा बना डाला ? मन में मत रखो, भड़ास...

रतनजी – अब पाली स्टेशन आते ही, मोहनजी प्लेटफोर्म पर निगाहें फेंकते हुए रशीद भाई को आवाज़ देते हैं [मोहनजी की आवाज़ की नक़ल उतारते हुए, उनकी आवाज़ में बोलते हैं] ‘ए रे रशीद भाई कढ़ी खायोड़ा। पानी की बोतल तो भरता जा...!’ मगर, रशीद भाई क्यों सुनेंगे ? उनको तो [दीनजी भा’सा की तरफ़ देखते हैं]..

दीनजी भा’सा – आगे कहिये, जनाब। मेरा मुंह काहे ताक रहे हैं, आप ? कहीं आप अगला जुमला बोलना, भूल गए क्या ?

रतनजी – उनको तो जाना है दफ्तर, भा’सा आपके स्कूटर पर बैठकर।

दीनजी – फिर, आगे क्या ? चलिए, रशीद भाई नहीं आते हैं..तब जनाबे आली मोहनजी, क्या करते हैं ?

रतनजी – करे क्या ? करे गोबर, और क्या ? फिर बेचारे, प्लेटफोर्म पर खड़े दूसरे यात्रियों को आवाज़ देते हैं [नक़ल उतारते हुए, कहते हैं] ‘ओ बाबू साहब, ज़रा पानी की बोतल भरकर देना जी।’

दीनजी – जब रशीद भाई उनके लिए बोतल भरकर नहीं लाते, तब दूसरे अज़नबी यात्री पानी की बोतल भरकर क्यों लायेंगे ? क्या वे इनके मासी के बेटे भाई हैं, जो प्रेम से..?

रतनजी – आख़िर, मोहनजी ख़ुद बोतल लेकर उतरते हैं प्लेटफोर्म पर। फिर शीतल जल के नल के पास जाकर, जैसे ही पानी भरकर खड़े होते हैं, और तभी गाड़ी प्लेटफोर्म छोड़ देती है..फिर, बेचारे मोहनजी की क्या हालत होती होगी ? रामसा पीर जाने।

दीनजी हां रतनजी, रशीद भाई तो होनहार सेवाभावी है। मगर..

रशीद भाई – [गुस्से में कहते हैं] – रतनजी, काहे मेरी मज़ाक उड़ा रहे हैं आप ? अब मैं इस सेवाभावी टाइटल को देता हूं, लाप्पा। सेवा करते-करते, मैंने तक़लीफ़ें ही पायी है। अब तो भय्या, कहीं सेवा मुक्ति केंद्र खुल जाय तो मैं वहां बची हुई ज़िंदगी बसर कर लूंगा।

दीनजी – ऐसी कौनसी देण हो गयी आपके, जो आप ऐसे बोल रहे हैं ?

रशीद भाई – आदत से लाचार..मेरा जीव, बस...अब मानता नहीं। बहुत कर ली सेवा, अब करूं क्या..दीनजी ? अब, मुझसे सेवा होती नहीं।

दीनजी – आदत से लाचार ? आप ऐसे क्यों हो रहे हैं, दुखी ?

रशीद भाई – मेरा दिल-ए-दर्द मुझे मालुम है..[टोपी हटाकर सर पर लगी चोटें, दिखलाते हैं] ये देखिये मेरे सर को, कहाँ-कहाँ लगी है चोटें...? यह सिर इन शैतान कौओं की चोंचो का प्रहार झेल चुका है..उसी को पीड़ा का अहसास होता है, जिसने ये प्रहार झेले हों।

ओमजी देखिये जनाब जिसके सर पर कौआ चोंच मारता है, वह आदमी भाग्यशाली होता है।

रशीद भाई – [गुस्से में] – ऐसे ख़ुशअख्तर आप भी बन जाइए, कौए की..

दीनजी – यार रशीद भाई, क्यों करते जा रहे हैं..आप, इनसे इतनी झकाल ? इनसे झकाल करने के पहले बिदामें खाई हुई होनी चाहिए ? [बैग से सोफरामाइसन ट्यूब निकालकर, उन्हें देते हैं] यह लीजिये, ट्यूब। अपनी चोटों पर, मसल दीजिये।

[रशीद भाई उनसे ट्यूब लेकर, सर की चोटों पर मसलते हुए कहते है]

रशीद भाई – देखिये, उदघोषक बोल गया है ‘गाड़ी प्लेटफोर्म नंबर दो पर आ रही है। अब गाड़ी आने में ज़्यादा देर नहीं है। अब चलिए, प्लेटफोर्म नंबर दो पर।

[सभी अपने बैग उठाकर उतरीय पुल चढ़ते हैं, और प्लेटफोर्म नंबर दो पर आते हैं। इस प्लेटफोर्म पर, कई ग्रेनेनाईट के तख़्त लगे हैं। एक तख़्त पर, सेणी भा’सा और दयाल साहब बैठे हैं। गाड़ी शीघ्र आने की सूचना पाकर, कई यात्री प्लेटफोर्म पर चहलक़दमी का रहे हैं। अब सभी, दयाल साहब के पास आते हैं।]

रशीद भाई – [नज़दीक आकर, हाथ जोड़ते है] – साहब, नमस्कार।

दयाल साहब – नमस्कार भाई, नमस्कार। बैठिये जनाब, आ ही गए तो।

[सेणी भा’सा और दयाल साहब थोड़ा एक तरफ़ खिसक जाते हैं, ख़ाली जगह पर सभी बैठ जाते हैं। अब बैठने के बाद, दीनजी भा’सा रशीद भाई से कहते हैं]

दीनजी – अब अच्छी तरह से बैठ गए रशीद भाई, अब कहिये क्या हुआ ?

सेणी भा’सा – नहीं जनाब, पहले दीनजी भा’सा किस्सा कहेंगे के ‘आगे उस बिलाव का, क्या हुआ ?’

[बिलाव का नाम सुनते ही दयाल साहब को, उनका रास्ता काटने वाली बिल्ली याद आ जाती है। अब वे दीनजी भा’सा की तरफ़ खारी-खारी नज़र से उन्हें देखते हुए, कहते हैं]

दयाल साहब – [दीनजी को देखते हुए, कहते हैं] – क्या कहना, बिल्ली का ? आयी और चली गयी। भा’सा ने भेजी थी, मेरे शगुन ख़राब करने के लिए। देख लो, अभी-तक गाड़ी नहीं आयी है। यह सब, शगुन ख़राब करने से हुआ है।

दीनजी – [हंसते हुए कहते हैं] – साहब, आपका रास्ता रोकने वाली बिल्ली की बात नहीं कर रहे हैं। सेणी भा’सा तो उस बिलाव का किस्सा कहने का निवेदन कर रहे हैं, जो सरकारी क्वाटरों में घुमा करता था। [सेणी भा’सा से कहते हुए] सेणी भा’सा, गाड़ी में बैठकर आराम से किस्सा बयान करेंगे। अभी तित छोड़ो, भा’सा। आराम करने दीजिये, ना।

रशीद भाई – दीनजी, आप आराम कीजिये। मुझे थमा दिया आपने, सेवाभावी का टाइटल। [सबसे कहते हैं] अब आप सभी दे दीजिये अपनी ख़ाली बोतलें, ठंडा पानी भरकर लेता आऊं..आप सब के लिए।

रतनजी – कहां जा रहे हैं, जनाब ? सारे दिन आपको पानी-पानी के सिवाय, कुछ दिखायी नहीं देता ? राणकपुर एक्सप्रेस आ रही है, सुन लीजिये आप..उसकी आवाज़ सुनायी दे रही है ?

[सीटी की आवाज़ सुनायी देती है, आवाज़ सुनकर रतनजी रशीद भाई से कहते हैं]

रतनजी – देख लो, आ रही है गाड़ी। अभी पटरियां पार करते-करते आप, मौत को गले लगा लेते ?

[सीटी देती हुई, राणकपुर एक्सप्रेस प्लेटफोर्म नंबर एक पर आती है]

ओमजी – यह लीजिये, मेरी बात सच्च हो गयी है। बाबा रामसा पीर की कृपा से राणकपुर एक्सप्रेस आ गयी है, प्लेटफोर्म नंबर एक पर। इस कारण रशीद भाई अब ठंडा पानी लाने के लिए, प्लेटफोर्म नंबर एक पर जा नहीं सकते..

रतनजी - बस जनाब, वे मेहनत करने से बच गए। तब ही...

ओमजी – मैं कहता हूं, कौआ भाग्यशाली आदमी के सर पर चोंच मारता है।

रशीद भाई – मेरा शरीर है, नाशवान। इस शरीर से जितनी बन पड़े, मुझे सेवा करनी चाहिए। मेहनत से बच गए, कहने से काम नहीं चलता। मुझे सेवा करनी होगी, तो मैं उतरीय पुल चढ़कर ठंडा पानी लेकर आ जाऊंगा।

दीनजी – आपको फ़िक्र नहीं है, जनाब। मगर, हम लोगों को आपकी फ़िक्र है। ऐसा शौक है तो आप, बाद में लेकर आ जाना..पानी। अभी रतनजी की बोतल में, पानी बचा है..अभी हम, उससे काम चला लेंगे। अभी आप यह बताये, आपके सर पर कौए ने चोंच क्यों मारी ? कहीं आपने कोई छेड़कानी की होगी, उसके साथ।

[रशीद अंगड़ाई लेते हैं, फिर होठ के नीचे तैयार ज़र्दा रखते हुए कहते हैं]

रशीद भाई – आज़ दोपहर का वक़्त था, हम लोगों ने खाना खाया..फिर लेट गए नीम तले। तब नीम पर कांव-कांव करते कौए, उसके चारों ओर मंडराने लगे। मैंने सामने देखा, एक कुत्ता दबे पांव नीम की तरफ आ रहा था। ये कौए उसको बार-बार चोंचे मारते जा रहे थे, इसके बाद...

ओमजी – फिर क्या ? मैंने उठाया, पत्थर। और निशाना लगाकर, उस कुत्ते पर फेंका। तब ये जनाब मुझे कहने लगे “ओमजी, कुत्ते को पत्थर मारकर आपने पाप किया है।” ज़वाब देते हुए मैंने कहा “रशीद भाई, आप ऐसे सेवाभावी बने हैं..तब आपको घोंसले से नीचे गिरा यह कौऐ का चूज़ा, आपको दिखाई क्यों नहीं दे रहा है ?

रतनजी – आगे ओमजी ने यही कहा ‘उस चूज़े का शिकार करने वाले इस कुत्ते को, पत्थर मारकर भगा दिया, मैंने। यह काम पुण्य का है, या पाप का ? आप ख़ुद ही, निर्णय कर लीजिये जनाब।”

रशीद भाई – इतना सुनकर, मैंने वृक्ष के नीचे देखा..वहां कौए का छोटा बच्चा “कैं कैं” की आवाज़ करता, फुदक रहा था। उस बेचारे के पंख पूरे आये नहीं, इस कारण उसके मां-बाप उसके ऊपर “कौं कौं” की आवाज़ करते उस पर मंडरा रहे थे। इतने में तगारी लिए आ गया, चाय की होटल वाला छोरा कानिया।

रतनजी – [हंसते हुए कहते हैं] – वह कमबख़्त कानिया बोला, के “अंकलजी इस तगारी को रख लीजिये अपने सर पर, टोप की तरह। इसके बाद आप इस बच्चे को उठाकर, इसके नीड़ में रखना..क्योंकि आप, कौए की आदतें जानते नहीं। इसलिए मैं आपको, चेतावनी के तौर पर कह रहा हूं।

रशीद भाई – मुझे क्या पता था ? यह छोरा मुझे बचने का साधन बता रहा है, या मेरी मज़ाक उड़ा रहा है ? नासमझ बनकर मैंने कह दिया उसे, के “कानिया, क्या तू मुझे डोफा समझता है ? मेरे उस्ताद दयाल साहब से, मैंने अच्छी तरह से सीख लिया है के, दस्ताने पहनकर ही, पक्षी के चूज़े के हाथ लगाना चाहिए..मुझे ज़रूरत नहीं, इस तगारी की।

रतनजी – आगे ये डेड होशियार रशीद भाई, कहते हैं “बिना दस्ताना पहने इस चूज़े को छुआ तो इस चूज़े के जर्म्स, मेरे हाथों पर आ सकते हैं। इस तरह दस्ताने पहनकर, चूजे की बीमारी से बचा जा सकता है। अबे ए डेड होशियार, तू मेरे सर पर तगारी रखवाकर..मेरी इज़्ज़त की, बख़िया उधेड़ना चाहता है ?”

दीनजी – आगे, क्या हुआ ?

रशीद भाई – मैंने उस भले छोरे की बात नहीं मानी, झट हाथ में दस्ताना पहनकर उस कौए के चूज़े को उठाया, फिर घोंसले में रखने के लिए झट पेड़ पर चढ़ने की कोशिश करने लगा..तभी आयी मुसीबत। ख़ुदा रहम, ख़ुदा रहम।

रतनजी – [हंसते हुए, कहते हैं] – फिर क्या ? कौए का जोड़ा, इनके पीछे पड़ गया। भईजी डेड होशियार सेवाभावी का माथा सूजा दिया, चोंचे मार-मारकर। मगर, डेड होशियार महोदय इतनी चोंचे खाने के बाद भी, आख़िर जनाब पेड़ पर चढ़ गए..और चूज़े को घोंसले में रखकर ही, इन्होंने दम लिया।

दीनजी – वाह रशीद भाई, वाह। क्या कहना है, आपका ? आपको दधीची का ख़िताब मिलना चाहिए, एक ने अपनी हड्डियां दान दी तो दूसरे ने पर हित में अपना माथा हाज़िर कर दिया, धर्म के काम के लिए।

रशीद भाई – [ख़ुश होकर, कहते हैं] – भा’सा शुक्रिया, मगर यह कुचमादी का ठीकरा कानिया क्या बोला ? के, ‘अंकलजी आप इस कौए के बच्चे को अपनी हथेली पर बैठाकर, इस दफ़्तर के चारों ओर चार चक्कर काट लीजिये..तो मैं आपको, एक सौ एक रुपये दूंगा। बोलो, आपको शर्त मंज़ूर है या नहीं ?’

रतनजी – तब मैंने उससे कहा, के “डोफा, पहले यहां रख इस हथेली पर एक सौ एक रुपये। फिर तू तो चार-चार चक्कर कहता रह जाएगा, और तेरे अंकलजी चक्कर काट लेंगे पूरे दस।”

रशीद भाई – कानिया के भईजी, कानिये को एक रूपया भी नहीं देते उसे ख़र्च करने के लिए। और यह कुतिया का ताऊ शर्त लगाने चला, एक सौ एक रुपयों की। तब मैंने उससे कहा, के “पहले तू जाकर तेरे भईजी को बुलाकर यहाँ ला, फिर उनके सामने तू लगाना शर्त। फिर तू चार-चार चक्कर कहता रह जाएगा, और मैं काट लूंगा पूरे दस चक्कर।”

रतनजी – आगे मैंने कह दिया, के “अगर तू रुपये नहीं देगा, तो तेरे भईजी की ज़ेब से निकालकर हम वसूल कर लेंगे।

ओमजी – इतना सुनते ही, वह छोरा सर पर पांव रखकर दौड़ा..बतूलिये की तरह। उसको ऐसा लगा, ‘मानो उसके भईजी जलावन की लकड़ी लिए, उसके पीछे दौड़ते आ रहे हैं ?’ फिर मैंने सेवाभावी महानुभव से कहा, “भाई सेवाभावी अब आप भूल जाओगे, ना...किसी की सेवा करनी।”

रशीद भाई मैंने कह दिया, के मैं ऐसा पूत नहीं, जो बाधा आने पर भलाई का मार्ग छोड़ दे ? अरे, जनाब। यह कौए की जोड़ी मेरा कितना ही खून निकाल ले, मगर मैं सेवा का मार्ग नहीं छोडूंगा। इतना कहकर मैंने अपने सर पर लोहे की तगारी रखी, फिर चढ़ा पेड़ पर..

दीनजी – एक बार और, चढ़ गए ? अरे यार, आपको तो बीमारी लग गयी..बार-बार चढ़ने की ? कुछ तो शर्म कीजिये, जनाब। यह उम्र नहीं है, बार-बार चढ़ने की।

रतनजी – [लबों पर मुस्कान बिखेरते हुए, कहते हैं] – अरे दीनजी, मैं इनको बार-बार कह-कहकर थक गया, के “यह कोई उम्र है आपकी, बार-बार उतरने-चढ़ने की ? अब तो जनाब, सुनने की उम्र है। [ठहाका लगाकर, कहते हैं] सुनिए जनाब, उदघोषक घोषणा कर रहा है..

रशीद भाई – [खीजते हुए कहते हैं] – कैसे क्या ? एक-दो बार, क्या ? बीस बार उतरूंगा-चढूंगा, आख़िर मुझे घोंसले में देखना बाकी रह गया कि, ‘बच्चा घोंसले में अच्छी तरह से रखा गया, या नहीं ?’ चढ़ती बार तो भा’सा, मैं जानता हूं इन कौओं की क्या हालत हुई होगी ? जब उन्होंने लोहे की तगारी पर, चोंचे मारी होगी ? अब आप-लोग आराम से सुन लीजिएगा, इस डोफे उदघोषक की आवाज़।

उदघोषक – [घोषणा करता हुआ, कहता है] – बैंगलूर-चेन्नई एक्सप्रेस, प्लेटफोर्म नंबर एक पर शीघ्र आ रही है। यात्री गण उतरीय पुल का प्रयोग करें, पटरियों को पार करके आना-जाना रेलवे नियम के विरुद्ध है। नियम के उल्लंघन करने पर, सज़ा हो सकती है।

रतनजी – [लबों पर मुस्कान बिखेरकर, कहते हैं] – लीजिये बधाई हो, रशीद भाई। अब आप ख़ुदा रहम, ख़ुदा रहम बोलना मत। अल्लाहताआला ने, आपकी उतरने और चढ़ने की तमन्ना पूरी कर दी है।

रशीद भाई – क्या कहा, जनाब ?

रतनजी – मैंने कहा ‘अच्छी तरह सुन लेना, रशीद भाई। जनाब आपका उतरने-चढ़ने का शौक देखकर अल्लाह ताआला ने, गाड़ी वापस प्लेटफोर्म नंबर एक पर बुला ली है।’ [दीनजी से कहते हैं] भा’सा, आप चढ़ने के लिए तैयार हैं ? पुलिया चढ़ते-चढ़ते अब आप करना मत, हाम्फू-हाम्फू।

दीनजी भा’सा – देखिये रतनजी, इस तरह शरीर की अवस्था पर हंसा नहीं जाता।

रतनजी अब रोवो, अपने शरीर को लेकर ? पहले कहता था, शरीर को आरामदेह मत बनाओ। रोज़ घुमने जाया करो, न जाया जाता तो चलिए मेरे साथ रामदेवरा की पद यात्रा में। कीजिये मत, फ़िक्र। आपको आराम से, ले जाऊंगा।

दीनजी – अरे जनाब पहले आप यह बताएं, के ‘आप कभी किसी असक्षम आदमी को, पद यात्रा पर ले गए..या, नहीं ?

रतनजी – क्या कह रहे हैं, दीनजी भा’सा ? यहां तो मैंने, लूले क्या ? पांगले क्या ? डोकरे क्या, डोकरियों को क्या ? सब को यह पद-यात्रा, आराम से यात्रा करवायी है। इस सेवा के लिए, मुझे हिन्दू सेवा मंडल ने चुना है। आप मेरे साथ चलिए, आराम से ले जाऊंगा रामदेवरा। फ़िक्र करना मत, भा’सा। देखिये आप, मैं आपको ऐसे संभाल लूंगा..

[रतनजी झट खड़े हो जाते हैं, और लूले-पांगले लोगों के चलने की नक़ल करते हैं। और साथ-साथ कहते जाते हैं, के...]

रतनजी – [लूले-पांगले आदमियों के चलने का, अभिनय करते हुए बोलते जाते हैं] – आप ऐसे चलेंगे भा’सा, तब मैं आपको ऐसे संभाल लूंगा। फिर मैं आपको इस तरह पकड़ लूंगा, ताकि आप नीचे गिरेंगे नहीं। [मगर जैसे ही वे पीछे मुड़कर देखते हैं, न तो वहां रशीद भाई दिखाई देते हैं और ना दीनजी भा’सा। फिर क्या ? वे प्लेटफोर्म पर पागलों की तरह निगाहें फेंककर, उन दोनों को ढूंढ़ने की कोशिश करते हैं। इनको ऐसा करते देखकर, ओमजी हंसते हैं]

रतनजी – क्यों हंसते जा रहे हो, छक्के की तरह ? बता नहीं सकते, वे दोनों रुख़्सत हो गए। फिर मैं यहां खड़ा, पागलों की तरह किसे सुनाता जा रहा हूं ? क्या, इन दीवारों को ? 

ओमजी – रतनजी आपका प्रवचन बहुत अनमोल है, ज्ञानी-दानिशमंद व इल्म वाले इंसानों को ही समझ में आ सकता है। बेचारे रशीद भाई और दीनजी भा’सा में, कहां इतनी क़ाबिलियत ?

रतनजी – फिर, आप क्यों रुक गए ? आप भी, चले जाते।

ओमजी – मेरी बोतल आपके पास है, आप इसे दे देते..तो मैं भी, चला जाता। मुझे कोई चाव नहीं, आपका भाषण सुनने का ? बोतल दे दीजिये, और फिर चलिए प्लेटफोर्म नंबर एक पर। वहां चलकर, गाड़ी के यात्रियों को सुनाते रहना..आपका अनमोल भाषण। सच कहता हूं, आप तो हो..मोहनजी के माजने के।

[बैंगलूर-चेन्नई एक्सप्रेस सीटी देती हुई दिखाई देती है, थोड़ी देर में वह प्लेटफोर्म नंबर एक पर आकर रुक जाती है। अब दोनों प्लेटफोर्म नंबर दो से नीचे उतरकर, पटरियां पार करते हैं। फिर बैंगलूर-चेन्नई एक्सप्रेस के शयनान डब्बे में, दाख़िल हो जाते हैं। ये सारे शयनान डब्बे एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं, इन सब डब्बों में आने-जाने का रास्ता खुला है। अब मोहनजी अपने इन साथियों को ढूंढ़ते-ढूंढ़ते एस-४ डब्बे में आ जाते हैं। वहां दरवाज़े के पास खड़ा है, गुलाबो। वह इनको देखकर, हंसता है। मोहनजी भोला मुंह बनाकर, उससे हंसने का कारण पूछते हुए कहते हैं]

मोहनजी  - गुलाबा, तू और मैं एक जैसे हैं यार। जैसा तू है, वैसा ही मैं हूं। तू घुमता है पूरी गाड़ी में, और मैं भी घुमता हूं रे कढ़ी खायोड़ा..सभी शयनान डब्बो में। फिर यार, तू क्यों हंसता जा रहा है ठोकिरा..मुझे देखता-देखता ? बोल यार, अब खड़ा-खड़ा क्यों देख रहा है मुझे, कहीं तेरे पिछवाड़े में चूनिया तो नहीं काट रहे हैं कढ़ी खायोड़ा ?            

गुलाबो – [लबों पर मुस्कान बिखेरता हुआ, कहता है] – सरकारी ससुराल की हवा कैसे लगी रे, मेरे सेठ मोहन लाल ? अब और करेगा रे, टिकट चैक ? क्या एक बार और खिला दूं तूझे, ससुराल की हवा ?

[पछीत [बर्थ] पर सो रहे छंगाणी साहब का एक बूट, रशीद भाई युरीनल के पास लाकर छुपा देते हैं। अब वहां खड़े हैं मोहनजी, उनको क्या पता..यह किसका बूट है ? गुलाबा के खीजाते ही वे, उस बूट को उठाकर उसके ऊपर फेंक देते हैं। मगर गुलाबा ठहरा, पूरा गज़ब का गोला। वह ठोकिरा झट बूट को केच कर लेता है, फिर उसे लेकर गाड़ी के बाहर भाग जाता है। केबीन में बैठे ओमजी और रशीद भाई को, मोहनजी की गुस्से से भरी आवाज़ सुनायी देती है।]

मोहनजी – [गुस्से में, चिल्लाते हुए] – छक्के की औलाद। इधर मर, कढ़ी खायोड़ा। [गुलाबे के ऊपर बूट फेंकते हैं] मुझे ससुराल की हवा खिलाने वाला, तू है कौन ?

[युरीनल जाने हेतु छंगाणी साहब उठते हैं, और एक पांव में बूट डालकर फिर दूसरे पांव में बूट डालना चाहते हैं..मगर, अब यह दूसरा बूट उन्हें कहीं दिखाई दे..तो वे, उसे पहने ? तभी मोहनजी केबीन में दाख़िल होते हैं, इस वक़्त ओमजी छंगाणी साहब से पूछ रहे हैं ?]

ओमजी – क्या ढूंढ़ रहे हैं, जनाब ? कहीं आप ससुराल से आये बूट को तो, नहीं ढूंढ रहे हैं ? जिसे आप, अपने काळज़े की कोर की तरह रखते आये हैं ? अब क्या कहूं, जनाब ? उसे तो यह गुलाबा उठाकर ले गया, जनाब।

मोहनजी – [केबीन में दाख़िल होते हुए, कहते हैं] – मालिक छंगाणी साहब, कहीं युरीनल के पास पड़ा लावारिश बूट आपका तो नहीं था ?

रशीद भाई – फेंकने के पहले, मोहनजी आप सोच लेते..बूट किसका है ? आपको, क्या पता ? बेचारे छंगाणी कितने जतन से बीसों पैबंद लगाकर, अपना काम चला रहे थे, आख़िर वह बूट इनके ससुराल से आया हुआ बूट था..यानि इनकी काळज़े की कोर।

[गाड़ी का इंजन सीटी देता है, दीनजी, रतनजी, गोपसा और ताश खेलने वालों की इनकी पूरी टीम डब्बे में दाख़िल होती है। ऐसा लगता है, गाड़ी रवाना होने वाली है। इस कारण, ओमजी झट छंगाणी साहब को चेताते हुए उनसे कहते हैं..]

ओमजी – दौड़िए छंगाणी साहब, गुलाबे के पीछे। गाड़ी रवाना हो रही है, जनाब। जल्दी कीजिये। आपका बूट न मिला तो, आपकी मेम साहब आपको छोड़ेगी नहीं।

मोहनजी – [रशीद भाई से, कहते हैं] – यार रशीद भाई, अब आपका सेवाभाव दिखलाने का वक़्त आ गया है। आप दौड़िए उस गुलाबे हिंजड़े के पीछे, और ले आइये...!

[किसी यात्री ने, रास्ते में एक बड़ी संदूक रख दी है..जिसके पास ही इमरजेंसी वाली खिड़की है। उस खिड़की से ठंडी हवा आ रही है, यह जानकर मोहनजी उसी संदूक पर बैठ जाते हैं। बैठने के बाद वे खिड़की से बाहर झांकते हैं। तभी, ओमजी कहते हैं]

ओमजी – कुछ तो बताइयेगा, मोहनजी..रशीद भाई क्या लेकर आयें ? कोई खाने की चीज़ है, क्या ?

मोहनजी – [हंसते हुए कहते हैं] – हां रे, ओमजी कढ़ी खायोड़ा। खाने की मस्त चीज़ है रे, भाई ओमजी। आपको खानी है, क्या ?

रतनजी [सीट पर बैठते हुए, कहते हैं] वह भी छंगाणी साहब का भारी भरकम जूता, बीस पैबंद लगा हुआ ? अरे जनाब, वह भी इनके ससुराल से आया हुआ...इनके काळज़े की कोर, समझ गए ?

[इतने में गुलाबा आता है खिड़की के पास, और छंगाणी साहब का बूट फेंकता हुआ कहता है]

गुलाबा – [बूट फेंकता है, जो सीधा आकर मोहनजी के थोबड़े पर गिरता है] अरे ओ सेठ। देने की चीज़ देते नहीं, आप ? लीजिये आपके खाने की चीज़, आपको ही मुबारक।

[बूट आकर सीधा गिरता है, मोहनजी के चका-चक चमक रहे थोबड़े पर। फिर क्या ? बेचारे दर्द के मारे, ज़ोर से चिल्लाते है। उनको चिल्लाते देखकर, छंगाणी साहब अब अलग से फरमाते हैं]

छंगाणी साहब – जूत्ता आ गया, जनाब ?

मोहनजी [अपने रुख़सारों को दबाते हुए, कहते हैं] जूता आपका आ गया, जनाब। मगर, खाना मुझे पड़ा। [बूट को छंगाणी साहब के ऊपर फेंकते हुए, कहते हैं] यह लीजिये जनाब, आपके काळज़े की कोर।

[यह बूट आकर सीधा गिरता है, छंगाणी साहब के मुंह पर। अब वे अपने रुख़सारों को दबाते हुए, कहते हैं]

छंगाणी साहब – [ज़ोर से चिल्लाकर, कहते हैं] ओ तापी बावड़ी वाले, बालाजी बाबजी। यह क्या कर डाला, बेटी का बाप ? सवामणी का प्रसाद भेजना तो दूर, और यह क्या खाने के लिये भेज दिया आपने..बाबजी सा ?

ओमजी इसे ही समझ लीजिये, जनाब..के, क्या खाया ? खाया, बाल गोपाल का प्रसाद। बापूड़ा, अब आप यही समझ लीजिये। और लोगों को, कहना मत..के, क्या खाया ? खायी होगी, आपने...अपनी ख़ुद की चीज़..यानि, काळज़े की कोर।

[गाड़ी रवाना हो गयी है, रोज़ तो छंगाणी साहब दीनजी भा’सा से मांग-मांगकर खाते थे, बाल गुपाल का प्रसाद। अगर नहीं मिलता तो जनाब, मुंह चढ़ाकर बैठ जाया करते और किसी से बोलते नहीं। आज़ खायी उन्होंने अपने जूत्ते की प्रसादी, उस जूत्ते की प्रसादी..जिसे बहुत जतन से पैबंद लगा-लगाकर, वे उसकी उम्र बढ़ाते आ रहे हैं। ये वे ही जूत्ते हैं, जो इनके ससुराल से आये हुए हैं..यह बात याद आते ही, उन्हें याद आ जाती है अपनी मेम साहब की। अब उनको फ़िक्र हो जाती है, कब जोधपुर स्टेशन आयेगा, कब घर पहुंचेगे और कब उनकी दिल की रानी मेम साहब से मुलाक़ात होगी ?” सोचते-सोचते, वे वक़्त देखने के लिए हाथ पर बंधी घड़ी को देखते जा रहे हैं..और साथ में अपने गालों को, दबाते हुए कहते हैं]

छंगाणी साहब – [अपने गालों को दबाते हुए, कहते हैं] – अरे बालाजी बाबजी, मेरी तो बज गयी, बारह। अब..

[सामने की बर्थ पर लेटे चंदूसा, अंगड़ाई लेते हुए कहते हैं]

चंदूसा – [अंगड़ाई लेते हुए, कहते हैं] – जनाब बारह उस वक़्त बजती, जब आप जूता खोकर पहुंच जाते मेम साहब के पास। खैर अच्छा हुआ जनाब, आपका जूत्ता सही-सलामत आपके पास लौट आया। बच गयी आपकी, काळज़े की कोर यानी ससुराल के जूते। संभाल लीजिये, इन जूतों को। अब आप, बार-बार घड़ी को मत देखिये, मेम साहब कुछ नहीं कहेगी। क्योंकि, ससुराल से आये जूत्ते बच गए हैं..!

[मंच पर, अन्धेरा छा जाता है।]

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रचनाकार: [मारवाड़ का हिंदी नाटक] यह चांडाल चौकड़ी, बड़ी अलाम है। खंड 14 - लेखक - दिनेश चन्द्र पुरोहित
[मारवाड़ का हिंदी नाटक] यह चांडाल चौकड़ी, बड़ी अलाम है। खंड 14 - लेखक - दिनेश चन्द्र पुरोहित
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https://www.rachanakar.org/2019/12/yah-chandal-chaukdi-bdi-alam-hai-14.html
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