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बैगा जनजाति की लोक कथाएँ - 2. उड़ने वाला घोड़ा - डॉ.विजय चौरसिया

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2. उड़ने वाला घोड़ा डां.विजय चौरसिया    एक राज्य में एक लोहार और एक बढ़ई निवास करते थे। मैं न तो उस बढ़ई का नाम जानता और न ही उस लोहार का नाम ...

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2. उड़ने वाला घोड़ा

डां.विजय चौरसिया


   एक राज्य में एक लोहार और एक बढ़ई निवास करते थे। मैं न तो उस बढ़ई का नाम जानता और न ही उस लोहार का नाम ! परंतु अधिकतर कहानियों में बढ़ई और लोहार के साथ एक राजा जरुर रहता है।
          अच्छा तो कहानी शुरु करते हैं। हां तो एक राज्य में एक लोहार और एक बढ़ई निवास करते थे। उस लोहार और बढ़ई दोनों में बहुत अच्छी मित्रता थी। लोहार अपने काम में बहुत दक्ष था। उसकी बनाई हुई वस्तुऐं बहुत जल्दी बिक जाती थीं। परंतु बढ़ई की किस्मत ऐसी नहीं थी। वह जो सामान बनाता उसकी बिक्री कभी - कभी ही होती थी। जिसके कारण वह लोहार से जलने लगा। बढ़ई अपने मन ही मन कहता क्या बताऊं! मेरी बनाई चीजें कोई नहीं खरीदता और उस लोहार की चीजें बाजार में हाथों - हाथ बिक जाती हैं। अब बढ़ई अपने लोहार दोस्त से छोटी - छोटी बातों पर झगड़ा करने लगता। एक दिन उन दोनों में बहुत बातचीत हुई और बात मारपीट तक पहुंच गई। इसके बाद दोनों अपनी - अपनी शिकायत लेकर उस राज्य के राजा के पास न्याय के लिए पहुंचे।राजा ने उन दोनों की बातें सुनी।
       तब राजा ने फैसला सुनाया कि तुम दोनों अपने - अपने घर जाओ और एक - एक कोई अच्छी वस्तु बनाकर लाओ। तभी यह फैसला होगा की कौन अच्छा कारीगर है। दोनों वहां से चले गये। बढ़ई अपने घर गया और उसने लकड़ी का एक सुंदर घोड़ा बनाया और उसमें एक इंजिन और लकड़ी के पंखे लगा दिऐ। इसी प्रकार उस लोहार ने लोहे की एक बहुत बड़ी कड़ाही बनाकर तैयार कर ली। एक दिन बढ़ई ने अपना घोड़ा और लोहार ने अपनी कड़ाही चादर में लपेटी और राजा के दिखाने राजमहल आ गये।


       राजा अपनी रानी के साथ राजमहल के एक बहुत बड़े कमरे में बैठे थे। उन्होंने लोहार और बढ़ई को अपने कमरे में बुलाया और लोहार की कड़ाही और बढ़ई के घोड़ा ध्यान से देखा। जैसे ही रानी ने लोहे की कड़ाही को देखा तो रानी ने कहा यह कड़ाही बहुत अच्छी है। इसे में अपने पास रखुंगी। घोड़ा - घोड़ी तो हमारे घुड़साल में बहुत हैं। जिस समय राजा - रानी उस लोहार और बढ़ई से बात कर रहे थे। उसी समय राजा का बड़ा लड़का उस कमरे में आ गया और जैसे ही उसने बढ़ई के बनाए हुए घोड़ा को देखा तो आश्चर्यचकित हो गया। राजा का बेटा उस घोड़े के ऊपर सवार हो गया। जैसे ही राजकुंवर की जांघ घोड़ा के पंखों से टकराई तो उस घोड़े के पंख फैल गए और घोड़ा राजमहल से निकलकर आकाश में उड़ने लगता है। उस घोड़े पर राजकुंवर सवार था। राजकुंवर को यह नहीं मालुम था कि इस घोड़ा को रोकते कैसे हैं। जिसके कारण राजकुंवर कई दिनों तक आकाश में उड़ता रहा। बहुत दिनों तक उड़ने के कारण उसको बहुत जोरों से भूख लगने लगी।


         यहां पर राजा ने जब देखा की बढ़ई के बनाए उस घोड़े को उसका पुत्र उड़ाकर ले गया है। तब राजा उस बढ़ई और लोहार से नाराज हो गया। राजा ने गुस्से में उस बढ़ई और लोहार को जेलखाना में ड़ाल दिया। राजा ने कसम खाई की जब तक उसका पुत्र वापस नहीं आ जाता तब तक उन दोनों को जेल खाना से नहीं छोड़ेंगे।
         उस बढ़ई और लोहार की पत्नियों ने बहुत दिनों तक अपने - अपने पतियों के आने की राह देखी और जब बहुत दिनों तक उनके पति नहीं आए तो दोनों अपने - अपने घरों से भाग गईं और दोनों ने दूसरा पति बना लिया।
       कुछ दिनों बाद राजकुंवर उस घोड़े पर सवार होकर एक दूसरे राज्य में चला गया। घोड़े पर सवार राजकुंवर का एक हाथ अनजाने में घोड़े के बगल में लगी एक बटन पर चला गया! जिससे वह बटन दब गई। जिससे घोड़ा धीरे - धीरे जमीन पर उतरने लगा। कुछ देर बाद एक बहुत बड़ी नदी के बीच घोड़ा राजकुंवर को लेकर उतर गया। घोडे ने तैरते - तैरते किसी प्रकार उस नदी को पार किया। राजकुंवर घोड़े उतरा और घोड़ा को नदी के पास एक बहुत बड़े वृक्ष को खोखले के अंदर रख दिया।


        राजकुंवर ने अपने घोड़े को छिपाने के बाद नदी के पास एक बहुत बड़े नगर को देखा तो राजकुंवर उस नगर की ओर जाने लगा। राजकुंवर को बहुत जोर से भूख लगी थी। उसने नगर में जाकर अपने खाने - पीने की व्यवस्था और कहीं नौकरी करने की सोची। राजकुंवर ने जैसे ही नगर में प्रवेश किया तो उसे उस नगर का पहला घर दिखाई दिया। राजकुंवर ने उस घर में प्रवेश किया तो उसे उस घर की मालकिन एक बूढ़ी ड़ोकरी मिली। राजकुंवर ने उस बूढ़ी से पूछा : माता जी मैं बहुत दिनों से भूखा हूं कुछ खाने को मिलेगा। तब उस बूढ़ी ने कहाः बेटा मैं तुमको भोजन तो करा दूंगी! इसके एवज में तुमको मेरे जानवरों को चराने जंगल ले जाना पड़ेगा। राजकुंवर ने भर पेट भोजन किया और उस बूढ़ी के जानवरों को चराने जंगल की ओर चला गया। शाम को राजकुंवर जब जंगल से जानवरों को वापस लेकर आया तो उसने उस बूढ़ी से पूंछा : माता जी में रात को आराम कहां करुंगा। तब उस बूढ़ी ने कहा तुम रात को इसी मकान के ऑगन में आराम कर लो। राजकुंवर ने रात को उस बूढ़ी माता के घर के ऑगन में सोकर रात बिताई। सुबह होते ही राजकुंवर नगर में घूमने के लिए निकल गया। वह राजमहल के सामने एक चबूतरे पर आकर बैठ गया और अपना हुक्का निकालकर पीने लगा। उसी समय उसकी नजर राजमहल में राजा की बेटी के ऊपर पड़ी। राजकुंवर और राजा की बेटी ने एक दूसरे को देखा और उन दोनों में प्यार हो गया और राजकुंवर राजा की बेटी के प्रेम जाल में फंस गया।
       अब कहानी थोड़ा खराब होते जा रही है मुझे बताने में शरम आ रही है।


       राजकुंवर उसी समय राजमहल से वापस आ गया और नदी किनारे जाकर खोखले पेड़ से घोड़ा को निकाला और आकाश मार्ग से राजमहल में आ गया। वहां से वह राजकुमारी के कमरे में चला गया। इस प्रकार राजकुंवर प्रतिदिन रात के समय राजकुमारी के कमरे में जाने लगा।
       कुछ दिनों के बाद राजा और रानी को मालुम पड़ा की उनकी बेटी गर्भवती हो गई है। राजा - रानी ने सोचा अवश्य ही कोई युवक रोज रात को राजकुमारी के कमरे में आता - जाता है। तब रानी ने ढ़ेर सारी हल्दी पिसवाकर राजकुमारी के आने - जाने के रास्तों में फैला दी।


      उसी रात को राजकुंवर घोड़े पर सवार होकर राजमहल में आया और राजकुमारी के कमरे में जाने लगा, तो राजकुमारी के पालतु तोते ने राजकुंवर को सर्तक किया कि आज तुम राजकुमारी से मिलने मत जाओ, आज खतरा है पर राजकुंवर ने उस तोते की बातों का ध्यान नहीं दिया। वह राजकुमारी के कमरे में चला गया और रात भर राजकुमारी के साथ रंगरेलियां मनाता रहा। जब राजकुंवर सुबह राजमहल से जाने लगे तो उनके कपड़ों में जगह - जगह हल्दी के दाग लगे हुए थे। राजकुंवर राजमहल से अपने घोड़े पर सवार होकर नदी किनारे उसी पेड़ के खोखले में अपना घोड़ा छुपाकर ! उस बूढ़ी के घर आ गया। उस बूढ़ी ने राजकुंवर से पूंछा : तुम रात को कहां गए थे। जिसके कारण तुम्हारे कपड़े इस तरह पीले हो गए। जब राजकुंवर ने देखा कि उसके पहने हुए पूरे कपड़ों में हल्दी लग गई है। तो उसने दूसरे कपड़े पहन लिए और हल्दी वाले कपड़ों को धोबी को धोने के लिए दे दिए। इसके बाद राजकुंवर जानवरों को चराने जंगल की ओर निकल गया।
        उसी समय राजा और रानी अपनी बेटी के कमरे में गए तो समझ गए की कोई उनकी बेटी के कमरे में जरुर आया था। राजा ने अपने सैनिकों को बुलाकर आदेश दिया कि राज्य भर के जितने नौजवान युवक हैं। उनको तुरंत राज महल में हाजिर होने का हुक्म दो। पूरे राज्य में मुनादी करवा दी गई। यह मुनादी धोबी के लड़के ने भी सुनी और वह राजमहल जाने की तैयारी करने लगा। वह राजा के राज महल में जाने के लिए अच्छे कपड़े खोजने लगा। उसी समय उसे राजकुंवर के हल्दी लगे कपड़े दिखे। वे कपड़े धोबी के लड़के को बहुत सुंदर लग रहे थे। धोबी के लड़के ने राजकुंवर के हल्दी वाले कपड़े पहन लिए और राजमहल की ओर जाने लगा। उसी समय रास्ते में उसे राजा के सैनिक दिखे उन्होंने धोबी के लड़के को मारना - पीटना शुरु कर दिया। धोबी का लड़का आश्चर्य में पड़ गया की उसने कौन सी गलती कर ली है जो राजा के सिपाही उसे मार रहे हैं। जब धोबी के पिता ने देखा की राजा के सिपाही उसके लड़के को बिना किसी कसूर के मारे जा रहे हैं। तो वह उन सिपाहियों की शिकायत करने राजा के पास चला गया। धोबी ने राजा से अपने लड़के को रिहा करने की विनती की और धोबी ने कहा की राजा जी जो कपड़े मेरा लड़का पहनकर राजमहल में आया था! वह उसके कपड़े नहीं थे। वे कपड़े गांव की एक ड़ोकरी के चरवाहा के थे।
       जब राजा ने धोबी की बात सुनी तो राजा ने सिपाहियों को आदेश दिया की अभी जाकर उस चरवाहा को बंदी बनाकर राजमहल में हाजिर करो। राजा के सिपाही जब उस बुढ़िया के यहां गए। तो उस बुढ़िया ने कहा की मेरा चरवाहा जानवरों को चराने जंगल गया है। जिसके कारण वह राजा के बुलाने पर राजमहल नहीं जा सका। राजा के सिपाही उस चरवाहा को पकड़ने जंगल गए। राजकुंवर ने राजा के सिपाहियों को अपनी ओर आते देखा तो उसने जंगल की तरफ दौड़ लगा दी और भागते - भागते वह नदी के किनारे उस पेड़ के नीचे गया। जहां उसका घोड़ा बंधा था।
      उसने अपना घोड़ा निकाला और आकाश मार्ग से शाम के समय राजमहल पहुंच गया।उसने राजमहल में जाकर राजकुमारी को बुलाया और उसे घोडे में बैठालकर राजमहल के ऊपर आकाश में उड़ने लगा। जब राजा ने अपनी बेटी को उस चरवाहा के साथ घोड़ा में चढ़कर भागते देखा तो राजा ने अपना धनुष बाण निकाला और उसके तीरों से घोड़े को मारने लगा। आखिर कहां गया तीर और कहां गया घोड़ा? राजकुंवर ने राजा जी को दूर से ही प्रणाम किया और घोडे को आकाश में उड़ाते हुए बहुत दूर निकल गया।


       उसी समय राजकुमारी ने राजकुंवर से कहा की उसके पेट में दर्द हो रहा है और उसके गर्भ के दिन पूरे हो गए हैं। उस समय राजकुंवर का घोड़ा एक बडी नदी के ऊपर से होकर उड़ रहा था। उस नदी के बीच में एक टापू था। राजकुंवर ने उसी टापू के ऊपर अपना घोड़ा उतार दिया। उसके कुछ देर बाद राजकुमारी ने उसी टापू पर एक बच्चे को जन्म दिया। राजकुंवर ने राजकुमारी से कहा की मैं अभी सुनमाइन (दाई) और धोबी को लेकर शहर से आता हूं। वहीं से नहाने के लिए गर्म पानी करना होगा! तो मैं वहां से आग भी लेकर आ जाऊंगा। राजकुंवर घोड़े पर सवार होकर नदी से शहर की ओर चल दिया। शहर में जाकर उसने सुनमाइन और धोबी को बुलाया और उनसे कहा की तुम दोनों नदी के टीले में पहुंचो। राजकुंवर ने सुखे कंड़े और आग का जलता हुआ अंगार अपने हाथ में रखा और घोड़े को भगाते हुए अपनी पत्नी के पास आने लगा। जब राजकुंवर नदी के ऊपर से उड़ रहा था। उसी समय बहुत जोरों से ऑधी आ गई। राजकुंवर के हाथ में रखा अंगार जलने लगा और उसके कपड़ों में गिर गया! जिससे राजकुंवर के कपड़ों में आग लग गई। उसके घोड़े के पंखों में आग लग लग गई। जिससे घोड़ा सवार सहित नदी में गिर गया। राजकुंवर के पूरे कपड़ों में आग लग गई।


       राजकुमारी सोच में पड़ कर कहने लगी! मैं अब क्या करुं मेरे चारों ओर पानी ही पानी है। राजकुंवर अभी तक आग लेकर नहीं आए! मैं छोटे से बच्चे के साथ हूं! मेरे पूरे कपड़े पानी से भींग गए हैं। राजकुमारी बहुत निराश हो गई! उसी निराशा में उसने अपने नवजात बच्चे को उठाया और उसी नदी में फेंक दिया और उसके साथ ही उसने भी पानी में कूंदकर आत्म हत्या कर ली।
      कुछ दूरी पर नदी के किनारे एक धोबी कपड़ों को धो रहा था। उसने एक नवजात शिशु को नदी में बहते हुए देखा। उसी समय धोबी ने नदी में छलांग लगा दी और उस बच्चे को निकालकर बाहर ले आया। उसने बच्चे को मरणासन्न अवस्था में पाया। उसने उस बच्चे को हाथ में उठाया और अपनी पत्नी के पास लेकर गया। उसकी पत्नी ने कहा अच्छा किया जो आप इस बच्चे को लेकर आ गए। हमारा एक भी बच्चा नहीं है। हम इसी को पाल - पोस कर बड़ा करेंगे। जब बड़ा हो जायेगा तो हमारे धंधे में काम आयेगा।


        उसी नदी के उस पार दूसरी जगह एक मालिन बुढ़िया ने एक जवान लड़की को नदी में बहते देखा। उसने उस लड़की को पानी से बाहर निकाल लिया और उल्टा करके उसके शरीर से पानी निकाल कर उसकी मालिश करने लगी। जब राजकुमारी को होश आया और उसने अपनी ऑख खोली तो उस बुढ़िया ने राजकुमारी से कहा बेटी तुम मेरी भतीजन हो। ऐसा कहकर उस मालिन बुढ़िया ने राजकुमारी को अपने घर लेकर आ गई। पानी में डूबने के कारण राकुमारी के सिर में चोट लग गई थी! जिसके कारण उसकी याददाश्त चली गई थी। मालिन ने राजकुमारी को अपनी भतीजन इसलिए कहा की राजकुमारी ने अपने शरीर में मूल्यवान वस्त्र और हीरा, जवाहरात के जेवर पहने हुए थे। जिसको मालिन अपने कब्जे में करना चाह रही थी।


      घोड़े से गिरने के बाद राजकुंवर का पूरा शरीर जल गया था। जिससे उसकी मृत्यू हो गई थी। राजकुंवर का मृत शरीर नदी के पानी में बहते - बहते नदी किनारे शमशान घाट की ओर आ रहा था। उसी समय एक राजकुमारी अपने पति का मृत्य शरीर लेकर शमशान घाट पर आई थी! उसने अपने पति का अंतिम संस्कार किया और उसी नदी के किनारे स्नान करने चली गई स्नान करने के बाद जब वह अपने कपड़े बदल रही थी! उसी समय उसकी नजर राजकुंवर की लाश पर पड़ी जो पानी में बहते हुए उसकी तरफ आ रही थी। राजकुंवर का पूरा शरीर आग से बुरी तरह जल गया था।राजकुमारी ने राजकुंवर की लाश को पकड़ कर नदी किनारे लिटा दिया। इसके बाद राजकुमारी  राजकुंवर की लाश को शमशान घाट के समीप बने भगवान के मंदिर में ले आई। उसने राजकुंवर की लाश को एक चादर के बिछौना में लिटा दिया। इसके बाद राजकुमारी भगवान के चरणों में गिर कर राजकुंवर को जीवन दान देने के लिए भगवान से प्रार्थना करने लगी। भगवान ने राजकुमारी की विनती नहीं सुनी! भगवान जी ने कहाः यह आदमी बहुत ज्यादा जल गया है। परंतु राजकुमारी ने भगवान की विनती करना नहीं छोड़ा। राजकुमारी सात दिन आठ रात तक भगवान के मंदिर में विनती करती रही। बहुत विनती करने के बाद भगवान जी ने राजकुमारी की विनती सुन ली और राजकुंवर के शरीर में प्राण ड़ाल दिये। राजकुंवर ने अपनी ऑखें खोली और उठ कर बैठ गये। उसी समय राजकुंवर को अपनी पत्नी और बच्चे की याद आई और वह तुरंत उठकर बैठ गया और नदी की तरफ दौड़कर जाने लगा। राजकुमारी उसको बुलाती रही पर राजकुंवर ने राजकुमारी की बात नहीं सुनी। उसी समय भगवान जी ने राजकुंवर को राजकुमारी के पास लौटने का आदेश दिया? तब राजकुंवर राजकुमारी के पास वापस आ गया। राजकुमारी ने राजकुंवर को अपने महल में ले गई और कुछ दिन बाद राजकुमारी ने राजकुंवर से विवाह कर लिया और राजकुंवर को उस राज्य का राजा बना दिया।


       इस प्रकार बहुत साल बीत गए। राजकुंवर का लड़का जवान हो गया।उसने अपनी शादी करने का विचार किया।एक दिन उसने उस बूढ़ी मालिन की भतीजी को देखा (जो वास्तव में उस लड़के की मां थी)। वह उसकी मोह माया में फंस गया और उससे प्यार करने लगा। वह धोबी की पत्नी के पास गया और उससे कहा कि में मालिन की भतीजी से ही शादी करुंगा। धोबी की पत्नी ने उस लड़के से कहा तुम उसके साथ विवाह नहीं कर सकते। वह लड़की मालिन जाति की है। लेकिन राजकुंवर के लड़के ने मालिन की लड़की के साथ विवाह करने के लिए उसका हाथ पकड़ लिया। राजकुंवर का लड़का उस बूढ़ी मालिन के पास गया और उसे एक बोतल शराब और पान सुपाड़ी दिया। परंतु उस बुढ़िया ने उस लड़के का दिया समान ग्रहण नहीं किया। उसने कहा मैं तुम्हारी दी हुई शराब और सुपाड़ी नहीं ले सकती। तब राजकुंवर के लड़के ने कहा मैं तुम्हारी भतीजन के साथ विवाह करना चाहता हूं। मालिन बूढ़िया ने कहा : तुम कैसे मेरी भतीजी के साथ विवाह कर सकते हो? वह माली जाति की है और तुम धोबी जाति के हो। इसलिए तुम दोनों का विवाह नहीं हो सकता। परंतु राजकुंवर के लड़के ने उससे विवाह करने की ठान ली।


      उसने पूरे नगर के लोगों को आमंत्रित कर एक पंचायत बुलाई। पंचायत में सभी पंचों ने निर्णय लिया की उन दोनों का विवाह हो जाना चाहिए और अगले सप्ताह की सोमवार को उनका विवाह हो जाना चाहिए। जब उनके विवाह का दिन आ गया तो लगुन देखने के लिए एक पंड़ित को बुलाया गया। पंड़ीत जी ने अपनी पोथी खोली और वर - वधु की लगुन तैयार की! उसने पोथी में देखा कि दोनों की लगुन ठीक बैठ रही है। यह शादी बहुत हंसी - खुशी से सम्पन्न होगी। दोनों परिवार के लोगों ने शादी में राजकुंवर को भी आमंत्रित किया था। क्योंकी राजकुंवर उस राज्य के राजा थे।
      अब दोनों शादी होने लगी। जब दुल्हन - दूल्हा के पीछे - पीछे भांवर लेने के लिए निकली! तो राजकुंवर ने दुल्हन के पैर देखे और उसके पैरों की निशानी के कारण राजकुंवर ने अपनी पहली वाली पत्नी को पहचान लिया। राजकुंवर ने दोनों को भांवर करने से रोक दिया और कहा जिस पंड़ित ने यह लगुन बनाई है। उसकी लगुन गलत है। हमारे राज्य में एक पनिका लड़का है। जो बकरी चराता है। वह सही लगुन बैठालता है। उसे अभी बुलाया जाय? सिपाहियों ने जाकर उस पनिका लड़के को राजकुंवर के समक्ष पेश किया। वह लड़का राजकुंवर के सामने आकर डर गया कि मैंने कौन सा कसूर कर दिया है। तब राजकुंवर ने उस पनिका लड़का से कहा कि हमने तुमको इनकी लगुन देखने के लिए बुलाया है।


       तब उस पनिका लड़के ने अपनी पोथी निकाली और राजकुंवर की पूरी कहानी पढ़ कर सुना दी। उसने अपनी पोथी में उस बढ़ई और लोहार के बारे में पढ़ा! उसने राजकुंवर के साथ बीती सभी घटनाओं के बारे में बताया कि वह किस प्रकार से उस उड़ने वाले घोड़े में सवार होकर उड़ गया था। राजकुंवर ने उस पनिका लड़के को उसी समय रोका और सभी लोगों को बताया कि यह पनिका लड़का जो बता रहा है। वह बात सच है। जब धोबी ने इस घटना के बारे में सुना तो वह घबड़ा गया। क्योंकी धोबी राजकुंवर के पुत्र को अपना पुत्र कह रहा था। वह मालिन बुढ़िया भी डर के कारण थर - थर कांपने लगी। क्योंकी उसने राजकुमारी को अपनी भतीजी कहा था? राजकुंवर ने तुरंत दुल्हन के मुंह से घूंघट उठा दिया और अपनी पत्नी को पहचान गया। जो लड़का दूल्हा बना था उसे राजकुंवर ने कहा :यह तुम्हारी मां है। तब उस लड़के ने अपनी होने वाली पत्नी का दूध पिया और उसका बेटा बन गया। राजकुंवर अपनी पहली वाली पत्नी और अपने पुत्र को राजमहल में लेकर आ गये। अब राजकुंवर की दो पत्नियां हो गई।
        कुछ दिनों बाद राजकुंवर ने अपनी दोनों पत्नियों और पुत्र को लेकर अपने पिता के राज्य में वापस आ गया। राजकुंवर जैसे ही महल में आये उसके पिता ने उसको नहीं पहचाना! क्योंकी जब राजकुंवर घर से गये थे! उस समय वह बहुत छोटे थे। अब वो पूरे जवान हो गए थे। उनकी सूरत शक्ल बिलकुल बदल गई थी। अब उसकी दो पत्नी और एक लड़का भी हो गया था। राजा को शंका हुई। तो राजा ने राजकुंवर से पूंछा तुम कौन हो तो राजकुंवर ने कहा मैं तुम्हारा बेटा हूं। राजा ने कहा तुम यह कैसे साबित करोगे की तुम ही मेरे बेटे हो? तो राजकुंवर ने अपने पिताजी से पूंछा दादाः वह लोहार और बढ़ई अभी भी जेलखाना में हैं क्या? तो बूढ़े राजा ने कहा हां वे दोनों अभी भी जेल में हैं। फिर राजकुंवर ने बढ़ई और लोहार की कहानी बताई। तब राजा को विश्वास हो गया कि यही मेरा बिछड़ा पुत्र राजकुंवर ही है।
       राजा ने अपने सिपाहियों को आदेश दिया की बढ़ई और लोहार को जेलखाना से तुरंत रिहा कर दिया  जावे। राजा ने दोनों को सजा से मुक्त कर दिया। राजा ने बढ़ई को उड़ने वाले घोड़ा की मजदूरी एक हजार रुपया मिला पर लोहार को उसकी बनाई कड़ाही का एक रुपया भी नहीं मिला। बड़ई और लोहार अपने - अपने घर गये तो उन्होंने अपनी पत्नियों को घर में नहीं पाया।उन दोनों की पत्नियों ने उनके जेल जाते ही दूसरी शादी करके घर से भाग गई थीं।
       बूढ़े राजा ने अपने बेटे राजकुंवर से कहा - बेटा मैं बूढ़ा हो गया हूं! अब तुम इस राज्य के राजा बन जाओ। राजा ने राजकुंवर को उस राज्य का राजा बना दिया। अब राजकुंवर दोनों रानी और एक बेटा के साथ मिलजुलकर खुशी से रहने लगे।
      कहानी अब समाप्त हो गई। कहानी बतलाने वाला झूंठा है। इस कहानी पर विश्वास करने वाला गंवार। जिस प्रकार से राजकुमार के जीवन में खुशी आई उसी प्रकार सबक जीवन में खुशी आये।


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अग्रवाल,1,शबनम शर्मा,7,शब्द संधान,17,शम्भूनाथ,1,शरद कोकास,2,शशांक मिश्र भारती,8,शशिकांत सिंह,12,शहीद भगतसिंह,1,शामिख़ फ़राज़,1,शारदा नरेन्द्र मेहता,1,शालिनी तिवारी,8,शालिनी मुखरैया,6,शिक्षक दिवस,6,शिवकुमार कश्यप,1,शिवप्रसाद कमल,1,शिवरात्रि,1,शिवेन्‍द्र प्रताप त्रिपाठी,1,शीला नरेन्द्र त्रिवेदी,1,शुभम श्री,1,शुभ्रता मिश्रा,1,शेखर मलिक,1,शेषनाथ प्रसाद,1,शैलेन्द्र सरस्वती,3,शैलेश त्रिपाठी,2,शौचालय,1,श्याम गुप्त,3,श्याम सखा श्याम,1,श्याम सुशील,2,श्रीनाथ सिंह,6,श्रीमती तारा सिंह,2,श्रीमद्भगवद्गीता,1,श्रृंगी,1,श्वेता अरोड़ा,1,संजय दुबे,4,संजय सक्सेना,1,संजीव,1,संजीव ठाकुर,2,संद मदर टेरेसा,1,संदीप तोमर,1,संपादकीय,3,संस्मरण,715,संस्मरण लेखन पुरस्कार 2018,128,सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन,1,सतीश कुमार त्रिपाठी,2,सपना महेश,1,सपना मांगलिक,1,समीक्षा,815,सरिता पन्थी,1,सविता मिश्रा,1,साइबर अपराध,1,साइबर क्राइम,1,साक्षात्कार,19,सागर यादव जख्मी,1,सार्थक देवांगन,2,सालिम मियाँ,1,साहित्य समाचार,93,साहित्यम्,6,साहित्यिक गतिविधियाँ,212,साहित्यिक बगिया,1,सिंहासन बत्तीसी,1,सिद्धार्थ जगन्नाथ 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रचनाकार: बैगा जनजाति की लोक कथाएँ - 2. उड़ने वाला घोड़ा - डॉ.विजय चौरसिया
बैगा जनजाति की लोक कथाएँ - 2. उड़ने वाला घोड़ा - डॉ.विजय चौरसिया
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