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जीवन का अधूरापन - आत्माराम यादव

*कहाँ गये भवानीप्रसाद मिश्र के ऊँघते अनमने जंगल*


भवानीप्रसाद मिश्र ने देखे थे सतपुड़ा के घने जंगल
नींद में डूबे हुये मिले थे वे उॅघते अनमने जंगल।
झाड़ ऊॅचे और नीचे जो खड़े थे अपनी आंखें मींचे
जंगल का निराला जीवन मिश्रजी ने शब्दों में उलींचें।
मिश्र की अमर कविता बनी सतपुड़ा के घने जंगल
आज ढूंढे नहीं मिलते सतपुड़ा की गोद में पले जंगल।।
नर्मदाघाटी के घने जंगलों की मैं व्यथा सुनाता हॅं
बगवाड़ा जोशीपुर का मर्म समझो एक पता बताता हॅं।
सीहोर जिले में चहुंओर फैला सागौन का घना वन था
पत्तों की छाया से आच्छादित सुन्दर सा उपवन था।
सतपुड़ा के चिरयौवन में सप्त पहाड़ पल्लवित थे
बन्दर-भालू,शेर -चीते सभी, मस्ती में प्रमुदित थे।।
सागौनों के पेड़ काटकर सतपुड़ा वन को किया उजाड़
मस्तक पर लहराते पेड़ मिटाये और मिटा दिये पहाड़।।
सतपुड़ा के वन-उपवन पहाड़ों पर कभी चरने जाती थी गौएं
चरना बंद हुआ चरनोई भूमि वन पर, मॅडराई काली छायाएं।
पीव गुजरे जमाने की बात है कविता सतपुड़ा के जंगल
लालच ने निगल लिये भवानीप्रसाद मिश्र के अनमने जंगल।।


जीवन का अधूरापन


मुझे याद है प्रिय
शादी के बाद तुम
दूर-बहुत दूर थी
मैं तुम्हारे वियोग में
दो साल तक
अकेला रहा हॅू।
बड़ी शिद्दत के
बाद तुम आयी थी
तुम्हारे साथ रहते
तब दिशायें मुझे
काटती थी और
तुम अपनी धुन में
मुझसे विलग थी।
तुम्हारा पास होना
अक्सर मुझे बताता
जैसे जमीन-आसमान
गले मिलने को है।
मैंने महसूस किया
दिशायें दूर बहुत दूर
असीम तक पहुंच गयी है।
तुम मेरे साथ थी
पर दूर इतनी थी
जैसे चान्द आसमान में।
मेरी दुनिया सिमट कर
तुम्हारे ईर्द गिर्द थी
तुम रास्ते को दूर
बहुत दूर बनाती रही
मैं हर राह को
तुम्हारे लिये छोटी करता रहा।
मैं हर दिशा को
तुम्हारे आसपास
तुम्हारे कदमों में लाया
मैं तुम्हारी-मेरी दुनिया को
एक सुन्दर आँगन बनाता रहा।
तुम्हारी बातों का
तुम्हारे जज्बातों का
तुम ही मतलब समझती थी
मेरी बातें और जज्बात
तुम्हारे लिये बेमतलब थे।
मेरे मन की व्यथा
मेरे दिल की प्यास
तुम अपने कदमों में
रोंधती रही मैं सहता गया।
तुम्हारा मस्तिष्क
अवरोधित रहा है बातों से
तुम अज्ञेय रही हो जज्बातों से
मैं प्रेम की पराकाष्ठा को
जीना चाहता था
तुमसे प्रेम करता था
पीव न प्रेम कर सका
न ही जी सका
बाधा हमेशा से
तुम रही हो, तुम्हारा
अवसादित मन रहा है
तुम अब भी अवसाद से
मुक्ति पाने के परामर्श
परामर्शदाता के बतायें
उपायों को अपनाकर
सालों से अवसाद में हो।
सिरफिरेपन में प्रेम नहीं
वासना की लपटों में
सुलग रहे हम दोनों के बीच
एक अधूरापन आज भी जिंदा है।


काश हर घर आँगन हो


कितना अच्छा था
जब हम बच्चे थे
तब घर के आँगन में
इकट्ठा हो जाता था पूरा परिवार।
कैलाश,शंकर, विनिया चन्दा
आँगन में खूब मस्ती करते थे
तब आँगन किसी खेल के
मैदान से कमतर नहीं था
जिसमें समा जाता था सारा मोहल्ला घर-द्वार।
मकान से जुड़ा हुआ आँगन
आँगन से बाहर तक घर का छोर
सब मिले थे,आपस में घुले-मिले थे।
पीव अब घरों से खो गये है आँगन
आँगन से दूर चला गया है घर
घर से दूर चले गये है घर के बच्चे।
काश फिर से घरों में आँगन हो जाये
काश फिर से आँगन में बच्चे खेले
काश फिर से आँगन में घर-परिवार मिले।

प्रेम मिलन


जब नवयौवना 
बंध जाती है
पति के बन्धन में
तब पति के पास
निर्लज्ज/अश्लील होते ही
उसकी काया को
पति अर्पित करता है
अपने अंग।
दोनों भीतर ही भीतर
अपनी भावनाओं के
सागर में गोता लगाते है
अच्छे-बुरे विचारों का बंबडर
उड़ा ले जाता है उन्हें
और वे एक दूसरे के चरित्र को
मापते हुये करते है मंथन।
जब वे विचारों के सागर में
तैरते-उतराते
करते है देह का समर्पण
तब उनमें
कुछ विचार टूटते है
कुछ भावनायें बिखरती है
और वे
सुखद पीड़ा के साथ
एक दूसरे की काया को
उन्मुक्तता से रौंदते है ।
तब देह के भीतर से
सैकड़ों बिजलियां कड़कडाकर
दूसरी देह में गिरती अनुभव करते है
मानों घनघोर मेघ
बरस चुके है और
अलौकिक आनंद के साथ ही
पीव नवपरिणिता पति-पत्नी
निस्तेज हो जाते है।
गीत- चाहत
ये कजरारे तेरा नैना
मस्ती भरे  तेरे  बैना
मन अल्हड़ है मेरा
तेरी आँखों में समा जाऊं ।
ये नशीली काली रातें
रसभरी तेरी प्यारी बातें
शवनमी तेरी चितवन
मुझे मदहोश किये जाये।
ये नागिन सी जुल्फें
तेरे गालों पे लहराये
दिल मेरा मचले
तेरे आगोश में लिपट जाऊँ ।
ये लहराता तेरा आँचल
बिजलियां गिराता बादल
पीव पागल बना जाये
तू मेरी बांहों में समा जाऊँ ।

                            आत्माराम यादव पीव वरिष्ठ पत्रकार
                         काली मंदिर के पीछे, पत्रकार आत्माराम यादव गली
                         वार्ड नंबर 31 ,ग्वालटोली होशंगाबाद मध्यप्रदेश

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