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(आत्मकथन) - बेरोजगारी का दर्द

भारतवर्ष में सरकारें आती हैं जाती हैं । लेकिन बेरोजगारी नहीं जाती है। मैं कोई बहुत बड़ा लेखक नहीं हूं, जो कि बेरोजगारी पर पूरा व्याख्यान कर सकूं। मैं तो केवल अपना बेरोजगारी का दर्द बयां कर सकता हूं। बेरोजगारी का दर्द मुझसे पूछो पूरे 24 वर्ष हो गए। मुझे अब तक नौकरी नहीं मिली।

इस देश की अजीब विडंबना है। वो दिन अभी भी मुझे याद है। जब मैं दसवीं कक्षा में था। तब से मैं नौकरी की तलाश में भटक रहा हूं।

आगरा में कुछ हो ना हो लेकिन सब्जी खरीदना और बात बनाना सीख जाते हैं। बस एक ही टोटका चलता रहता है। कि रूम बदलने से किस्मत बदल जाती है।

हम किसी रूम में 3 महीने से ज्यादा नहीं रुके।

और बदलते रहे इस क़दर कि पूरे आगरा के रूम वाले हमारे अंकल बन गए।  बड़े भैया रवि वर्मा ने कहा कि तुम "के० डी० कैंपस" ज्वाइन कर लो। फ़िर क्या कोचिंग ज्वाइन की। कोचिंग में सर ने कहा बेरोजगारी से लड़ने का एक ही हथियार है, वो है लूसेंट। फ़िर क्या लूसेंट भी ख़रीद ली।

उस छात्र का दर्द जानते हो जो 30 रुपए के 50 फोटो पासपोर्ट  साइज़ के लिए फतेहाबाद से आगरा में आते थे। चेहरा वही रहता है, केवल तारीख  व जन्म तारीख बदल जाती है। देश में बेरोजगारी का आलम यह है। कि मैट्रिक परीक्षा पास करते ही रोज 5 किलोमीटर दौड़  लगाना स्टार्ट कर देते हैं।

लोग पहले "डिफेंस लाइन" फिर  "एस०एस०सी०" फ़िर "यूपी एसoसी" सिवल परीक्षा आदि। जानते हैं। साहब सब कुछ हो जाता है। केवल "नौकरी नहीं होती हैं।

सरकारें आती-जाती हैं । रह जाता है तो  क्या केवल बेरोजगारी है।

बेरोजगारी क्या होता है। कभी आगरा में आकर देखिए। जब "एकलव्य स्टेडियम में रैली होती हैं। तो  रैली ना रैली होकर ये सोनपुर का पशु मेला हो जाता है। जब 250-250 का बेच दौड़ने निकलता है। तो जान निकल जाती है। हांफते-हांफते मुंह से खून निकलने लगता है।

5 मिनट में 1600 मीटर दौड़ने के लिए "आदमी को भूत बनना पड़ता है। इंसान के बस की बात नहीं है।

इसी बेरोज़गारी ने हमें सिखाया है। "खुले प्लेट फार्म पर 10 रुपए का प्लास्टिक का चटाई खरीद कर बिना तकिया के कैसे सोया जाता है। बेरोजगारी का नशा ऐसा था। कि "जी.के.", "जी.एस."का फार्मूला पूरे रूम में चिपकाएं रहते थे। "देखिए आज कल तो फार्म ऑनलाइन कराया जा रहा है। और आधार कार्ड को भी लिंक कराया जा रहा है। पहले तीन चार जगह से फॉर्म अप्लाई होता था। कि कहीं ना कहीं से कॉल लेटर लौट कर वापस आ जाए। "घर का पता बदलकर कितनी बार मूल निवास पत्र बनवाए है। बस आगरा का हर बेरोजगार ही जानता है। कई स्कूल से हाई स्कूल की परीक्षा पास करते हैं। कि कहीं और से फॉर्म अप्लाई कर सकें। कहीं पहले वाली मार्कशीट में उम्र ना ज्यादा हो जाए। जिससे दूसरी मार्कशीट से अप्लाई कर देंगे।

"ये भगवान टॉकीज की गलियों में स्टूडेंट भरे पड़े हैं। "कमला नगर से खंदारी तक केवल आपको ज्यादातर स्टूडेंट्स ही स्टूडेंट्स मिलेंगे। दीवारों पर केवल पोस्टर ही दिखता है। कोई ये सर तो कोई वो सर। सबका अपना- अपना धंधा होता है। भाई नौकरी के लिए 40 तक पहाड़े, 50 तक वर्ग सब मुंह ज़ुबानी याद है।

मेरे समझ में नहीं आता कि कौन सा अच्छा है। और कौन सा बेकार है।

एक समय फ़िरोज़ाबाद में बुआ जी की लड़की की शादी थी। हम उसमें नहीं गए थे। क्या पता इस परीक्षा में नौकरी मिल जाए। जब शाम को घर लौटे थे। तो बहुत रोए थे। कि साला किसी ठेकेदार ने पहले ही पेपर आउट करा दिया था।

एक पढ़ाकू बेरोजगार के लिए सबसे बड़ा त्याग था।          "देखिए बैच तो पहले भी चल था,और आज भी चल रहा है। ताकि हम बेरोजगारों से भी किसी का रोजगार चल रहा है। लेकिन अपने रोजगार का अता-पता नहीं था। "सच कहुं तो अब इम्तहान नहीं दिया जाता है। अब तो मेरा ही इम्तहान हो रहा था। मेरी जवानी का, मेरे पापा के पैसों का व्यर्थ खर्चा हो रहा था। मेरे साथी पुनीत कुमार, व डॉ० मोहम्मद अफरोज ने कहा भाई तू निराश मत हो अपने गांव पूठ पुरा फतेहाबाद आजा ।

इसलिए इस जिंदगी से समझौता करके पढ़ाई व आगरा छोड़ कर चल दिए। पापा के साथ खेती में हाथ बटाने के लिए सब कुछ भूल कर अपने छोटे से गांव की तरफ चल दिए। आज अपने पिता जी के साथ खेती करके अपने आप को दिलासा दिला रहे हैं। क्यों कि किसानों की भी हालत इस देश में बहुत खराब है।

       "आख़िर बेरोजगारी का दर्द होता है..................

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अवधेश कुमार निषाद मझवार

ग्राम पूठपुरा  पोस्ट उझावली

तहसील फतेहाबाद आगरा


Email- avadheshkumar789@gmail.com

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