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" यू एन्ड मी ---- द अल्टीमेट ड्रीम ओफ लव" गुजरात की भूमि से उपजा पहला महिला चेट उपन्यास ---- डॉ रानू मुखर्जी

" यू एन्ड मी ---- द अल्टीमेट ड्रीम ओफ लव" गुजरात की भूमि से उपजा पहला महिला चेट उपन्यास ---- डॉ रानू मुखर्जी

समय के साथ साथ मनुष्य की संवेदनाएं भी बदलती जा रही है और संवेदनाओं के साथ साहित्य का स्वरूप भी बदलता जा रहा है। आज साहित्य का स्वरूप एकरेखीय नहीं है। अनेक विधाएं अभिव्यक्ति का माध्यम बन रही है। इन सभी में चैट उपन्यास उभर कर आई है और हलचल मचा रही है। मेरी जानकारी के अनुसार सूरज प्रकाश जी का " नाट ईक्वल टू लव " इस विधा का पहला उपन्यास है और दूसरे नम्बर पर मल्लिका मुखर्जी का " यू एन्ड मी ---- द अल्टीमेट ड्रीम ओफ लव "आता है।

कुछ उपन्यासकार कथा को विस्तार देने के लिए सामाजिक विषमताओं को प्रधानता देते हैं। कुछ रचनाकार राजनैतिक षडयंत्रों को आधार बनाकर अपने कथा को विस्तार देते हैं। पर मल्लिका मुखर्जी ऐसा कुछ नहीं करती हैं उनके लिए घटनाओं का बाहरी तौर पर कोई अर्थ नहीं है वो अपने को खंगालती है। सालों पहले की दबी चिंगारी को संवेदना के धरातल पर लाकर उसे हवा देती है। और स्पष्ट करती है कि संवेदना के धरातल पर टिका नायक नायिका ईश्वरीय प्रेम कितना और किस प्रकार बनता टूटता और बिखरता है।

मल्लिका मुखर्जी का ताजा प्रकाशित उपन्यास " यू एन्ड मी ---- द अल्टीमेट ड्रीम ओफ लव " को पढकर बेचैनी बहुत दिनों तक बनी रहती है। उपन्यास के कथावस्तु के मूल में अंतर को खंगालने वाले वो मारक भाव हैं जो युवावस्था के एक तरफा खोए हुए प्रेम को अचानक फेस बुक के माध्यम से पा जाने पर होता है। मनःस्थिति के चित्रण को मल्लिका इतने सूक्ष्म रूप से करती है कि अनायास ही मन उसके प्रति संवेदनशीलता से भर उठता है। मल्लिका का अल्हडावस्था का प्रेम सीधे सीधे नहीं जाता। झरने की तरह उसका बहाव विस्तृत हो जाता है और विश्वव्यापी रूप धारण कर पाठक पर स्वत: हावी हो जाता है।

अश्विन मैकवान एक मस्त कलाकार है। अपने क्षेत्र में व्यस्त, जीवन के उतार चढाव से त्रस्त । मल्लिका का निश्छल प्रेम एक रोशनी की जगमगाहट के रूप में उनको मिलती है। मल्लिका ने गहरी संवेदना से भरे शब्दों से मार्मिक भावों से उपन्यास में आए चित्रों को बुना है जो भाषा के अद्भुत जाल में पाठक को बांध तो लेते है ही साथ ही इस तथ्य से ईश्वरीय प्रेम की उष्मता को प्रकाशित भी करते है। मल्लिका के जीवन में पार्थो का आगम एक वरदान है।

मुग्धावस्था का प्रेम पत्थर पर कुरेदकर लिखने जैसा होता है। हवाई महल बनते हैं । हवाई घोडे पर सवार होते है। पर अहसास शाश्वत होता है। निखलास। पवित्र। एक ईश्वरीय देन। शायद ये उन्हीं को नसीब होती है जिनकी आत्मा पवित्र होती है। मल्लिका मुखर्जी (,नन्ही परी,) उनके मुग्धावस्था का प्रेमी अश्विन (, ऐश, ) ऐसे ही कहे अनकहे आत्मीय प्रेम के उतार चढाव पर 13500 कि मी दूरी तय करने में इकतालीस साल लग गए पर । दोनों विवाहित । संसारी । पर पहला प्रेम अपनी जगह स्थिर।

चेट उपन्यास के रूमानियत अंदाज को  मल्लिका मुखर्जी जी ने अपने उपन्यास का आधार बनाया है। भाषा की सरलता, रवानगी और साधारण नौजवान हौसला सब को उन्होंने अपनी अभिव्यक्ति का औजार बनाया। उनके उपन्यास में भारतीय जीवन दर्शन, परिवर्तन की अहंकार विहीन आस्था, सामाजिक जीवन , जीवन के संकल्प, मानवीय पीडा और भविष्य की दृष्टि हर कहीं तरंगायित है। उपन्यास के तथ्य उनके अंतर की कथा को, जागरण की आस्था को और प्रेम की भाव धारा को समेटे हुए है। वास्तविकता का सुन्दर चित्र। अनुभवजन्य भावों को ही इतनी सार्थकता के साथ चित्रित किया जा सकता है। मन मंथन। आत्म मंथन और छटपटाहट को समझने वाला साथी और एक सफल चेट उपन्यास।

मल्लिका जी के चेट उपन्यास का स्वर न केवल अतीत की शक्तिमय चेतना की स्वरलिपि है, बल्कि अपने समय में संघर्षों और आहत सपनों की मर्म भेदी पुकार भी है। अपने प्रेमी की अस्वस्थ के बारे में जानकर मल्लिका कातर हो उठती है। सुदूर विदेश में स्थित अपने प्रेमी के कोलोन कैन्सर दर्द को अपने आँसुओं की अंजली देकर कम करना चाहती है। यह उसकी संवेदनशील मानसिकता प्रमाण है। मल्लिका की कलम से भारतीय आत्मा का पुनराविष्कार हुआ है। अध्यात्मिकता उनकी सबसे बडी ताकत है , जो परंपरा के आवरण को चीरकर जागृत प्रेरणा बन जाती है।

बरसों से अपने अनकहे , दबे प्रेम को न भूलकर , वर्षों बाद फेसबुक के माध्यम से प्रथम प्रेम को ढूंढ कर अपने प्रेमी को अपने प्रेम से अवगत करने का अद्भुत साहस दिखाया है । यह संभव इसलिए हो सका क्योंकि मल्लिका का प्रेम ईश्वरीय वरदान से भूषित है। आन्तरिक प्रेम। पवित्र मानसिकता का उदात्त विस्तार।

जीवन की निरंतरता में सुख - दुख आंख मिचौली करते रहे। कही कुछ निश्चित नहीं है, बंधा हुआ नहीं है। भाग्य का रहस्यमय चक्र चलता रहता है।

इस उपन्यास के नायक पार्थो मुखर्जी हैं। अगर पार्थो मल्लिका के जीवन में नहीं आते तो शायद ही यह उपन्यास लिखा जाता । पार्थो मल्लिका की शक्ति बनकर आए। आन्तरिक शक्ति। साहस। उत्साह। एक अविचल हिमालय ।अपने पूर्ण मानवीय तेजस्विता के साथ। और तभी मल्लिका की कलम से " यू एन्ड मी द अल्टीमेट ड्रीम ओफ लव" का जन्म हुआ। और अधिक नहीं। यह उपन्यास झकझोर कर रख देती है। मल्लिका मुखर्जी जी आपसे अभी और अनेक अपेक्षाएं है। एक अनमोल तोहफ़ा दिया है हिन्दी साहित्य को आपने। स्वागत है। बधाई। नमस्कार। सभी उपन्यासकारों के साथ-साथ और अनेक लेखिकाओं ने अपनी कलम से उपन्यासों में प्रगतिवादी विचारधारा को और अधिक मजबूत किया है।

संदर्भ ग्रंथ----

1. हिन्दी उपन्यासों में नारी -- डॉ शैली रस्तोगी।

2. स्त्रीवाद और महिला उपन्यासकार --- डॉ वैशाली देशपांडे।

3. चित्रा मुदगल - आवा ।

4. अनामिका , बीजाक्षर , पृ . 44.

5. मृदुला गर्ग के कथा साहित्य में नारी --- डॉ रमा नवले ।

डॉ रानू मुखर्जी

A 303 , दर्शनम् सेन्टर पार्क A 303 , परशुराम नगर ,

परशुराम रोड, सूर्या पैलेस के पास

सयाजीगंज। pin - 390020

email - ranumukharji @yahoo.co.in

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डॉ रानू मुखर्जी

A 303 , दर्शनम् सेन्टर पार्क A 303 , परशुराम नगर ,

परशुराम रोड, सूर्या पैलेस के पास

सयाजीगंज। pin - 390020

email - ranumukharji @yahoo.co.in

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परिचय – पत्र

नाम - डॉ. रानू मुखर्जी

जन्म - कलकता

मातृभाषा - बंगला

शिक्षा - एम.ए. (हिंदी), पी.एच.डी.(महाराजा सयाजी राव युनिवर्सिटी,वडोदरा), बी.एड. (भारतीय

शिक्षा परिषद, यु.पी.)

लेखन - हिंदी, बंगला, गुजराती, ओडीया, अँग्रेजी भाषाओं के ज्ञान के कारण आनुवाद कार्य में

संलग्न। स्वरचित कहानी, आलोचना, कविता, लेख आदि हंस (दिल्ली), वागर्थ (कलकता), समकालीन भारतीय साहित्य (दिल्ली), कथाक्रम (दिल्ली), नव भारत (भोपाल), शैली (बिहार), संदर्भ माजरा (जयपुर), शिवानंद वाणी (बनारस), दैनिक जागरण (कानपुर), दक्षिण समाचार (हैदराबाद), नारी अस्मिता (बडौदा),नेपथ्य (भोपाल), भाषासेतु (अहमदाबाद) आदि प्रतिष्ठित पत्र – पत्रिकाओं में प्रकशित। “गुजरात में हिन्दी साहित्य का इतिहास” के लेखन में सहायक।

प्रकाशन - “मध्यकालीन हिंदी गुजराती साखी साहित्य” (शोध ग्रंथ-1998), “किसे पुकारुँ?”(कहानी

संग्रह – 2000), “मोड पर” (कहानी संग्रह – 2001), “नारी चेतना” (आलोचना – 2001), “अबके बिछ्डे ना मिलै” (कहानी संग्रह – 2004), “किसे पुकारुँ?” (गुजराती भाषा में आनुवाद -2008), “बाहर वाला चेहरा” (कहानी संग्रह-2013), “सुरभी” बांग्ला कहानियों का हिन्दी अनुवाद – प्रकाशित, “स्वप्न दुःस्वप्न” तथा “मेमरी लेन” (चिनु मोदी के गुजराती नाटकों का अनुवाद 2017), “बांग्ला नाटय साहित्य तथा रंगमंच का संक्षिप्त इति.” (शिघ्र प्रकाश्य)।

उपलब्धियाँ - हिंदी साहित्य अकादमी गुजरात द्वारा वर्ष 2000 में शोध ग्रंथ “साखी साहित्य” प्रथम

पुरस्कृत, गुजरात साहित्य परिषद द्वारा 2000 में स्वरचित कहानी “मुखौटा” द्वितीय पुरस्कृत, हिंदी साहित्य अकादमी गुजरात द्वारा वर्ष 2002 में स्वरचित कहानी संग्रह “किसे पुकारुँ?” को कहानी विधा के अंतर्गत प्रथम पुरस्कृत, केन्द्रिय हिंदी निदेशालय द्वारा कहानी संग्रह “किसे पुकारुँ?” को अहिंदी भाषी लेखकों को पुरस्कृत करने की योजना के अंतर्गत माननीय प्रधान मंत्री श्री अटल बिहारी बाजपेयीजी के हाथों प्रधान मंत्री निवास में प्र्शस्ति पत्र, शाल, मोमेंटो तथा पचास हजार रु. प्रदान कर 30-04-2003 को सम्मानित किया। वर्ष 2003 में साहित्य अकादमि गुजरात द्वारा पुस्तक “मोड पर” को कहानी विधा के अंतर्गत द्वितीय पुरस्कृत। 2019 में बिहार हिन्दी- साहित्य सम्मेलन द्वारा स्रजनात्मक साहित्य के लिए “ साहित्य सम्मेलन शताब्दी सम्मान “ से सम्मानित किया गया। 2019 में स्रजनलोक प्रकाशन द्वारा गुजराती से हिन्दी में अनुवादित पुस्तक “स्वप्न दुस्वप्न” को “ स्रजनलोक अनुवाद सम्मान” से सम्मनित किया गया।

अन्य उपलब्धियाँ - आकशवाणी (अहमदाबाद-वडोदरा) को वार्ताकार। टी.वी. पर साहित्यिक

पुस्तकों क परिचय कराना।

संपर्क - डॉ. रानू मुखर्जी

A.303.Darshanam Central Park.Pararashuramnagar.

Sayajigaunj.BARODA-390020. GUJARAT. EMAIL-ranumukharji@yahoo.co.in

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