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व्यंग्य - और उस पर "आप" का ग़म - प्रभात गोस्वामी

व्यंग्य  -

और उस पर "आप" का ग़म -

प्रभात गोस्वामी

आज विश्व रेडियो दिवस है. हमने भी बेचारे ट्रांजिस्टर को झाड़-फूंक कर बाहर निकाला. कम से कम आज तो रेडियो के हालचाल पूछ लें. देश की राजधानी में घूम रहे हैं. वैसे तो अभी दिल्ली में फिल्म " कहीं ख़ुशी-कहीं ग़म" का शो फिर से राजनीति के रजतपट पर चल रहा है. हम भी पुराने दिनों की यादें ताज़ा करने के लिए ट्रांजिस्टर हाथ में लिए सड़क पर मोहम्मद रफ़ी साहब की सुरीली आवाज़ में गीत " ये तन्हाई का आलम और इस पर "आप" का ग़म. " सुनते हुए चल रहे थे. पर, अचानक कोई आया और गुंडई से ये गाना बंद करवा गया. किसी को भी यकीन नहीं हुआ कि ये क्या हुआ ? कैसे हुआ ?कब हुआ ? और, उसके आगे निकलते ही हमने फिर रेडियो ट्यून किया गीत बज रहा था,"करवटें बदलते रहे सारी रात हम, "आप " की कसम. "

थोड़े आगे चले तो सड़क किनारे पान की छोटी -सी गुमटी में दिल्ली विधानसभा के चुनाव परिणामों पर कुछ मोहल्ला छाप विश्लेषक ऊँची-ऊँची आवाज़ में अपनी-अपनी टिप्पणियों के साथ एक-दूजे से उलझ रहे थे. यहाँ भी हर तरह के विशेषज्ञ खड़े हुए थे. मैदान से अभ्यास कर लौटे एक खिलाड़ी हाथ में क्रिकेट का बल्ला लिए बोला –" राजनीति का मैदान भी क्रिकेट की पिच जैसा हो गया है. यहाँ कभी लम्बी पारी खेलने वाले "ज़ीरो" पर भी आउट हो जाते हैं, कहीं तिहरा शतक बनाने वाले अगली पारी में "डबल फिगर" तक भी पहुँच नहीं पाते हैं."

तभी बीच में एक ज़िम में काम करने वाला एक ट्रेनर बिना विषय की जानकारी के टपका हाथ उछालते हुए बोला, " अजी, आजकल तो "ज़ीरो फिगर" का ट्रेंड चल रहा है ! " तभी एक बुजुर्ग गुस्से से - बोला, " अबे चुप कर,अपना हाथ पीछे रख, पता नहीं कहाँ की बात को कहाँ धकेल रहा है ? " इस बीच महानगर निगम से सम्बंधित लग रहा एक सख्स बोला, " ये सब स्वच्छ भारत" अभियान का कमाल है. सारे शहर में सफाई, कीचड़ का नामोनिशान मिटा दिया. कमल खिलता तो कहाँ ? हूँ..हूँ...बात में कुछ तो दम है की तर्ज़ पर कुछ चेहरों पर मुस्कान तैरने लगी.

चर्चा के बीच एक छात्र ने विषय प्रवेश किया. सर खुजलाते हुए पूछा, " अमां यार ! हमने अब तक तो यही सुना था कि पानी से बिजली बनती है और बिजली से करंट. पर, पहलीबार पानी,बिजली और करंट से सरकार बनते देखी है. लोकतंत्र में यह नया प्रयोग अब हम छात्रों के लिए शोध का एक नया विषय बनेगा." तभी बीच में राजनीति के एक पुराने खापड़ कूद पड़े. उन्होंने कहा, " राजनीति के "वरिष्ठजनों" ने पन्नाधाय-सा बलिदान देकर हमें हराया." हमने फिर रेडियो ट्यून किया. रफ़ी साहब की मधुर आवाज़ में गीत," अकेले हैं,चले आओ, जहाँ हो ? कहाँ आवाज़ दें तुमको कहाँ हो ? लोग चुप हो गए, हमारी ओर बड़े कातर भाव से देखा. हमने कहा," भाइयो, आज "विश्व रेडियो दिवस" है.

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प्रभात गोस्वामी,

15/ 27, मालवीय नगर,

जयपुर (राजस्थान)

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