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कहानी - भास्कर राव इंजीनियर --- अरुण अर्णव खरे ---

कहानी

भास्कर राव इंजीनियर

--- अरुण अर्णव खरे ---

एस०जी० भास्कर राव को इतना भावुक किसी ने कभी नहीं देखा था - उनकी आंखों से झरझर आँसू बह रहे थे। ओल्ड हॉस्टल के अधिकतर छात्र उनके कमरे के सामने एकत्र हो चुके थे और इस दृष्य को देख-देख कर खुद भी भावुक हुए जा रहे थे। उन्होंने सबको पहले ही बता रखा था कि इसके बाद वह अब दोबारा पेपर देने नहीं आएंगे, इस बार अन्तिम बार पेपर देने आए हैं। उस दिन शाम को ही उनका गुण्टूर वापसी का रिजर्वेशन था। उनका सामान पैक हो चुका था। बाबूराव कमरे में एक ओर खड़ा रो रहा था। वह पिछले कई सालों से हॉस्टल का चौकीदार था और फुर्सत के समय भास्कर राव की सेवा करता रहता था।

भास्कर राव ने एस०आई०टी० टेक्नोलॉजिकल इंस्टीट्यूट में उस समय प्रवेश लिया था जब कॉलेज नया-नया खुला था। तब इंजीनियरिंग कॉलेज में आज सरीखी ब्रांचेज की भरमार नहीं थी - केवल तीन कोर ब्रांचेज - सिविल, मेकेनिकल और इलेक्ट्रिकल की ही पढ़ाई हुआ करती थी। भास्कर राव गुण्टूर से यहां इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग पढ़ने आए थे। उनका सपना था इलेक्ट्रीकल इंजीनियर बनकर ट्रांसफॉर्मर बनाने की एक फेक्टरी लगाने का। जब भी वह अपने गाँव जाते और वहाँ बिजली न होने की वजह से लोगों की परेशानियों को देखते तो उनका मन वेदना से भर जाता - आजादी के तीस वर्षों बाद भी उनके गाँव में रोशनी नहीं पहुंच पाई थी - बिजली विभाग का जूनियर इंजीनियर हमेशा ट्रांसफॉर्मर ना होने का रोना रोता था। बिजली ना होने के कारण गाँव में प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र तक नहीं खुल पाया था और ना ही प्रायमरी स्कूल। बारिस के समय अंधेरे में डूबी गलियों में चलने को अभिशप्त गाँव वाले हर साल तीन-चार लोगो को सर्प-दंश से असमय ही काल के गाल में समाते हुए देखते थे। गाँव से चार मील की दूरी पर ही नागालेरू नदी थी लेकिन बिजली के अभाव में गाँव के खेत प्यासे थे - नदी का पानी खेतों तक पहुंचाने के लिए कोई साधन नहीं था। गर्मियों में पीने के पानी का भी अभाव हो जाता था - नल-जल योजना के बारे में सोचना भी गाँव वालों के लिए स्वप्नवत था। उनके गाँव जैसे ही आस-पास के बहुत से गाँव इसी तरह अंधेरे में डूबे सिसकियां लेते हुए जी रहे थे।

अंधेरे में डूबे गाँवों में रोशनी पहुंचाने का -- उनका सपना अब तक अधूरा ही था। पूरे ग्यारह वर्षों के अथक प्रयास के बाद भी वह फ़ुल-फ्लेश इंजीनियर बनने में सफल नहीं हुए थे - वह इंजीनियर बनने का सपना त्याग चुके थे और अपने पैतृक तम्बाखू-उत्पादन के बिजनेस में रम चुके थे। उनका विवाह भी हो चुका था और एक नन्हा-मुन्ना भी उनके जीवन में आ चुका था। पर गाँव का अंधेरा अब भी उनके मन में कभी-कभी कराहता रहता था और वह बैचैनी अनुभव करने लगते। इसी व्यग्रता में वह इंजीनियर बनने का मोह त्याग नहीं पाए थे और इम्तहान देने पहुंच जाते थे।

ओल्ड हॉस्टल का कमरा नम्बर सात भास्कर राव की पहिचान था। १९७७ में जब उन्होंने कॉलेज में एडमीशन लिया था तबसे वह उसी कमरे में रहते आए थे, कभी दूसरे कमरे में शिफ्ट नहीं हुए। अनेक शुभचिंतको ने कमरे को उनके लिए अशुभ तक कहा पर उन्होंने कभी इस बात पर विश्वास नहीं किया -- वह हँस कर बात टाल देते कि सात मई को तो उनका जन्म हुआ है फिर सात नम्बर अशुभ कैसे हो सकता है। १९८३ में वह कॉलेज के नियमित छात्र नहीं रहे थे लेकिन जब भी वह परीक्षा देने आते वह उसी कमरे में ही रुकते थे। उनके आने की बात सुनकर ही उस कमरे में रहने वाले लड़के किसी दूसरे कमरे में अपने साथियों के साथ शिफ्ट हो जाते थे। यह उनका दबदबा या डर नहीं था अपितु उनके प्रति अगाध आदर और श्रद्धा का परिणाम था। हॉस्टल के वार्डन ने भी कभी इस बात पर आपत्ति नहीं की थी। १९८३ में अशोक त्रिवेदी उनका रूममेट हुआ करता था वह भी १९८६ में पास हो गया था। उसके बाद विनोद गुरु को वह रूम एलाट हो गया था लेकिन भास्कर राव के लिए वह भी सहर्ष रूम छोड़ कर मनोज गोयल के साथ रहने चला जाता था। वर्तमान में सचिन माथुर और देवेन्द्र पंचोली वह रूम शेयर कर रहे थे। भास्कर राव के आने की खबर सुन कर वे दोनों भी अपने दोस्तों के पास शिफ्ट हो गए थे।

भास्कर राव बहुत ही खुशमिजाज, हरेक का ख्याल रखने वाले, सहृदय और सम्वेदनशील व्यक्ति थे। उनके बारे में कितनी ही बातें और किस्से हॉस्टल में रहने वाले सुनते-सुनाते रहते थे। नए लड़कों के लिए जहाँ वह कोतुहल की वस्तु होते थे वहीं परिचितों के लिए उनका आगमन आह्लाद से भरपूर होता था। जीवन सूर्यवंशी तो उन्हें देवतुल्य मानता था। ट्रेन से उतरते समय जब उसकी टॉँग कट गई थी और अत्यधिक खून बह जाने से उसके जीवन पर संकट आ गया था तब भास्कर राव अपना इंस्ट्रूमेण्टेशन का पेपर छोड़ कर उसे खून देने अस्पताल दौड़े आए थे। जिसने भी जीवन से यह कहानी सुनी उसके मन में स्वमेव ही भास्कर राव ने अपना स्थान बना लिया।

पिछले तीन वर्षों से रमेश केसरवानी की कॉलेज फीस और हॉस्टल का खर्च वही वहन कर रहे थे। उसके पिता का आकस्मित निधन हो जाने से उसके परिवार में कोई भी कमानेवाला नहीं था। वह पढ़ाई छोड़ कर शिक्षाकर्मी बन गया था - उस साल जब भास्कर राव परीक्षा देने आए और उन्हें रमेश के बारे में पता चला तो वह ना केवल रमेश से मिलने उसके गाँव तक गए अपितु उससे अपनी इंजीनियरिंग की पढ़ाई पूरी करने का संकल्प भी कराया। रमेश भी अपने संकल्प के प्रति दृढ़ निकला और हर सेमेस्टर में यूनिवर्सिटी में प्रथम तीन मेरिट होल्डर्स में आ रहा है। शहरयार खान के भाई मुबीन को भास्कर राव ने ही हैदराबाद बेडमिण्टन अकादमी में एडमीशन दिलाया था। वह देश का सबसे प्रतिभाशाली खिलाड़ी था। उसने राज्य बेडमिण्टन स्पर्द्धा का जूनियर खिताब भी जीता था किंतु सब्जी का ठेला लगाने वाले पिता के पास उसे अच्छी कोचिंग दिलाने के लिए पैसे ही नहीं थे।

ऐसे कितने ही किस्से थे जो भास्कर राव के साथ जुड़े थे। भास्कर राव जब भी पेपर देने आते और हॉस्टल में रुकते - वह सभी के लिए कुछ ना कुछ लेकर जरूर आते। दिनकर को उन्होंने माउथ ऑर्गन लाकर दिया था तो रविन्द्र को गिटार। विनीत को टेनिस का रैकेट दिलाया था - मनोहर को फाइन आर्टस के कम्पटीशन में भाग लेने के लिए शिमला भेजा था। इस समय होस्टल में सभी लड़के उनसे बहुत जूनियर थे। राम उपाध्याय तो उस समय नर्सरी में था जब भास्कर राव इस कालेज में पढ़ने आए थे। यही कारण था कि हॉस्टल का हर लड़का उनमे अपने गार्जीयन का अक्श देखता था। वह जितने दिन हॉस्टल में रुकते वहां का माहौल ही अलग रहता। सब बड़े अनुशासित नजर आते और ध्यान रखते कि उनके कारण भास्कर राव को जरा भी तकलीफ न हो।

भास्कर राव ने आने से पहले ही सचिन माथुर को बता दिया था कि इस बार वह आखिरी बार परीक्षा देने आये हैं -- इसके बाद वह दोबारा इंजीनियर बनने की कौशिश नहीं करेंगे और अपने पूर्वजों का बिजनेस पूरे मनोयोग से संभालने लगेंगे। सचिन ने यह बात सबको बता दी थी -- यह जानकर सभी दुखी थे और दिल से दुआ कर रहे थे कि इस बार उनका सपना जरूर पूरा हो जाए। जिस दिन उनका पेपर था उस दिन सुबह-सुबह ही राम उपाध्याय ने हनुमान टेकरी का प्रसाद लाकर उन्हें खिलाया था। केसरवानी उनके लिए वाहे-गुरु से मन्नत मांगने गया था और शहरयार ने पीली-कोठी पर उनके लिए हरी चादर चढ़ाई थी और वहां से तबर्रुफ में रेवड़ी तथा मिश्री लेकर आया था। पूरा ओल्ड हॉस्टल चाहता था कि भास्कर राव यहां से अपनी अभिलाषा पूर्ण कर ही वापिस जाएं।

पेपर होने के दस दिन बाद का उनका रिजर्वेशन था अतएव इन दिनों में हॉस्टल में उत्सव जैसा माहोल रहा। एक दिन भास्कर राव ने अपनी तरफ से सबको पार्टी दी -- उन्होंने अपने हाथों से सबको इडली बना कर खिलाईं। जाने से एक दिन पहले सभी ने मिलकर उनके सम्मान में विदाई पार्टी का आयोजन किया। विदाई पार्टी क्या थी हॉस्टल डे जैसा रंगारंग धमाल कार्यक्रम था - गीत, संगीत, डांस, चुटकुले और सबसे बढ़कर भास्कर राव का गायन। छह साल बाद उन्होंने हॉस्टल में कोई गीत गाया था। वर्तमान में हॉस्टल में रहने वाले किसी भी लड़के ने उनका गाना नहीं सुना था। पहले उन्होंने एन०टी० रामाराव की फिल्मों के कुछ डायलॉग सुनाए और फिर एस०पी० बालासुब्रमण्यम के गीत गाए। इसके बाद हेमंत कुमार के एक से बढ़कर एक सदाबहार गीत सुनाकर सबको चोंका दिया। रात में तीन बजे तक यह मस्ती भरा कार्यक्रम चलता रहा। किसी की इच्छा नहीं थी कि कार्यक्रम कभी खत्म हो या इस सुहानी रात की सुबह भी हो।

सुबह होते ही बाबूलाल आ गया था और भास्कर राव का सामान पैक करने में उनकी मदद करने। हॉस्टल के दूसरे बच्चे भी उनसे मिलने आ जा रहे थे। कोई उनके साथ फोटो ले रहा था तो कोई पैर छूकर आशीर्वाद। सब दुखी थे - यह जान कर कि वह जा रहे हैं -- फिर ना आने के लिए -- ग्यारह साल पहले वे जिस तरह कुछ बनने का सपना लेकर आये थे अब लौट कर जा रहे हैं वैसे ही खाली-खाली, अपूर्ण -- अधूरे से। राम उपाध्याय तो उनसे मिलकर रो ही दिया। वापस कमरे में जाकर भी बहुत देर तक वह तकिए में मुंह छुपाकर बुदबुदाता रहा था - सुना है भगवान के घर देर है अन्धेर नहीं -- पर लगता है अन्धेर भी है। भास्कर राव जैसे फरिस्ता दिल इन्सान की भी भगवान कितनी परीक्षा ले रहा है -- हमारी प्रार्थनाएं भी व्यर्थ जा रहीं हैं।

सामान की पैकिंग पूरी हो चुकी थी। ट्रेन छूटने में लगभग दो घण्टे का समय शेष था। बाबूलाल कमरे के एक कोने में उदास खड़ा लगभग रो देने की स्थिति में था। भास्कर राव उसे समझा रहे थे। कुछ बच्चे कमरे के बाहर खड़े थे। देवेन्द्र पंचोली हाथ में एक कागज पकड़े हाँफता हुआ आया। उसके पीछे-पीछे दो लडके ढोल लेकर आए थे। आते ही वह भास्कर राव से लिपट कर रोने लग गया - "सर आप पास हो गये हैं -- अभी आप हमें छोड़ कर जा रहे थे अब हम आपको विदा करेंगे धूमधाम से।"

"क्या कहा देवेन्द्र तुमने -- फिर से बोलो -- क्या भास्कर राव इंजीनियर बन गया --" कहते हुए भास्कर राव ने भी देवेन्द्र को अपनी बाँहों में जकड़ लिया। उनकी आंखों से भी जलधारा बह निकली। मन का उद्वेग सारे बाँध तोड़ कर निर्बाध बह चला था। उनके कमरे के सामने बच्चों की भीड़ बढ़ती जा रही थी। सभी की आंखे भीगी हुईं थी - खुशी से -- प्रार्थना सुन लिए जाने से -- ईश्वर के घर अन्धेर नहीं है की बात सही सिद्ध हो जाने से --

अरुण अर्णव खरे

डी-1/35 दानिश नगर

होशंगबाद रोड, भोपाल (म०प्र०) 462 026

ई मेल : arunarnaw@gmail.com

1 टिप्पणियाँ

  1. वास्तविकता का धरातल पर बुनी कहानी मन के अंत:स्थल को छू गई
    बहुत अच्छी प्रस्तुति

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