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कहीं दूर... कविताएँ - राजेश गोसाईं

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1....हैं तैयार हम उदघोष होगा खतरे का जब भी रणभूमि के लिए हैं तैयार हम हैं तैयार हम घर घर से निकल कर सरहद के हैं पहरेदार हम पहरेदार हम ...

1....हैं तैयार हम

उदघोष होगा खतरे का जब भी रणभूमि के लिए हैं तैयार हम
हैं तैयार हम
घर घर से निकल कर सरहद के
हैं पहरेदार हम
पहरेदार हम
फौलादी हैं सीने अपने
चलेंगे अंगारों पर
लिये भुजाओं में हथियार बम
हैं तैयार हम
 
है दिलों में कुछ
करने का अरमान बड़ा
चीर के देखो सीने अपने
हर सीने में इक हिंदुस्तान खड़ा
मस्ती में झूमेंगे
मस्ती में खेलेंगे
वतन के वास्ते हर कष्ट झेलेंगे
रंग बसन्ती का भी
घुला है हर बात पर
बांध कर देशहित में कफन
हैं तैयार हम
एक हाथ बंदूक और
दूजे में लेकर तिरंगा
हैं तैयार हम
हर सीने में लेकर हिंदुस्तान
हैं तैयार हम

उठा लिये जो शस्त्र हमने
परवाह नहीं फिर जान की
लिये हथेली पर मौत चलेंगे
उफ़ तक ना होगी जुबान की
झुकने ना देंगे सर
ना लुटने देंगे
आबरू हिंदुस्तान की
हो देश की खातिर फांसी तो
हैं तैयार हम
हैं तैयार हम
राजेश गोसाईं
******

2.......आवारा चमन

दीवाना हुआ दिल
मिल के तुमसे हरदम
खो गया उस जहान में
जहां प्यार का है संगम

बेचैन हैं बहारें
चैन नहीं हमदम
हूं पागल मैं भी
और आवारा हुआ चमन

बादल कोई आया
भीगा ये तन मन
दीवाना हुआ मैं भी
दीवाना हुआ सावन

ये जुल्फों की घटायें
ये चन्दन सा बदन
इस प्यार की अंगड़ाई में
पागल हुआ मौसम
राजेश गोसाईं
*******


3......टूटा हुआ फूल

इन्हें मालूम ही नहीं था
मैं टूटा हुआ हूं
इक मासूम सा फूल ही था
जो डाली से टूटा हुआ हूं

जब देखा था इन्होंने
रंग और नूर से भरा हुआ था
चारों तरफ तितलियों
और भंवरों से घिरा हुआ था

दुर्लभ जमीं और चट्टानों पर भी
चेहरा खिला हुआ था
हवाओं के झोंकों का
मुझ पर पहरा हुआ था
आज वक़्त की आंधियों में गिरा हुआ हूं

दर्द की नगरी से निकल कर
कहीं सुख की बस्ती में चला हूं
मौजों की मस्ती से बिखर कर
अर्थी पे चला हूं
किसी बाला के बालों में सजा हुआ हूं
चमन का टूटा हुआ फूल
शहीदों के मधुबन में लगा हुआ हूं
राजेश गोसाईं
******


4...=ऐ मेरी प्यारी बीवी


ऐ मेरी प्यारी बीवी
तू मान ले यही
तू अभी नहीं बुड्ढी...और मैं बुड्ढा
अब तो मान जा .मान..जा....
.मेरी जां....


ये झुर्रियां.... गुलाबी गालों की
ये सफेदी....बालों की..
लहरें हैं ...ये ...तेरे प्यार की....
है तेरी ..आंखों में ...नशीलापन
तू रानी....बहार की
बज रही है ....बज रही ...
है दांतों की डुगडुगी.....
फिर भी नहीं तू बुड्ढी ....और मैं बुड्ढा
अब तो मान जा ....मान जा....
मेरी जां....

ढलती उम्र में भी .....तू हसीं
तेरे जैसी सुंदर ....और नहीं ...
कहीं नहीं.....
है मेरी .. है मेरी ...जिन्दगी का सहारा ...तू साथी..
बन के ...दादा दादी खिलायेंगे... गुड्डा और गुड्डी
फिर भी नहीं तू बुड्ढी ....और मैं बुड्ढा
अब तो मान जा ....मान जा..
मेरी जां....
राजेश गोसाईं
******


5....कब आयेगी


ना जाने मुझको
ये मौत कब आयेगी
पता जिंदगी का
मैंने दे दिया था
लापरवाही और
गलती का मकान
दुर्घटना स्थल का निशान
उसे दे दिया था

सुख दुःख की नगरी में
होती है दर्द की बारिश
रिश्तों ने रिश्तों का
कत्ल जो किया था
घायल हुई  सांसों में
अपनों ने अपनों से
मुंह भी पलट लिया था

सांप्रदायिक हिंसा का
पहला पता जब दिया था
गोलियों के भंवर में
मैं फंसा रह गया था
नाम लिया उस प्रभु का
तो मौत ने भी अपना
रास्ता बदल लिया था

लड़खड़ा रहा था
जब पहाड़ पे चढ़ा था
गिर कर के देखा तो
सामने बहता दरिया था
शिव की कृपा से
फिर मौत ने अपना
रास्ता बदल लिया था

जूझता ही रहा मैं
गंभीर रोगों से ता-उम्र
गैरौं से मिल कर अपनों ने
तब साथ बहुत दिया था
कुछ उनके प्यार से ही
मौत ने अपना
रास्ता बदल लिया था

इक पशु ने आ कर
तारे दिन में दिखलाये
तोड़ कर बदन के सितारे
बिस्तर पे बिखराये
किसी शुभ कर्म से फिर
मौत ने रास्ता बदल लिया था

कहीं ऊंच नीच चलन में
पांव फिसल गया था
सांसों की घुटन में
टूटन हड्डी का हुआ था
किसी बुरी घड़ी में
शुभ घड़ी की वजह से
आज फिर मौत ने
रास्ता बदल लिया था

आनी तो है ही इक दिन
ये मौत सबको
याद रखना भी जरूरी है
जिंदगी में सबको
यत्र-तत्र-सर्वत्र
कहीं सड़क पर

ना जाने आज
ना जाने कब
ना जाने किसकी
ये मौत रास्ता बदल जायेगी
राजेश गोसाईं
********


6......कहीं दूर...

कहीं दूर ...जो फूल खिला था
देख कर उसको... मन में ...हुई इक आशा
खिला रहे ये.... अपनी उम्र तक
खुशबू ....सारे जहान में लुटाता

कभी कोई ....तोड़ ना दे इसको
जिस डाली पे..... है ये मुस्काता
तपती धूप में ...रूप इसका
बिगड़ ना जाये .....जो खिला था

राजा है..... बगिया का चाहे
मगर तितलियों से घिरा हुआ
लालच में ...मकरन्द के आये
भंवरों का ...इसपे पहरा हुआ
आये ना झोंका ...हवा का कोई
दिखाये ना कुदरत ....अपना तमाशा
राजेश गोसाईं
******

7......आप बीती

ना जमीं दिख रही है ना आसमां
पड़ा हुआ हूं बिस्तर पे मैं परेशान

हुये दिन बहुत कोई स्नान नहीं किया
दैनिक कर्म करना बिलकुल है मना

दर्द की नगरी में हूं अभी तड़प रहा
सांसें तो चल रही हैं पर हवा है कहां

अभी तो कुछ भी पता नहीं है मुझे
उठ कर चलूंगा मैं कब यहां वहां

कैसा ये खेल कुदरत ने है रचा
परेशान मैं और परेशान हैं जहां
राजेश गोसाईं
******

8....

भरोसा

आदमी का आदमी से
यही दोस्ताना है
यारों का यार है और
दुश्मन जमाना है

कत्ल तो बहुत देखें हैं
रिश्तों के हमने
अपनों ने अपनों को
कहां पहचाना है

कोई साथ देता नहीं
उम्र भर किसी का
गैरों संग अपनों ने
शमशान पहुचाना है

भरोसा जिंदगी का
नहीं है कोई
सांसों ने सांसों को
पार लगाना है
राजेश गोसाईं
*****

9.....परिवर्तन


रोज सुबह देखता हूँ
रौशनी के अंकुर
सांय , मुरझाये हुये
फूल से चेहरे
रौशनी की झुर्रियां
अर्ध चन्द्रमा की
धुंधली चाँन्दनी में
खिली कलियाँ
यही जिन्दगी का अंश
कभी अतीत कभी वर्तमान
और कभी भविष्य
परिवर्तित कर देता है
इंसान का धर्म - फर्ज
और बदल जाती है
इंसानियत -
हैवानियत में ह.हा.हा
समझने लगता है मनुष्य
भाग्य का खेल इसे
परन्तु अंजान है स्वंय वही
निर्माता है अपनी तकदीर का
जिन्दगी की तस्वीर का
रंग भरता है जिसमें स्वयं वही
भाग्य तो सिर्फ खेलता है
इंसान के कर्मों से और
और बदल जाता है खुद ही
हार या जीत में
यह परिवर्तन ही स्वयं
परिवर्तित हो जाता है तब
मनुष्य के अहं में
राजेश गोसाईं
*****

10....उदासियाँ


क्यूं उग आयें पेड़ उदासियों के
फल जख्मों के अभी भी हरे हैं
दर्द की बारिश में भीगा ये मन है
परिन्दे यादों के अभी तो उड़े हैं
यादों के सागर में दर्द उफान पर है
हवाओं से कह दो जरा थम जायें
कश्ती भरी है जख्मों से दिल की
आहों से कह दो जरा रुक के आयें
दास्तां दर्द की बेजुबां ही बोलती है
जुबां खुले तो सिर्फ आह ही होती है
आंसू पढ़ लो किताब आँख भी होती है
उदास पेड़ों की छांव हर शाख होती है
राजेश गोसाईं
*****

11....उस पेड़ की तरह


वृक्षों की सांय-सांय
मानो सांसों के स्वर में
लड़खड़ाहट सी हो रही है
सिन्दूरी सांझ का एकाकीपन
तिमिर के अंकुरों का स्फुटन
नवीन प्रभात की पत्तियों में
पीलापन व मुरझाई लकीरें
कोई माली नहीं जो सेवा करे
सींचे उन झुलसाये तरूवरों को
भीषण गर्मी में खड़े जो
अपने जीवन के हरे दिनों से
धूप में शाखायें सूख रही जिनकी
नीलाम्बर चादर तान कर वो
वृक्ष सांय सांय कर हिलते
ना जाने कब टूट कर बिखर जायें
मेरी कल्पनाओं में बसता कोई
शहर कब उजड़ जाये
जिसमें कोई बूढ़ा अपने
स्वरों को सम्भालता हुआ
चलता है.......मगर यह तस्वीर
बेरंग और अधूरी ही है जो
टूट कर बिखर जायेगी
गिर जायेगी धरा पे तो पूरी होगी
फिर किसी वृक्ष की सांय-सांय
सुनता हूँ खिड़की के बाहर सायं ( शाम )
और अंदर से उसको खड़ा देख
मैं सोचने लगता हूँ कि
जीवन की सांझ ढलने लगी है
मैं भी शायद बूढ़ा हो गया हूँ
उस पेड़ की तरह
राजेश गोसाईं
*******

12.....जाल


दूर-सुदूर मनभावन रूपों में
फैले हुये बोगनवलिया के फूल
हरे भरे पत्तों की छाँव....
कितना आनन्द , कितना सुकून
मगर आज........
दूर सुदूर फैला हुआ शर शिरा जाल
उसमें से रिसती हुई धूप-- आह !
एकाएक किसी पुष्प पुंज की
हंसी सुन हैरान होता मैं
खोजने लगता हूँ कोई
छिपा हुआ पुष्प
उस कंटक सूत्र में
एक नन्हा सा फूल एक तरफ देख
मैं सोचने लगा .......
कांटे ही कांटे , बिखरे हुये फूल धरा पे
उधर अकेला ही पुष्प पुंज लड़ रहा
कभी धूप से कभी समीर से
नन्हा सा फूल अभी भी
ठीक ऐसे ही मेरा देश है शायद
रिक्त हुये शिरा जाल सा
परन्तु पुष्प की अभिलाषा में
मैं कांटे खोजता हुआ देखने लगा
दूर तक फैला हुआ
बोगनवलिया का जाल
समाज का जाल
घर व रिश्तों का जाल
दूर तक अलग अलग रूपों में
राजेश गोसाईं

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 आलेख ,1, कविता ,1, कहानी ,1, व्यंग्य ,1,14 सितम्बर,7,14 september,6,15 अगस्त,4,2 अक्टूबर अक्तूबर,1,अंजनी श्रीवास्तव,1,अंजली काजल,1,अंजली देशपांडे,1,अंबिकादत्त व्यास,1,अखिलेश कुमार भारती,1,अखिलेश सोनी,1,अग्रसेन,1,अजय अरूण,1,अजय वर्मा,1,अजित वडनेरकर,1,अजीत प्रियदर्शी,1,अजीत भारती,1,अनंत वडघणे,1,अनन्त आलोक,1,अनमोल विचार,1,अनामिका,3,अनामी शरण बबल,1,अनिमेष कुमार गुप्ता,1,अनिल कुमार पारा,1,अनिल जनविजय,1,अनुज कुमार आचार्य,5,अनुज कुमार आचार्य बैजनाथ,1,अनुज खरे,1,अनुपम मिश्र,1,अनूप शुक्ल,14,अपर्णा शर्मा,6,अभिमन्यु,1,अभिषेक ओझा,1,अभिषेक कुमार अम्बर,1,अभिषेक मिश्र,1,अमरपाल सिंह आयुष्कर,2,अमरलाल हिंगोराणी,1,अमित शर्मा,3,अमित शुक्ल,1,अमिय बिन्दु,1,अमृता प्रीतम,1,अरविन्द कुमार खेड़े,5,अरूण देव,1,अरूण माहेश्वरी,1,अर्चना चतुर्वेदी,1,अर्चना वर्मा,2,अर्जुन सिंह नेगी,1,अविनाश त्रिपाठी,1,अशोक गौतम,3,अशोक जैन पोरवाल,14,अशोक शुक्ल,1,अश्विनी कुमार आलोक,1,आई बी अरोड़ा,1,आकांक्षा यादव,1,आचार्य बलवन्त,1,आचार्य शिवपूजन सहाय,1,आजादी,3,आत्मकथा,1,आदित्य प्रचंडिया,1,आनंद टहलरामाणी,1,आनन्द किरण,3,आर. के. नारायण,1,आरकॉम,1,आरती,1,आरिफा एविस,5,आलेख,4290,आलोक कुमार,3,आलोक कुमार सातपुते,1,आवश्यक सूचना!,1,आशीष कुमार त्रिवेदी,5,आशीष श्रीवास्तव,1,आशुतोष,1,आशुतोष शुक्ल,1,इंदु संचेतना,1,इन्दिरा वासवाणी,1,इन्द्रमणि उपाध्याय,1,इन्द्रेश कुमार,1,इलाहाबाद,2,ई-बुक,374,ईबुक,231,ईश्वरचन्द्र,1,उपन्यास,269,उपासना,1,उपासना बेहार,5,उमाशंकर सिंह परमार,1,उमेश चन्द्र सिरसवारी,2,उमेशचन्द्र सिरसवारी,1,उषा छाबड़ा,1,उषा रानी,1,ऋतुराज सिंह कौल,1,ऋषभचरण जैन,1,एम. एम. चन्द्रा,17,एस. एम. चन्द्रा,2,कथासरित्सागर,1,कर्ण,1,कला जगत,113,कलावंती सिंह,1,कल्पना कुलश्रेष्ठ,11,कवि,2,कविता,3240,कहानी,2361,कहानी संग्रह,247,काजल कुमार,7,कान्हा,1,कामिनी कामायनी,5,कार्टून,7,काशीनाथ सिंह,2,किताबी कोना,7,किरन सिंह,1,किशोरी लाल गोस्वामी,1,कुंवर प्रेमिल,1,कुबेर,7,कुमार करन मस्ताना,1,कुसुमलता सिंह,1,कृश्न चन्दर,6,कृष्ण,3,कृष्ण कुमार यादव,1,कृष्ण खटवाणी,1,कृष्ण जन्माष्टमी,5,के. पी. सक्सेना,1,केदारनाथ सिंह,1,कैलाश मंडलोई,3,कैलाश वानखेड़े,1,कैशलेस,1,कैस जौनपुरी,3,क़ैस जौनपुरी,1,कौशल किशोर श्रीवास्तव,1,खिमन मूलाणी,1,गंगा प्रसाद श्रीवास्तव,1,गंगाप्रसाद शर्मा गुणशेखर,1,ग़ज़लें,550,गजानंद प्रसाद देवांगन,2,गजेन्द्र नामदेव,1,गणि राजेन्द्र विजय,1,गणेश चतुर्थी,1,गणेश सिंह,4,गांधी जयंती,1,गिरधारी राम,4,गीत,3,गीता दुबे,1,गीता सिंह,1,गुंजन शर्मा,1,गुडविन मसीह,2,गुनो सामताणी,1,गुरदयाल सिंह,1,गोरख प्रभाकर काकडे,1,गोवर्धन यादव,1,गोविन्द वल्लभ पंत,1,गोविन्द सेन,5,चंद्रकला त्रिपाठी,1,चंद्रलेखा,1,चतुष्पदी,1,चन्द्रकिशोर जायसवाल,1,चन्द्रकुमार जैन,6,चाँद पत्रिका,1,चिकित्सा शिविर,1,चुटकुला,71,ज़कीया ज़ुबैरी,1,जगदीप सिंह दाँगी,1,जयचन्द प्रजापति कक्कूजी,2,जयश्री जाजू,4,जयश्री राय,1,जया जादवानी,1,जवाहरलाल कौल,1,जसबीर चावला,1,जावेद अनीस,8,जीवंत प्रसारण,141,जीवनी,1,जीशान हैदर जैदी,1,जुगलबंदी,5,जुनैद अंसारी,1,जैक लंडन,1,ज्ञान चतुर्वेदी,2,ज्योति अग्रवाल,1,टेकचंद,1,ठाकुर प्रसाद सिंह,1,तकनीक,32,तक्षक,1,तनूजा चौधरी,1,तरुण भटनागर,1,तरूण कु सोनी तन्वीर,1,ताराशंकर बंद्योपाध्याय,1,तीर्थ चांदवाणी,1,तुलसीराम,1,तेजेन्द्र शर्मा,2,तेवर,1,तेवरी,8,त्रिलोचन,8,दामोदर दत्त दीक्षित,1,दिनेश बैस,6,दिलबाग सिंह विर्क,1,दिलीप भाटिया,1,दिविक रमेश,1,दीपक आचार्य,48,दुर्गाष्टमी,1,देवी नागरानी,20,देवेन्द्र कुमार मिश्रा,2,देवेन्द्र पाठक महरूम,1,दोहे,1,धर्मेन्द्र निर्मल,2,धर्मेन्द्र राजमंगल,2,नइमत गुलची,1,नजीर नज़ीर अकबराबादी,1,नन्दलाल भारती,2,नरेंद्र शुक्ल,2,नरेन्द्र कुमार आर्य,1,नरेन्द्र कोहली,2,नरेन्‍द्रकुमार मेहता,9,नलिनी मिश्र,1,नवदुर्गा,1,नवरात्रि,1,नागार्जुन,1,नाटक,152,नामवर सिंह,1,निबंध,3,नियम,1,निर्मल गुप्ता,2,नीतू सुदीप्ति ‘नित्या’,1,नीरज खरे,1,नीलम महेंद्र,1,नीला प्रसाद,1,पंकज प्रखर,4,पंकज मित्र,2,पंकज शुक्ला,1,पंकज सुबीर,3,परसाई,1,परसाईं,1,परिहास,4,पल्लव,1,पल्लवी त्रिवेदी,2,पवन तिवारी,2,पाक कला,23,पाठकीय,62,पालगुम्मि पद्मराजू,1,पुनर्वसु जोशी,9,पूजा उपाध्याय,2,पोपटी हीरानंदाणी,1,पौराणिक,1,प्रज्ञा,1,प्रताप सहगल,1,प्रतिभा,1,प्रतिभा सक्सेना,1,प्रदीप कुमार,1,प्रदीप कुमार दाश दीपक,1,प्रदीप कुमार साह,11,प्रदोष मिश्र,1,प्रभात दुबे,1,प्रभु चौधरी,2,प्रमिला भारती,1,प्रमोद कुमार तिवारी,1,प्रमोद भार्गव,2,प्रमोद यादव,14,प्रवीण कुमार झा,1,प्रांजल धर,1,प्राची,367,प्रियंवद,2,प्रियदर्शन,1,प्रेम कहानी,1,प्रेम दिवस,2,प्रेम मंगल,1,फिक्र तौंसवी,1,फ्लेनरी ऑक्नर,1,बंग महिला,1,बंसी खूबचंदाणी,1,बकर पुराण,1,बजरंग बिहारी तिवारी,1,बरसाने लाल चतुर्वेदी,1,बलबीर दत्त,1,बलराज सिंह सिद्धू,1,बलूची,1,बसंत त्रिपाठी,2,बातचीत,2,बाल उपन्यास,6,बाल कथा,356,बाल कलम,26,बाल दिवस,4,बालकथा,80,बालकृष्ण भट्ट,1,बालगीत,20,बृज मोहन,2,बृजेन्द्र श्रीवास्तव उत्कर्ष,1,बेढब बनारसी,1,बैचलर्स किचन,1,बॉब डिलेन,1,भरत त्रिवेदी,1,भागवत रावत,1,भारत कालरा,1,भारत भूषण अग्रवाल,1,भारत यायावर,2,भावना राय,1,भावना शुक्ल,5,भीष्म साहनी,1,भूतनाथ,1,भूपेन्द्र कुमार दवे,1,मंजरी शुक्ला,2,मंजीत ठाकुर,1,मंजूर एहतेशाम,1,मंतव्य,1,मथुरा प्रसाद नवीन,1,मदन सोनी,1,मधु त्रिवेदी,2,मधु संधु,1,मधुर नज्मी,1,मधुरा प्रसाद नवीन,1,मधुरिमा प्रसाद,1,मधुरेश,1,मनीष कुमार सिंह,4,मनोज कुमार,6,मनोज कुमार झा,5,मनोज कुमार पांडेय,1,मनोज कुमार श्रीवास्तव,2,मनोज दास,1,ममता सिंह,2,मयंक चतुर्वेदी,1,महापर्व छठ,1,महाभारत,2,महावीर प्रसाद द्विवेदी,1,महाशिवरात्रि,1,महेंद्र भटनागर,3,महेन्द्र देवांगन माटी,1,महेश कटारे,1,महेश कुमार गोंड हीवेट,2,महेश सिंह,2,महेश हीवेट,1,मानसून,1,मार्कण्डेय,1,मिलन चौरसिया 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रचनाकार: कहीं दूर... कविताएँ - राजेश गोसाईं
कहीं दूर... कविताएँ - राजेश गोसाईं
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