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अपनों ने क्या - क्या नहीं कराया इस जमाने में - - नाथ गोरखपुरी

01

तेरे  नजरों  के  चारदीवारी  में  क़ैद हैं।
हाँ! हम मोहब्बत के खुमारी में क़ैद हैं।।

कौन कहता है हम तुमसे खफ़ा हो गए।
हाँ ! हम अपनी  दुनियादारी में क़ैद हैं।।

गिना जाता है हमें बाँटने वालों में अक्सर।
क्योंकि  हम  तो  हिस्सेदारी  में  क़ैद  हैं।।

क्यों  ग़ैरों  को  हमसे  देखा  नहीं  जाता?
शायद  अपनों  की  तरफदारी  में क़ैद हैं।।

सब मिलता बा'इमां' से बे'इमां' हो जाते तो।
पर 'नाथ' तो  अपनी  वफ़ादारी  में क़ैद हैं।।

02-

रात नदी है, मैं किश्ती हूँ ,
सपना मेरा तूफ़ान बना
उस तूफ़ान को पार किया तो ,
सफ़र मेरा आसान बना

बीच समंदर के मैं अंदर
अपनी दिशा में बहता था
काल तरंगें मानो बनके
मुझसे ही ये कहता था

तेरा जज़्बा तेरा साहस ,
सुन तेरा पतवार बना
रात नदी है, मैं किश्ती हूँ ,
सपना मेरा तूफ़ान बना।


03-

हमनें लहू को बहते देखा, उसकी बेबस आँखों में।
हमने उसे तड़पते देखा, उसकी बेबस बातों में।।

कौन वीर है जिसने धरा पर वायुवेग को रोका है।
हमने हवा अटकते देखा, उसकी बेबस साँसों में।।

बचपन बीता सुनते सुनते सच की जीत ही होती है
हमने सच को सिसकते देखा झूठों के जज्बातों में।।

खरी गवाही दी थी उसने सरपंचों के आँगन में।
हमने न्याय बदलते देखा नोटों की बरसातों में।।

सच प्रहरी का चोला पहने दिने उजाले में दिखता।
हमने उसे टहलते देखा जुर्म की काली रातों में।।

जिसका साया पड़ते ही खिले फूल मुरझा जाते।
हमने उसे मचलते देखा खादी संग हवालातों में।।

चन्दन टोपी से जिसने मस्जिद-मंदिर् गुलजार किया।
हमने उसे निकलते देखा , वैश्या के आहातों से।।

टूट चुका था सपना सारा ,रोटी को मोहताज हुआ।
हमने उसे सम्भलते देखा तंगी के हालातों से।।

जो आँखे आँखों को भी, पढ़ने का दम भरती थीं।
हमने उन्हें फिसलते देखा चिकनी चुपड़ी बातों पे।।

04-

किस हेतु ये मय लाल हुआ
मय बोला तो ये कमाल हुआ
हर ओर नशा इठलाता है
तब ही मय लाल हो जाता है

जब जीत जश्न जमता जमके
मय शामिल हो हलके हलके
परवाह करे अब को कलके
पागल बन जातीं हैं पलके

जब पाप कमाई देता है
अपराध सगाई देता है
तब कुछ ना दिखाई देता है
बस अहं सुनाई देता है

लफ्जों से लहू बरसता है
शब्दों का साँप सरकता है
ऐंठन का आग धधकता है
सम्बन्ध दीवार दरकता है

त्यौरियाँ चढ़ाई जाती हैं
दृष्टि दिखलाई जाती हैं
प्रतिद्वंदी धमकाये जाते हैं
जब रंग जमाये जाते हैं


तब मय रंग बदलता है
बाहर बोतल के निकलता है
पल को नहीं सम्भलता है
मानव मन को वो छलता है

सब कहते बवाल हो जाता है
और इक सवाल हो जाता है
मानव मन क्यों ना लजाता है
तब ही मय लाल हो जाता है

05-
अंधकारमय इस संसार में ,उजाले की उम्मीद में
सारी ख़ुशी बेचकर ,  हानि लाभ देखकर ,
जी रहा है आदमी...

रोके या मुस्कुराके  , दिखाके या छिपाके
फटे क़िस्मत को कर्मों के धागे से
कभी पीछे से कभी आगे से ,
सी रहा है आदमी...

रिश्ते को नाप तौल  , हल्का वजन देखकर
मधु पात्र फेंककर
कड़वे को घूंट घूंट पी रहा है आदमी...

06-

अपनों ने क्या - क्या नहीं  कराया  इस जमाने में।
मैं फिर भी खुद को ढूंढ़ता  रहा   इस  वीराने  में।।

मैंने रिश्ते  को  समझा  और समझाना भी चाहा।
हर  बार  मैं  ही  हारा  हूँ , अपनों  को  मनाने में।।

हमसे  वो  अपने  रूठ गये , गैरों  की  बात सुन।
हजारों  लम्हे  लगे  थे  , जिनसे रिश्ते बनाने में।।

ग़मों को पीकर मैंने , जिसे  ख़ुशियां  हजार दी।
कोई  कसर  ना छोड़ी उसने ,मुझको सताने में।।

जलता  रहा  खामोश , उम्र  भर  जिनके लिए।
उन्होंने  पल भर ना देर की आग को लगाने में।।

ज़माने की बातें हैं ये, इन्हें जमाने में ही रहने दे।
'नाथ' दिल से जरा सोच क्या रखा है ज़माने में।।

         -  नाथ गोरखपुरी

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