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संस्मरण - फकीरा मामा - सुनीता यादव


फकीरा मामा

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शाम होने को थी,हवा तेज चल रही थी। माँ घर में डिबिया जला रही थी। उस समय किसी कांच की शीशी के ढक्कन में छेद करके कपडे की कतरन डाल देते थे। फिर मिट्टी का तेल भरकर ढक्कन के ऊपर कतरन जलाते थे तो घर में प्रकाश हो जाता था। तभी घर के बाहर से आवाज आई--"लल्ली है क्या" ये आवाज जब कुछ तेज आई तो माँ खुश हो गई। बोली अरे--"भैया की आवाज है, फकीरा भैया आया है" जा जल्दी में मामा को अंदर ले आ। " मामा आते ही बोले लल्ली ठीक है। हाँ भैया ठीक हूं। ------आने में बडी देर कर ली,माँ ने बडी उत्सुकता से पूछा। हाँ भिन्नो (बहना) गांव से चलने में देर हो गई। फिर कुछ देर शहर में लग गई। मामा ने बडी सहजता से उत्तर दिया। ----"भैया घर तो सब ठीक है, भाभी----बच्चे ---।

माँ ने घर की खैर खबर पूछी। मामा बोले ----- "सब मौज बहार है" बस तेरी भाभी की तबीयत कभी कभी नाजुक हो जाती है" अब उमर भी तो बढ़ती जा रही है। पहले वाली बात अब कहाँ रह गई। "मामा कहते चले जा रहे थे। माँ बोली भैया हाथ मुंह धो लो और खाना खा लो,बातें फिर कर लेंगे। माँ ने गोभी आलू की सब्जी बनाई थी। माँ चूल्हे पर रोटी सेंक रही थी,और हम ले जाकर मामा को दे देते थे। हम बहुत खुश थे आज मामा आये है। कल नानी के घर जाने मिलेगा। रेल की सवारी मिलेगी। उस समय रेल की खिड़की के पास बैठकर चलते पेड देखने का आनन्द---आज की चकाचौन्ध से बहुत ऊपर था। अम्मा,पिता जी,और मामा कब तक बात करते रहे पता नहीं,हम तो सो गये थे। सुबह माँ तैयार हो गई एक कपड़े के थैले में कपड़े रख लिए। उस समय बैग किसी विरले के पास होता था। शाम को नानी के गांव चले गये। माँ दो तीन रहकर घर आ गई।

फकीरा मामा कई बार माँ को लेने आये,माँ चली जाती थी,और आ जाती थी। ऐसा साल में एक बार जून की छुट्टी में तो जरूर होता था। एक दो साल के बाद जब कुछ समझदारी आ गई थी। माँ नानी के घर गई हुई गरमी की छुट्टियों मे। तब एक दिन फकीरा मामा खाट पर बैठे,हमारे सगे मामा की दाढ़ी बना रहे थे। उस दिन पता चला मामा माँ को घर छोड कहाँ गायब हो जाते हैं। बाल मन अनेक सवाल उभर आये थे,दृश्य देख जिज्ञासा शांत होने का नाम नहीं ले रही थी। हमने माँ से पूछ ही लिया-----" माँ ये फकीरा मामा,इन वाले मामा की दाढ़ी क्यों बना रहे हैं। " माँ ने बडी सहजता से उत्तर दिया-------"भैया ये हमारे घर के नाई है" उस दिन पता चला कि ये हमारे सगे मामा नहीं हैं। पर माँ ने कभी ऐसा आभास नहीं होने दिया कि ये हमारे सगे मामा नहीं हैं। घर आने पर वही आव भगत वही सत्कार,वही प्यार।

आज को देखकर लगता है कि उस पीढी में कितनी आत्मीयता थी। ना हिन्दू मुसलमान का भेद,ना अपने पराये का कोई अन्तर। फकीरा मामा मुसलमान थे। और हमारे मामा के घर के नाई । पर माँ जो आदर सत्कार फकीरा मामा का करती थी। उसे याद करके आज मन गर्व से ऊंचा हो जाता है। और मामा थे जो माँ के पास कभी खाली हाथ नहीं आये। कुछ भी नहीं तो गुड ले आते थे-----"फकीरा मामा"---।

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