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जवाब (लघुकथा) - मनीष कुमार पाटीदार

जवाब (लघुकथा)

आशा घर का सारा काम समय पर कर लेती थी। सुबह जल्दी उठना, बच्चों को तैयार कर स्कूल भेजना, माँ - बाबूजी, प्रकाश के लिए चाय नाश्ता बनाकर देना इत्यादि। आशा जैसी गृहिणी सम्मान की पात्र थी फिर भी सास ससुर उसे बात - बात पर टोकते रहते।''ऐसा करो - वैसा करो, भोजन में नमक मिर्च कम इस्तेमाल करो, कम चीनी की चाय बनाया करो।

आशा माँ - बाबूजी का कहना मान लेती थी और उनकी इच्छानुसार रसोईघर में काम करती थी। आशा सरल स्वभाव की थी तथा कभी किसी बात पर गुस्सा नहीं करती थी। माँ - बाबूजी उससे रुखा व्यवहार करते आये मगर वह कोमल हृदय की प्रेम देती रही।

समय के साथ स्वभाव में परिवर्तन आ ही जाता है मगर आशा के स्वभाव में कोई परिवर्तन नहीं आया। माँ बाबूजी पता नहीं किस बात पर अपनी संस्कारी बहू से घृणात्मक व्यवहार करने लगे। आशा भी कभी - कभी सोच लेती और संयम से काम लेती आई।

आखिर एक दिन उसने माँ जी से पूछ ही लिया - ''माँ जी मुझे इस घर में आये तीन साल हो गये मगर अभी तक मैंने आपको और बाबूजी को कभी शिकायत का मौका नहीं दिया काम को लेकर, फिर आप इस तरह का व्यवहार क्यों करते हो जबकि आपने ही शादी के मंडप में मेरे माँ पिताजी के सामने बेटी की तरह रखने का वचन दिया था।'' माँ जी ने मुँह फुलाते हुए कहा - ''शादी के तीन साल हो गये मगर अब तक हम दादा दादी बनने के लिए तरस रहे हैं, क्या चाहती हो कि हम ऐसे ही रहे? डॉक्टर बाबू की रिपोर्ट भी यही कहती है कि तुम कभी माँ नहीं बन पाओगी। बांझ बनकर इस घर को तुम दीमक की तरह खोखला कर दोगी।'' आशा यह सब सुनकर निरुत्तर रह गई। उसके पास माँ जी के सवाल कोई जवाब नहीं था।

प्रेषक

मनीष कुमार पाटीदार

ग्राम + पोस्ट ईटावदी , तहसील महेश्वर, जिला खरगोन (म॰ प्र॰) 451224

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