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माँ और ज्योतिष - हंसा कमलेश

माँ और ज्योतिष

राजे रजवाड़ों की जमीन पर, राजस्थान की मीठी सी बोली के एक शहर जोधपुर में गुलाब और इत्र फुलेल की सुगंध के बीच एक किलकारी गूंजी और माँ मुझे नाना के घर से दादाजी के घर राजगढ़ ले आई। नानाजी राजज्योतिषाचार्य थे। उनके घर दास दासियाँ माँ के आसपास होती थी। माँ अकेली तीन भाइयों की इकलौती बहन और नानाजी नानी जी की इकलौती लाड़ली बिटिया सो एक दासी माँ के सिरहाने खड़ी होती थी। पर माँ भौतिक सुख-सुविधाओं से ही समृद्ध नहीं थी। नाना नानी ने माँ को जीवट बनाया था, माँ को संघर्ष करने की आदत उन्होंने घूंटी के साथ पिलाई थी। नाना के घर में जहां माँ को कुछ नहीं करना पड़ता था, वही दादी के घर में झाड़ू, बर्तन से लेकर घर आंगन गोबर तक से लीपना पढ़ता था। पर माँ ने कभी शिकायत नहीं की। माँ को मैंने हंसते मुस्कुराते काम करते देखा।

मैंने माँ को भारतीय संस्कृति के अनुरूप जीते देखा भारतीय संस्कृति में हर दिन एक पर्व और उत्सव के रूप में मनाया जाता है और माँ हर दिन को, हर पर्व को और हर उत्सव को जीती रही है। माँ बहुत धार्मिक है क्योंकि वह आज भी मेरे साथ है। मुझे याद आते हैं बचपन के वो दिन जब कार्तिक के महीने में सुबह मुंह अंधेरे माँ 4:00 बजे अपने कपड़ों की छोटी सी पोटली को कांख में दबाए धीरे-धीरे दरवाजे से बाहर होती थी और मैं पल्ला पकड़ कर बाहर हो जाती थी, बाबूजी की नींद ना खुले, दादी की नींद ना खुले, मेरे रोने, इस डर से मां मुझे अपने साथ ले जाती थी। न जाने कितने कार्तिक के महीनों को मैंने अपनी माँ के साथ तब तक जिया जब तक मैं ससुराल की देहरी पर ना आ गई। माँ का आशीर्वाद कुछ ऐसा मिला कि मेरा आशियाना भी नर्मदा के किनारे बस गया।

आज मैं भी तमाम रीति-रिवाजों के साथ माँ को याद करते हुए हर पल नर्मदा के किनारे होने के सुख को जीने लगी, क्योंकि नर्मदा का किनारा किनारा नहीं वहां जीवन सांसें लेता है, वहां आस्था जीती है, वहां विश्वास डुबकी लगाता है और यह सब कुछ मैंने अपनी माँ के साथ सीखा ही नहीं, माँ के साथ जिया भी। इतना ही नहीं मेरे दादाजी ने माँ के सपने को पूरा किया और उन्हें स्कूल में शिक्षिका के पद पर लगा दिया। शिक्षिका बनते ही तो मां के हाथों में पूरा का पूरा आसमान आ गया। उन्होंने हम काका बाबा के भाई बहनों को साहित्य का समृद्ध संसार दे डाला। गर्मी की छुट्टियां लगती और बचपन में बाल साहित्य आ जाता था। बड़े हुए तो प्रेमचंद, महादेवी वर्मा, जयशंकर प्रसाद, शरत चन्द, भगवती चरण, हजारी प्रसाद द्विवेदी धीरे-धीरे घर में आने लगे। हरिवंश राय बच्चन का नीड़ का बसेरा याद आता है जब मैं देखती हूं अपने बसेरे को। अमृता प्रीतम जब घर में कोरे कागज के साथ आई तो वो सचमुच मेरे कोरे दिल के केनवास पर अपने हस्ताक्षर छोड़ गई।

समय बीतता गया, घर में ज्योतिषी आए और उन्होंने कह दिया मेरे हाथ में शिक्षा नहीं है, मैं कुछ नहीं कर पाऊंगी। माँ का चेहरा सफेद हो गया पर अगले ही पल वो उठी और ले गई अंदर और झनझनाती आवाज के साथ गाल लाल हो गया, सुन्न कानों ने भी सुनी वो गरजती हुई आवाज हम हैं तो किस्मत है, किस्मत से हम नहीं। खबरदार जो एक भी आंसू गिराया, उठो और लक्ष्य तय करो। आज माँ गर्व से कहती है ये मेरी सबसे छोटी बेटी है।

हंसा कमलेश

होशंगाबाद

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