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व्यंग्य " जिंदा होने का प्रमाण" - हनुमान मुक्त

आंधियों की जिद है, जहां बिजलियां गिराने की ।

हमारी भी जिद है ,वहीं आशियां बनाने की।

उसूलों पर आंच आए ,तो टकराना जरूरी है ।

अगर जिंदा हो तो, जिंदा नजर आना जरूरी है ।

उनके उसूलों पर आंच आने  लगी और वो टकरा गए ।उन्होंने जैसे ही अपने  जिंदा होने का प्रमाण दिया। मंत्री जी का सिंहासन डोलने लगा।  आनन-फानन में अपने सभी दौरो को रद्द किया। आंधी और बिजली को काबू में किया और सभी को एक साथ अपने आशियां में बैठ कर बात करने का न्योता दे दिया ।

सभी दुखियारे इकट्ठे हो गए। दुख की इस घड़ी में साथ रहना जरूरी है ।

पता नहीं कब कैसी आंधी चल जाए और वे टीन टप्पपर के घरौंदो की तरह हवा में उड़ जाए इसलिए उन्होंने एक दूसरे का हाथ थाम कर अपने आप को वजनदार बनाने का प्रयास करना शुरू कर दिया।

उन्होंने सुख में सब साथी दुख में ना कोय चरितार्थ नहीं होने दिया। दुख में भी वे इकट्ठा होने का स्वांग करने लगे। 

चोर चोर मौसेरे भाई की तर्ज पर दुखिया दुखिया भाई भाई इकट्ठा हो गए ।

उन्होंने हिंदू मुस्लिम भाई-भाई के नारे को भी बुलन्द नहीं किया। सिर्फ दुखिया दुखिया भाई-भाई के नारे को ही बुलंद किया । वे कितने वजनदार है यह तो आंधियों की ताकत से ही पता चलेगा। वे कितनी तेजी से चलती है और उड़ा पाती है या नहीं। दूसरी ओर वे अपने उसूलों पर कायम थे। उन्होंने इनके  उसूलों को आंच  देने का प्रयास किया था। आंच ही नहीं बल्कि उसूलों को जलाने का प्रयास किया था। साल भर से उनके उसूल उनकी आंच से तप  रहे थे ।

तपन से  वे सुलग रहे थे ,धीरे-धीरे। हल्का-फुल्का धुंआ भी उठ रहा था ।इसको वे नजरअंदाज कर रहे थे।इसे वे उनकी कमजोरी मान  रहे थे। उनके काफी मना करने के बाद भी उन्होंने तपन देना कम नहीं किया ।आखिर उन्हें भभकना था और वे भभक उठे  तेजी से  फक से....।

आजकल डोक्यूमेंटेशन का जमाना है। आप के डाक्यूमेंट्स पूरे होने चाहिए। आप यदि पेंशन धारी है ।आप जिंदा है, बैंक जाकर प्रत्येक माह कैशियर से, बैंक मैनेजर से जाकर मिलते हैं। तब भी आपको हर साल बैंक को आपके जिंदा होने का प्रमाण देना जरूरी है। लिखित रूप से। गजेटेड ऑफिसर से प्रमाणित।

कि आप जिंदा है उस ऑफिसर ने आपको फला तारीख को जिंदा देखा है ।आप कितना ही उछल कूद मचाओ। धमाचौकड़ी मचाओ।

इससे काम नहीं चलेगा। कितना ही उनसे कहो कि भैया हम जिंदा है हमें जिंदा मान लो लेकिन वे नहीं मानेंगे ।जब तक आप कोई लिखित डाक्यूमेंट्स  पेश नहीं कर देते। उन्हें पेश करना ही पड़ेगा।

उनके साथ भी ऐसा ही हुआ । उनके जिंदा होने का प्रमाण मांगा गया।

उन्होंने लिखित डाक्यूमेंट्स पेश नहीं किया तो उन्हें मृत मान लिया गया ।आखिर उनकी भी सीमा थी कब तक अपने आप को ऐसी स्थिति में पड़े रहने देते।

उन्होंने अपनी जिंदादिली से अपने जिंदा होने का सबूत पेश कर दिया।

उन्होंने विधायकों की परेड करवा दी। लिखित में इस्तीफे दिलवा दिए।  अब इससे ज्यादा लिखित डाक्यूमेंट्स क्या चाहिए?

उनके डाक्यूमेंट्स देखते  ही वे दुहाई देने लगे हैं ।भैया हम तो आपको पहले भी जिंदा मान रहे थे। ऐसा सब करने की क्या जरूरत थी ।हम तो पहले से ही दुखियारे हैं। हमारी उम्र का ख्याल रखो। अपनी प्रतिष्ठा का ध्यान रखो । यहां हमने तुम्हें इतना सम्मान दिया है। इस सम्मान का ध्यान रखो।

वे अपनी बात पर कायम थे। उसूलों पर आंच आए ,तो टकराना जरूरी है।

अगर जिंदा हो तो ,जिंदा नजर आना जरूरी है।

अब वे उनको जिंदा नजर आने लगे हैं।


#हनुमान मुक्त

93,कान्ति नगर

गंगापुर सिटी (स.मा.)

राजस्थान

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