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अंतराष्ट्रीय महिला दिवस - "अनुपालनीय संस्कृति आधार " - कुमारी पिंकी

 


कुमारी पिंकी

अंतराष्ट्रीय महिला दिवस


"अनुपालनीय संस्कृति आधार "

""""राष्ट्र को नमन करें
विश्व में सफल बनें"""


घर की आन है देश की है  शान।

नारी जीवन दायिनी पाये सकल सम्मान

नारी के अंदर बसे रूप शीलगुण ज्ञान
त्याग क्षमा गहना है।
  नारी जग का आधार।
जननी सकल परिवार॥


हर वर्ष 8 मार्च को पूरे विश्व में महिला दिवस मनाया जाता है।

अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस महिलाओं के प्रति सम्मान व्यक्त करते हुए:-

सम्मान प्रशंसा और महिला के प्यार को जाहिर कर के महिला दिवस उत्सव के रूप में मनाया जाता है।

महिलाओं की आर्थिक सामाजिक और राजनैतिक उपलब्धि पर आधारित अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस।

आज से लगभग सौ वर्ष पहले अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस की शुरुआत हुई थी।

क्लारा जेटकिन* जो कि मार्क्सवादी कार्यकर्ता थी। उन्होंने ही महिला दिवस की शुरुआत की।

क्लारा जेटकिंग मार्क्सवादी कार्यकर्ता होने के कारण महिलाओं के अधिकारों के प्रति सजग और सक्रिय थी ।और उन्होंने ही महिलाओं को अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस मनाने का संदेश दिया।

सन 1910 ईस्वी में कोपेनहेगन में कामकाजी औरतों की एक इंटरनेशनल कांफ्रेंस आयोजित हुई । और उसी में महिला दिवस मनाने का निश्चय किया गया।

उस कॉन्फ्रेंस में 17 देशों की 100 से भी ऊपर महिलाएं मौजूद थी और उन्होंने अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस मनाने के सुझाव का समर्थन किया और उसी समय से पूरे विश्व में धीरे-धीरे अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस मनाया जाने लगा।

सबसे पहले 1911 एसपी में ऑस्ट्रिया डेनमार्क जर्मनी और स्विट्जरलैंड में अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस मनाया गया।

इस वर्ष सन् 2019 ईस्वी में हम 107 वां अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस मना रहे हैं ।जो हमारे लिए बहुत ही गौरव की बात है ।और महिलाओं के लिए सराहनीय प्रयास है उन्हें आगे बढ़ने में निरंतर प्रगति करने में।

सन 1975 में महिला दिवस को आधिकारिक मानता दी गई संयुक्त राष्ट्र संघ ने वार्षिक तौर पर मनाने का निश्चय किया और अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस की थीम की शुरुआत हुई ।

1988 में 15000 महिलाओं ने न्यूयॉर्क सिटी में वोटिंग अधिकारों के तहत काम के घंटे काम करने के लिए और बेहतर वेतन देने के लिए मार्च निकाला ।1 साल बाद अमेरिका की सोशलिस्ट पार्टी की घोषणा के अनुसार 1911में यूनाइटेड स्टेट में पहली राष्ट्रीय महिला दिवस 28 फरवरी को मनाया और 1910 ईस्वी में सोशल डेमोक्रेटिक पार्टी की महिला अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस बनाने का विचार रखा ।और उन्होंने सुझाव दिया कि महिलाओं को अपनी मांगों को आगे बढ़ाने के लिए खुद आगे बढ़ना होगा और सरकार से स्वीकार कराना होगा।

महिलाओं का अमूल्य योगदान हर क्षेत्र में है जैसे:-

अध्यापन में कार्यरत आकाशवाणी दूरदर्शन की अप्रूव्ड स्क्रिप्ट राइटर निर्देशिका अभिनेत्री कवियत्री संपादक समाजसेविका घर सेविका एयर पायलट व्यवसाई साहित्य के क्षेत्र में।

सामाजिक ,सांस्कृतिक क्षेत्र ,धार्मिक क्षेत्र, भौगोलिक क्षेत्र और साहित्य जगत में नारी के विभिन्न स्वरूपों का रूप देखने को मिलता है।

वाह्य और आंतरिक अंतर्मन के सुंदर आत्मिक सौंदर्य का रहस्यमय उद्घाटन नारी के मन में होता है ।और प्रकृति एवं ईश्वर द्वारा प्रदत अद्भुत पवित्र साध्य नारी है ।जिसे महसूस करने के लिए पवित्र साधना का होना जरूरी है ।उस सीमा की ना तो कोई सरहद है। और ना ही कोई छोर। है यह तो एक विराट स्वरूप है जिसके आगे स्वयं विधाता भी नतमस्तक हैं यह नारी के लिए अद्भुत वरदान होने के साथ-साथ दिव्य औषधि भी है ।नारी ही वह सोंधी मिट्टी है जो जीवन बगिया को महकाती है। वह व्यक्तित्व के निर्माण के साथ-साथ राष्ट्र के निर्माण में , विकास में अपनी योग्य भूमिका निभाती है ।नारी के लिए यह कहा जाए कि विविधता में एकता है तो यह अतिशयोक्ति नहीं होगी क्योंकि नारी का बाह्य स्वरूप सौंदर्य पहनावा में तो विविधता का होता है ।लेकिन केंद्रीय शक्ति ईश्वर में ही स्थिर होती है ।यह गुण सभी महिलाओं में होता है। इसी शक्ति के इर्द-गिर्द सूर्य और चंद्रमा की भांति सद्गुण जैसे:- विश्वास, प्रेम ,करुणा, निष्ठा, दया ,समर्पण, त्याग, बलिदान ,ममता, शीलता ,स्नेहलता, कर्तव्य परायणता, सहनशीलता ,मर्यादा, समता ,सृजनशीलता और सहिष्णुता का गुण महिला में मौजूद होता है इस शक्तियों के परिणाम स्वरुप महिलाओं का राष्ट्र निर्माण और विकास में योगदान अतुलनीय और सराहनीय है। महिलाओं में विद्वान साहित्य का गुण गुणवत्ता पूर्ण बनाता है ।अनेक महिलाओं ने साहित्य सृजनशीलता के क्षेत्र में अतुल योगदान दिया है। अपना विशेष योगदान जैसे :-महादेवी वर्मा, अमृता प्रीतम, मीरा, आशा पूर्णा, महाश्वेता देवी , झूंपा लाहिरी और सुभद्रा कुमारी चौहान आदि कालजई साहित्य की रचना की है ।जो व्यक्तित्व के विकास के साथ-साथ अध्यात्मिक और नैतिक विकास को भी बल एवं नया आधार प्रदान करता है ।और राष्ट्र निर्माण के स्वर मुखर होते हैं उनके भव्य भावात्मक अभिव्यक्ति नई दिशा मिलती है। और हम कह सकते हैं कि महिलाओं ने अपने कर्तव्य कर्मठता और क्षमता के माध्यम से राष्ट्र के निर्माण में अभूतपूर्व योगदान दिया है ।आज की नारी पुरुषों के समान ही सुशिक्षित और विकसित है।

कई देशों में महिला दिवस के अवसर पर राष्ट्रीय अवकाश की घोषणा की जाती है रूस और कई देशों में तो उस दिन दुकानों में फूल की कीमत भी बढ़ जाती है और पैसा देने पर भी फूल नहीं मिलता है इतना महिला को सम्मान फूल द्वारा दिया जाता है ।चीन में ज्यादातर दफ्तरों में महिलाओं के लिए आधे दिन की छुट्टी होती है। वहीं अमेरिका में 8 मार्च को विमेन हिस्ट्री मंथ के तौर पर मनाया जाता है।

आज महिलाएं हर क्षेत्र में आगे हैं लेकिन पहले इस प्रकार की आजादी नहीं था ।अतीत पहले इससे भिन्न था ।पहले महिला इतनी पढ़ी-लिखी नहीं थी ।वह नौकरी भी नहीं कर पाती थी ।और उन्हें वोट डालने का अधिकार भी कम ही मिलता था। उन्हें घर से बाहर निकलने की आजादी नहीं थी। मुस्लिम महिलाओं को और पर्दानशीं होने के कारण किसी क्षेत्र में अधिकार प्राप्त नहीं था। महिलाओं के अपनी कर्मठता के बल पर आज इतनी विकसित वृद्धि प्राप्त हुई है। और यह सब उनकी स्वतंत्र सोच की देन है। राष्ट्र निर्माण में महिलाओं की भूमिका अविस्मरणीय है।

भारतीय संस्कृति में पूर्व से ही महिलाओं के सम्मान को बहुत महत्व दिया गया है।

संस्कृत में एक श्लोक है कि :-यस्य पूज्यंते नार्यस्तु तत्र रमंते देवता।

अर्थात जहाँ नारी की पूजा होती है तो वहां देवताओं का निवास होता है।
किंतु वर्तमान में हालात अलग है।
नारी का अपमान चिंतन का विषय है।
उसे भोग की वस्तु समझकर आदमी इस्तेमाल कर रहा है। जो घोर चिंता का कारण है।

भारतीय सभ्यताओं और संस्कृति को बनाए रखने के लिए नारी के सम्मान को कैसे बनाये रखें इस पर विचार करना नितांत आवश्यक है।

नारी के सम्मान को सुरक्षित रखना देश वासियों का प्रथम प्रयास व दायित्व होना ही अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस पर उचित सम्मान
होगा।

नारी विधाता की सर्वोत्तम सृष्टि है ।नारी की सूरत और सीरत की गहनता एवं पराकाष्ठा को मापना नामुमकिन है।

राष्ट्र के निर्माण में एवं विकास में उसकी अपनी महती भूमिका है। जिसका निर्माण नारी ने स्वयं किया है।

विश्व प्रसिद्ध महिलाओं ने अपने मन क्रम वचन के बल पर विश्व में अपना कीर्तिमान स्थापित किया है।

हम श्रीमती इंदिरा गांधी का उदाहरण ले उन्होंने अपने कर्म के बल पर विश्व को थर्राकर इतिहास राजनीति में अपना नया कीर्तिमान स्थापित किया है। इंदिरा गांधी ने अपनी दृढ़ संकल्प के बल पर भारत और विश्व की राजनीति को प्रभावित किया है।

महामहिम श्रीमती इंदिरा गांधी को लौह- महिला की उपाधि यूं ही नहीं मिली है यह उनके अथक प्रयासों का फल है।

कहा जाता है कि महिलाएं किसी भी क्षेत्र में पीछे नहीं और एक पुरुष के निरंतर बढ़ने में एक महिला का हाथ होता है ।इसका उदाहरण हमें कस्तूरबा गांधी से बखूबी मिलती है।

कस्तूरबा गांधी ने महात्मा गांधी का बायां हाथ पकड़ कर कंधे से कंधा मिलाकर देश को आजाद कराने में जो योगदान दिया है वह कभी भुलाया नहीं जा सकता है।

बच्चों में संस्कार भरने का काम माता के द्वारा ही होता है और मां का स्वरुप संसार में अति उत्तम है। नारी को मां होने का वरदान ईश्वर का अनुपम देन है।

बचपन से ही हम सुनते आए हैं कि माता ही प्रथम गुरु होती है। मां के व्यक्तित्व का नकारात्मक और सकारात्मक दोनों प्रभाव बच्चों पर पड़ता है ।
और अपने संस्कारों की बगिया से बच्चों को इस प्रकार सींचती है कि निखर कर कली सुंदर फूल बनकर देश की सेवा में उभर कर आते हैं।
 
विश्व विकास के साथ देश विकास भी सुनिश्चित होता है॥

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कुमारी पिंकी  दरभंगा बिहार

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